शनिवार, 31 अक्तूबर 2009

पाँव में चुभने लगे .

देश पर चर्चा चली तो,प्रश्न भी उठने लगे।
शर्म से चेहरे हमारे,बेतरह झुकने लगे॥ १

आँधियों के पाँव में तो,बेडियाँ डाली नही।
दीपकों से रोशनी के,वायदे करने लगे॥२

होंसले लेकर चले थे,रहबरों के साथ हम।
वे रास्ते ही रहबरों के पाँव में चुभने लगे॥ ३

जब उजालों से रही,पहचान न बिल्कुल कोई।
जुगनुओं की रौशनी को,रौशनी कहने लगे॥४

तारीख लिखेगी तुम्हारे कर्म की हर दास्ताँ।
सर कटाकर किस तरह, मगरूर तुम रहने लगे॥५

की है तरक्की आदमी ने इस कदर, है अब तलक।
लड़ते थे जो कि पत्थरों से ,बारूद से लड़ने लगे॥६

रचनाकार ---मेरे पिता श्री देवेन्द्र सिंह त्यागी







बुधवार, 28 अक्तूबर 2009

अमेरिका भारत की धार्मिक नीतियों के बारे में बोलना बंद करे.

अब भारत सरकार की धार्मिक निति क्या हो और उसे पूरे देश में किस प्रकार लागू किया जाय ?इसकी चिंता अमेरिका सरकार को सताने लगी है। इस्लामिक देशों की अपने अपने देश में अल्पसंख्यकों के प्रति क्या निति है किस प्रकार सरेआम वहां अल्पसंख्यकों को मोत के घाट उतारा जा रहा है, किस प्रकार मानवाधिकारों की वहां धज्जियाँ उडाई जा रही हैं,यह सब देख सुनकर भी अमेरिका किसी भी छोटे मोटे इस्लामिक देश के विरूद्ध एक भी शब्द बोलने का साहस नही कर पाता। चीन की किसी भी घरेलू निति के बारे में बोलने में जिस अमेरिका की रूह कापती है,आस्ट्रेलिया में हो रहे भारतीय समाज पर हमलों के बारे में जिसने एक शब्द भी नही बोला है,वह आज भारत की धार्मिक निति पर खुले आम बयानबाजी कर रहा है तथा एक रिपोर्ट तैयार कराई है।
जी हाँ ,अभी हाल ही में अमेरिका के लोकतंत्र ,मानवाधिकार और श्रम मामलों के सहायक मंत्री माइकल एच पोजर ने भारत की केन्द्र सरकार की धार्मिक निति पर बोलते हुए कहा है की ,"प्रश्न यह है कि भारत की केन्द्र सरकार की निति को स्थानीय स्तर पर किस प्रकार लागू किया जाय। "
अमेरिका ने इस मामले में जो रिपोर्ट तैयार की है,उसमे कांग्रेस सरकार की धार्मिक निति (भारत का इसाई करण)
की प्रशंसा की है,तथा भाजपा की नीतियों की आलोचना की है। रिपोर्ट में कहा गया है कि,"कुछ प्रदेशों में इस धार्मिक स्वतंत्रता को धर्मांतरण विरोधी क़ानून बनाकर या क़ानून में संशोधन करके इसे सीमित कर दिया है,और वहां पर अल्पसंख्यक लोगो पर आक्रमण करने वाले लोगो के विरूद्ध कोई भी प्रभावी कार्यवाही नही की गई है।" रिपोर्ट में वरुण गाँधी के भाषण का भी जिक्र किया गया है।
इस बात को अगर पूरी गहराई से परखा जाय,तो स्पष्ट रूप से दिखाई पड़ता है कि किस प्रकार अमेरिका भारत को एक इसाई देश बनाने की सुनियोजित षड़यंत्र रच रहा है।
कभी राजग सरकार के साथ गलबहियां करने वाला अमेरिका किस प्रकार एक विदेशी इसाई महिला के हाथ में सत्ता की चाबी आते ही किस षड़यंत्र में लग गया है, यह रिपोर्ट साफ़ बताती है।

गुरुवार, 15 अक्तूबर 2009

१५ ओक्टुबर को दुर्गा भाभी की पुन्य तिथि पर मेरा शत- शत नमन

भारतीय स्वतंत्रता संग्राम में एक क्रांतिकारी थे भगवतीचरण वोहरा। भगत सिंह जी का पूरा संगठन उनको बड़ा भाई मानता था। उनकी धर्मपत्नी का नाम था दुर्गा, और यही दुर्गा इतिहास में दुर्गा भाभी का नाम पाकर अमर हो गई।
जिस समय सरदार भगत सिंह जी व उनके साथियों ने लाला लाजपत राय जी की म्रत्यु का बदला लेने के लिए दिन दहाड़े सांडर्स को गोलियों से उड़ा दिया था। तो अंग्रेज एकदम बोखला गए थे। उन्होंने चप्पे चप्पे पर क्रांतिकारियों को पकड़ने के लिए निगरानी शुरू कर दी। क्रांतिकारियों के लाहोर से निकलने में दुर्गा भाभी का योगदान अविस्मरनीय है।
उस समय भगवतीचरण वोहरा फरार थे। दुर्गा भाभी लाहोर की एक छोटी सी गली में एक मकान में रह रही थी। भगत सिंह जी की पत्नी बनकर उन्होंने भगतसिंह व राजगुरु को लाहोर स्टेशन से लखनऊ तक पहुचाया। उनके साथ उनका पुत्र शचीन्द्र भी था। राजगुरु जी उन के नोकर के रूप में थे।
इसके बाद भगत सिंह व बटुकेश्वर दत्त ने दिल्ली असेम्बली में बम फैंका, और अपनी ग्रिफतारी दे दी।उसके पश्चात् जब भगत सिंह, राजगुरु व सुखदेव को फांसी की सजा हो गई तब दुर्गा भाभी,सुसीला दीदी तथा साथियों ने मिलकर जेल से भगत सिंह व साथियों को छुटाने के लिए एक योजना बनाई । इसके अर्न्तगत दिल्ली में एक छोटी सी बम फैक्ट्री बनाई गई। इसमे बने बम का परिक्षन करते हुए दुर्गा भाभी के पति वोहरा जी की मौत हो गई।
पति की म्रत्यु के पश्चात् दुर्गा भाभी ने भगत सिंह को छुड़ाने का कार्य अपने हाथ में ले लिया। परन्तु दुर्भाग्य से उस बम फैक्ट्री में विष्फोट हो गया,और दुर्गा भाभी व साथियों को भूमिगत होना पड़ा।दुर्गा भाभी की सारी संपत्ति जब्त कर ली गई,किंतु वे अपने पथ पर अग्रसर होती रही। वे भगत सिंह की रिहाई के लिए गाँधी से भी मिली,किंतु कोई फायदा नही हुआ।
भगत सिंह व साथियों को फंसी लगने के बाद वे अत्यन्त दुखी हुई। उन्होंने अंग्रेजों से बदला लेने के लिए पुलिस कमिश्नर को मारने का निर्णय किया। उन्होंने अपना बच्चा अपने एक रिश्तेदार के पास छोड़ दिया। अपनी इस योजना को कार्य रूप देने के लिए वे मुंबई जा पहुची। एक रात काली साडी पहनकर वे कमिश्नर के बंगले पर जा पहुची। क्रन्तिकारी प्रथ्वी सिंह उनके साथ थे।
कुछ अंग्रेज कमिश्नर के बंगले की और से आते दिखाई दिएदुर्गा भाभी अत्यन्त आवेश व गुस्से में थी। उन्होंने तुंरत गोली चला दी। कमिश्नर उन लोगों में नही था। गोली लगने से तीन अंग्रेज घायल हो गए।वहाँ से भागकर उन्होंने तुंरत मुंबई को छोड़ दिया। काफी समय तक वो पुलिस से बचती रही। लेकिन बाद में गिरफ्तार हो गयीं। सबूतों के अभाव के कारण उनको कोई सजा तो नही हुई किंतु फ़िर भी उनको नजरबन्द रक्खा गया,तथा बाद में रिहा कर दिया गया।
उनके सभी साथी शहीद हो चुके थे। वे बिल्कुल बेसहारा हो चुकी थी। अंत में थक हारकर बैठने के बजाय वे समाज सेवा में लग गई। १९३७ से १९८२ तक वे लखनऊ में वे एक शिक्षा केन्द्र चलाती रही। उसके बाद वे गाजियाबाद में आकर बस गई। १५ ओक्टुबर १९९९ को उनका स्वर्गवास हो गया। उनकी मौत एक गुमनामी की मौत रही। उनकी शवयात्रा में देश का कोई बड़ा नेता तो नेता गाजियाबाद का भी कोई क्षेत्रिय नेता भी शामिल नही हुआ।हाँ कुछ पत्रकारों द्बारा सरकार की खिल्ली जरूर उडाई गई।

रविवार, 4 अक्तूबर 2009

आवश्यकता है अभी एक और स्वतंत्रता संग्राम की

सम्पूर्ण विश्व ने सदियों से भारत पर लगातार आक्रमण किए हैं किंतु मुख्यतः मुग़ल और ब्रिटिश लोगो को ही अधिक सफलता मिली है। मुग़ल और ब्रिटिश लोग भी इस राष्ट्र पर कभी पुर्णतः राज नही कर सके।भारत जब गुलाम था और यहाँ मुग़ल और ब्रिटिश साम्राज्यवादियों का साम्राज्य था ,उस समय देश में किसी न किसी जगह क्रांति चलती ही रहती थी और यहाँ के लोगो ने प्राण गवाएं पर कभी मन से दासता स्वीकार नही की किंतु आज देश के एक बड़े वर्ग ने पराधीनता और गुलामी स्वीकार ली है और जिनकी पराधीनता स्वीकार की है ,अब उनका उद्देश्य पूरे राष्ट्र को पराधीन बनाने का है और इस कार्य को बड़ी कुशलता के साथ क्रियान्वित कर रहे हैं। उन्होंने चारो तरफ़ ऐसा जाल बिछाया है की इसको हर कोई आराम से समझ भी नही पाता एक ऐसा माहौल बना दिया है की किसी भी भारतवासी में आत्मसम्मान या आत्मविश्वास जाग्रत न हो जाए और अपने को हीन भावना से ही ग्रस्त समझे। वर्तमान में पूरे विश्व में ये अकेला देश ऐसा है जिसको अपनी भाषा में लिखते-बोलते-पढ़ते शर्म आती है जो अमेरिका और ब्रिटेन की नौकरी करना पसंद करता है या सिर्फ़ एक उपनिवेश बन कर रहना चाहता है। यहाँ के उधोगपति, नौकरीपेशा या थोड़ा सा भी संपन्न व्यक्ति इंग्लिश बोलता है या बोलने का प्रयास करता दिखाई देता है और बड़ा ही गर्व महसूस करता है। मैं किसी भाषा के विरुद्ध नही हूँ और मैं भी फिलहाल इंग्लिश भाषी देश में कार्यरत हूँ किंतु इंग्लिश बोलने पर गर्व नही करता क्युकी मैं इसको एक साधारण भाषा से अधिक कुछ नहीं समझता जैसा की चाइना , जापान, रसिया, फ्रांस, स्पेन आदि के लोग समझते हैं। मेरा यह मानना है और यह प्रत्यक्ष भी है की भाषा, ज्ञान का पर्यावाची नही होती और कोई राष्ट्र अपनी भाषा में ही तरक्की कर सकता है अन्यथा उसकी तरक्की कुछ सीमित लोगो तक ही सीमित रहती है। जापान, यु. एस., चाइना इस बात के ज्वलंत उदाहरण है कि अपने स्वाभिमान और आत्मविश्वास से ही तरक्की होती है न कि किसी की नक़ल से।भारतियों में ये प्रचार बहुत है कि कंप्यूटर पर हिन्दी में कार्य करना सम्भव नहीं है इसके लिए हँसी के टेक्निकल शब्द बनाकर बहुत मजे लिए जाते हैं। ये तो गुलामी कि मानसिकता की पराकाष्ठा है। चाइना की मैंडरिन भाषा में ३०० से अधिक अक्षर हैं और वो अपना समस्त कार्य इसी में करते हैं और ऐसा ही जापान, रसिया, फ्रांस आदि के लोग करते हैं। जापान आदि कई देशो में प्रोग्रामिंग भी जापानीज़ आदि में होती है। नयी खोज के साथ भाषा में नए शब्दों का भी निर्माण होता है। किंतु हिन्दी में ऊटपटांग शब्द बना कर कुछ भारतीय हँसते हैं और गुलामी कि चरम सीमा पर पहुच जातें हैं।

कुछ लोग आई. टी. और सोफ्टवेअर में भारत की कामयाबी को ही पूर्ण राष्ट्र कि तरक्की मानते हैं। क्या यह देश केवल सोफ्टवेअर और आई टी इंजिनीयर्स का ही है बाकी जनता को देश निकाले की सजा देनी चाहिए। क्या केवल एक क्षेत्र में तरक्की करके इतने विशाल देश का भरण-पोषण हो सकता है। एक अनुमान के अनुससार २०२० तक भारत में १५ करोड़ से भी अधिक बेरोजगार हो जायेंगे और अब भी कितने ही करोडो लोग भूखे-नंगो का नर्कीय जीवन जीने पर मजबूर हैं।ये कैसी तरक्की कि है भारत ने १९९७ से करीब १ लाख ८२ हजार ९३६ किसान आत्महत्या कर चुके हैं, जबकि सरकार अमेरिका कि नक़ल से बेलआउट में मस्त है।२००७ के दौरान १६६३२ किसानों ने आत्महत्या कर ली। इनमें सर्वाधिक किसान महाराष्ट्र से हैं। गांव-देहात में मौत का धारावाहिक तांडव जस का तस जारी है। दिन-प्रतिदिन बेरोजगारी बढती जा रही है और भारत के इंजिनियर अमेरिका और ब्रिटेन के लिए काम करके बहुत प्रसन्न हो रहे हैं कि देश तरक्की कर रहा है। यदि वर्तमान में देश की समस्याओं पर एक पुस्तक लिखी जाए तो कम से कम १०००० पृष्ठ तो आराम से लिखे जा सकते हैं। जो भारत का शहरी धनाड्य और संपन्न वर्ग है उसको केवल अपनी तरक्की ही सारे देश की तरक्की नज़र आती है किंतु कटु सत्य यह है मुश्किल से २-३ करोड़ लोग ही संपन्न हैं और अधिक से अधिक ५ करोड़ हैं और ये ही लोग ओर अधिक संपन्न होते जा रहे हैं और ये ही लोग देश पर राज भी कर रहे हैं और बाकी जनता को लच्छेदार बातो में उलझा के उनका शोषण कर रहे हैं।ऊपर से सेकुलर्स खुलेआम प्रत्यक्ष आतंकवादियों को समर्थन देते हैं और शान्ति का राग अलाप करके जनता के विद्रोह या क्रांति को शांत करने में लगे रहते हैं ।

मजे की बात देखो जनता का बेवकूफ उसी के सामने बनाया जा रहा है और जनता जातियों और गुटों में विभाजित होकर अपना बलात्कार करा रही है और जरा सी लज्जा भी नही है। अब राष्ट्रभक्ति का भी वो सम्मान नहीं है ओर लोग स्वतंत्रता को Happy Republic Day या Happy Independence Day कह कर अपना कर्तव्य पूर्ण करते हैं। यदि लोग ये समझते हैं की १९४७ में देश स्वतंत्र हुआ था तो वो एक बहुत बड़े भुलावे में हैं गौर से इतिहास को पलट कर देखो ओर जिनके हाथो में वो सत्ता आई थी उनका व्यक्तित्व देखो तो पाओगे वह एक सत्ता का स्थानांतरण था जो की कुछ अंग्रेजो से हट कर दूसरे अंग्रेजो के हाथ में आ गई थी। उन्होंने उस समय न तो अंग्रेजो के कानून को बदला न ही अपनी शिक्षा पद्धति लागू की, न ही ग़लत इतिहास को बदलने का प्रयास किया और न ही देश को एक सूत्र में बांधने का प्रयास किया वरन् देश को अंग्रेजो की नीति पर ही मुस्लिम तुष्टिकरण, भाषा, जाति आदि के नाम पर इसको खंड-बंड कर दिया। ये कैसी स्वतंत्रता है भाई मेरी समझ से परे है। इन्होने देश को मानसिक गुलाम बना दिया ओर उसीका परिणाम है आज जनता ने स्वयम ही देश की सत्ता एक विदेशी महिला के चरणों में अर्पित करदी अब केवल उसका मन्दिर बनाना ही बाकी है।

हमें राष्ट्र और राष्ट्रवाद को जानना चाहिए यजुर्वेद के अनुसार

आ ब्रह्मन ब्राहमणों ब्रह्मवर्चसी जायतामा राष्ट्रे राजन्यः शूरअइषव्योअतिव्यधि महारथो जायतां दोग्ध्री धेनुर्वोधानडवानाशुः सप्तिः पुरन्धिर्योषा जिष्णू रतेष्ठा सभेयो युवास्या यजमानस्य वीरो जायतां, निकामे निकामे नः पर्जन्यो वर्षतु फलवत्यो नअओषधयः पच्यन्तां योगक्षेमो नः कल्पताम्।।

इस सूक्त के अनुसार जन समूह, जो एक सुनिश्चित भूमिखंड में रहता है, संसार में व्याप्त और इसको चलने वाले परमात्मा अथवा प्रकृति के अस्तित्व को स्वीकारता है, जो बुद्धि या ज्ञान को प्राथमिकता देता है और विद्वजनों का आदर करता है, और जिसके पास अपने देश को बाहरी आक्रमण और आन्तरिक, प्राकृतिक आपत्तियों से बचाने और सभी के योगक्षेम की क्षमता हो, वह एक राष्ट्र है।

अंग्रेजी भाषा के ऑक्सफोर्ड शब्दकोष में नेशन शब्द का अर्थ बताया गया है - 'वह विशिष्ट जाति अथवा जन समूह जिसका उदगम, भाषा, इतिहास अथवा राजनीतिक संस्थाएं समान हों ।'
वैसे पश्चिम में नेशन को और अलग-अलग तरीको से भी परिभाषित किया गया है। आज का संसार नेशन-स्टेट्स में विभाजित है। आप देख सकते हैं भारत की राष्ट्र की परिभाषा और पश्चिम में कितना अन्तर है। यह भी एक पूर्ण विषय है जिस पर पूरी पुस्तक लिखी जा सकती है। मेरा यहाँ पर तात्पर्य ये है की भारत एक राष्ट्र है और उसकी आत्मा वहां की संस्कृति और लोगो की वो भावना है जो उनको एक राष्ट्र के लिए समर्पित करती है । किंतु आज न केवल इसके राष्ट्र होने में संदेह किया जाता है वरन इसकी आत्मा हिंदू समाज को आतंकवादी, अत्याचारी जैसे शब्दों से परिभाषित किया जाता है। पूरे विश्व में सनातन धर्म या हिन्दुओ की छवि को कलंकित करने का व्यापक तौर पर कार्य और षडयंत्र किया जा रहा है। खुलेआम प्रत्यक्ष राष्ट्रवादी शक्तियों का दमन हो रहा है और आज का हिंदू समाज मौन धारण किए किसी ईश्वरीय अवतार की प्रतीक्षा में बैठा दिखाई देता है जबकि मनुष्य अपने कर्मो का स्वयं कर्ता और भोक्ता होता है। और सत्य की तभी जीत होती है जब उसके जीतने की चेष्टा की जाती है। यदि कोई प्रयास ही नही करेगा तो ये देश इन सेकुलर्स जिनका उद्देश्य ही हिंदू,हिन्दुज्म को जड़ से मिटाना है के हाथो गुलाम या मुस्लिम मजहबी देश में परिवर्तित हो जाएगा । ये सेकुलर्स यहाँ यू. एस. में और विदेशो में बैठे भारतीयों को अपने राष्ट्र से काटने के लिए विशेष फिल्में या मूवी बनाते हैं, पुस्तकें लिखते हैं, समाचार पत्र में लेख लिखते हैं आदि कार्य ये बड़ी ही दृढ़ इच्छा के साथ युद्ध स्तर पर कर रहे हैं।ये सेकुलर लोग जिमी मानसिकता से ग्रस्त जिमी-टैक्स अदा कर रहे हैं जो मुग़ल काल में हिन्दुओं से लिया जाता था।

आप में से काफ़ी लोगो ने स्वतंत्रता की लड़ाई और क्रांतिकारियों के बारे में जब-जब पढ़ा होगा तो आप लोगो में भी एक राष्ट्रवाद की भावना जाग्रत होती होगी और ये भी सोचते होगे कि यदि मैं उस समय होता तो क्रांतिकारी होता तो आज ये राष्ट्र अपने भक्तो को फ़िर से आमंत्रण दे रहा है उन्हें क्रांतिकारी बनने का ओर देश पर बलिदान होने का फ़िर से मौका दे रहा है और आज फ़िर से एक स्वतंत्रता संग्राम की आवश्यकता है अन्यथा इस विश्व से विश्वगुरू सनातन सभ्यता का नामो-निशान मिट जाएगा। गीता में भी श्रीकृष्ण ने अर्जुन से कहा है-

स्वतः प्राप्त हे पार्थ ! खुले यह, स्वर्ग-द्वार के जैसा।
भाग्यवान क्षत्री ही करते, युद्ध प्राप्त हैं ऐसा।।


वंदे मातरम्
रचनाकार-सौरभ आत्रेय

शुक्रवार, 2 अक्तूबर 2009

हिंदू शब्द की उत्पत्ति १७ वीं शताब्दी में हुई.निर्लज्ज व्यक्तियों का झूंठ.

कुछ ब्लोगर्स ने आजकल हिंदू संस्कृति को बदनाम करने का ठेका ले रक्खा है वो चाहे हिंदू त्यौहार हों अथवा हिंदू देवी देवता। और इससे भी बड़ा दुख जब होता है जब हिंदू समाज के ही कुछ लोग उनके समर्थन में टिपण्णी छोड़ते है।

अभी हाल ही में मैंने एक ब्लॉग पर एक लेख पढ़ा। वह बुद्धिहीन ब्लोगर लिखता है कि "हिंदू शब्द की उत्पत्ति १७ वीं शताब्दी में हुई है।" उदहारण के रूप में उसने नेहरूकी डिस्कवरी ऑफ़ इंडिया" का उदाहरण प्रस्तुत किया है। नेहरू की वह पुस्तक नेहरू की तरह झूंठ का पुलिंदा है। नेहरू अपने आप में कितना झूठा व हिंदू विरोधी था यह सच आज सबके सामने खुलता जा रहा है।

हिंदू शब्द भारतीय विद्दवानो के अनुसार कम से कम ४००० वर्ष पुराना है।

शब्द कल्पद्रुम : जो कि लगभग दूसरी शताब्दी में रचित है ,में मन्त्र है.............

"हीनं दुष्यति इतिहिंदू जाती विशेष:"

अर्थात हीन कर्म का त्याग करने वाले को हिंदू कहते है।

इसी प्रकार अदभुत कोष में मन्त्र आता है.........................

"हिंदू: हिन्दुश्च प्रसिद्धौ दुशतानाम विघर्षने"।

अर्थात हिंदू और हिंदु दोनों शब्द दुष्टों को नष्ट करने वाले अर्थ में प्रसिद्द है।

वृद्ध स्म्रति (छठी शताब्दी)में मन्त्र है,...........................

हिंसया दूयते यश्च सदाचरण तत्पर:।
वेद्.........हिंदु मुख शब्द भाक्। "

अर्थात जो सदाचारी वैदिक मार्ग पर चलने वाला, हिंसा से दुख मानने वाला है, वह हिंदु है।

ब्रहस्पति आगम (समय ज्ञात नही) में श्लोक है,................................

"हिमालय समारभ्य यवाद इंदु सरोवं।
तं देव निर्वितं देशम हिंदुस्थानम प्रच्क्षेत ।

अर्थात हिमालय पर्वत से लेकर इंदु(हिंद) महासागर तक देव पुरुषों द्बारा निर्मित इस छेत्र को हिन्दुस्थान कहते है।

पारसी समाज के एक अत्यन्त प्राचीन ग्रन्थ में लिखा है कि,
"अक्नुम बिरह्मने व्यास नाम आज हिंद आमद बस दाना कि काल चुना नस्त"।

अर्थात व्यास नमक एक ब्र्हामन हिंद से आया जिसके बराबर कोई अक्लमंद नही था।

इस्लाम के पैगेम्बर मोहम्मद साहब से भी १७०० वर्ष पुर्व लबि बिन अख्ताब बिना तुर्फा नाम के एक कवि अरब में पैदा हुए। उन्होंने अपने एक ग्रन्थ में लिखा है,............................

"अया मुबार्केल अरज यू शैये नोहा मिलन हिन्दे।
व अरादाक्ल्लाह मन्योंज्जेल जिकर्तुं॥

अर्थात हे हिंद कि पुन्य भूमि! तू धन्य है,क्योंकि ईश्वर ने अपने ज्ञान के लिए तुझे चुना है।

१० वीं शताब्दी के महाकवि वेन .....अटल नगर अजमेर,अटल हिंदव अस्थानं ।
महाकवि चन्द्र बरदाई....................जब हिंदू दल जोर छुए छूती मेरे धार भ्रम ।

जैसे हजारो तथ्य चीख-चीख कर कहते है की हिंदू शब्द हजारों-हजारों वर्ष पुराना है।
इन हजारों तथ्यों के अलावा भी लाखों तथ्य इस्लाम के लूटेरों ने तक्ष शिला व नालंदा जैसे विश्व -विद्यालयों को नष्ट करके समाप्त कर दिए।

इसलिए मेरा सभी ब्लोगर्स से अनुरोध है कि वे किसी अध्यन हीन व बुद्धि हीन व्यक्ति की ग़लत जानकारी को सच न माने।हिंदू धर्म की बुराई करो और अपने को हिंदू कहो ,ऐसा करने से कोई हिंदू नही बन जाता।