शुक्रवार, 29 मई 2009

पिशाचों से बचालो देश को

तुम सो रहे हो नोजवानो
देश बिकता है,

तुम्हारी संस्कृति का है खुला
परिवेश बिकता है।

सिंहासनों के लोभियों के हाथ में पड़कर ,

तुम्हारे देश के इतिहास का
अवशेष बिकता है ।

पिशाचों से बचालो देश को,
अभिमान ये होगा,

तुम्हारा राष्ट्र को अर्पित किया
सम्मान ये होगा।

ये आतंकियों को यूँ यदि
सर पे चढायेंगे,

हमलावरों को राष्ट्र के बेटे बताएँगे,

जगह जिनकी है केवल जेल में,

उन्ही दरिंदों को,

लहू जो स्वार्थ में,इस देश का

इनको पिलायेंगे।

सपूतों के बहाए रक्त का
अपमान ये होगा,

शहीदों का हुआ सब व्यर्थ ही
बलिदान ये होगा।

पिशाचों से बचालो .......................

ये आतंकी इरादों को
नजरअंदाज करते है,

जिहादी युद्ध को कुछ
सिरफिरों का खेल कहते है,

वतन, आतंकियों की चाह के
माकूल करके ये,

महज सत्ता की खातिर
देश को गुमराह करतेहैं।

यही होता रहा तो

देश अब शमसान ये होगा,

chamakte सूर्य से इस देश का
अवसान ये होगा।

पिशाचों से ....................................................

चलो इस देश का नवजागरण

तुमको बुलाता है।

समर का तुमको आमंत्रण ,

वह तुमको बुलाता है।

चलो आलोक लेकर के

अँधेरा काट दे इसका,

है तुमपे देश का जो ऋण ,

वह तुमको बुलाता है।

तुम्हारे हर कदम की ताल से,

जयगान ये होगा ,

पुनः सिरमोर दुनिया का,

रे हिंदुस्तान ये होगा।

भविष्य के वतन की पीढियों को

दान ये होगा।

तुम्हारा राष्ट्र को ...............

(रचनाकार...... मेरे पिता श्री देवेन्द्र सिंह त्यागी)



मंगलवार, 26 मई 2009

गीता के काव्य अनुवाद का कुछ अंश


गीता काव्य-पीयूष - (श्रीमद्भगवद्गीता हिन्दी भाषा-काव्यानुवाद से उद्धृत)

स्वतः प्राप्त हे पार्थ ! खुले यह, स्वर्ग-द्वार के जैसा।
भाग्यवान क्षत्री ही करते, युद्ध प्राप्त हैं ऐसा।।
नष्ट हुए कुल-धर्म मनुज का, वास अनिश्चित पल तक।
हे जनार्दन! सुना गया है, सदा नर्क में अब तक।।१/४४।।

इस देही को शैशव , यौवन , जरा यथा है आता।
है अन्य देह भी वैसे, मोहित, विज्ञ नही हो जाता।।२/१३।।

विज्ञ-अरि इस तृप्ति-हीन,इस काम-अनल के द्वारा।
हे कौन्तेय ! सब ज्ञान मनुज का, ढका हुआ है सारा।।३/३९।।

अधर्म - वृद्दि और नाश धर्मं का , जब-जब भारत होता।
स्वयं जन्म मैं इस धरती पर, तब-तब आकर लेता।।४/७।।

करने दुष्टों का नाश और , भक्तो की रक्षा हित में।
युग-युग में लेता जन्म, धर्म को करने स्थापित मैं।।४/८।।

ब्रह्म-समर्पित कर कर्मों को, संग-रहित करता जो।
जल से पद्य्न-पत्र-सम अघ में, लिप्त नहीं होता वो।।५/१०।।

चंचल, प्रमथनशील और, अत्यंत बलि ये मन है।
वायु-सम ही इसे रोकना, मधुसूदन ! अति कठिन है।।६/३४।।

चार तरह के पूत मनुज हैं, करते मेरा अर्चन।
हे भरत ! आर्त-जिज्ञासु-अर्थी, और महाज्ञानी जन।।७/१६।।

जिस समय प्राप्त होते मृत योगी, अनावृति- आवृति को।
कहता हूँ अर्जुन भरत श्रेष्ठ !, तुझ से उस काल-गति को।।८/२३।।

गतियुक्त बली सर्वत्र पवन ये, ज्यों स्थित है नभ में ।
उसी तरह तू समझ भूत ये, सारे स्थित मुझ में।।९/६।।

हूँ आदि-अंत -मध्य में स्थित, मैं , गुडाकेश ! भूतो के।
हूँ मैं ही स्थित जीव सभी के, अन्तर में जीवो के।।१०/२०।।

मेरे हेतु कर्म-युक्त, मत्परम-भक्त मेरा अर्जुन जो।
अनासक्त, निर्वैर, पाण्डव !, है होता प्राप्त मुझे वो।। ११/५५।।

न स्थिर रख सकता मुझ में, तू यदि धनञ्जय मन को।
कर प्रयत्न अभ्यास योग से, तू पाने का मुझ को।।१२/९।।

वह ज्योतियों की ज्योति, तमस से परे कहा है जाता।।
ज्ञान, गेय, ज्ञानगम्य उरो में, है सबके वो रहता।।१३/१७।।

प्रकृति-सम्भव, सत्व-रजो-तम, हे अर्जुन त्रिगुण ये ही।
बाँध देह में देते ये हैं, ये अविनाशी देही।।१४/५।।

होता ज्ञान उत्पन्न सत्व से, होता लोभ रजस से।
अज्ञान, मोह, प्रमाद पनपते, अर्जुन अरे तमस से।।१४/१७।।

करता प्रकाशित तेज सूर्य-गत, जो इस पूर्ण जगत को।
चंद्र-अनल में तेज व्याप्त जो, जान मेरा ही उसको।।१५/१२।।

काम-क्रोध और लोभ तीन ये, अर्जुन ! द्वार नरक के।
ये तीनो ही त्याज्य अतः हैं, कारक आत्म-पतन के।।१६/२१।।

रहना स्थित तप-दान-यज्ञ में, सत ही है कहलाता।
उस से सम्प्रक्त पार्थ ! कर्म भी, सत ही कहा है जाता।।१७/२७।।

सम्पूर्ण भूत के उर में अर्जुन !, रहता स्थित ईश्वर।
निज माया से उन्हें घुमाता, बैठा तन-यंत्रो पर।।१८/६१।।

योगेश कृष्ण ‘औ’पार्थ धनुर्धर, हैं विद्यमान जहाँ पर।
है मेरे मत से अचल क्षेम , श्री-नीति - विजय वहां पर।। १८/७८।।

(अनुवादक ---मेरे पिता श्री देवेन्द्र सिंह त्यागी )









शुक्रवार, 22 मई 2009

दिल्ली सल्तनत इतिहास के दो सुनहरे वर्ष

अलाउद्दीन की हत्या के बाद उसका पुत्र मुबारक अपने सभी विरोधिओं कोकत्ल करने के बाद दिल्ली का सुलतान बन बैठा । उसकी इस कार्य में सबसे अधिक सहायता उसके सेनापति खुसरुखान ने की। खुसरुखान एक हिंदू गुलाम था। १२९७ में मालिक काफूर ने जब गुजरात पर आक्रमण किया था,तब एक सुंदर व तेजस्वी लड़का गुलाम के रूप में पकड़ा गया। जो अल्लाउद्दीन को सोंप दिया गया। उस हिंदू लड़के को इस्लाम में दिक्षितकिया गया तथा उसका नाम हसन रखा गया। धीरे धीरे हसन एक वीर योद्धा बनता चला गया। मुबारक के सुलतान बनने पर वह खुसरुखान के नाम से उसका सेनापति बना।
गुजरात के राजा की पुत्री देवल देवी को भी मालिक काफूर युद्ध में उठा लाया था,और अलाउद्दीन के पुत्र खिज्र्खान से जबर दस्ती उसका निकाह पडवा दिया। गुर्जर वंश की यह राजकन्या खिज्र्खान की हत्या के बाद सुलतान मुबारक के हट लग गई,और मुबारक ने उससे निकाह कर लिया।
हिंदू बालक से हसन व हसन से खुसरुखान बने युवक के दिल में अपने पुराने धर्म व अपने राष्ट्र के लिए अपार प्रेम जाग्रत था। इसी ज्वाला में हिंदू गुर्जर राजकन्या देवल देवी भी धधक रही थी । इसी कारण खुसरुखान ने एक दूरगामी योजना बना डाली। सुलतान मुबारक के अतिविश्वास पात्र होने के कारण खुसरुखान का महल में बेरोकटोक आना जाना था। खुसरुखान ने सुलतान को विश्वास में लेकर गुजरात की अपनी पुरानी हिंदू जाती परिया(पवार)के चुने हुए लगभग २०००० युवा सेना में भरती कर लिए .ये सारी योजनाएं महल में बन रही थी। देवल देवी इन योजनाओं में खुसरू का पूरा साथ दे रही थी।महल के भीतर भी सारे अंग रक्षक व पहरेदार भी बदल डाले गए।समय आने पर खुसरुखान ने मुबारक को मोंत के घाट उतर दिया.और नसुरुद्दीन के नम से दिल्ली का सुलतान बन गया। देवल देवी से उसने हिंदू रीतिरिवाज से विवाह किया।
उसने नसुरुद्दीन (जिसका अर्थ होता है धर्म रक्षक ) के नाम से ही अपने को हिंदू सम्राट घोषित कर दिया। जेल में पड़े सभी हिन्दुओं को छोड़ दिया गया। जबरदस्ती मुस्लमान बनाए लोगो का शुद्धिकरण कराय जाने लगा। जजिया समाप्त हो गया। नए हिंदू सम्राट ने हिंदू व मुस्लिम सैनिको दोनों की पगार बढ़ा दी। परंतु मुस्लिम सेना ने समय आने पर सुलतान के साथ धोखा किया.
अब इतना कुछ होने पर मुस्लिम समाज विरोध होनाथा।नसुरुद्दीन की ताकत के सामने २ वर्ष तक तो सब ठीक रहा। परंतु २ वर्ष बाद पंजाब प्रान्त के शासक गयासुद्दीन ने अपनी ताकत बढ़ा ली और दिल्ली पर काफिर के शासक को ख़त्म करने के लिए उस पर आक्रमण कर दिया। हिंदू सम्राट नसुरुद्दीन की मुस्लिम सेना समर छेत्र में पंजाब के शासक के साथ मिल गई। बचे हुए हिंदू वीर वीरता से लड़े परंतु नसुरुद्दीन के साथ युद्ध में वीरगति को प्राप्त हो गए.रानी देवल ने भी महल से कूदकर अपनी जान दे दी। नसुरुद्दीन का नाम भारतीय इतिहास में स्वर्ण अक्षरो में लिखा जाना चाहिए था। परन्तु इतिहासकारों ने दिल्ली सल्तनत के २ सुनहरे वर्ष बिल्कुल भुला दिए।

मंगलवार, 19 मई 2009

रानी पद्यमिनी का जोहर, विश्व इतिहास की सबसे वीरोचित व अदभुत घटना

जब गोरा और बादल जैसे वीर राजपूत अपने प्राणों की आहुति देकर अलाउद्दीन खिलजी जैसे नरपिशाच के जबड़े से चित्तोड़ के राणा भीम सिंह(इतिहास में कई स्थान पर राणा भीम सिंह के नाम के स्थान पर राणा रतन सिंह भी लिखा है। )को निकाल ले गए,तब अलाउद्दीन गुस्से से पागल हो गया। उसने निरीह हिंदू जनता का कत्लेआम शुरू कर दिया, आस पास के गावों की हजारों हिंदू स्त्रियों के शीलभंग होने लगे । चित्तोड़ के दुर्ग के अन्दर इसका प्रतिशोध लेने की तैयारी शुरू हो गई। १० वर्ष के बालक से ८० वर्ष तक के वृद्ध हिंदू वीरों ने सर पर केसरिया बाना बाँध लिया। लगभग ५००० हिंदू वीर १००००० इस्लामिक दानवों से टकराने को तैयार हो गए।
अब अन्तिम विदाई का समय आ गया था। सभी को पता था की युद्ध छेत्र में क्या होने वाला है। दुर्ग के भीतर रानी पद्यमिनी व अन्य हिंदू वीरांगनाओं ने भी इस यज्य में अपने प्राणों की आहुति देने की तैयारी कर ली थी। कोई भी स्त्री इस्लामिक दानवों के हाथ में नही पड़ना चाहती थी।
अब विश्व इतिहास की वो वीरोचित घटना घटने वाली थी जिसे पड़ने व सुनने से प्रय्तेक हिंदू का सर गर्व से उठ जाता है और आँखे नम हो जाती है। दुर्ग के मध्य में एक बहुत बड़ा गड्ढा खोद कर एक हवन कुण्ड बनाया गया। सर्व प्रथम बहनों ने भाइयों को राखी बंधी और उस हवन कुण्ड में प्रवेश किया। उसके पश्चात् पिताओं ने अपनी छोटी-छोटी लड़किओं व लड़कों की अपने हाथों से उस हवन में आहुति दी।सबसे बाद में रानी पद्यमिनी ने हिंदू वीरांगनाओं के साथ अपने अपने पतियों के तिलक किए और जय हर के उद्दघोशो के साथ पवित्र अग्नि में प्रवेश कर लिया। यही इतिहासिक घटना रानी पद्यमिनी के जोहर की घटना है।
जय हर के घोशों से दुर्ग के बहार इस्लामिक दानव दहल उठे थे। दुर्ग के द्वार खुले और ५००० अलबेले हिंदू वीर यज्य की अन्तिम आहुति में अपने प्राणों की आहुति देने के लिए अलाउद्दीन की १००००० की सेना पर टूट पड़े। राणा भीम सिंह के साथ सभी हिंदू वीर वीरगति को प्राप्त हुए। अलाउद्दीन की सेना के लगभग १२००० दानवों को जहन्नुम पहुँचा दिया गया।
रानी पद्यमिनी के जोहर की घटना विश्व इतिहास की सबसे वीरोचित व एक अदभुत घटना है। ऐसी वीरांगनाओं के बलिदान को हर हिंदू को नमन करना चाहिए।

बुधवार, 13 मई 2009

विश्व इतिहास की सबसे साहसिक घटनाओं में से एक

दिल्ली के नरपिशाच बादशाह अलाउद्दीन खिलजी ने जब चित्तोड़ की महारानी पद्यमिनी के रूप की चर्चा सुनी ,तो वह रानी को पाने के लिए आतुर हो बैठा । उसने राणा भीम सिंह को संदेश भेजा की वह रानी पद्यमिनी को उसको सोंप दे वरना वह चित्तोड़ की ईंट से ईंट बजा देगा। अलाउद्दीन की धमकी सुनकर राणा भीम सिंह ने भी उस नरपिशाच को जवाब दिया की वह उस दुष्ट से रणभूमि में बात करेंगे।
कामपिपासु अलाउद्दीन ने महारानी को अपने हरम में डालने के लिए सन १३०३ में चित्तोड़ पर आक्रमण कर दिया। भारतीय वीरो ने उसका स्वागत अपने हथियारों से किया। राजपूतों ने इस्लामिक नरपिशाचों की उतम सेना वाहिनी को मूली गाजर की तरह काट डाला। एक महीने चले युद्ध के पश्चात् अलाउद्दीन को दिल्ली वापस भागना पड़ा। चित्तोड़ की तरफ़ से उसके होसले पस्त हो गए थे। परन्तु वह महारानी को भूला नही था।कुछ समय बाद वह पहले से भी बड़ी सेना लेकर चित्तोड़ पहुँच गया। चित्तोड़ के 10000 सैनिको के लिए इस बार वह लगभग १००००० की सेना लेकर पहुँचा। परंतु उसकी हिम्मत चित्तोड़ पर सीधे सीधे आक्रमण की नही हुई। उस पिशाच ने आस पास के गाँवो में आग लगवा दी,हिन्दुओं का कत्लेआम शुरू कर दिया। हिंदू ललनाओं के बलात्कार होने लगे।
उसके इस आक्रमण का प्रतिकार करने के लिए जैसे ही राजपूत सैनिक दुर्ग से बहार आए ,अलाउदीन ने एक सोची समझी रणनीति के अनुसार कुटिल चाल चली। उसने राणा को संधि के लिए संदेश भेजा। राणा भीम सिंह भी अपनी प्रजा के कत्लेआम से दुखी हो उठे थे। अतः उन्होने अलाउद्दीन को दुर्ग में बुला लिया। अथिति देवो भवः का मान रखते हुए राणा ने अलाउद्दीन का सत्कार किया तथा उस वहशी को दुर्ग के द्वार तक छोड़ने आए। अलाउद्दीन ने राणा से निवेदन किया की वह उसके तम्बू तक चले । राणा भीम सिंह उसके झांसे में आ गए। जैसे ही वो उसकी सेना के दायरे में आए मुस्लमान सैनिकों ने झपटकर राणा व उनके साथिओं को ग्रिफ्तार कर लिया।
अब उस दरिन्दे ने दुर्ग में कहला भेजा कि महारानी पद्यमिनी को उसके हरम में भेज दिया जाय ,अन्यथा वह राणा व उसके साथियों को तड़पा तड़पा कर मार डालेगा। चित्तोड़ की आन बान का प्रश्न था।कुछ चुनिन्दा राजपूतों की बैठक हुई। बैठक में एक आत्मघाती योजना बनी। जिसके अनुसार अलाउद्दीन को कहला भेजा की रानी पद्यमिनी अपनी ७०० दासिओं के साथ अलाउद्दीन के पास आ रही हैं।
योजना के अनुसार महारानी के वेश में एक १४ वर्षीय राजपूत बालक बादल को शस्त्रों से सुसज्जित करके पालकी में बैठा दिया गया। बाकि पाल्किओं में भी चुनिन्दा ७०० राजपूतों को दासिओं के रूप में हथियारों से सुसज्जित करके बैठाया गया। कहारों के भेष में भी राजपूत सैनिकों को तैयार किया गया।लगभग 2100 राजपूत वीर गोरा,जो की बादल का चाचा था, के नेत्र्तव्य में १००००० इस्लामिक पिशाचों से अपने राणा को आजाद कराने के लिए चल दिए।
अलाउद्दीन ने जैसे ही दूर से छदम महारानी को आते देखा ,तो वह खुशी से चहक उठा। रानी का कारंवा उसके तम्बू से कुछ दूर आकर रूक गया। अलाउद्दीन के पास संदेश भेजा गया कि महारानी राणा से मिलकर विदा लेना चाहती हैं। खुशी में पागल हो गए अलाउद्दीन ने बिना सोचे समझे राणा भीम सिंह को रानी की पालकी के पास भेज दिया।
जैसे ही राणा छदम रानी की पालकी के पास पहुंचे ,लगभग ५०० राजपूतों ने राणा को अपने घेरे में ले लिया,और दुर्ग की तरफ़ बढ गए।
अचानक चारो और हर हर महादेव के नारों से आकाश गूंजा, बचे हुए १६०० राजपूत ,१००००० इस्लामिक पिशाचों पर यमदूत बनकर टूट पड़े।धोखेबाज इस्लामिक सैनिक हाय अल्लाह,मर गए अल्लाह और धोखा धोखा करते हुए चरों और भागने लगे। १६०० हिंदू वीरों ने अलाउद्दीन की लगभग ९००० की सेना को देखते ही देखते काट डाला। और सदा के लिए भारत माता की गोद में सो गए। इस आत्मघाती रणनीति में दो वीर पुरूष गोरा व बादल भारत की पोराणिक कथाओं के नायक बन गए। इस युद्ध में नरपिशाच अलाउद्दीन खिलजी भी बुरी तरह घायल हुआ।
यह इतिहास की घटना विश्व इतिहास की महानतम साहसिक घटनाओं में से एक है।

सोमवार, 4 मई 2009

गाँधी परिवार अथवा खान परिवार

गाँधी परिवार का परिचय जब भी किसी कांग्रेसी अथवा मीडिया द्वारा देशवासियों को दिया गया है अथवा दिया जाता है,तब वह फिरोज गाँधी तक जाकर ही यकायक रुक सा जाता है फिर बड़ी सफाई के साथ अचानक उस परिचय का हैंडिल एक विपरीत रास्ते की और घुमाकर नेहरु वंश की और मोड़ दिया जाता है। फिरोज गाँधी भी अंततः किसी के पुत्र तो होंगे ही। उनके पिता कौन थे ? यह बतलाना आवश्यक नहीं समझा जाता। फिरोज गाँधी का परिचय पितृ पक्ष से काट कर क्यों ननिहाल के परिवार से बार-बार जोड़ा जाता रहा है, यह एक ऐसा रहस्य है जिसे नेहरु परिवार के आभा-मंडल से ढक कर एक गहरे गढे में मानो सदैव के लिए ही दफ़न कर दिया गया है।यह कैसा आश्चर्य है की पंथ निरपेक्षता(मुस्लिम प्रेम) की अलअम्बरदार कांग्रेस के द्वारा भी आखिर यह गर्वपूर्वक क्यों नहीं बतलाया जाता की फिरोज गाँधी एक पारसी युवक नहीं अपितु एक मुस्लिम पिता के पुत्र थे। और फिरोज गाँधी का मूल नाम फिरोज गाँधी नहीं फिरोज खान था जिसको एक सोची समझी कूटनीति के अर्न्तगत फिरोज गाँधी करा दिया गया था।फिरोज गाँधी मुसलमान थे और जीवन पर्यन्त मुसलमान ही बने रहे। उनके पिता का नाम नवाब खान था जो इलाहबाद में मोती महल (इशरत महल) के निकट ही एक किराने की दूकान चलाते थे । इसी सिलसिले में (रसोई की सामग्री पहुंचाने के सिलसिले में) उनका मोती महल में आना जाना लगातार रहता था। फिरोज खान भी अपने पिता के साथ ही प्रायः मोती महल में जाते रहते थे। वहीँ पर अपनी समवयस्क इन्द्रा प्रियदर्शनी से उनका परिचय हुआ और धीरे-धीरे जब यह परिचय गूढ़ प्रेम में परिणत हुआ तब फिरोज खान ने लन्दन की एक मस्जिद में इन्द्रा को मैमूदा बेगम बनाकर उनके साथ निकाह पढ़ लिया।गाँधी और नेहरु के अत्यधिक विरोध किये जाने के फलस्वरूप भी जब यह निकाह संपन्न हो ही गया तब समस्या 'खान' उपनाम को लेकर आ खड़ी हुई। अंततः इस समस्या का हल नेहरु के जनरल सोलिसिटर श्री सप्रू के द्वारा निकाला गया। मिस्टर सप्रू ने एक याचिका और एक शपथ पत्र न्यायालय में प्रस्तुत करा कर 'खान' उपनाम को 'गाँधी' उपनाम में परिवर्तित करा दिया।इस सत्य को केवल पंडित नेहरु ने ही नहीं अपितु सत्य के उस महान उपासक तथाकथित माहत्मा कहे जाने वाले मोहन दास करम चाँद गाँधी ने भी इसे राष्ट्र से छिपा कर सत्य के साथ ही एक बड़ा विश्वासघात कर डाला ।
गांधी उपनाम ही क्यों - वास्तव में फिरोज खान के पिता नवाब खान की पत्नी जन्म से एक पारसी महिला थी जिन्हें इस्लाम में लाकर उनके पिता ने भी उनसे निकाह पढ़ लिया था। बस फिरोज खान की माँ के इसी जन्मजात पारसी शब्द का पल्ला पकड़ लिया गया। पारसी मत में एक उपनाम गैंदी भी है जो रोमन लिपि में पढ़े जाने पर गाँधी जैसा ही लगता है। और फिर इसी गैंदी उपनाम के आधार पर फिरोज के साथ गाँधी उपनाम को जोड़ कर कांग्रेसियों ने उस मुस्लिम युवक फिरोज खान का परिचय एक पारसी युवक के रूप में बढे ही ढोल-नगाढे के साथ प्रचारित कर दिया। और जो आज भी लगातार बड़ी बेशर्मी के साथ यूँ ही प्रचारित किया जा रहा है।
(मेरे पिता श्री देवेन्द्र सिंह त्यागी द्वारा लिखित )

रविवार, 3 मई 2009

भारत के महान नेताओं की नजरों में इस्लाम

इस्लाम के सम्बन्ध में भारतवर्ष की कई महान विभुतियों ने समय समय पर हिंदू समाज को चेताया है................
लाला लाजपत राय.-----लालाजी ने श्री सी० आर० दास को १९२४ में लिखे एक पत्र में लिखा की, मैंने पिछले ६ मास् के दोरान अपना अधिकांश समय मुस्लिम कानून व मुस्लिम इतिहास के अध्यन में लगाया है। मै यह सोचने लगा हूँ कि, हिंदू -मुस्लिम एकता न तो सम्भव है और न ही व्यावहारिक। ...................... मै मुसलमानों पर विश्वास करने को तैयार हूँ,किन्तु कुरान औ़रहदीस के उन आदेशों का क्या होगा?मुस्लमान उनकी अवज्ञा नही कर सकते।
रविन्द्र नाथ टैगोर ------टैगोर जी ने हिंदू-मुस्लिम एकता के बारे में कहा है की, "हिंदू मुस्लिम एकता को लगभग एकदम असंभव बनाने वाली एक और महत्वपूर्ण वजह है की मुस्लमान अपनी देशभक्ति को एक देश तक सीमित नही रख सकते। ................मोहम्मद अली जोहर जैसे व्यक्तियों ने यह घोषित किया है कि, किसी भी हालत में किसी भी देश के मुस्लमान के खिलाफ खड़े होने की अनुमति नही है। "
डॉक्टर अम्बेडकर ------------"तमाम मान्यताओं के बाद इस्लाम की जिस बात पर ध्यान देना चाहिए , वह यह है कि जिस देश में मुस्लिम क़ानून नही है ,वहां यदि मुस्लिम कानून और राज्य के कानून में संघर्ष हो, तो मुस्लिम कानून को ही लागू होना चाहिए,और मुसलमानों को चाहिए कि वे मुस्लिम कानून को माने तथा राज्य के कानून को तोडे। "
"इस्लामिक कानून की इस व्यवस्था की वजह से भारत हिन्दुओं व मुसलमानों की साझी मात्रभूमि नही हो सकती। ................वह मुसलमानों की भूमि तब हो सकती है जब उस पर मुसलमानों का शासन हो । "
"यथार्थ वादी व्यक्ति को समझ लेना चाहिए की मुस्लमान ,हिन्दुओं को काफिर समझते है। जो बचाए जाने से कंही ज्यादा मरने लायक है। "
"इसका अधिक महत्त्व नही है की उन्मादी मुसलमानों के द्वारा मारे गए प्रतिष्ठित हिन्दुओं की संख्या कम है अथवा ज्यादा। प्रतिष्ठित मुसलमानों ने इन अपराधियों की कभी भी निंदा नही की। इसके विपरीत इन अपराधियों की तारीफ़ धार्मिक शहीद की तरह की गई।"
"मुसलमानों की राजनीती में जीवन के धर्म निर्पेक्ष वर्गों को कोई जगह नही मिलती है। "
"कोंग्रेस इस बात को समझने में असमर्थ रही है की मुसलमानों को सहूलियतें देते जाने से उसकी निति ने मुसलमानों की आक्रमकता को बढाया है और उससे भी बुरी बात यह है की, मुसलमानों को यह लगने लगा है कि, हिंदू पराजय वादी है और उसमे बदला लेने की प्रवति नही है। "
क्या ये महान नेता व बुद्धि जीवी झूठे है या आज के तथा कथित धर्म निर्पेक्ष नेता। ये बात पाठक गण स्वम सोचे .