मंगलवार, 29 सितंबर 2009

मै राष्ट्र -यज्य के लिए तुम्हारा शीश मांगने आया.

अपना शौर्य तेज भुला यह देश हुआ क्षत-क्षत है।
यह धरा आज अपने ही मानस -पुत्रों से आहत है।
अब मात्र उबलता लहू समय का मूल्य चुका सकता है।
तब एक अकेला भारत जग का शीश झुका सकता है।
एक किरण ही खाती सारे अंधकार के दल को।
एक सिंह कर देता निर्बल पशुओं के सब बल को।
एक शून्य जुड़कर संख्या को लाख बना देता है।
अंगार एक ही सारे वन को राख बना देता है।
मै आया हूँ गीत सुनाने नही राष्ट्र-पीड़ा के।
मै केवल वह आग लहू में आज नापने आया
मै राष्ट्र-यज्य के लिए तुम्हारा शीश मांगने आया ।।१

नही महकती गंध केशरी कश्मीरी उपवन में।
बारूदों की गंध फैलती जाती है आँगन में।
मलयाचल की वायु में है गंध विषैली तिरती।
सम्पूर्ण राष्ट्र के परिवेश पर लेख विषैले लिखती।
स्वेत बर्फ की चादर गिरी के तन पर आग बनी है।
आज धरा की हरियाली की पीड़ा हुई घनी है।
पर सत्ता के मद में अंधे धरती के घावों से।
अंजान बने फिरते है बढ़ते ज्वाला के लावों से।
शक्ति के नव बीज खोंजता इसीलिए ही अब मैं।
मै महाकाल का मन्त्र फूंकता तुम्हे साधने आया
मै राष्ट्र यज्य के लिए ....................................२


उठ रहा आज जो भीषण -रव यह एक जेहादी स्वर है।
एक दिशा से नही घेरता चारो और समर है।
इस जिहाद की नही कोई भी अन्तिम कही कड़ी है ।
सहस्त्र वर्ष से अधिक राष्ट्र पर इसकी नजर गढ़ी है।
निरपेक्ष मौन है किंतु सत्ता इसको खेल समझती।
अंतहीन इस रण को बस उन्माद समझ कर हंसती।
उदारवाद के बहकावों के शब्द जाल में फंसकर।
नही देखती इतिहासों के काले प्रष्ठ पलटकर।
इतिहासों की उसी कालिमा से आवृत प्रष्ठों में ।
उज्जवल इतिवृत के पन्नों को मै आज बाँचने आया
मै राष्ट्र यज्य के लिए .........................................३


itivrat के प्रष्ठ सुनहरे जो सत्ता ने फाड़ दिए हैं।
आतंकवाद के पैरों में ही गहरे गाड़ दिए हैं।
अपने जीवन-मूल्य बेच सत्ता का मोल किया है।
सत्ता के पलडे में सारा भारत तोल दिया है।
ओट अहिंसा की ले कायरता का वरण किया है।
भूतकाल के भारत के वैभव का हरण किया है।
मत पूछो क्या-क्या पाप किए है सत्ता को वरने को।
आतंकवाद सोपान बनाली सत्ता पर चढ़ने को।
इस अंतहीन आतंकवाद से आरपार करने को ।
किस -किस की नस में उबल रहा वह लहू जाँचने आया।
मै राष्ट्र-यज्य के लिए .................................................४


saikularivaad से राष्ट्रवाद का है उपहास उड़ाकर।
अल्पसंख्यकता को राष्ट्रवाद का नव परियाय बनाकर।
सैकुलरती को अल्पसंख्यकता का नूतन अर्थ दिया है।
राष्ट्रद्रोह और राष्ट्रवाद सम-अर्थी मान लिया है।
राष्ट्र -अस्मिता भी इनकी इन सोंचो से हारी है।
आतंकवाद की तुष्टि तो अब संसद पर भारी है।
नही राष्ट्र के भक्त इन्हे आतंकवाद प्यारा है।
करनी से इनके आतंक नही हर बार देश हारा है।
आतंकवाद का तिनका-तिनका जड़ -सहित नष्ट करने को।
मै राष्ट्र- प्रेम का तक्र तुम्हारे बीच बाँटने आया॥

मै राष्ट्र-यज्य के लिए ............................................५


आलोक राष्ट्र का पश्चिम की बदली में अटक गया है।
अन्धकार की राह पकड़कर सूरज भटक गया है।
सहना कोई अन्याय यह कायरता का सूचक है।
यह किसी राष्ट्र की जनशक्ति की जड़ता का सूचक है।
मात्र अहिंसा तो ऋषियों का आभूषण होती है।
par राज मार्ग पर कायरता का आकर्षण होती है।
हिंसा के प्रतिशोधों को तो युद्ध किए जाते है।
प्रस्ताव अमन के वीरों द्वारा नही दिए जाते है।
इस कायरता के संस्कार है रोपे जिसने मन में।
वह भावः अहिंसा के मन से मै आज काटने आया।
मै राष्ट्र यज्य के लिए ........................................६


युद्धों से भयभीत देश जो युद्धों से बचता है।
युद्ध स्वं उसके द्वारों पर दस्तक जा देता है।
इसलिए शत्रु की चालों में न अपने को फसने दो।
वीरों की छाती पर अब तो बस शास्त्रों को सजने दो।
यदि समय पर चूके सब कुछ राष्ट्र यह खो देगा।
फ़िर सिंहासन की एक भूल का दंड देश भोगेगा।
राष्ट्र खड़ा है पीछे तेरे रणभेरी बजने दो।
अब जनशक्ति को अश्वमेध की तैयारी करने दो।
इस महायज्य की पूत-अनल में समिधा बन जाने को।
मै धर्म-जाति के हर गह्वर को आज पाटने आया॥
मै राष्ट्र-यज्य के लिए ............................................७

रविवार, 27 सितंबर 2009

भारतीय संस्कृति के आधार यज्य को अपपतन करने की वामपंथी मानसिकता.

हमारे भारतीय ग्रंथों व गौरवशाली इतिहास को गोरे अंग्रेजो ने बदनाम करने में कोई कसर नही छोडीहै, वहीं आज काले अंग्रेज (अंग्रेजी की गुलाम मानसिकता वाले भारतीय) भी भारतीयता को बादनाम करने पर तुले है।मैंने वेदों के बारे में अपने पहले लेख मे बताया था कि किस प्रकार नेहरू ने अपनी पुस्तक डिस्कवरी ऑफ़ इंडिया में वेदों को जंगली लोगो के जंगली गीत बताया था। आज उसी कड़ी मे मै आपको एक कम्युनिस्ट नेता अमृत पाद डांगे के लिखे एक ग्रन्थ के बारे में बताऊंगा

डांगे ने भारतीय संस्कृति पर एक पुस्तक लिखी है.उस पुस्तक मे उसने ऋग्वेदीय काल की चर्चा करते हुए यज्य के बारे में लिखा है,"यज्य नाम के सामूहिक महोत्सव के प्रसंग पर खूब मांस खाकर एवं खूब मदिरा पीकर वे पुरातन कालीन लोग अग्नि के चारों ओर सो जाते थे अथवा अपनी चुनी संगिनी सहित झोपडी में विहार के लिए चले जाते थे।"

अब वेदों में यज्य के बारे मे क्या लिखा है मै आपको बताता हूँ।

ऋग्वेद के प्रथम मंडल मे ही ३६ वें वर्ग के मन्त्र ५ में बताया गया है कि,"जो यज्य धूम से शोधे हुए पवन हैं,वे अच्छे राज्य के कराने वाले होकर रोग आदि दोषों का नाश करते हैं और जो अशुद्ध ,अर्थात दुर्गंध आदि दोषों से भरे हुए है सुखों का नाश करते हैं,इससे मनुष्यों को चाहिए कि अग्नि मे होम द्वारा वायु की शुद्धि से अनेक प्रकार के सुखों को सिद्ध करें।"

सप्तम मंडल के द्वीतीय सूक्त के मन्त्र १ में बताया गया है कि,"हे !अग्नि हम आज जो तुम्हे समिधायें प्रदान करते है,उनको तुम स्वीकार करो.तुम इन संविधाओ को स्वीकार करके अच्छी तरह प्रदीप्त हो। पर्वत के ऊंचे भागों को तुम अपनी तप्त रश्मियों से स्पर्श करो और सूर्य की किरणों के साथ मिलो। पर्वत के शिखर पर भी यज्य करने चाहियें। उन यज्ञों से वायु मंडल शुद्ध होता है।"

सप्तम मंडल के द्वीतीय सूक्त में मन्त्र संख्या ८ में बताया गया है कि,"भारती देश की भाषा है। मात्रभाषा की संज्ञा भारती है.इला मात्रभूमि को कहते है। सरस्वती सतत बहने वाली संस्कृति है। मात्रभाषा,मात्रभूमि व मात्र्संस्क्रती ये तीन देवियाँ है। इन तीनो देवियों का सत्कार यज्य मे होना चाहिए। जो भी मनुष्य कर्म करे वे इन तीनो देवियों की उन्नति की द्रष्टि से किए जांय। ये तीनो देवियाँ अग्नि के ही रूप हैं। मात्रभाषा अग्नि का ही रूप है,क्यों कि अग्नि से ही वाणी उत्पन्न होती है। मात्रभूमि भी अग्नि का ही रूप है, क्यों कि भूमि अग्नि का ही स्थान है,और सभ्यता या संस्कृति भी अग्नि के सामान तेजस्वी होती है। इन तीनो देवियों की भक्ति सदा ही करनी चाहिए।"

तृतीय मंडल सूक्त ४ के मन्त्र ४ में बताया गया है कि ,"जो यज्य करता और यज्य कराने वाले हों, विद्य्वान हों,और सुंदर शुद्ध पद्धार्थों को अग्नि मै छोडे तो क्या सुख प्राप्त न होंगे।"

तृतीय मंडल के सूक्त ४ के मन्त्र ५ में बताया गया है कि ,"जो मनुष्य सुगंध्यादी युक्त पद्धार्थों के अग्नि में छोड़ने से वायु,वृष्टि,जल,ओषधि और अन्नो को अच्छे प्रकार से शोधे तो सब आरोग्य्पन को प्राप्त हों।"

यज्य के महत्त्व को बताने के लिए ऐसे कितने ही मन्त्र ऋग्वेद मे है। लेकिन नेहरू हो या हो कामरेड डांगे इनका कार्य भारतीय संस्कृति को बदनाम करने का ही रहा है। मैक्समूलर जैसा वेदों को बदनाम करने वाले व्यक्ति ने मरने से कुछ ही समय पहले ये स्वीकार किया कि भारतीय संस्कृति सनातन है। वेद कम से कम १५००० वर्ष ओर हो सकता है कि लाखों वर्ष पूर्व लिखे गए हैं।

कामरेड डांगे अरे नही डंगर ने वेदों की कभी छवि भी न देखी हो,परंतु भारतीय संस्कृति के आधार यज्य के बारे में ऐसी बात लिखने से पहले उसके मष्तिष्क में क्या खुराफात जगी होगी ये तो मै नही बता सकता।किंतु इतना जरूर कह सकता हूँ कि भारतीय संस्कृति के आधार वेदों को बदनाम करने वाले व्यक्ति चाहे कोई भी हो देशभक्त नही हो सकता।

वेदों में यज्य के बारे मे पढ़कर पता चलता है कि उस समय के ऋषियों को वायुमंडल -शुद्धि का कितना ज्ञान था,क्यों कि आज शोध हो चुका है कि १० ग्राम देशी घी को अगर १० ग्राम चावल के साथ यज्य की आहुति के साथ यज्य कि अग्नि मे अर्पित किया जाय तो वायुमंडल मे १ टन ओक्सिजन पैदा होती है। वायु मंडल में अगर ओक्सिजन की अधिकता होगी तो वायुमंडल तो शुद्ध होगा ही ,साथ ही वर्षा की पूर्ती भी रहेगी क्यो कि ओक्सिजन -हाइड्रोजन का मिश्रण ही जल की उत्पत्ति का कारण है. वेदों मे इस बात का ज्ञान लाखों वर्ष पहले ही था। अगर आज पूरे विश्व में घर -घर में प्रतिदिन यज्य होवे,तो पूरे विश्व की प्रदुषण, सूखा जैसी समस्याएँ दूर हो सकती हैं।

तो बोलो यज्य भगवान् की जय।

रविवार, 20 सितंबर 2009

संसद चालीसा

संसद से सीधा प्रसारण-संसद चालीसा

देशवासियों सुनो झलकियाँ मै तुमको दिखलाता।
राष्ट्र- अस्मिता के स्थल से सीधे ही बतियाता।
चारदीवारी की खिड़की सब लो मै खोल रहा हूँ।
सुनो देश के बन्दों मै संसद से बोल रहा हूँ।१।

रंगमंच संसद है नेता अभिनेता बने हुए हैं।
जन- सेवा अभिनय के रंग में सारे सने हुए हैं।
पॉँच वर्ष तक इस नाटक का होगा अभिनय जारी।
किस तरह लोग वोटों में बदलें होगी अब तैयारी।२।

चुनाव छेत्र में गाली जिनको मुहं भर ये देते थे।
जनता से जिनको सदा सजग ये रहने को कहते थे।
क्या-क्या तिकड़म करके सबने सांसद- पद जीते है।
बाँट परस्पर अब सत्ता का मिलकर रस पीते हैं।३।

जो धर्म आज तक मानवता का आया पाठ पढाता।
सर्वधर्म-समभाव-प्रेम से हर पल जिसका नाता।
वोटों की वृद्धि से कुछ न सरोकार उसका है।
इसीलिए संसद में होता तिरस्कार उसका है।४।

दो पक्षो के बीच राष्ट्र की धज्जी उड़ती जाती।
राष्ट्र-अस्मिता संसद में है खड़ी-खड़ी सिस्काती।
पल-पल, क्षन-क्षन उसका ही तो यहाँ मरण होता है।
द्रुपद सुता का बार-बार यहाँ चीर-हरण होता है।५।

आतंकवाद और छदम युद्ध का है जो पालनहारा।
साझे में आतंकवाद का होगा अब निबटारा।
आतंक मिटाने का उसके संग समझोता करती है।
चोरों से मिलकर चोर पकड़ने का सौदा करती है।६।

विषय राष्ट्र के एक वर्ग पर यहाँ ठिठक जाते हैं।
राष्ट्र-प्रेम के सारे मानक यहाँ छिटक जाते हैं।
अर्थ-बजट की द्रष्टि जाकर एक जगह टिकती है।
एक वर्ग की मनुहारों पर संसद यह बिकती है।7।

अफजल के बदले मे जो है वोट डालने जाते।
सत्ता की नजरों में वे ही राष्ट्र भक्त कहलाते।
आज देश की गर्दन पर जो फेर रहे हैं आरे।
उनकी वोटो से विजयी नही क्या संसद के हत्यारे।8।

सर्वोच्च अदालत ने फाँसी का जिसको दंड दिया है।
संसद ने तो उसको ही वोटो में बदल लिया है।
इसलिए आज यह देश जिसे है अपराधी ठहराता।
वही जेल मे आज बैठकर बिरयानी है खाता।9।

मौत बांटते जिसको सबने टी० वी० पर पहचाना।
धुआं उगलती बंदूकों को दुनिया भर ने जाना।
सत्ता का सब खेल समझ वह हत्त्यारा गदगद है।
हत्या का प्रमाण ढूंढती अभी तलक संसद है।10।

यहमाइक-कुर्सी फैंक वीरता रोज-रोज दिखलाती।
पर शत्रु की घुड़की पर है हाथ मसल रह जाती।
जाने क्या-क्या कर जुगाड़ यहाँ कायरता घुस आई।
फ़िर काग -मंडली मधुर सुरों का पुरुष्कार है लायी।११।

जब एक पंथ से आतंकियों की खेप पकड़ में आती।
वोट खिसकती सोच-सोच यह संसद घबरा जाती।
तब धर्म दूसरे पर भी आतंकी का ठप्पा यह धरती है।
यूँ लोकतंत्र में सैक्यूलारती की रक्षा यह करती है। १२।

लोकतंत्र में युवाओं को हिस्सा जब देने को ।
चिल्लाती जनता है इनको भी भाग वहां लेने को।
बड़ी शान से जन इच्छा का मन यह रख देती है।
बेटों को सब तंत्र सोंप जनतंत्र बचा लेती है।१३

घोटाले अरबों -खरबों के यहाँ प्राय होते हैं।
चर्चे उनके चोपालों पर सुबह -सायं होते हैं।
अधिक शोर मचने पर सोती संसद यह जगती है।
आयोग बिठाकर दौलत को चुपचाप हजम करती है।१४

जो इसी धरा पर खाते-पीते साँस हवा में लेते।
माता का सम्मान नही पर इस धरती को देते।
उनके ही पीछे राष्ट्र सौंपने संसद भाग रही है।
एक मुस्त बदले में केवल बोटें मांग रही है । १५

देश-द्रोह में लगे रहें या करे देश बर्बादी ।
दे रही छूट यह हर उस दल को है पूरी आजादी।
बस एक शर्त का अनुपालन ही उनकी जिम्मेदारी।
सिंहासन का मौन- समर्थन करे हमेशा जारी ।१६

सरकार पाक की जब जी चाहे घुड़की दे देती है।
कान दबाकर संसद उसकी सब-कुछ सुन लेती है।
बोटो के भयवश न विरुद्ध कुछ साहस है यह करती।
एक वर्ग को पाक-समर्थक संसद स्वयम समझती। १७

पहले तो शत्रु इसी धरा पर हमले ख़ुद करवाता।
फ़िर हमलों के इससे ही प्रमाण स्वयं मंगवाता।
वह दो कोडी का देश फैकता रद्दी में है उनको।
यह कायर संसद युद्ध नही,प्रमाण भेजती उसको।१८

जब विस्फोटों की गूँज भीड़ के बीचों-बीच उभरती।
दस-पॉँच जनों के तन से जब ,शोणित की धार उबलती।
लाशों के चेहरों में वोटों की गणना को जुटती है।
यूँ बार-बार सत्ता पाने के सपने यह बुनती है। १९

रचनाकार ----मेरे पिता श्री देवेन्द्र सिंह त्यागी

शनिवार, 19 सितंबर 2009

ऋग्वेद में विमान की चर्चा.

नेहरू ने अपनी पुस्तक "डिस्कवरी ऑफ़ इंडिया "में विश्व में सबसे बढे ज्ञान के स्रोत वेदों के बारे में लिखा है कि "भारत में ३००० वर्ष पूर्व जंगली मनुष्य जब भेढ़ बकरी चराया करते थे तो अपना समय काटने के लिए जो गीत गाया करते थे वे ही वेद् है।"आज नेहरू अगर जिन्दा होता तो मै उससे अवश्य पूछता कि क्या उसने कभी वेदों की प्रतियों को देखा है पढने की बात तो बहुत दूर की है। अधिकतर भारतीय लेखक भी वेदों को बिना पढ़े उनको असभ्य संस्कृति के लोगो द्वारा रचित बताते है।
जबकि वेदों के ज्ञान के बारे में बिल्कुल इसका उल्टा है।प्रथ्वी पर ऐसा कोई ज्ञान ,विज्ञानं नही है जिसकी जानकारी वेदों में न हो।वेदों के बारे में अपने इस लेख में में आपको बताऊंगा कि आज जो हवाई जहाज हवा में उड़ रहे है ,ऋग्वेद में उसकी जानकारी दी हुई है।

ऋग्वेद के प्रथम मंडल के श्लोक ७-- आ नो नावा मतीनां यातंपारे गन्तवे। युन्जाथाम्शिव्ना रथं॥
जिसका अर्थ है कि,"मनुष्यों को चाहिए कि वो रथ से स्थल,नाव से जल में तथा विमान से आकाश में आया जाया करें।"

उसके पश्चात श्लोक ८ में बताया गया है कि," कोई भी मनुष्य अग्नि,जल आदि से चलने वाले अर्थात भाप से चलने वाले यान,के बिना प्रथ्वी समुन्द्र और अन्त्रिक्ष में सुख से आने जाने में समर्थ नही हो सकता।"

९ में बताया गया है कि,"जो मनुष्य विद्ववानों की शिक्षा के अनुकूल अग्नि,जल के प्रयोग से युक्त यानो पर स्थित होके राजा-प्रजा के व्यवहार कि सिद्धि के लिए समुद्रो के छोर तक जावे-आवे तो बहुत उत्तमोत्तम धन को प्राप्त होवे।"

श्लोक १० में बताया गया है कि,"हे सवारी पर चलने वाले मनुष्यों! तुम दिशाओं को जानने वाले चुम्बक,ध्रुव यंत्र और सूर्यादि कारण से दिशाओं को जान;यानो को चलाया और ठहराया भी करो जिससे भ्रान्ति में पड़कर अन्यंत्र गमन न हो,अर्थात जहाँ जाना चाहते हो वही पहुँचो,भटकना न हो। "

इसके बाद श्लोक११ में बताया गया है कि ,"मनुष्यों को उचित है कि सर्वत्र आने-जाने के लिए सीधे और शुद्ध मार्गों को रच और विमानादि यानों से इच्छा पूर्वक गमन करके नाना प्रकार के सुखों को प्राप्त करें।"

इन श्लोकों के आलावा और भी कई जगह विमान कि चर्चा है। ऋग्वेद ज्ञानकाण्ड पर आधारित है।समस्त विश्व में जो भी आविष्कार हुए या हो रहे है उन सबका ज्ञान वेदों में है। विश्व के कितने वैज्ञानिकों ने वेदों को पढने के लिए कई कई वर्ष संस्कृत भाषा को सीखा,परन्तु हमारे देश के नेता,बुद्धिजीवी वर्ग ? ही वेदों की बुराई करने पर तुले रहते है।

मेरी ईश्वर से प्रार्थना है कि वह दिन जल्दी आए जब ज्ञान के भण्डार ये वेद् भारत के घर घर में पहुंचे और सभी इनका अध्यन करे।क्यों कि इतिहास साक्षि है कि जिस दिन से भारतीय वेदों कि शिक्षा से दूर होने लगे तभी से भारतीय समाज में विकृति शुरू हो गई।

(मैंने श्लोको को लिखने कि कोशिश कि परन्तु संस्कृत में होने के कारण शब्द ग़लत हो रहे थे,इसलिए केवल उनका भावार्थ ही लिखा है। )

बुधवार, 16 सितंबर 2009

दोहो की धारा

रखवाला तो सो रहा ,क्या होगा अब हाल।
लोकतंत्र के खेत में, घुस आए स्रंगाल ॥ १ ॥


दिल्ली की ही भूल के, भोगे हैं संत्रास ।
दिल्ली फ़िर दोहरा रही पुनः वही इतिहास ॥ 2 ॥


दिया पंथनिरपेक्षता , को इतना सम्मान।
बहुसंख्यक की आस्था, कर दी लहूलुहान ॥ ३ ॥


हुए अचानक देश में,आतंकी विस्फोट।
लगी होड़ नेताओं में,कोन बटोरे वोट ॥ ४ ॥

बेटो को ही राज का,देकर उतराधिकार ।
नेता पैनी कर रहे, लोकतंत्र की धार ॥ ५ ॥

कैसे लिक्खे लेखनी, अब फूलों के छंद।
उपवन में है फैलती,बारूदी दुर्गंध ॥ ६॥


नई आर्थिक नीतियो , का करती उपहास।
सड़क किनारे पड़ी हुई, भूखी -नंगी लाश ॥ ७ ॥

प्रातः आँगन में गिरे, आकर जब अखबार।
करने लगता तेज फ़िर,में चाकू की धार ॥ ८ ॥

पुन्य से अब पाप का, छिड़ने दो संग्राम।
धरती को शायद मिले, फ़िर से कोई राम॥


रचनाकार--मेरे पिता श्री देवेन्द्र सिंह त्यागी

मंगलवार, 15 सितंबर 2009

अफजल तो फ़िर भी बच गया.

मै अपने कुछ मित्रो के साथ मेरठ से दिल्ली जा रहा था। रास्ते में समय काटने के लिए कुछ बातचीत का दौर चल पडा , तो यात्रा में केन्द्रीय सरकार के कार्यो की मीमांसा शुरू हो गई। बात शुरू हुई अफजल की,क्योकि हमने भी अफजल गुरु की फांसी के लिए कई प्रदर्शन किए थे। खूब जुलुस निकाले और खूब गला फाड़-फाड़ कर चिल्लाये भी कि अफजल को फांसी दो,फांसी दो। हुआ कुछ नही तो एक भड़ास थी मन में, निकालनी शुरू कर दी।

हमने बात को आगे बढाते हुए कहा कि,कितने साल हो गए लेकिन सरकार अफजल को फांसी नही दे रही है और अब तो सरकार ने हद कर दी है कि केन्द्र सरकार आतंकवादियों के परिवार की पेंशन बांधने जा रही है और भी बातें आगे बढ़ी। कसाब का जिक्र हुआ, सोहराबुद्दीन का हुआ। अंत में मैंने मित्रो के साथ एक निर्णय किया कि,हम भी बहरे प्रशासन व सोई हुई हिंदू जनता को जगाने के लिए कोई ऐसा कार्य करे कि हमारी बात को पूरा मीडिया जगत पूरे देश में पहुचाये।

निर्णय भी ले लिया कि भगत सिंह जी के अनुरूप हम भी तेज धमाके वाला व धुएँ वाला कोई बम फोडेंगे । जिससे कोई व्यक्ति आह़त न हो,तथा अपनी ग्रिफतारी देकर जनता को जगायंगे। अब बात थी कि बम कहाँ फोड़ा जाय, तो तय हुआ की दिल्ली तो जा रहे है क्यो न कनाट प्लेस पर ये शुभ कार्य किया जाय। अब दिल्ली पहुचकर बम की खोज शुरू हो गई। जल्दी ही दिवाली पर छोड़े जाने वाले दो पटाखे हमे प्राप्त हो गए। और कनाट प्लेस पर जाकर फोड़ डाले और इन्तजार करने लगे मीडिया का।

परन्तु एक आर्श्चय हुआ कि भारतीय पुलिस जो हमेशा घटना के काफी देर बाद पहुचती है वो मिडिया के लोगो से पहले पहुँच गई,और हमे ग्रिफतार कर लिया गया। हमने बड़ी शान से ग्रिफ्तारी भी दे दी। परन्तु थाने तक पहुचते पहुचते सारा नजारा ही बदल गया। लगता था की पूरी दिल्ली की सारी पुलिस वहां थी ,हमने सोचा कि हमारे आलावा कोई बहुत बड़ा आतंकी भी शायद इसी थाने मे है। परन्तु जो हुआ वो तो सोचा भी न था ,कि वो सारा इंतजाम तो हमारे लिए ही था।अब हमें महसूस होने लगा कि सारा मामला ही बिगड़ गया है।

पुलिस का कोई ऑफिसर हमसे पूछ रहा था कि और कहाँ कहाँ बम फोड़ने का प्लान है?कोन से आतंकवादी संगठन से जुड़े हो?तो कोई पूछ रहा था कि इससे पहले कहाँ कहाँ बम फोडे है। अफजल को फांसी दिलाने का सारा सपना चूर-चूर होता दीख रहा था। परंतु मैंने थोडी सी हिम्मत दिखायी,और पुलिस को सारा नाटक समझाया कि हम तो सोई जनता को जगाने के लिए व बहरे शासन को अपना पक्ष सुनाने के लिए सरदार भगत सिंह के रास्ते पर चलना चाह रहे है। परंतु हमारी बात किसी ने भी नही सुनी।

एक सिपाही हमारे पास आया ,बोला बबुआ कोन आतंकवादी को फोलो कर रहे हो,बड़ा साब और मंत्री जी आपके बारे में बतिया रहे है तो मंत्री जी ही कहत रह कि इ लोगन तो ससुरा बहुत बड़े आतंकी का फोलो करता है। ससुरों को कल ही फांसी पर लटकवा दो।

पता नही रात कैसे कटी ?आँख लग ही नही पायी। सुबह सुबह एक नेताजी आए हाथ में समाचार पत्र लिए हुए थे। हमारे ऊपर फैक कर मारा कि तुम हिंदू आतंकवादी बाज नही आओगे। पहले अंग्रेजो को मार रहे थे अब हमे मारना चाहते हो। हमारी कुछ भी समझ में नही आ रहा था कि हम करे तो क्या करे ? हमे न तो कोई फोन ही करने दिया गया, और न ही मीडिया से बात।

achanak केन्द्रीय सरकार भी हरकत मे आ गई। सरकार की मीटिंग हुई। मैडम जी ने सरदार को ऑर्डर दिया की, मन्नू इन आतंकवादियों को एक महीने में फांसी हो जानी चाहिए, चुनाव नजदीक है। काफी फायदा मिलेगा। मैडम के ही एक मंत्री ने कहा कि मैडम जी बुरा न मानो तो एक बात कहूं कि इन को फांसी देने के बाद हिंदू लोग अफजल के बारे में नही पूछेंगे। बैठक में एक मिनट को सन्नाटा छा गया । परंतु मैडम की जहरीली मुस्कान चेहरे पर फैली और बोली ये तो अच्छा ही है, लगे हाथ अफजल की फांसी की घोषणा भी कर देते है,मुसलमानों को ये तो कह ही देंगे की देखो हमने मुस्लिम आतंकी को फांसी देने से पहले चार हिंदू आतंकियों को फांसी पर चढाया है। बैठक में मैडम की जय जयकार होने लगी और मीटिंग समाप्त हो गई।

आर्श्चय, एक महीने में ही हमारे विरूद्ध सारे सबूत जुटा लिए गए।सारी राजनैतिक ताकत हमारे विरूद्ध खडी हो गई । समाचार पत्र से पता लगा कि हमारे बाद अफजल को भी फांसी हो रही है,तो मन में कही थोडी खुशी हुई कि चलो हमारा बलिदान ही सही लेकिन अफजल को फांसी तो हो रही है।

अब फाँसी वाला दिन भी आ गया । हमे फाँसी के तख्ते की और ले जाया जाने लगा । हम सोच रहे थे जेल के चारो और हमारी जय जयकार हो रही होगी। परंतु कोई इंसान तो इन्सान किसी जानवर कि भी आवाज नही आई। हाँ रास्ते में मिले एक दो कैदियों ने जरूर कहा कि साले चले थे भगत सिंह बनने,अब मरो।हम भी बेशर्मी से उनकी और देखते हुए निकल गए।

अब जैसे ही हमे फांसी पर लटकाया गया तो अचानक हमारी आँख खुल गई,और अपने को अपने बिस्तर पर पसीनो से लथपथ पाया। कुछ देर तो अपने को सँभालने में लगी। पर जैसे ही अपने सपने के बारे में सोचा तो बड़ा अफ़सोस हुआ कि आँख खुलने से अफजल तो साला फ़िर भी बच गया।

ईश्वर एक नाम अनेक

ऋग्वेद कहता है कि ईश्वर एक है किन्तु दृष्टिभेद से मनीषियों ने उसे भिन्न-भिन्न नाम दे रखा है । जैसे एक ही व्यक्ति दृष्टिभेद के कारण परिवार के लोगों द्वारा पिता, भाई, चाचा, मामा, फूफा, दादा, बहनोई, भतीजा, पुत्र, भांजा, पोता, नाती आदि नामों से संबोधित होता है, वैसे ही ईश्वर भी भिन्न-भिन्न कर्ताभाव के कारण अनेक नाम वाला हो जाता है।

यथा-
जिस रूप में वह सृष्टिकर्ता है वह ब्रह्मा कहलाता है ।

जिस रूप में वह विद्या का सागर है उसका नाम सरस्वती है ।

जिस रूप में वह सर्वत्र व्याप्त है या जगत को धारण करने वाला है उसका नाम विष्णु है ।

जिस रूप में वह समस्त धन-सम्पत्ति और वैभव का स्वामी है उसका नाम लक्ष्मी है ।

जिस रूप में वह संहारकर्ता है उसका नाम रुद्र है ।

जिस रूप में वह कल्याण करने वाला है उसका नाम शिव है ।

जिस रूप में वह समस्त शक्ति का स्वामी है उसका नाम पार्वती है, दुर्गा है ।

जिस रूप मे वह सबका काल है उसका नाम काली है ।

जिस रूप मे वह सामूहिक बुद्धि का परिचायक है उसका नाम गणेश है ।

जिस रूप में वह पराक्रम का भण्डार है उसका नाम स्कंद है ।

जिस रूप में वह आनन्ददाता है, मनोहारी है उसका नाम राम है ।

जिस रूप में वह धरती को शस्य से भरपूर करने वाला है उसका नाम सीता है ।

जिस रूप में वह सबको आकृष्ट करने वाला है, अभिभूत करने वाला है उसका नाम कृष्ण है

जिस रूप में वह सबको प्रसन्न करने, सम्पन्न करने और सफलता दिलाने वाला है उसका नाम राधा है ।

लोग अपनी रुचि के अनुसार ईश्वर के किसी नाम की पूजा करते हैं । एक विद्यार्थी सरस्वती का पुजारी बन जाता है, सेठ-साहूकार को लक्ष्मी प्यारी लगती है । शक्ति के उपासक की दुर्गा में आस्था बनती है । शैव को शिव और वैष्णव को विष्णु नाम प्यारा लगता है । वैसे सभी नामों को हिन्दू श्रद्धा की दृष्टि से स्मरण करता है ।

साभार --vishvhindusamaj.org

शनिवार, 12 सितंबर 2009

कायरता की पराकाष्ठा

नेहरू से लेकर आज तक भारत के राजनेता सीमाओं से छेड़छाड़ आराम से सहन करते आए है। महाभारत में भीष्म पिता ने कहा है कि,"राष्ट्र की सीमाएं माता के वस्त्रों के सामान होती है,कोई भी बेटा जिनसे छेड़छाड़ सहन नही कर सकता."हमारे देश के नेतागण चाहे चीन हो या बांग्लादेश ,कोई भी कितना ही अतिक्रमण करले वे उसे सहन तो करते ही है साथ ही उसे भारतीय जनता से छुपाते भी है।

पिछले साल अकेले चीन ने ही भारत में घुसपैठ का लगभग २२५ बार दुस्साहस किया है। चीन ने १९५० में तिब्बत पर कब्जा करने के बाद जब लद्दाख में ओक्सिचीन पर अतिक्रमण करके निर्माण कार्य भी शुरू कर दिया था तो जानकारी के बावजूद नेहरू ने न केवल कोई कार्यवाही की बल्कि इस तथ्य को भारतीय जनता से छुपाने की पूरी कोशिश भी की। ओक्सिचीन के आलावा चीन ने शिप्कला,बारहोती,तवांग व नेफा में भी घुसपैठ करके अपने अड्डे बना लिए थे। भारत का ३८००० वर्ग किलोमीटर का भाग चीन १९५५ तक कब्जा चुका था।

बाद में संसद में हंगामा होने पर नेहरू ने जवाब दिया कि ,"वहाँ तो घास तक भी नही उगती।" नेहरू की इस बात का जवाब उस समय के रक्षा मंत्री रहे महावीर सिंह त्यागी ने जब अपनी टोपी उतारकर दिया कि, "देखो मेरे गंजे सर पर भी एक बाल नही उगता ,इसे भी काटकर चीन को सोप दो।" इस उत्तर को सुनकर नेहरू झल्लाकर संसद से बहार चले गए । इसी वर्ष भी सिक्किम से चीनियों को खदेड़ने में कई भारतीय सैनिको ने वीरगति प्राप्त की है।

आज चीन की तरफ़ से जो लगातार अतिक्रमण हो रहा है उसकी चेतावनी १९५० में ही सरकार को वीर सावरकर ने देते हुए कहा था कि, " भारत को असली खतरा चीन से है,इसलिए भारत की उत्तरी सीमा को सबसे पहले सुरक्षित किया जाय।" सावरकर की इस बात का समर्थन उस समय रहे सेना के सर्वोच्च अधिकारी जनरल करिअप्पा ने भी किया था। परन्तु सत्ता के मद में चूर नेहरू ने सावरकर की उस बात को अनसुनी कर दिया । नेहरू की वही निति आजतक जारी है । चीन बार बार भारतीय छेत्र में रोज अतिक्रमण कर रहा है, और भारत का रक्षा मंत्री लगातार कह रहा है कि चिंता की कोई बात नही। इस निति को अहिंसा नही बल्कि कायरता कहते है।

इन्ही बातों कि और इंगित करती हुई कवि श्री देवेन्द्र सिंह त्यागी की कविताओं की ये पंक्ति देखिये

दो पक्षो बीच राष्ट्र की धज्जी उड़ती जाती।
राष्ट्र-अस्मिता संसद में है खड़ी-खड़ी सिस्काती।
पल-पल क्षन-क्षन उसका ही तो यहाँ मरण होता है।
द्रुपद सुता का बार-बार यहाँ चीर-हरण होता है।

युद्धों से भयभीत देश जो युद्धों से बचता है।
युद्ध स्वं उसके द्वारों पर दस्तक जा देता है।
इसलिए शत्रु की चालों में न अपने को फसने दो।
वीरों की छाती पर अब तो शास्त्रों को सजने दो।
यदि समय पर चूके सब कुछ राष्ट्र यह खो देगा।
फ़िर सिंहासन की एक भूल का दंड देश भोगेगा।

पिछली एक सदी में इस्लाम का सबसे बड़ा बुद्धिजीवी अल्लामा इकबाल

इस्लाम में पिछली सदी में एक महानायक पैदा हुआ अल्लामा इक़बाल। सारे जहाँ से अच्छा लिखने वाले इस शायर को निसंदेह २० वीं सदी का इस्लाम का सबसे बड़ा बुद्धिजीवी व शुभ चिन्तक माना गया है। आजादी के बाद भी इस शायर को हमारे देश भारत के बुद्धिजीवी व धर्म निर्पेक्ष इस शायर की प्रसंशा करते नही अघाते।
सन १९०९ में इसी शायर ने शिकवा नाम से एक पुस्तक की रचना की और ४ वर्ष बाद इसी की पूरक एक और जवाब ऐ शिकवा की रचना की। इन पुस्तकों में इकबाल ने अल्लाह से कुछ मामूली सी शिकायत की है। इस्लाम के इस बुद्धिजीवी ने अल्लाह से शिकायत की है कि

"सारी दुनिया में हम मुसलमानों ने तुम्हारे नाम पर ही सब कुछ किया। तमाम काफिरों , दूसरे धर्मो को मानने वालो को ख़त्म कर दिया,उनकी मुर्तिया तोडी,उनकी पूरी सभ्यताये उजाड़ डाली। केवल इसलिए की वे सब तुम्हारी सत्ता को माने ,इस्लाम को कबूलें। मगर ऐ अल्लाह, तेरे लिए इतना कुछ करने वाले मुसलमानों को तूने क्या दिया? कुछ भी तो नही। उल्टे दुनिया के काफिर मजे से रह रहे है। उन्हें हूरे व नियामाते यहीं धरती पर मिल रही है, जबकि मुसलमान दुखी है। अब काफिर इस्लाम को बीते ज़माने की बात समझते है। "

इस शायर की अल्लाह से इस शिकायत पर भारत के मुस्लिम बुद्धिजीवी व हिंदू सेकुलर नेता क्या कहना चाहेंगे ? क्यो कि शिकवा को समझने के लिए अलग से बुद्धि लगाने कि आवश्यकता नही है।
भारत का एक महान लेखक खूसट खुशवंत सिंह ने तो इकबाल कि इस रचना का अंग्रेजी अनुवाद किया है और इस रचना की तारीफ़ में कसीदें पड़े है।
इस्लाम को भाईचारे का व प्रेम का संदेश देने वाला बताने वाले इस्लाम के इस बुद्धिजीवी की इस रचना को जरूर पढ़े,और समझें कि इसके लिए इस्लाम कि वो शिक्षा ही जिम्मेदार है जो इकबाल जैसे लोगो को कुरान व हादीसों से प्राप्त होती है।

सोमवार, 7 सितंबर 2009

हम भारतीय, सिकंदर महान? को सिकंदर महान क्यों माने

सिकंदर अपने पिता की मृत्यु के पश्चात् अपने सौतेले व चचेरे भाइयों को कत्ल करने के बाद मेसेडोनिया के सिंहासन पर बैठा था। अपनी महत्वकन्क्षा के कारण वह विश्व विजय को निकला। अपने आसपास के विद्रोहियों का दमन करके उसने इरान पर आक्रमण किया,इरान को जीतने के बाद गोर्दियास को जीता । गोर्दियास को जीतने के बाद टायर को नष्ट कर डाला। बेबीलोन को जीतकर पूरे राज्य में आग लगवा दी। बाद में अफगानिस्तान के क्षेत्र को रोंद्ता हुआ सिन्धु नदी तक चढ़ आया।

सिकंदर को अपनी जीतों से घमंड होने लगा था । वह अपने को इश्वर का अवतार मानने लगा,तथा अपने को पूजा का अधिकारी समझने लगा। परंतु भारत में उसका वो मान मर्दन हुआ जो कि उसकी मौत का कारण बना।

सिन्धु को पार करने के बाद भारतt के तीन छोटे छोटे राज्य थे। १--,ताक्स्शिला जहाँ का राजा अम्भी था। २--पोरस। ३--अम्भिसार ,जो की काश्मीर के चारो और फैला हुआ था। अम्भी का पुरु से पुराना बैर था,इसलिए उसने सिकंदर से हाथ मिला लिया। अम्भिसार ने भी तठस्त रहकर सिकंदर की राह छोड़ दी, परंतु भारतमाता के वीर पुत्र पुरु ने सिकंदर से दो-दो हाथ करने का निर्णय कर लिया। आगे के युद्ध का वर्णन में यूरोपीय इतिहासकारों के वर्णन को ध्यान में रखकर करूंगा। सिकंदर ने आम्भी की साहयता से सिन्धु पर एक स्थायी पुल का निर्माण कर लिया।
प्लुतार्च के अनुसार,"२०,००० पैदल व १५००० घुड़सवार सिकंदर की सेना पुरु की सेना से बहुत अधिक थी,तथा सिकंदर की साहयता आम्भी की सेना ने भी की थी। "

कर्तियास लिखता है की, "सिकंदर झेलम के दूसरी और पड़ाव डाले हुए था। सिकंदर की सेना का एक भाग झेहलम नदी के एक द्वीप में पहुच गया। पुरु के सैनिक भी उस द्वीप में तैरकर पहुच गए। उन्होंने यूनानी सैनिको के अग्रिम दल पर हमला बोल दिया। अनेक यूनानी सैनिको को मार डाला गया। बचे कुचे सैनिक नदी में कूद गए और उसी में डूब गए। "
बाकि बची अपनी सेना के साथ सिकंदर रात में नावों के द्वारा हरनपुर से ६० किलोमीटर ऊपर की और पहुच गया। और वहीं से नदी को पार किया। वहीं पर भयंकर युद्ध हुआ। उस युद्ध में पुरु का बड़ा पुत्र वीरगति को प्राप्त हुआ।

एरियन लिखता है कि,"भारतीय युवराज ने अकेले ही सिकंदर के घेरे में घुसकर सिकंदर को घायल कर दिया और उसके घोडे 'बुसे फेलास 'को मार डाला।"
ये भी कहा जाता है की पुरु के हाथी दल-दल में फंस गए थे,तो कर्तियास लिखता है कि,"इन पशुओं ने घोर आतंक पैदा कर दिया था। उनकी भीषण चीत्कार से सिकंदर के घोडे न केवल डर रहे थे बल्कि बिगड़कर भाग भी रहे थे। ----------------अनेको विजयों के ये शिरोमणि अब ऐसे स्थानों की खोज में लग गए जहाँ इनको शरण मिल सके। सिकंदर ने छोटे शास्त्रों से सुसज्जित सेना को हाथियों से निपटने की आज्ञा दी। इस आक्रमण से चिड़कर हाथियों ने सिकंदर की सेना को अपने पावों में कुचलना शुरू कर दिया।"
वह आगे लिखता है कि,"सर्वाधिक ह्रदयविदारक द्रश्य यह था कि, यह मजबूत कद वाला पशु यूनानी सैनिको को अपनी सूंड सेपकड़ लेता व अपने महावत को सोंप देता और वो उसका सर धड से तुंरत अलग कर देता। --------------इसी प्रकार सारा दिन समाप्त हो जाता,और युद्ध चलता ही रहता। "
इसी प्रकार दियोदोरस लिखता है की,"हाथियों में अपार बल था,और वे अत्यन्त लाभकारी सिद्ध हुए। अपने पैरों के तले उन्होंने बहुत सारे यूनानी सैनिको को चूर-चूर कर दिया।
कहा जाता है की पुरु ने अनाव्यशक रक्तपात रोकने के लिए सिकंदर को अकेले ही निपटने का प्रस्ताव रक्खा था। परन्तु सिकंदर ने भयातुर उस वीर प्रस्ताव को अस्वीकार कर दिया था।
इथोपियाई महाकाव्यों का संपादन करने वाले श्री इ० ए० दब्ल्यु०बैज लिखते है की,"जेहलम के युद्ध में सिकंदर की अश्व सेना का अधिकांश भाग मारा गया। सिकंदर ने अनुभव किया कि यदि में लडाई को आगे जारी रखूँगा,तो पूर्ण रूप से अपना नाश कर लूँगा।अतः उसने युद्ध बंद करने की पुरु से प्रार्थना की। भारतीय परम्परा के अनुसार पुरु ने शत्रु का वद्ध नही किया। इसके पश्चात संधि पर हस्ताक्षर हुए,और सिकंदर ने पुरु को अन्य प्रदेश जीतने में सहायता की"।
बिल्कुल साफ़ है की प्राचीन भारत की रक्षात्मक दिवार से टकराने के बाद सिकंदर का घमंड चूर हो चुका था। उसके सैनिक भी डरकर विद्रोह कर चुके थे । तब सिकंदर ने पुरु से वापस जाने की आज्ञा मांगी। पुरु ने सिकंदर को उस मार्ग से जाने को मना कर दिया जिससे वह आया था। और अपने प्रदेश से दक्खिन की और से जाने का मार्ग दिया।
जिन मार्गो से सिकंदर वापस जा रहा था,उसके सैनिको ने भूख के कारण राहगीरों को लूटना शुरू कर दिया।इसी लूट को भारतीय इतिहास में सिकंदर की दक्खिन की और की विजय लिख दिया। परंतु इसी वापसी में मालवी नामक एक छोटे से भारतीय गणराज्य ने सिकंदर की लूटपाट का विरोध किया।इस लडाई में सिकंदर बुरी तरह घायल हो गया।
प्लुतार्च लिखता है कि,"भारत में सबसे अधिक खुन्कार लड़ाकू जाती मलावी लोगो के द्वारा सिकंदर के टुकड़े टुकड़े होने ही वाले थे,---------------उनकी तलवारे व भाले सिकंदर के कवचों को भेद गए थे।और सिकंदर को बुरी तरह से आहात कर दिया।शत्रु का एक तीर उसका बख्तर पार करके उसकी पसलियों में घुस गया।सिकंदर घुटनों के बल गिर गया। शत्रु उसका शीश उतारने ही वाले थे की प्युसेस्तास व लिम्नेयास आगे आए। किंतु उनमे से एक तो मार दिया गया तथा दूसरा बुरी तरह घायल हो गया।"
इसी भरी markat में सिकंदर की गर्दन पर एक लोहे की lathi का प्रहार हुआ और सिकंदर अचेत हो गया। उसके अन्ग्रक्षक उसी अवस्था में सिकंदर को निकाल ले गए। भारत में सिकंदर का संघर्ष सिकंदर की मोत का कारण बन गया।
अपने देश वापस जाते हुए वह बेबीलोन में रुका। भारत विजय करने में उसका घमंड चूर चूर हो गया। इसी कारण वह अत्यधिक मद्यपान करने लगा,और ज्वर से पीड़ित हो गया। तथा कुछ दिन बाद उसी ज्वर ने उसकी जान ले ली।
स्पष्ट रूप से पता चलता है कि सिकंदर भारत के एक भी राज्य को नही जीत पाया । परंतू पुरु से इतनी मार खाने के बाद भी इतिहास में जोड़ दिया गया कि सिकंदर ने पुरु पर जीत हासिल की।भारत में भी महान राजा पुरु की जीत को पुरु की हार ही बताया जाता है।यूनान सिकंदर को महान कह सकता है लेकिन भारतीय इतिहास में सिकंदर को नही बल्कि उस पुरु को महान लिखना चाहिए जिन्होंने एक विदेशी आक्रान्ता का मानमर्दन किया।

शनिवार, 5 सितंबर 2009

संसद से सीधा प्रसारण-संसद चालीसा भाग १

देशवासियों सुनो झलकियाँ मै तुमको दिखलाता।
राष्ट्र- अस्मिता के स्थल से सीधे ही बतियाता।
चारदीवारी की खिड़की सब लो मै खोल रहा हूँ।
सुनो देश के बन्दों मै संसद से बोल रहा हूँ।१।

रंगमंच संसद है नेता अभिनेता बने हुए हैं।
जन- सेवा अभिनय के रंग में सारे सने हुए हैं।
पॉँच वर्ष तक इस नाटक का होगा अभिनय जारी।
किस तरह लोग वोटों में बदलें होगी अब तैयारी।२।

चुनाव छेत्र में गाली जिनको मुहं भरके देते थे।
जनता से जिनको सदा सजग रहने को कहते थे।
क्या-क्या तिकड़म करके सबने संसद पद जीते है।
बाँट परस्पर अब सत्ता का रस मिलकर पीते हैं।३।

जो धर्म आज तक आया मानवता का पाठ पढाता।
सर्वधर्म-समभाव-प्रेम से हर पल जिसका नाता।
वोटों की वृद्धि से कुछ न सरोकार उसका है।
इसलिए संसद में होता तिरस्कार उसका है।४।

दो पक्षो बीच राष्ट्र की धज्जी उड़ती जाती।
राष्ट्र-अस्मिता संसद में है खड़ी-खड़ी सिस्काती।
पल-पल क्षन-क्षन उसका ही तो हाय मरण होता है।
द्रुपद सुता का बार-बार यहाँ चीर-हरण होता है।५।

आतंकवाद और छदम युद्ध का है जो पालनहारा।
साझे में आतंकवाद का होगा अब निबटारा।
आतंक मिटाने का उसके संग समझोता करती है।
चोरों से मिलकर चोर पकड़ने का दावा करती है।६।

विषय राष्ट्र के एक वर्ग पर यहाँ ठिटक जाते हैं।
राष्ट्र-प्रेम के सारे मानक यहाँ छिटक जाते हैं।
अर्थ-बजट की द्रष्टि जाकर एक जगह टिकती है।
एक वर्ग की मनुहारों पर संसद यह बिकती है।7.

अफजल के बदले मे जो है वोट डालने जाते।
सत्ता की नजरों में वे ही राष्ट्र भक्त कहलाते।
आज देश की गर्दन पर जो फेर रहे हैं आरे।
उनकी वोटो से विजयी नही क्या संसद के हत्यारे।8.

सर्वोच्च अदालत ने फाँसी का जिसको दंड दिया है।
सांसद ने तो उसको ही वोटो में बदल लिया है।
इसलिए आज यह देश जिसे है अपराधी ठहराता।
वही जेल मे आज बैठकर बिरयानी है खाता।9.

मौत बांटते जिसको सबने टी० वी० पर पहचाना।
धुआं उगलती बंदूकों को दुनिया भर ने जाना।
सत्ता का सब खेल समझ वह हत्त्यारा गदगद है।
हत्या का प्रमाण ढूंढती अभी तलक संसद है।10.

यह माइक-कुर्सी फैंक वीरता रोज-रोज दिखलाती।
पर शत्रु की घुड़की पर है हाथ मसल रह जाती।
जाने क्या-क्या कर जुगाड़ यहाँ कायरता घुस आई।
फ़िर भांड-मंडली मधुर सुरों का पुरुष्कार है लायी।११।

जब एक पंथ से आतंकियों की खेप पकड़ में आती।
वोट खिसकती सोच-सोच यह संसद घबरा जाती।
तब धर्म दूसरे पर भी आतंकी का ठप्पा यह धरती है।
यूँ लोकतंत्र में सैक्युलरती की रक्षा यह करती है। १२।
क्रमशः