गुरुवार, 17 जून 2010

ये है झांसी की रानी (jhansi ki rani)का असली चित्र.




मित्रो आज १७ जून को झाँसी की रानी लक्ष्मी बाई की पुन्यथिति है।


झांसी की रानी लक्ष्मीबाई का यह एकमात्र फोटो है, जिसे कोलकाता में रहने वाले अंग्रेज फोटोग्राफर जॉनस्टोन एंड हॉटमैन द्वारा 1850 में ही खींचा गया था। यह फोटो अहमदाबाद निवासी चित्रकार अमित अंबालाल के संग्रह में मौजूद है।

The only photo of Rani Laxmibai of Jhansi, which living in Calcutta in 1850 by the British photographer Ahugoman Jonstone and was pulled. This photo Ahmedabad resident artist Amit Ambalal exists in the collection.


शनिवार, 12 जून 2010

छोडूंगा नहीं एक दिन तो शमशान घाट आवेगा.

मेरी सबसे पहली तुकबंदी "दूर की सोच "

एक दिन सुरेन्द्र शर्मा जी मन्दिर पूजा को गए।
मन्दिर से जब बाहर आए ,अपने नए जूते गायब पाये ।
जूते गायब देखकर ,सुरेन्द्र जी ने मचाया शोर,
तब एक फूल वाले से पता चला ,
कि जूते ले गया शैल नाम का चोर।
ठाणे में रपट लिखाई, जासूसों को पीछे लगाया,
पर शैल नाम का चोर कहीं पकड़ में न आया।
थक हार कर बेचारे श्रीमान,जा पहुचे सीधे शमसान ,
बोले शैल अब देखूँगा ,तने कोण बचावेगा
छोडूँगा नही एक दिन तो शमशान घाट आवेगा।

सोमवार, 7 जून 2010

यह मेरे इस देश को हो गया क्या आज है.


यह मेरे इस देशं को ये हो गया क्या आज है
ये जिन्दगी की प्रात है या जिन्दगी की सांझ है।

उद्देश्यहीन भीड़ क्यों हर तरफ खड़ी हुई।
हर आदमी के चेहरे पे गम की परत चढ़ी हुई।
यूं देखने मे हर कोई लगता तो पास-पास है।
लेकिन दिलों की दूरियां!! कैसा विरोधाभास है?
क्यों जिन्दगी के गीत की ये बेसुरी आवाज है।
ये मेरे इस ............................................................ ॥


हर सुबह की धूप का सूरज कही है को गया ।
चांदनी समेटकर अब चाँद भी है सो गया।
हर गली के बीच में वहशियाना शोर है।
क्यों खुद की आत्मा का खुद आदमी ही चोर है?
जाने कैसा बज रहा ये जिन्दगी का साज है।
ये मेरे इस देश .............................................. ॥


हर तरफ है नाचती हिंसा भरी जवानिया ।
मेरे वतन में रह गयी अहिंसा की बस कहानिया।
अन्न महंगा है तो क्या खून तो सस्ता हुआ।
यहाँ आदमी को आदमी है खा रहा हँसता हुआ।
गाँधी के सपनो पे बना ये कैसा रामराज है !!!!!
ये मेरे इस देश को .................................................... ॥


जीने की लालसा लिए बस जी रहा है आदमी ।
यूं विष का घूँट आप ही तो पी रहा है आदमी।
असत्य और कपट की जब बू रही हो खेतियाँ।
पाएंगी कहाँ से सच फिर आने वाली पीढियां।
फूलों भरे चमन का ये कैसा बुरा आगाज है।
ये मेरे इस ............................................................. ॥


इतने मुखोंटे आदमी के पास रहते है यहाँ।
हर बार चेहरे और ही हर बार दीखते हैं यहाँ।
यूं आदमी को जिन्दगी के दर्द का अहसास है।
पर जी रहा है इसलिए क़ल पर उसे विश्वास है।
ये जिन्दगी के जीने का कैसा नया अंदाज है।
ये मेरे इस देश को हो गया क्या आज है।


( यह रचना मेरे पिताजी ने १९७५ में रची थी । किन्तु आज भी ज्यों की त्यों प्रासंगिक है।)