मंगलवार, 30 मार्च 2010

कायर मनुष्य,कायर समाज व कायर राष्ट्र का कोई सहायक नहीं होता.

समझोतों से नहीं कभी भी युद्ध टला करते हैं।
कायर जन ही इनसे खुद को स्वयं छला करते हैं।।
स्वतंत्रता -काल से आज तक की कालावधि में पकिस्तान और भारत के मध्य लगभग १७५ बार से भी अधिक वार्तालापों के दौर चल चुके हैं। इस लम्बी वार्ताओं की कड़ी में उन सभी वार्तालापों के क्या परीणाम रहे,इसकी गहराई में जाने की अब कोई आवश्यकता नहीं रही है। इसको संछेप में सीधे सीधे ही यही कहा जा सकता है कि पकिस्तान से भारत लगभग १७५ बार ही कूटनीतिक युद्ध में पराजित हो चुका है। १९४८ में पाकिस्तान के सैनिकों का कबाइलियों के वेश में आक्रमण रहा हो या १९६५ का युद्ध हो अथवा १९७१ या फिर १९९९ में कारगिल का युद्ध हो, भारत समर-छेत्र सैनिक विजय के प्राप्त करने के बावजूद भी बार बार हारा है। इन युद्दों में प्राप्त सैनिक विजय के लिए भारत का शासक वर्ग यदि अपनी पीठ थपथपाता है तो वह राष्ट्र को यह बतलाने का भी साहस करे कि विजय प्राप्त करने के उपरांत भी पाकिस्तान के किस भू-भाग को उसने भारत के अधिकृत किया है। अथवा कोन सा लाभ या लक्सय उसकी इन विजयों द्वारा प्राप्त किया गया। जबकि पाकिस्तान बार बार पराजित होकर भी हर युद्ध के बाद भारत की अपेक्सा सदैव लाभ में ही रहा है।
भारत की कायर सत्ता एक बड़े युद्ध को टालने के लिए समय समय पर समझोतों और वार्ताओं का खेल खेलती है। जबकि शत्रु इस समय का सदुपयोग केवल अपनी सैनिक शक्ति को सुद्रढ़ करने में लगता रहता है। आजादी के समय पाकिस्तान एक अत्यंत निर्बल राष्ट्र ही था । किन्तु वार्तालापों में भारत को बार बार उलझाकर उसने आज तक जो शक्ति अर्जित कर ली है , वह आज सबके सम्मुख है। आज पाकिस्तान भारत की और आँख तरेरता है, उसकी नितांत ऊपेक्छा करता है ,बार बार धमकी देता है,यही सब आज तक के भारतीय राजनेताओं की उन सभी वार्ताओं से प्राप्त की गयी उपलब्धियां हैं। और अब फिर से एक नयी उपलब्धी प्राप्त करने की भारत सरकार की पाकितान के साथ सचिव स्तर की बात चल पडी है । भारत का जन जन इस वार्तालाप की अंतिम परिणति से परिचित है। वार्ता आरम्भ होने से पूर्व अपने आतंकवादियों से पुणे में कराये गए विस्फोटो के द्वारा पाकिस्तान ने इसकी जानकारी भारत को पहले ही दे दी है। बस अब तो केवल भारत सरकार ही इस वार्तालाप की ऊलाब्धि जान्ने के लिए उत्सुकता बची हुई है।
गत ६० वर्षों से इसी प्रकार से वार्ताओं का दोर चला आ रहा है । क्या भारत की सरकारे सचमुच इतनी भोली है कि वह केवल चर्चाओं के दोर चलाकर एक ऐसे शत्रु को नियंत्रण में लाना चाहती है,जिसके मन में कहीं गहरे तक भारत के प्रति केवल तीव्र घ्रणा ही बसी है।जिसका एक मात्र उदेश्य अपने जन्म काल से ही भारत को खंड खंड करके उसको मिटा देना या अपने अधिकार में करने का ही रहा है। केवल अपनी कायरता के कारण भारत उसके इस उद्देश्य की पूर्ती का ही एक परोक्स्त: माध्यम बनता चला आ रहा है ।
मेरा इन बातों का कहने का तात्पर्य यह भी नहीं है कि भारत को तुरंत ही पाकिस्तान पर आक्रमण कर देना चाहिए। किन्तु स्वाभिमान को बचाए रखने की सम्मति तो हर किसी भारतीय की भारत सरकार को देने की जिम्मेदारी बनती ही है।पाकिस्तान भारत का कोई छिपा शत्रु नहीं है,जिसके शत्रु भाव से कोई परिचित न हो। वह हर पल बातों का जहर उगलकर भारत के प्रति अपनी शत्रुता की घोषणा करता रहता है । तब क्या भारत को उसके प्रलाप का उत्तर इस प्रकार देना चाहिए,जिस प्रकार वह आज तक देता रहा है। अब पाकिस्तान को भारत की और से यह स्पष्ट चेतावनी मिलनी ही चाहिए कि यदि एक निश्चित समय सीमा तक यह अपने आतंकी कार्यों में सुधार नहीं करता तो फिर किसी भी सीमा तक जाने के लिए भारत की स्वतंत्रत है । इस वर्तमान वार्ता के दोर का तभी कुछ लाभ हो सकता है जब भारत पाकितान के सम्मुख आतंक समाप्त कर ने के लिए समय की एक निश्चित सीमा रेखा खीचे ।
भारत यदी इस प्रकार के चेतावनी देकर अपना दृढ रुख इस पर बनाए रखे तो विश्व बिरादरी भी उसका साथ देने के लिए विवश हो सकती है। भारत सरकार को यह समझ लेने की आवश्यकता है कि कायर मनुष्य का , कायर समाज का और कायर राष्ट्र का कोई सहायक नहीं होता । अपनी भुजाओं के बल पर विशवास करके ही इतिहास की धारा मोड़ी जा सकती है। एक अवश्यम्भावी युद्ध को टालने का प्रयास सदा कायर सत्ता ही करती है। धरती के यथार्थ कठोर तल पर पैर न जमाये रखकर जो केवल दिवा- स्वप्नों में ही झूलता है,ऐसा भयग्रस्त राष्ट्र कभी अपना भविष्य नहीं बना सकता । और अंत में ....................
उचित काल को राष्ट्र स्वयं ही बातों में खोता जो।
अपनी ही भावी पीढी का अपराधी होता वो॥

गुरुवार, 25 मार्च 2010

यहाँ देशद्रोही ही मंत्री व .संसद .........बनते है.


सप्रग की पिछली सरकार में पेट्रोलियम मंत्री रहे मणिशंकर अय्यर का नाम तो आप सभी को याद होगा। इस सरकार में भी नेताजी मैडम के दूत बनकर जगह जगह सोनिया गान करते घूम रहे है।
मणिशंकर का चरित्र एक ऐसे राष्ट्रद्रोही का रहा है,जिसको कभी छमा नही किया जा सकता।
१९६२ में जिस समय चीन ने भारत पर आक्रमण किया था,उस समय ये नेता लन्दन में पढ़ाई कर रहा था। पूरा का पूरा देश इस आक्रमण से शोकग्रस्त था। गाँव गाँव व नगर नगर से भारतीय सैनिको के लिए धन एकत्र किया जा रहा था।माता व बहनों ने अपने हाथों के जेवर व मंगलसूत्र तक भारतीय सेना के लिए दे दिए थे। सारा देश रो रहा था। परंतु लन्दन में ये देशद्रोही कुछ और ही खेल खेल रहा था। अय्यर व इसके साथी भी सैनिको के लिए चंदा एकत्र कर रहे थे
किंतु वो जो धन एकत्र कर रहा था,वो भारतीय सैनिको के लिए नही बल्कि लाल सेना (चीनी सेना) के लिए धन एकत्र कर रहा था।
उसकी इस बात का नेहरू को भी पता था।क्यो कि जिस समय अय्यर का चयन इंडियन फ़ौरन सर्विस में हुआ था, तो देश की सबसे बड़ी जासूसी संस्था ने प्रधानमंत्री कार्यालय को एक पत्र लिखा,तथा उपरोक्त बात का हवाला देते हुए उसके चयन पर रोक लगाने को कहा। परन्तु देश के इस महान? नेता ने भी अय्यर का पक्ष लेते हुए उसके चयन को मान्यता दे दी।
यही प्रक्रिया सप्रग ने अपने प्रथम कार्यकाल में अय्यर को पेट्रोलियम मंत्री बनाकर दोहराई। सोनिया स्तुति करने का अय्यर को इस सरकार ने अरे नहीं माननीय राष्ट्रपति जी (सरकार गलत नहीं लिखा क्योंकि राष्ट्रपति जी भी तो सरकारी है) ने भी प्रसाद दे दिया है बात ये है कि राष्ट्रपति को अधिकार है कि वह कुछ ऐसे लोगों को राजसभा में मनोनीत कर सकता है जिन्होंने कला ,संगीत जैसे क्षेत्रों में विशेष योगदान दिया हो। जिस रास्ते से लता मंगेशकर, हेमा मालिनी जैसे कलाकार राजसभा में पहुंचे उसी रास्ते से अय्यर को राजसभा में भेजने के लिए राष्ट्रपति ने कैसे चुना । न तो अय्यर कोई कलाकार हैं और न ही समाज के लिए कोई ऐसा कार्य किया है जिससे उसे राजसभा के लिए चुना जाय। हाँ अय्यर मैडम भक्त जरूर है,और मैडम कि चमचा गिरी व चरण वंदना का ही प्रसाद के रूप में उसे राजसभा में भेजा जा रहा है।
१९६२ में जो देशद्रोही कार्य अय्यर ने किया था। यही कार्य किसी और देश का व्यक्ति करता तो निश्चय ही उस देश का क़ानून उसे कड़ी से कड़ी सजा देता। परंतु एक देशद्रोही भारत में ही मंत्री व संसद ...................................... बन सकता है। अय्यर इसका जीता जगता सबूत है।

शनिवार, 13 मार्च 2010

आप सभी को नववर्ष विक्रमी संवत २०६७ की हार्दिक शुभकामनाएं


मित्रों जब अब से एक वर्ष पूर्व मैंने ब्लॉग लिखना शुरू किया था ,तब सबसे प्रथम सम्राट विक्र्मद्वित्तीय के ऊपर दो लेख लिखे थे। विक्रमी संवत २०६६ समाप्त हो रहा है। संवत २०६७ का आरम्भ होने जा रहा है। भारतीय नव वर्ष कि हार्दिक शुभकामनाओं के साथ मै विक्रमी संवत के प्रवर्तक सम्राट विक्र्माद्वितीय को नमन करते हुए वे दोनों लेख आपको दुबारा प्रस्तुत कर रहा हूँ।

विश्व विजेता सम्राट विक्रमादित्य
ईसा से कई शताब्दी पूर्व भारत भूमि पर एक साम्रराज्य था मालव गण। मालव गण की राजधानी थी भारत की प्रसिद्ध नगरी उज्जेन । उज्जैन एक प्राचीन गणतंत्र राज्य था । प्रजावात्सल्या राजा नाबोवाहन की म्रत्यु के पश्चात उनके पुत्र गंधर्वसेन ने "महाराजाधिराज मालवाधिपति महेंद्राद्वित्तीय "की उपाधि धारण करके मालव गण को राजतन्त्र में बदल दिया । उस समय भारत में चार शक शासको का राज्य था। शक राजाओं के भ्रष्ट आचरणों की चर्चाएँ सुनकर गंधर्वसेन भी कामुक व निरंकुश हो गया। एकं बार मालव गण की राजधानी में एक जैन साध्वी पधारी।उनके रूप की सुन्दरता की चर्चा के कारण गंधर्व सेन भी उनके दर्शन करने पहुच गया । साध्वी के रूप ने उन्हें कामांध बना दिया। महाराज ने साध्वी का अपहरण कर लिया तथा साध्वी के साथ जबरदस्ती विवाह कर लिया। अपनी बहन साध्वी के अपहरण के बाद उनके भाई जैन मुनि कलिकाचार्य ने राष्ट्र्यद्रोह करके बदले की भावना से शक राजाओं को उज्जैन पर हमला करने के लिए तैयार कर लिया। शक राजाओं ने चारों और से आक्रमण करके उज्जैन नगरी को जीत लिया.शोषद वहाँ का शासक बना दिया गया। गंधर्व सेन साध्वी और अपनी रानी सोम्यादर्शन के साथ विन्धयाचल के वनों में छुप गये.साध्वी सरस्वती ने महारानी सोम्या से बहुत दुलार पाया तथा साध्वी ने भी गंधर्व सेन को अपना पति स्वीकार कर लिया । वनों में निवास करते हुए,सरस्वती ने एक पुत्र को जनम दिया, जिसका नाम भरत हरी रक्खा गया.उसके तीन वर्ष पश्चात महारानी सोम्या ने भी एक पुत्र को जनम दिया.जिसका नाम विक्रम सेन रक्खा गया।
विंध्याचल के वनों में निवास करते हुए एक दिन गंधर्व सेन आखेट को गये,जहाँ वे एक सिंह का शिकार हो गये। वहीं साध्वी सरस्वती भी अपने भाई जैन मुनि कलिकाचार्य के राष्ट्र द्रोह से छुब्द थी।महाराज की म्रत्यु के पशचात उनहोने भी अपने पुत्र भ्रत्हरी को महारानी को सोंपकर अन्न का त्याग कर दिया।और अपने प्राण त्याग दिए। उसके पश्चात महारानी सोम्या दोनों पुत्रों को लेकर कृषण भगवान् की नगरी चली गई,तथा वहाँ पर आज्ञातवास काटने लगी। दोनों राजकुमारों में भ्रताहरी चिंतन शील बालकथा,तथा विक्रम में एक असाधारण योद्धा के सभी गुन विद्यमान थे। अब समय धीरे धीरे समय अपनी कालपरिक्र्मा पर तेजी से आगे बढने लगा। दोनों राजकुमारों को पता चल चुका था की शको ने उनके पिता को हराकर उज्जैन पर अधिकार कर लिया था,तथा शक दशको से भारतीय जनता पर अत्याचार कर रहे है।विक्रम जब युवा हुआ तब वह एक सुगतित शरीर का स्वामी व एक महान योद्धा बन चुका था। धनुषबाण, खडग, असी,त्रिसूल,व परशु आदि में उसका कोई सानी नही था.अपनी नेत्रत्व्य करने की छमता के कारन उसने एक सैन्य दल भी गठित कर लिया था।
अब समय आ गया था ,की भारतवर्ष को शकों से छुटकारा दिलाया जाय।वीर विक्रम सेन ने अपने मित्रो को संदेश भेजकर बुला लिया.सभाओं व मंत्रणा के दौर शुरू हो गए। निर्णय लिया गया की ,सर्वप्रथम उज्जैन में जमे शक राज शोशाद व उसके भतीजे खारोस को युद्ध में पराजित करना होगा।परन्तु एक अड़चन थीकि, उज्जैन पर आक्रमण के समय सौराष्ट्र का शकराज भुमक व तक्षिला का शकराज कुशुलुक शोशाद की साहयता के लिए आयेंगे। विक्रम ने कहा की, शक राजाओं के पास विशाल सेनाये है,संग्राम भयंकर होगा,तो उसके मित्रो ने उसे आश्वासन दियाकी, जब तक आप उज्जैन नगरी को नही जीत लेंगे ,तब तक सौराष्ट्र व तक्षिला की सेनाओं को हम आप के पास फटकने भी न देंगे। विक्रम सेन के इन मित्रों में सौवीर गन राज्य का युवराज प्रधुम्न, कुनिंद गन राज्य का युवराज भद्रबाहु,अमर्गुप्त आदि प्रमुख थे।
अब सर्वप्रथम सेना की संख्या को बढ़ाना व उसको सुद्रढ़ करना था। सेना की संख्या बढ़ाने के लिए गावं गावं के शिव मंदिरों में भैरव भक्त के नाम से गावों के युवकों को भरती किया जाने लगा। सभी युवकों को त्रिशूल प्रदान किए गए। युवकों को पास के वनों में शास्त्राभ्यास कराया जाने लगा.इस कार्य में वनीय छेत्र बहुत साहयता कर रहा था। इतना बड़ा कार्य होने के बाद भी शकों को कानोकान भनक भी नही लगी.
कुछ ही समय में भैरव सैनिकों की संख्या लगभग ५० सहस्त्र हो गई.भारत वर्ष के वर्तमान की हलचल देखकर भारत का भविष्य अपने सुनहरे वर्तमान की कल्पना करने लगा। लगभग दो वर्ष भाग दौर में बीत गए.इसी बीच विक्रम को एक नया सहयोगी मिल गया अपिलक। अपिलक आन्ध्र के महाराजा शिवमुख का अनुज था। अपिलक को भैरव सेना का सेनापति बना दिया गया। धन की व्यवस्था का भार अमर्गुप्त को सोपा गया। अब जहाँ भारत का भविष्य एक चक्रवाती सम्राट के स्वागत के लिए आतुर था,वहीं चारो शक राजा भारतीय जनता का शोषण कर रहे थे और विलासी जीवन में लिप्त थे।
इशा की प्रथम शताब्दी में महाकुम्भ के अवसर पर सभी भैरव सेनिको को साधू-संतो के वेश में उज्जैन के सैकडो गावों के मंदिरों में ठहरा दिया गया .प्रय्तेक गाँव का आर मन्दिर मनो शिव के टांडाव् के लिए भूमि तैयार कर रहा था। महाकुम्भ का स्नान समाप्त होते ही सैनिको ने अपना अभियान शुरू कर दिया। भैरव सेना ने उज्जैन व विदिशा को घेर लिया gayaa . भीषण संग्राम हुआ। विदेशी शकों को बुरी तरह काट डाला गया। उज्जैन का शासक शोषद भाग खड़ा हुआ.तथा मथुरा के शासक का पुत्र खारोश विदिशा के युद्ध में मारा गया। इस समाचार को सुनते ही सौराष्ट्र व मथुरा के शासकों ने उज्जैन पर आक्रमण किया। अब विक्रम के मित्रों की बारी थी, उन्होंने सौराष्ट्र के शासक भुमक को भैरव सेना के साथ राह में ही घेर लिया,तथा उसको बुरी तरह पराजित किया, तथा अपने मित्र को दिया वचन पूरा किया।
मथुरा के शक राजा राज्बुल से विक्रम स्वम टकरा गया और उसे बंदी बना लिया। आंध्र महाराज सत्कारणी के अनुज अपिलक के नेत्र्तव्य में पुरे मध्य भारत में भैरव सेना ने अपने तांडव से शक सेनाओं को समाप्त कर दिया। विक्रम सेन ने अपने भ्राता भरथरी को उज्जैन का शासक नियुक्त कराया। तीनो शक राजाओं के पराजित होने के बाद ताछ्शिला के शक रजा कुशुलुक ने भी विक्रम से संधि कर ली। मथुरा के शासक की महारानी ने विक्रम की माता सौम्या से मिलकर छमा मांगी तथा अपनी पुत्री हंसा के लिए विक्रम का हाथ मांगा । महारानी सौम्या ने उस बंधन को तुंरत स्वीकार कर लिया। विक्रम के भ्राता भरथरी का मन शासन से अधिक ध्यान व योग में लगता था इसलिए उन्होंने राजपाट त्याग कर सन्यास ले लिया। उज्जैन नगरी के राजकुमार ने पुन: वर्षों पश्चात गणतंत्र की स्थापना की व्यवस्था की परन्तु मित्रों व जनता के आग्रह पर विक्रम सेन को महाराजाधिराज विक्र्माद्वित्य के नाम से सिंहासन पर आसीत् होना पडा।
लाखों की संख्या में शकों का याघ्होपवीत हुआ। शक हिंदू संस्कृति में ऐसे समां गए जैसे एक नदी समुद्र में मिलकर अपना अस्तित्व खो देती है। विदेशी शकों के आक्रमणों से भारत मुक्त हुआ तथा हिंदू संस्क्रती का प्रसार समस्त विश्व में हुआ। इसी शक विजय के उपरांत इशा से ५७ वर्ष पूर्व महाराजा विक्र्माद्वित्तीय के राज्याभिषेक पर विक्रमी संवत की स्थापना हुई। आगे आने वाले कई चक्रवाती सम्राटों ने इन्ही सम्राट विक्रमादित्य के नाम की उपाधि धारण की.
भारतवर्ष के ऐसे वीर शिरोमणि सम्राट विकारामाद्वित्य को शत-शत प्रणाम।





सम्राट विक्रमादित्य का साम्राज्य अरब तक था.
शकों को भारत से खदेड़ने के बाद सम्राट विक्रमादित्य ने पुरे भारतवर्ष में ही नही , बल्कि लगभग पूरे विश्व को जीत कर हिंदू संस्कृति का प्रचार पूरे विश्व में किया। सम्राट के साम्राज्य में कभी सूर्य अस्त नही होता था। सम्राट विक्रमादित्य ने अरबों पर शासन किया था, इसका प्रमाण स्वं अरबी काव्य में है । "सैरुअल ओकुल" नमक एक अरबी काव्य , जिसके लेखक "जिरहम विन्तोई" नमक एक अरबी कवि है। उन्होंने लिखा है,-------
"वे अत्यन्त भाग्यशाली लोग है, जो सम्राट विक्रमादित्य के शासन काल में जन्मे। अपनी प्रजा के कल्याण में रत वह एक कर्ताव्यनिष्ट , दयालु, एवं सचरित्र राजा था।"
"किंतु उस समय खुदा को भूले हुए हम अरब इंद्रिय विषय -वासनाओं में डूबे हुए थे । हम लोगो में षड़यंत्र और अत्याचार प्रचलित था। हमारे देश को अज्ञान के अन्धकार ने ग्रसित कर रखा था। सारा देश ऐसे घोर अंधकार से आच्छादित था जैसा की अमावस्या की रात्रि को होता है।"


"किंतु शिक्षा का वर्तमान उषाकाल एवं सुखद सूर्य प्रकाश उस सचरित्र सम्राट विक्रम की कृपालुता का परिणाम है। यद्यपि हम विदेशी ही थे,फ़िर भी वह हमारे प्रति उपेछा न बरत पाया। जिसने हमे अपनी द्रष्टि से ओझल नही किया"। "उसने अपना पवित्र धर्म हम लोगो में फैलाया। उसने अपने देश से विद्वान् लोग भेजे,जिनकी प्रतिभा सूर्य के प्रकाश के समान हमारे देश में चमकी । वे विद्वान और दूर द्रष्टा लोग ,जिनकी दयालुता व कृपा से हम एक बार फ़िर खुदा के अस्तित्व को अनुभव करने लगे। उसके पवित्र अस्तित्व से परिचित किए गए,और सत्य के मार्ग पर चलाए गए। उनका यहाँ पर्दापण महाराजा विक्रमादित्य के आदेश पर हुआ। "
इसी काव्य के कुछ अंश बिड़ला मन्दिर,दिल्ली की यज्ञशाला के स्तभों पर उत्कीर्ण है,-------------------१-हे भारत की पुन्य भूमि!तू धन्य है क्योंकि इश्वर ने अपने ज्ञान के लिए तुझको चुना। २-वाह्ह ईश्वर का ज्ञान जो सम्पूर्ण जगत को प्रकाशित करता है,यह भारतवर्ष में ऋषियो द्बारा चारों रूप में प्रकट हुआ। ३-और परमात्मा समस्त संसार को आज्ञा देता है की वेड जो मेरे गान है उनके अनुसार आचरण करो। वह ज्ञान के भण्डार 'साम' व 'यजुर 'है। ४ -और दो उनमे से 'ऋग् ' व 'अथर्व 'है । जो इनके प्रकाश में आ गया वह कभी अन्धकार को प्राप्त नही होता। "

विक्र्माद्वितीय के काल में भारत विज्ञान, कला, साहित्य, गणित, नस्छ्त्र आदि विद्याओं का विश्व गुरु था। महान गणितग्य व ज्योतिर्विद्ति वराह मिहिर ने सम्राट विक्रम के शासन काल में ही सारे विश्व में भारत की कीर्ति पताका फहराई।

महाकवि कालिदास भी इन्ही सम्राट विक्र्माद्वितीय के नवरत्नों में से एक थे ।

सोमवार, 8 मार्च 2010

क्या भारत में ऐसा संभव है.

९\११ के आतंकी हमले के बाद अमेरिका ने सूझ-बूझ और साहसयुक्त कदम उठाया है,वैसा ही साहसी कदम उठाना अब भारत के लिए भी आवश्यक हो गया है. यह कहना है एक सेवा-निर्वत्त मुस्लिम सेनाधिकारी का. उनके कथानुसार अमेरिका ने इस हमले के बाद से ही मस्जिदों के इमामों को उनके इलाके में रहने वाले मुस्लिमों की गैर कानूनी गतिविधियों का जिम्मेवार निश्चित किया है,क्योकि प्रत्येक मुस्लिम किसी न किसी मस्जिद से जुड़ा होता है. इस नियम के अंतर्गत अब तक २०० से ज्यादा इमामों को उनके इलाके में संदिग्ध घटनाओं के कारण अमेरिका से बाहर निकाला जा चुका है. इसलिए अमेरिका में उसके बाद आतंकी घटनाओं की पुनरावृति नहीं हुई है.
उस देशभक्त अधिकारी का सुझाव है की भारत सरकार को भी सभी मस्जिदों के प्रमुखों को उनसे सम्बंधित नागरिकों की गतिविधियों का जिमेदार मानना चाहिए. क्योकि उन्हें अपने इलाके में रहने वाले सभी नागरिकों की जानकारी होती है.
वे कहते है की जिस दिन पाकिस्तानी आतकवादियों को भारतीय समर्थक मिलने बंद हो जायेंगे ,उसी दिन से भारत में आतंकवाद दम तोड़ने लगेगा .
देश की सुरक्छा के लिए ऐसी इच्छा शक्ति आवश्यक है . लेकिन क्या भारत में ऐसा संभव है? यह एक yax प्रश्न है.