सोमवार, 20 दिसंबर 2010

दिग्विजय सिंह इसाई है,(digvijay is a converted christian)



दिग्विजय सिंह के तेवर हिन्दुओं के विरुद्ध कुछ ज्यादा ही गर्म हो रहे हैं।कोई भी नहीं समझ पा रहा है कि वो ऐसा क्यों कर रहा है। अगर इस बात को सत्य माना जाय कि दिग्विजय हिन्दू ही नहीं है ( http://en.wikipedia.org/wiki/Digvijay_Singh_(politician)
(Digvijay Singh was born in the royal family of Raghogarh principality, in Guna district of Madhya Pradesh. He is a rajput also known popularly as Diggi Raja.He studied at the Daly College, Indore, a private school established in 1882. During his school days he was an outstanding sportsman. He was a member of the school team in cricket, hockey and soccer. He represented Central Zone schools in cricket, and also played hockey and football at the college level.He also excelled in squash, and was the Central India champion at the junior level for six years from 1960 to 1966.He also held national ranking in this game.[clarification needed].He is a converted christian.)


तब इसका अंदाजा स्यवं ही लगाया जा सकता है।क्यों कि इसाई बनने के बाद हिंदुत्व को गाली गरियाकर ही दिग्विजय पुत्तर सोनिया मम्मी के दुलारे बनेंगे।

शुक्रवार, 17 दिसंबर 2010

गणित विद्या और शून्य का आविष्कार

सभी यह जानते हैं कि गणित में शून्य और दशमलव का आविष्कार भारत ने किया है किन्तु यह आंशिक सत्य है क्योंकि गणित विद्या का मूल(कारण) वेदों में है जिसमें न केवल शून्य से लेकर ९ तक सभी प्राकृतिक अंको का वर्णन है वरन अंक गणित, बीज गणित और रेखा गणित सभी गणित विद्या के ३ आधार ईश्वर ने हमको दिये हैं। बहुत से लोग यह मानते हैं आर्य भट्ट ने शून्य का या दशमलव का आविष्कार किया था जोकि गलत है क्योंकि यह तो पहले से ही वेदों में है, आर्य भट्ट निश्चित तौर पर एक महान गणितज्ञ थे इसमें कोई सन्देह नहीं है किन्तु प्राकृतिक संख्याओं के निर्माण का विज्ञान मानव ज्ञान से बहार की बात है। मैं यहाँ वेदों के मन्त्र तो नहीं लिख रहा हूँ किन्तु उनमें से उधृत कुछ एक बातों को लिख रहा हूँ प्रमाण के तौर पर।

अंक, बीज और रेखा भेद से जो तीन प्रकार की गणित विद्या सिद्ध की जाती है , उनमें से प्रथम अंक(१) जो संख्या है, सो दो बार गणने से २ की वाचक होती है। जैसे १+१=२। ऐसे ही एक के आगे एक तथा एक के आगे दो, वा दो के आगे १ आदि जोड़ने से ९ तक अंक होते हैं। इसी प्रकार एक के साथ तीन(३) जोड़ने से चार (४) तथा तीन(३) को तीन(३) के साथ जोड़ने से ६ अथवा तीन को तीन गुणने से ३ x ३ = ९ होते हैं।

इसी प्रकार चार के साथ चार , पाञ्च के साथ पाञ्च, छः के साथ छः, आठ के साथ आठ इत्यादि जोड़ने वा गुणने तथा सब मन्त्रों के आशय को को फ़ैलाने सब गणितविद्या निकलती है। जैसे पाञ्च के साथ पाञ्च (५५) वैसे ही छः छः इत्यादि जान लेने चाहियें। ऐसे ही इन मन्त्रों के अर्थो का आगे योजना करने से अंकों से अनेक प्रकार की गणित विद्या सिद्ध होती है। क्योंकि इन मन्त्रों के अर्थ और अनेक प्रकार के प्रयोगों से मनुष्यों को अनेक प्रकार की गणित विद्या अवश्य जाननी चाहिये ।
और जो कि वेदों का अंक ज्योतिषशास्त्र कहाता है (आज का कथित फलित ज्योतिषशास्त्र नहीं), उसमें भी इसी प्रकार के मन्त्रों के अभिप्राय से गणितविद्या सिद्ध की है और अंकों से जो गणित विद्या निकलती है , वह निश्चित और संख्यात पदार्थों में युक्त होती है। और अज्ञात पदार्थों की संख्या जानने के लिये बीजगणित होता है , सो भी अनेक मन्त्रों से सिद्ध होता है। जैसे (अ + क) (अ-क) (अ ÷ क) (अ x क) इत्यादि संकेत से निकलता है । यह भी वेदों से ही ऋषि-मुनियों ने निकला है। (अग्न आ०) इस मन्त्र के संकेतों से भी बीज गणित निकलता है।

और इसी प्रकार से तीसरा भाग जो रेखागणित है सो भी वेदों से ही सिद्ध होता है। अनेक मन्त्रों से रेखागणित का प्रकाश किया है। यज्ञ-वेदी के रचने में भी रेखा गणित का भी उपदेश है। पृथ्वी का जो चारो ओर घेरा है, उसको परिधि और ऊपर से अन्त तक जो पृथ्वी की रेखा है उसको व्यास कहते हैं। इसी प्रकार से इन मन्त्रों में आदि मध्य और अन्त आदि रेखाओं को भी जानना चाहिये और इस रीति से त्रियक् विषुवत रेखा आदि भी निकलती हैं

(कासीत्प्र०) अर्थात यथार्थ ज्ञान क्या है ? (प्रतिमा) जिससे पदार्थों का तोल किया जाये सो क्या चीज़ है ? (निदानम्) अर्थात कारण जिससे कार्य उत्पन्न होता है , वह क्या चीज़ है (आज्यं) जगत में जानने के योग्य सारभूत क्या है ? (परिधिः०) परिधि किसको कहते हैं ? (छन्दः०) स्वतन्त्र वस्तु क्या है ? (प्रउ०) प्रयोग और शब्दों से स्तुति करने के योग्य क्या है ? इन सात प्रश्नों का उत्तर यथावत दिया जाता है (यद्देवा देव०) जिसको सब विद्वान लोग पूजते हैं वही परमेश्वर प्रमा आदि नाम वाला है।
इन मन्त्रों में भी प्रमा और परिधि आदि शब्दों से रेखागणित साधने का उपदेश परमात्मा ने किया है। सो यह ३ प्रकार की गणित विद्या के अनेक मन्त्रों से आर्यों ने वेदों से ही सिद्ध की है और इसी आर्य्यावर्त्त देश से सर्वत्र भूगोल में गयी है।

गणित के साथ-२ समस्त विश्व के ज्ञान का आधार वेद ही हैं इसमें सन्देह नहीं करनी चाहिये। वेदों के नाम पर बकवासबाजी लिखने वालों पर न जाकर सत्य से अवगत होना चाहिये उदाहरण के तौर पर आज कल ज्योतिषशास्त्र के नाम पर जो धन्धा चल रहा है उसका वैदिक पुस्तकों में कहीं वर्णन नहीं है वो स्वार्थी और मुर्ख लोगो ने खड़ा किया है जिसको अनजाने में बहुत लोग मानते हैं जबकि सत्य यह है कि मनुष्य अपने कर्मो के आधार पर ही अपने भविष्य का निर्माण करता है न कि काला कपड़ा, दाल, तेल आदि अन्धविश्वास भरे दान देने से। वेदों से आधार लेकर ही महान ऋषियों ने अनेक प्रकार की विद्या सिद्ध की है।

आज राष्ट्र की स्तिथि अच्छी नहीं है, हमें हमारी जड़ों से हमें काटा जा रहा है, हमारे स्वाभिमान पर निरन्तर आघात किये जा रहे हैं इसीलिए हमें अपने धर्म के मूल से परिचित अवश्य होना चाहिये जिसको जानने से हमें ज्ञान और स्वाभिमान आएगा और हम राष्ट्र-सेवा के लिये उठ खड़े होंगे। हमारा मूल धर्म ज्ञान-विज्ञान के साथ-२ राष्ट्र-सेवा की प्रबल प्रेरणा देता है उसका विरोधी नहीं है इसीलिए भी समस्त राष्ट्र-विरोधी शक्तियां हमारे धर्म को निशाने पर रखती हैं।

कितने ही विश्व के लोग और मत कुछ पुस्तकों को ईश्वरीय पुस्तक मानते हैं जबकि उनमें अनेक साक्षात् प्रमाण हैं अवैज्ञानिकता के, मूर्खता के, धूर्तता के और भी अतार्किक बाते हैं किन्तु फिर भी उन मतों के लोग उन पुस्तकों के प्रचार में दिन-रात एक किये हुए हैं, बड़े-२ संगठन बनाये हुए हैं, युद्ध लड़ रहे हैं, पैसा बहा रहे हैं कि हमारी पुस्तक को ईश्वरीय मानो उसका अनुसरण करो वरना तुम्हारी खैर नहीं. और दूसरी तरफ सनातन हिन्दू वैदिक धर्म समस्त मानव जाति के कल्याण के लिये है उसमें किसी भी प्रकार का भेद-भाव नहीं है किसी प्रकार का दोष नहीं है किसी प्रकार की भी अवैज्ञानिकता नहीं है कोई अतार्किकता नहीं है जो सृष्टि के कण-२ से लेकर अखिल ब्रह्माण्ड का ज्ञान देता है, समस्त विद्याएं जिससे निकली हैं और उसका कोई प्रवर्तक कम से कम कोई मनुष्य भी नहीं है यह तो हम सभी जानते ही हैं इस सबके बावजूद भी इसको ईश्वरीय मानने में हम लोग ही सन्देह करते हैं कैसा विरोधाभास है

शनिवार, 11 दिसंबर 2010

साम्यवादी क्रान्ति के सूत्रधार लेनिन भी वीर सावरकर के घोर प्रशंसक थे.






भारत की संसद में जब वीर सावरकर के चित्र की प्रतिस्थापना की गयी तो उस समय के सारे कोंग्रेसी सांसद सोनिया मैनो के नेर्तत्व में तथा सारे कम्युनिष्ट सांसद समारोह का बहिष्कार करके चले गए थे। केवल मात्र सोमनाथ चटर्जी ही राजग के सांसदों के साथ संसद में उपस्थित थे।

वीर सावरकर मात्र एक सशस्त्र क्रांतिकारी ही नहीं वरन एक युगद्रष्टा थे। युगद्रष्टा के साथ साथ वे एक राष्ट्र स्रष्टा भी थे। वे विश्व क्रांतिकारिता के सूत्रधार और व्यवस्थापक भी थे। उनकी वीरता,धीरता व पांडित्य और कुशल नेत्रत्व को देखकर पूरा विश्व चकित था। साम्यवादी क्रांति के सूत्रधार लेनिन भी वीर सावरकर की विलक्षणता के अत्यधिक प्रभावित थे।

जब रूस के क्रांति की प्रष्ट भूमि तैयार हो रही थी,तब लेनिन रूस से जाकर वीर सावरकर के पास जाकर इंग्लेंड में इण्डिया हाउस में छिपे थे।लेनिन अपने अज्ञात वास में वीर सावरकर से रोज घंटों भावी अर्थव्यवस्था पर विचार-विमर्श करते थे। रुसी क्रान्ति सफल हो जाने के पश्चात लेनिन ने अपने प्रथम बजट में वीर सावरकर का आदर सहित उल्लेख किया। उसके पश्चात लेनिन सावरकर से तीन बार और मिले। दोनों के बीच वैचारिक सम्बन्ध लम्बे समय तक रहा।

रुसी क्रान्ति अभिलेखों में सावरकर को विश्व का महानतम क्रांतिकारी कहा गया है। लेकिन कम्युनिष्ट अपने कुलगुरु लेनिन पर वीर सावरकर द्वारा किये गए उपकार को बिलकुल भूल चुके हैं, इसे इन लोगों की सावरकर के प्रति क्रत्य्घ्नता की कहा जाएगा।