शुक्रवार, 30 दिसंबर 2011

सन २०११ को अगर स्वामी(subrmanyam swami) वर्ष का नाम दिया जाय तो कोई अतिशोक्ति नहीं होगी.



अंग्रेजों का ईसवी सन २०११ अब भूतकाल में चला गया है. २०११ पूरी दुनिया में काफी उथल पुथल मचाकर गया है. कई देशों में जन क्रांति के लिए विख्यात रहे इस साल में भारत भी किसी से पीछे नहीं रहा. जहाँ विश्व पटल पर एक नया देश दक्षिणी सूडान उभर कर आया वही लीबिया का तख्ता पलट हुआ और एक और तानाशाह तेल की अमेरिकन राजनीती का शिकार हुआ.
२०११ भारत में भी काफी हलचल भरा साल रहा. महंगाई, भ्रष्टाचार व काले धन की वापसी के आंदोलनों ने केंद्र सरकार की रातों की नीदें हराम कर डाली. टू जी स्पेक्ट्रम घोटाला ,मुंबई का आवास योजना घोटाला व राष्ट्रमंडल खेलों के घोटालों में केंद्र सरकार स्पष्ट फसती नजर आई. कोंग्रेस की इस भ्रष्ट सरकार के विरुद्ध भारत को दो नए नायक मिले.जहाँ पहले नायक बाबा रामदेव ने भारत की जनता को विदेशो में छुपाये काले धन के विरुद्ध खड़ा किया, वहीँ अन्ना हजारे ने जन लोकपाल बिल के लिए आन्दोलन खड़ा कर सरकार की खटिया खड़ी कर दी. मगर इन सबसे अलग एक महान आत्मा ऐसी भी रही जो भारत में हो रहे आंदोलनों की नीव का पत्थर बनी और एकला चलो के अभियान से कोंग्रेस सरकार के कई बड़े नेताओ,मंत्रियों को जेल पहुचाया. सोनिया गाँधी,राहुल व अन्य कोंगेसी नेताओं को स्वप्न में भी उस महान आत्मा की छवि डराने लगी. आप लोग समझ ही चुके होंगे की मै किसकी बात कर रहा हूँ ,और जो नहीं समझे तो उन्हें बताना आवश्यक है की यहाँ बात हो रही है जनता पार्टी के अध्यक्ष डॉ सुब्रमन्यम स्वामी जी की. सुब्रमन्यम स्वामी जी के कार्यकलापों से ही आज भारत के गृह मंत्री का काला चेहरा पीला पड़ गया है. कांग्रेस का सरकारी दामाद राबर्ट वाड्रा अपने छुपने के लिए बिल की तलाश में जुट गया है. राहुल के चहरे पर उनका खोफ स्पष्ट नजर आता है.
सुब्रमन्यम स्वामी जी के राष्ट्र पति कलाम को लिखे एक पत्र ने ही सोनिया गाँधी का पी एम् बनने का सपना चूर चूर कर दिया था. काले धन की वापसी का मुद्दा हो या अन्ना हजारे के भ्रष्टाचार का .इन सभी के पीछे स्वामी जी कहीं न कहीं स्पष्ट रूप से खड़े नजर आते है. राहुल गांन्धी के प्रधान मत्री बनने के मुद्दे पर वे मात्र मुस्कराकर यही कहते हैं की मै किसी भी विदेशी को भारत का प्रधान मंत्री नहीं बनने दूंगा.
भारत में सन २०११ को अगर स्वामी वर्ष का नाम दिया जाय तो कोई अतिशोक्ति नहीं होगी.भ्रष्ट केंद्र सरकार की २०११ में जिस साहस के साथ स्वामी जी ने पोल खोली ,प्रत्येक भारतवासी आशा करता है की सन २०१२ में भी वे दुगने उत्साह के साथ वे देश हित के कार्यों में लगे रहेंगे .इश्वर से उनके स्वस्थ की कामना करता हूँ और प्रत्येक भारत वासी से प्रार्थना करता हूँ की स्वामी जी का तन, मन और धन से सहयोग करे और भ्रष्ट सरकार की लुटिया डुबोने में स्वामी जी का साथ दें . इसी के साथ इसवी सन २०१२ की हार्दिक शुभकामनाओ के साथ आपका अपना नवीन त्यागी

बुधवार, 30 नवंबर 2011

आधुनिक भारत में हिन्दू समाज का सबसे बड़ा दुश्मन


एक बार एक वाल्मीकि बस्ती में मंदिर में गाँधी जी कुरान का पाठ करा रहे थे. तभी भीड़ में से एक औरत ने उठकर गाँधी से ऐसा करने को मना किया.
गाँधी ने पूछा .. क्यों?
तब उस औरत ने कहा कि ये हमारे धर्म के विरुद्ध है.
गाँधी ने कहा.... मै तो ऐसा नहीं मानता ,
तो उस औरत ने जवाब दिया कि हम आपको धर्म में व्यवस्था देने योग्य नहीं मानते.
गाँधी ने कहा कि इसमें यहाँ उपस्थित लोगों का मत ले लिया जाय.
औरत ने जवाब दिया कि क्या धर्म के विषय में वोटो से निर्णय लिया जा सकता है.
गाँधी बोला कि आप मेरे धर्म में बांधा डाल रही हैं.
औरत ने जवाब दिया कि आप तो करोडो हिन्दुओ के धर्म में नाजायज दखल दे रहे हैं.
गाँधी बोला ..मै तो कुरान सुनुगा .
औरत बोली ...मै इसका विरोध करुँगी.
और तभी औरत के पक्ष में सैकड़ो वाल्मीकि नवयुवक खड़े हो गए.और कहने लगे कि मंदिर में कुरान पढवाने से पहले किसी मस्जिद में गीता और रामायण का पाठ करके दिखाओ तो जाने.
विरोध बढ़ते देखकर गाँधी ने पुलिस को बुला लिया. पुलिस आई और विरोध करने वालों को पकड़ कर ले गयी .और उनके विरुद्ध दफा १०७ का मुकदमा दर्ज करा दिया गया .
और इसके पश्चात गाँधी ने पुलिस सुरक्षा में उस मंदिर में कुरान पढ़ी.
`(पुस्तक विश्वासघात ........ लेखक -- गुरुदत्त )

शनिवार, 19 नवंबर 2011

वेदों में गोमांस?

This article is also available in English at http://agniveer.com/68/no-beef-in-vedas/

यहां प्रस्तुत सामग्री वैदिक शब्दों के आद्योपांत और वस्तुनिष्ठ विश्लेषण पर आधारित है, जिस संदर्भ में वे वैदिक शब्दकोष, शब्दशास्त्र, व्याकरण तथा वैदिक मंत्रों के यथार्थ निरूपण के लिए अति आवश्यक अन्य साधनों में प्रयुक्त हुए हैं | अतः यह शोध श्रृंखला मैक्समूलर, ग्रिफ़िथ, विल्सन, विलियम्स् तथा अन्य भारतीय विचारकों के वेद और वैदिक भाषा के कार्य का अन्धानुकरण नहीं है | यद्यपि, पश्चिम के वर्तमान शिक्षा जगत में वे काफ़ी प्रचलित हैं, किंतु हमारे पास यह प्रमाणित करने के पर्याप्त कारण हैं कि उनका कार्य सच्चाई से कोसों दूर है | उनके इस पहलू पर हम यहां विस्तार से प्रकाश डालेंगे | विश्व की प्राचीनतम पुस्तक – वेद के प्रति गलत अवधारणाओं के विस्तृत विवेचन की श्रृंखला में यह प्रथम कड़ी है |

हिंदूओं के प्राथमिक पवित्र धर्म-ग्रंथ वेदों में अपवित्र बातों के भरे होने का लांछन सदियों से लगाया जा रहा है | यदि इन आक्षेपों को सही मान लिया जाए तो सम्पूर्ण हिन्दू संस्कृति, परंपराएं, मान्यताएं सिवाय वहशीपन, जंगलीयत और क्रूरता के और कुछ नहीं रह जाएंगी | वेद पृथ्वी पर ज्ञान के प्रथम स्रोत होने के अतिरिक्त हिन्दू धर्म के मूलाधार भी हैं, जो मानव मात्र के कल्याणमय जीवन जीने के लिए मार्गदर्शक हैं |

वेदों की झूठी निंदा करने की यह मुहीम उन विभिन्न तत्वों ने चला रखी है जिनके निहित स्वार्थ वेदों से कुछ चुनिंदा सन्दर्भों का हवाला देकर हिन्दुओं को दुनिया के समक्ष नीचा दिखाना चाहते हैं | यह सब गरीब और अशिक्षित भारतियों से अपनी मान्यताओं को छुड़वाने में काफ़ी कारगर साबित होता है कि उनके मूलाधार वेदों में नारी की अवमानना, मांस- भक्षण, बहुविवाह, जातिवाद और यहां तक की गौ- मांस भक्षण जैसे सभी अमानवीय तत्व विद्यमान हैं |

वेदों में आए त्याग या दान के अनुष्ठान के सन्दर्भों में जिसे यज्ञ भी कहा गया है, लोगों ने पशुबलिदान को आरोपित कर दिया है | आश्चर्य की बात है कि भारत में जन्में, पले- बढे बुद्धिजीवियों का एक वर्ग जो प्राचीन भारत के गहन अध्ययन का दावा करता है, वेदों में इन अपवित्र तत्वों को सिद्ध करने के लिए पाश्चात्य विद्वानों का सहारा लेता है |

वेदों द्वारा गौ हत्या और गौ मांस को स्वीकृत बताना हिन्दुओं की आत्मा पर मर्मान्तक प्रहार है | गाय का सम्मान हिन्दू धर्म का केंद्र बिंदू है | जब कोई हिन्दू को उसकी मान्यताओं और मूल सिद्धांतों में दोष या खोट दिखाने में सफल हो जाए, तो उस में हीन भावना जागृत होती है और फिर वह आसानी से मार्गभ्रष्ट किया जा सकता है | ऐसे लाखों नादान हिन्दू हैं जो इन बातों से अनजान हैं, इसलिए प्रति उत्तर देने में नाकाम होने के कारण अन्य मतावलंबियों के सामने समर्पण कर देते हैं |

जितने भी स्थापित हित – जो वेदों को बदनाम कर रहे हैं वे केवल पाश्चात्य और भारतीय विशेषज्ञों तक ही सीमित नहीं हैं | हिन्दुओं में एक खास जमात ऐसी है जो जनसंख्या के सामाजिक और आर्थिक रूप से पिछड़ें तबकों का शोषण कर अपनी बात मानने और उस पर अमल करने को बाध्य करती है अन्यथा दुष्परिणाम भुगतने की धमकी देती है |

वेदों के नाम पर थोपी गई इन सारी मिथ्या बातों का उत्तरदायित्व मुख्यतः मध्यकालीन वेदभाष्यकार महीधर, उव्वट और सायण द्वारा की गई व्याख्याओं पर है तथा वाम मार्गियों या तंत्र मार्गियों द्वारा वेदों के नाम से अपनी पुस्तकों में चलायी गई कुप्रथाओं पर है | एक अवधि के दौरान यह असत्यता सर्वत्र फ़ैल गई और अपनी जड़ें गहराई तक ज़माने में सफल रही, जब पाश्चात्य विद्वानों ने संस्कृत की अधकचरी जानकारी से वेदों के अनुवाद के नाम पर सायण और महीधर के वेद- भाष्य की व्याख्याओं का वैसा का वैसा अपनी लिपि में रूपांतरण कर लिया | जबकि वे वेदों के मूल अभिप्राय को समुचित रूप समझने के लिए अति आवश्यक शिक्षा (स्वर विज्ञान), व्याकरण, निरुक्त (शब्द व्युत्पत्ति शास्त्र), निघण्टु (वैदिक कोष), छंद , ज्योतिष तथा कल्प इत्यादि के ज्ञान से सर्वथा शून्य थे |

अग्निवीर के आन्दोलन का उद्देश्य वेदों के बारे में ऐसी मिथ्या धारणाओं का वास्तविक मूल्यांकन कर उनकी पवित्रता,शुद्धता,महान संकल्पना तथा मान्यता की स्थापना करना है | जो सिर्फ हिन्दुओं के लिए ही नहीं बल्कि मानव मात्र के लिए बिना किसी बंधन,पक्षपात या भेदभाव के समान रूप से उपलब्ध हैं |

.पशु-हिंसा का विरोध

यस्मिन्त्सर्वाणि भूतान्यात्मैवाभूद्विजानत:

तत्र को मोहः कः शोक एकत्वमनुपश्यत:

यजुर्वेद ४०। ७

जो सभी भूतों में अपनी ही आत्मा को देखते हैं, उन्हें कहीं पर भी शोक या मोह नहीं रह जाता क्योंकि वे उनके साथ अपनेपन की अनुभूति करते हैं | जो आत्मा के नष्ट न होने में और पुनर्जन्म में विश्वास रखते हों, वे कैसे यज्ञों में पशुओं का वध करने की सोच भी सकते हैं ? वे तो अपने पिछले दिनों के प्रिय और निकटस्थ लोगों को उन जिन्दा प्राणियों में देखते हैं |

अनुमन्ता विशसिता निहन्ता क्रयविक्रयी

संस्कर्ता चोपहर्ता च खादकश्चेति घातकाः

मनुस्मृति ५।५१

मारने की आज्ञा देने वाला, पशु को मारने के लिए लेने वाला, बेचने वाला, पशु को मारने वाला,

मांस को खरीदने और बेचने वाला, मांस को पकाने वाला और मांस खाने वाला यह सभी हत्यारे हैं |

ब्रीहिमत्तं यवमत्तमथो माषमथो तिलम्

एष वां भागो निहितो रत्नधेयाय दान्तौ मा हिंसिष्टं पितरं मातरं च

अथर्ववेद ६।१४०।२

हे दांतों की दोनों पंक्तियों ! चावल खाओ, जौ खाओ, उड़द खाओ और तिल खाओ |

यह अनाज तुम्हारे लिए ही बनाये गए हैं | उन्हें मत मारो जो माता – पिता बनने की योग्यता रखते हैं |

य आमं मांसमदन्ति पौरुषेयं च ये क्रविः

गर्भान् खादन्ति केशवास्तानितो नाशयामसि

अथर्ववेद ८। ६।२३

वह लोग जो नर और मादा, भ्रूण और अंड़ों के नाश से उपलब्ध हुए मांस को कच्चा या पकाकर खातें हैं, हमें उन्हें नष्ट कर देना चाहिए |

अनागोहत्या वै भीमा कृत्ये

मा नो गामश्वं पुरुषं वधीः

अथर्ववेद १०।१।२९

निर्दोषों को मारना निश्चित ही महा पाप है | हमारे गाय, घोड़े और पुरुषों को मत मार | वेदों में गाय और अन्य पशुओं के वध का स्पष्टतया निषेध होते हुए, इसे वेदों के नाम पर कैसे उचित ठहराया जा सकता है?

अघ्न्या यजमानस्य पशून्पाहि

यजुर्वेद १।१

हे मनुष्यों ! पशु अघ्न्य हैं – कभी न मारने योग्य, पशुओं की रक्षा करो |

पशूंस्त्रायेथां

यजुर्वेद ६।११

पशुओं का पालन करो |

द्विपादव चतुष्पात् पाहि

यजुर्वेद १४।८

हे मनुष्य ! दो पैर वाले की रक्षा कर और चार पैर वाले की भी रक्षा कर |

क्रव्य दा – क्रव्य (वध से प्राप्त मांस ) + अदा (खानेवाला) = मांस भक्षक |

पिशाच — पिशित (मांस) +अस (खानेवाला) = मांस खाने वाला |

असुत्रपा – असू (प्राण )+त्रपा(पर तृप्त होने वाला) = अपने भोजन के लिए दूसरों के प्राण हरने वाला | |

गर्भ दा और अंड़ दा = भूर्ण और अंड़े खाने वाले |

मांस दा = मांस खाने वाले |

वैदिक साहित्य में मांस भक्षकों को अत्यंत तिरस्कृत किया गया है | उन्हें राक्षस, पिशाच आदि की संज्ञा दी गई है जो दरिन्दे और हैवान माने गए हैं तथा जिन्हें सभ्य मानव समाज से बहिष्कृत समझा गया है |

ऊर्जं नो धेहि द्विपदे चतुष्पदे

यजुर्वेद ११।८३

सभी दो पाए और चौपाए प्राणियों को बल और पोषण प्राप्त हो | हिन्दुओं द्वारा भोजन ग्रहण करने से पूर्व बोले जाने वाले इस मंत्र में प्रत्येक जीव के लिए पोषण उपलब्ध होने की कामना की गई है | जो दर्शन प्रत्येक प्राणी के लिए जीवन के हर क्षण में कल्याण ही चाहता हो, वह पशुओं के वध को मान्यता कैसे देगा ?

२.यज्ञ में हिंसा का विरोध

जैसी कुछ लोगों की प्रचलित मान्यता है कि यज्ञ में पशु वध किया जाता है, वैसा बिलकुल नहीं है | वेदों में यज्ञ को श्रेष्ठतम कर्म या एक ऐसी क्रिया कहा गया है जो वातावरण को अत्यंत शुद्ध करती है |

अध्वर इति यज्ञानाम – ध्वरतिहिंसा कर्मा तत्प्रतिषेधः

निरुक्त २।७

निरुक्त या वैदिक शब्द व्युत्पत्ति शास्त्र में यास्काचार्य के अनुसार यज्ञ का एक नाम अध्वर भी है | ध्वर का मतलब है हिंसा सहित किया गया कर्म, अतः अध्वर का अर्थ हिंसा रहित कर्म है | वेदों में अध्वर के ऐसे प्रयोग प्रचुरता से पाए जाते हैं |

महाभारत के परवर्ती काल में वेदों के गलत अर्थ किए गए तथा अन्य कई धर्म – ग्रंथों के विविध तथ्यों को भी प्रक्षिप्त किया गया | आचार्य शंकर वैदिक मूल्यों की पुनः स्थापना में एक सीमा तक सफल रहे | वर्तमान समय में स्वामी दयानंद सरस्वती – आधुनिक भारत के पितामह ने वेदों की व्याख्या वैदिक भाषा के सही नियमों तथा यथार्थ प्रमाणों के आधार पर की | उन्होंने वेद-भाष्य, सत्यार्थ प्रकाश, ऋग्वेदादिभाष्यभूमिका तथा अन्य ग्रंथों की रचना की | उनके इस साहित्य से वैदिक मान्यताओं पर आधारित व्यापक सामाजिक सुधारणा हुई तथा वेदों के बारे में फैली हुई भ्रांतियों का निराकरण हुआ |

आइए,यज्ञ के बारे में वेदों के मंतव्य को जानें -

अग्ने यं यज्ञमध्वरं विश्वत: परि भूरसि

स इद देवेषु गच्छति
ऋग्वेद १ ।१।४

हे दैदीप्यमान प्रभु ! आप के द्वारा व्याप्त हिंसा रहित यज्ञ सभी के लिए लाभप्रद दिव्य गुणों से युक्त है तथा विद्वान मनुष्यों द्वारा स्वीकार किया गया है | ऋग्वेद में सर्वत्र यज्ञ को हिंसा रहित कहा गया है इसी तरह अन्य तीनों वेद भी वर्णित करते हैं | फिर यह कैसे माना जा सकता है कि वेदों में हिंसा या पशु वध की आज्ञा है ?

यज्ञों में पशु वध की अवधारणा उनके (यज्ञों ) के विविध प्रकार के नामों के कारण आई है जैसे अश्वमेध यज्ञ, गौमेध यज्ञ तथा नरमेध यज्ञ | किसी अतिरंजित कल्पना से भी इस संदर्भ में मेध का अर्थ वध संभव नहीं हो सकता |

यजुर्वेद अश्व का वर्णन करते हुए कहता है -

इमं मा हिंसीरेकशफं पशुं कनिक्रदं वाजिनं वाजिनेषु

यजुर्वेद १३।४८

इस एक खुर वाले, हिनहिनाने वाले तथा बहुत से पशुओं में अत्यंत वेगवान प्राणी का वध मत कर |अश्वमेध से अश्व को यज्ञ में बलि देने का तात्पर्य नहीं है इसके विपरीत यजुर्वेद में अश्व को नही मारने का स्पष्ट उल्लेख है | शतपथ में अश्व शब्द राष्ट्र या साम्राज्य के लिए आया है | मेध अर्थ वध नहीं होता | मेध शब्द बुद्धिपूर्वक किये गए कर्म को व्यक्त करता है | प्रकारांतर से उसका अर्थ मनुष्यों में संगतीकरण का भी है | जैसा कि मेध शब्द के धातु (मूल ) मेधृ -सं -ग -मे के अर्थ से स्पष्ट होता है |

राष्ट्रं वा अश्वमेध:

अन्नं हि गौ:

अग्निर्वा अश्व:

आज्यं मेधा:

(शतपथ १३।१।६।३)

स्वामी दयानन्द सरस्वती सत्यार्थ प्रकाश में लिखते हैं :-

राष्ट्र या साम्राज्य के वैभव, कल्याण और समृद्धि के लिए समर्पित यज्ञ ही अश्वमेध यज्ञ है | गौ शब्द का अर्थ पृथ्वी भी है | पृथ्वी तथा पर्यावरण की शुद्धता के लिए समर्पित यज्ञ गौमेध कहलाता है | ” अन्न, इन्द्रियाँ,किरण,पृथ्वी, आदि को पवित्र रखना गोमेध |” ” जब मनुष्य मर जाय, तब उसके शरीर का विधिपूर्वक दाह करना नरमेध कहाता है | ”

३. गौ – मांस का निषेध

वेदों में पशुओं की हत्या का विरोध तो है ही बल्कि गौ- हत्या पर तो तीव्र आपत्ति करते हुए उसे निषिद्ध माना गया है | यजुर्वेद में गाय को जीवनदायी पोषण दाता मानते हुए गौ हत्या को वर्जित किया गया है |

घृतं दुहानामदितिं जनायाग्ने मा हिंसी:

यजुर्वेद १३।४९

सदा ही रक्षा के पात्र गाय और बैल को मत मार |

आरे गोहा नृहा वधो वो अस्तु

ऋग्वेद ७ ।५६।१७

ऋग्वेद गौ- हत्या को जघन्य अपराध घोषित करते हुए मनुष्य हत्या के तुल्य मानता है और ऐसा महापाप करने वाले के लिये दण्ड का विधान करता है |

सूयवसाद भगवती हि भूया अथो वयं भगवन्तः स्याम

अद्धि तर्णमघ्न्ये विश्वदानीं पिब शुद्धमुदकमाचरन्ती

ऋग्वेद १।१६४।४०

अघ्न्या गौ- जो किसी भी अवस्था में नहीं मारने योग्य हैं, हरी घास और शुद्ध जल के सेवन से स्वस्थ रहें जिससे कि हम उत्तम सद् गुण,ज्ञान और ऐश्वर्य से युक्त हों |वैदिक कोष निघण्टु में गौ या गाय के पर्यायवाची शब्दों में अघ्न्या, अहि- और अदिति का भी समावेश है | निघण्टु के भाष्यकार यास्क इनकी व्याख्या में कहते हैं -अघ्न्या – जिसे कभी न मारना चाहिए | अहि – जिसका कदापि वध नहीं होना चाहिए | अदिति – जिसके खंड नहीं करने चाहिए | इन तीन शब्दों से यह भलीभांति विदित होता है कि गाय को किसी भी प्रकार से पीड़ित नहीं करना चाहिए | प्राय: वेदों में गाय इन्हीं नामों से पुकारी गई है |

अघ्न्येयं सा वर्द्धतां महते सौभगाय

ऋग्वेद १ ।१६४।२७

अघ्न्या गौ- हमारे लिये आरोग्य एवं सौभाग्य लाती हैं |

सुप्रपाणं भवत्वघ्न्याभ्य:

ऋग्वेद ५।८३।८

अघ्न्या गौ के लिए शुद्ध जल अति उत्तमता से उपलब्ध हो |

यः पौरुषेयेण क्रविषा समङ्क्ते यो अश्व्येन पशुना यातुधानः

यो अघ्न्याया भरति क्षीरमग्ने तेषां शीर्षाणि हरसापि वृश्च

ऋग्वेद १०।८७।१६

मनुष्य, अश्व या अन्य पशुओं के मांस से पेट भरने वाले तथा दूध देने वाली अघ्न्या गायों का विनाश करने वालों को कठोरतम दण्ड देना चाहिए |

विमुच्यध्वमघ्न्या देवयाना अगन्म

यजुर्वेद १२।७३

अघ्न्या गाय और बैल तुम्हें समृद्धि प्रदान करते हैं |

मा गामनागामदितिं वधिष्ट

ऋग्वेद ८।१०१।१५

गाय को मत मारो | गाय निष्पाप और अदिति – अखंडनीया है |

अन्तकाय गोघातं

यजुर्वेद ३०।१८

गौ हत्यारे का संहार किया जाये |

यदि नो गां हंसि यद्यश्वम् यदि पूरुषं

तं त्वा सीसेन विध्यामो यथा नो सो अवीरहा

अर्थववेद १।१६।४

यदि कोई हमारे गाय,घोड़े और पुरुषों की हत्या करता है, तो उसे सीसे की गोली से उड़ा दो |

वत्सं जातमिवाघ्न्या

अथर्ववेद ३।३०।१

आपस में उसी प्रकार प्रेम करो, जैसे अघ्न्या – कभी न मारने योग्य गाय – अपने बछड़े से करती है |

धेनुं सदनं रयीणाम्

अथर्ववेद ११।१।४

गाय सभी ऐश्वर्यों का उद्गम है |

ऋग्वेद के ६ वें मंडल का सम्पूर्ण २८ वां सूक्त गाय की महिमा बखान रहा है –

१.आ गावो अग्मन्नुत भद्रमक्रन्त्सीदन्तु

प्रत्येक जन यह सुनिश्चित करें कि गौएँ यातनाओं से दूर तथा स्वस्थ रहें |

२.भूयोभूयो रयिमिदस्य वर्धयन्नभिन्ने

गाय की देख-भाल करने वाले को ईश्वर का आशीर्वाद प्राप्त होता है |

.न ता नशन्ति न दभाति तस्करो नासामामित्रो व्यथिरा दधर्षति

गाय पर शत्रु भी शस्त्र का प्रयोग न करें |

४. न ता अर्वा रेनुककाटो अश्नुते न संस्कृत्रमुप यन्ति ता अभि

कोइ भी गाय का वध न करे |

.गावो भगो गाव इन्द्रो मे अच्छन्

गाय बल और समृद्धि लातीं हैं |

६. यूयं गावो मेदयथा

गाय यदि स्वस्थ और प्रसन्न रहेंगी तो पुरुष और स्त्रियाँ भी निरोग और समृद्ध होंगे |

. मा वः स्तेन ईशत माघशंस:

गाय हरी घास और शुद्ध जल क सेवन करें | वे मारी न जाएं और हमारे लिए समृद्धि लायें |

वेदों में मात्र गाय ही नहीं बल्कि प्रत्येक प्राणी के लिए प्रद्रर्शित उच्च भावना को समझने के लिए और कितने प्रमाण दिएं जाएं ? प्रस्तुत प्रमाणों से सुविज्ञ पाठक स्वयं यह निर्णय कर सकते हैं कि वेद किसी भी प्रकार कि अमानवीयता के सर्वथा ख़िलाफ़ हैं और जिस में गौ – वध तथा गौ- मांस का तो पूर्णत: निषेध है |

वेदों में गौ मांस का कहीं कोई विधान नहीं है |

मंगलवार, 15 नवंबर 2011

मेरे देशवासियों मै नाथूराम गोडसे बोल रहा हूँ


ukFkw jke xkSMlsA bl uke ds lqurs gh ,d Øwj gR;k dk tks :i Hkkjrh; tuekul dh vk¡[kksa ds lkeus vkrk gS] og :i xk¡/kh ds gR;kjs dk gSA eSa Hkkjrh; turk ls ,d ckr vo'; iwNuk pkgw¡xk fd ftl O;fDr us egkRek xk¡/kh dh gR;k dh D;k Hkkjrh; tuekul ml O;fDr ds mu fopkjksa dks tkurk gS ftuds dkj.k ukFkw jke xkSMls us xk¡/kh dh gR;k dhA D;k ukFkwjke xkSMls dh egRekxk¡/kh ls dksbZ tkfr; nq'euh Fkh ;k ukFkwjke xkSMls dksbZ fof{kIr O;fDr FkkA fdrus O;fDr tkurs gSa fd ukFkwjke xkSMls us Hkkjr dh vktknh dh yM+kbZ esa c<+p<+ dj fgLlk fy;k Fkk fdruksa dks ekywe gS fd ukFkwjke us tsy esa vaxzsth ljdkj ds dksM+s [kk;s FksA

okLro esa ns[kk tk;s rks ukFkwjkexkSMls us xk¡/kh th dks jktuSfrd dkj.kksa ls ekjk Fkk tks fd ukFkjke }kjk fn;s x;s oDrO;ksa ls Li"V Hkh gksrk gSA ukFkwjkexkSMls ds ftu c;kuksa dks rRdkyhu dkaxzsl ljdkj us fdlh Hk; ds dkj.k Hkkjrh; turk ls Nwik;k rFkk muds fdlh Hkh izdkj ds Nius ij jksd yxkbZ Fkh] og jksd dksVZ }kjk 1962 esa gVk nh x;h FkhA fQj Hkh fdUgha dkj.kksa ls ;s c;ku turk rd de gh igqap ik;sA


iafMr ukFkwjkexkSMls ds mu Økafrdkjh Ck;kuksa dks eSa jk"Vª&lfe/kk if=dk ds }kjk vki rd igqapkus dh dksf'k'k esa tqVk gwaA vki Lo;a tkus dh xk¡/kh th dh ukFkw jke xkSMls us gR;k dh Fkh vFkok o/kA

;s c;ku iqLrd ^^xk¡/kho/k D;kas\** ys[kd&xksiky xkSMls ls T;ksa ds R;ksa fy;s x;s gSaaA c;kuksa ls igys nh x;h Hkwfedk Hkh iqLrd xk¡/kho/k D;ksa\ ls yh x;h gSA


35½ mUgha fnuksa cgqr&lh ?kVuk,¡ ,slh gqbZ] ftuls eq>s ,slk fo'okl gks x;k fd lkojdj th vkSj vU; usrk esjs fopkjksa ds ;qodksa dh mxz uhfr dk leFkZu ugha djsaxsA 1946 esa lqgjkonhZ dh ljdkj ds le; uksvk[kkyh ¼caxky½ esa eqlyekuksa ds gkFkksa fgUnqvksa ij tks vR;kpkj gq,] mlls gekjk [kwu [kkSy x;kA gekjk {kksHk ml le; vkSj Hkh mxz gks x;k] tc xka/kh th us lqgjkonhZ dks 'kj.k nh vkSj izkFkZuk&lHkkvksa esa ^'kghn lkgc* ds uke ls lEcksf/kr djuk izkjEHk fd;kA xka/kh th tc fnYyh vk, rks Hkaxh dkyksuh ds efUnj esa viuh izkFkZuk&lHkk esa turk vkSj iqtkfj;ksa ds fojks/k djus ij Hkh mUgksaus dqjku dh vk;rsa i<+h ysfdu dHkh Hkh og fdlh efLtn esa ¼eqlyekuksa ds Hk; ls½ xhrk u i<+ ldsA og tkurs Fks fd efLtn esa xhrk i<+us ls eqlyekuksa }kjk muds lkFk fdl izdkj dk O;ogkj gksxk\ os lnk lgu'khy fgUnqvksa dks gh dqpyrs jgsA eSaus xka/kh th ds bu fopkjksa dks] fd fgUnw lgu'khy gksrk gSa] u"V djus dk fu.kZ; fd;kA eSa mudks ;g fl) djds fn[kkuk pkgrk Fkk fd tc fgUnw dk vieku gksrk gS] rc og Hkh lgu'khyrk NksM+ ldrk gS vkSj eSaus ,slk gh djus dk fu'p; fd;kA

¼36½ eSaus vkSj vkiVs us ;g fu'p; fd;k fd mudh izkFkZuk&lHkkvksa esa brus izn'kZu djsa fd muds fy, izkFkZuk&lHkk djuk vlEHko gks tk,A Jh vkiVs us dqN 'kj.kkFkhZ lkFk ysdj 'kgj esa ,d tqywl Hkh fudkyk] ftlesa xka/kh th vkSj lqgjkonhZ ds fo:) ukjs yxk, x, vkSj Hkaxh dkyksuh dh izkFkZuk&lHkk esa izn'kZu fd;kA ml le; gekjk fgalk djus dk ys'kek= Hkh fopkj u Fkk] fQj Hkh xka/kh th us dk;jrkiwoZd fiNys njokts dh 'kj.k yh vkSj vius vkidks lqjf{kr djus dk iz;Ru fd;kA

¼37½ tc Jh lkojdj us bl izn'kZu ds fo"k; esa i<+k rks mUgksaus gekjs dk;Z dh iz'kalk ugha dh] izR;qr eq>s ,dkar esa ,sls dk;Z ds fy, cgqr cqjk&Hkyk dgkA ;|fi geus izn'kZu 'kkfUriw.kZ fd, Fks rFkkfi mUgksaus dgk] ^^ftl izdkj eSa bl ckr dh fuUnk djrk gw¡ fd dkaxzsl ls laca/k j[kus okys yksx gekjh lHkkvksa vkSj pquko esa 'kkfUr Hkax djrs gSaA mlh izdkj eq>s bl ckr dh Hkh fuUnk djuh pkfg, fd fgUnw laxBuoknh yksx dkaxzsl okyksa ds fdlh dk;ZØe dks Hkax djrs gSaA ;fn xka/kh th viuh izkFkZuk&lHkk esa fgUnqvksa ds fo:) cksyrs gSa rks mlh izdkj vki Hkh viuh ikVhZ dh lHkk djsa vkSj xka/kh th ds fl)kUrksa dk [k.Mu djsaA ge lcdks viuh&viuh ckr dk izpkj laoS/kkfud fu;ekuqlkj djuk pkfg,A**

+¼38½ nwljh egRoiw.kZ ?kVuk ml le; gqbZ] tc Hkkjr ds foHkktu dk vfUre fu'p; gqvkA ml le; dqN fgUnw&lHkkbZ ;g tkuuk pkgrs Fks fd foHkkftr Hkkjr dh ubZ dkaxzsl ljdkj ds lkFk fganw&egklHkk dk D;k O;ogkj gksxk\ ohj lkojdj vkfn fgUnw usrkvksa us dgk fd ubZ ljdkj dks fdlh ny vFkok dkaxzsl dh ljdkj ugha ekuuk pkfg,] izR;qr Hkkjr dh jk"Vªh;&ljdkj le>uk pkfg, vkSj mldh izR;sd vkKk dk ikyu djuk pkfg,A mUgksaus dgk fd ikfdLrku cuus dk mudks nq[k rks vo'; gS] ijUrq fQj Hkh ubZ vktknh dh j{kk djus ds fy, vkSj mls LFkkbZ j[kus ds fy, ubZ ljdkj dks lg;ksx nsuk gh gekjk /;s; gksuk pkfg,A ;fn ubZ ljdkj dks lg;ksx u fn;k rks ns'k esa x`g;q) gks tk,xk vkSj eqlyeku vius xqIr mn~ns'; vFkkZr~ lkjs Hkkjr dks ikfdLrku cukus esa lQy gks tk,axsA

¼39½ eq>s vkSj esjs fe=ksa dks lkojdj th ds ;s fopkj lUrks"ktd ugha yxsA geus lksp fy;k fd gesa fgUnw tkfr ds fgr esa lkojdj th ds usr`Ro dks NksM+ nsuk pkfg,A viuh Hkfo"; dh ;kstukvksa vkSj dk;ZØe ds fo"k; esa mudk ijke'kZ ugha ysuk pkfg, vkSj u gedks viuh Hkfo"; dh ;kstukvksa dk Hksn mudks nsuk pkfg,A

¼40½ dqN le; ckn gh iatkc vkSj Hkkjr ds vU; Hkkxksaa esa eqlyekuksa ds vR;kpkj 'kq: gks x,A dk¡xzsl 'kklu us fcgkj] dydRrk] iatkc vkSj vU; LFkkuksa ij mu fgUnqvksa dks gh xksyh dk fu'kkuk cukuk 'kq: dj fn;k] ftUgksaus eqlyekuksa dh c<+rh gqbZ 'kfDr dks jksdus dk lkgl fd;k FkkA ftl ckr ls ge Mjrs Fks] ogha gksdj jghA fQj Hkh fdruh yTtk dh ckr Fkh fd dkaxzsl 'kklu 15 vxLr] 1947 dks jaxjfy;k¡ jpk,] jks'kuh djs vkSj vkuUnksRlo euk,a] tcfd mlh fnu iatkc esa eqlyekuksa }kjk fgUnqvksa dk [kwu cgk;k tk jgk Fkk vkSj iatkc esa fganqvksa ds ?kj tyk, tk jgs FksA esjs fopkjksa ds fganw&lHkkb;ksa us fu'p; fd;k fd ge mRlo u euk,a vkSj eqlyekuksa ds c<+rs gq, vR;kpkj dks jksdus dk iz;Ru djsaA

¼41½ fgUnw&egklHkk dh dk;Zdkfj.kh vkSj vf[ky Hkkjrh; fgUnw duosU'ku dh lHkk,a ukS vksSj nl vxLr dks fnYyh esa gqbZ Fkha] ftudh v/;{krk lkojdj th us dhA vkiVs us vkSj esjs fopkjksa ds vU; lnL;ksa us Hkjld iz;Ru fd;k fd egklHkk ds usrkvksa Jh lkojdj] eq[kthZ vkSj Jh HksiVdj dks vius fopkjksa ls lger djsa vkSj ;g izLrko ikfjr djk,a fd dkaxzsl ls Hkkjr&foHkktu vkSj fgUnqvksasa ds O;kid fouk'k ds iz'u ij VDdj yh tk,] ijUrq egklHkk ofdZx desVh us gekjs bu ijke'ksZ dks Hkh ugha ekuk fd gSnjkckn ds fo"k; esa fo'ks"k :i ls dksbZZ dk;Z fd;k tk,] ;k ubZ dkaxzsl ljdkj dk cfg"dkj fd;k tk,A esjs O;fDrxr fopkj esa foHkkftr Hkkjr dh ljdkj dks oS/k ljdkj ekuuk vkSj mldh lgk;rk djuk Bhd ugha FkkA ijUrq dk;Zdkfj.kh us ;g izLrko ikfjr fd;k fd 15 vxLr dks turk vius ?kjksa ij Hkxok /ot ygjk;,A ohj lkojdj us Lo;a vkxsa c<+dj dgk fd pØ okys frjaxs >.Ms dks jk"Vª/ot Lohdkj fd;k tk,A geus bl ckr dk [kqyk fojks/k fd;kA

¼42½ dsoy ;gh ugha] 15 vxLr dks ohj lkojdj us cgqr ls fgUnw jk"Vªokfn;ksa dh bPNk ds fo:)] vius edku ij Hkxos /ot ds lkFk pØ okyk frjaxk /ot Hkh ygjk;kA blds lkFk gh tc eq[kthZ us Vaªddky ls iwNk fd ubZ xouZesaV esa os eU=h in Lohdkj djsaxs ;k ugh] rc lkojdj th us mRrj fn;k fd ubZ xouZesaV esa vkSj lHkh ikfVZ;ksa dks lg;ksx nsuk pkfg,] pkgs blesa eU=h fdlh Hkh ikVhZ ds gksaA fgUnw jk"Vªokfn;ksa dks pkfg, fd ;fn muds usrk dks eU=h in fn;k tk, rks og mls Lohdkj djds vius lg;ksx dk izek.k nsA mUgksaus dkaxzsl usrkvksa dks bl ckr ij c/kkbZ nh fd og ea=heaMy cukus esa lcdk lg;ksx izkIr dj jgs Fks vkSj mUgksaus fgUnw&lHkk ds usrk MkWa-';keizlkkn eq[kthZ dks eU=h in ds fy, vkefU=r fd;kA Jh HkksioVdj dk Hkh ,slh gh fopkj FkkA

¼43½ ml le; dkaxzsl us mPp&usrk vkSj dqN izkUrh;&eU=h lkojdj th ls i=&O;ogkj dj jgs FksA ubZ xouZesaV lcds lg;ksx ls cus] ;g rks lkojdj th igys gh fu'p; dj pqds FksA eq>s lc nyksa dh feyh&tqyh ljdkj ls dksbZ fojks/k u FkkA pwWfd dkaxzsl xouZesaV xka/kh th ds b'kkjksa ij pyrh Fkh]A ;fn fdlh le; dkaxzsl ljdkj mudh dksbZ ckr ughas ekurh] rks og vu'ku dh /kedh nsdj euk ysrs FksA ,slh fLFkfr esa tks ljdkj ¼dkaxzsl ljdkj ;k lcdh feyh&tqyh ljdkj½ curh] mlesa dkaxzsl dk cgqer rks fuf'p; gh Fkk vkSj ;g Hkh r; Fkk fd og ljdkj xka/kh th dh vkKk esa pysxhA rc mlds }kjk fgUnqvksa ds lkFk vU;k; gksrs jguk fuf'pr FkkA

¼44½ tks Hkh dk;Z ohj lkojdj vkfn us bl fn'kk esa fd;s] esjs eu esa mudh bl uhfr ds izfr ?kksj fojfDr gks xbZ vkSj eSaus ]vkiVs us ,oa vU; fgUnw laxBuoknh uo;qodksa us ;g fu'p; fd;k fd lHkk esa iqjkus usrkvksa ds fcuk iwNs viuk dk;ZØe cukosa vkSj pysaA geus ;g Hkh lksp fy;k fd viuh dksbZ ;kstuk fdlh dks ugha crk,axs] ;gkWa rd fd lkojdj th dks Hkh ughaA

¼45½ eSaus vius nSfud i= ^vxz.kh* esa fgUnw&egklHkk dh bl uhfr vkSj o`) usrkvksa ds dk;ksZ dh vkykspuk izkjEHk dh vkSj fgUnw&laxBu ds bPNqd uo;qodksa dk vkg~oku fd;k fd os gekjs dk;ZØe dks viuk,¡A

¼46½ u;k dk;ZØe cukus ds fy, esjs ikl nks eq[; ekxZ Fks] ftUgsa eSa vkjEHk djrkA igyk rks ;g Fkk fd 'kkfUriwoZd xka/kh th dh izkFkZuk&lHkk esa izn'kZu fd, tk,a] ftlls mudksa ;g Kku gks tk, fd fgUnw lkewfgd :i ls mudh uhfr dk fojks/k djrs gSaA vFkok izkFkZuk&lHkkvksa esa] ftuesa os fgUnw fojks/kh izpkj djrs Fks] vius fojks/k ls xM+cM+ QSykbZ tk,A nwljk ;g fd] gSnjkckn ds fo"k; esa vkUnksyu izkjeHk fd;k tk,] ftlls fgUnw HkkbZ&cguksa dh ;ouksa ds vR;kpkj ls j{kk gksA ;s dk;ZØe xqIr :i ls gh py ldrs Fks vkSj og Hkh ,d O;fDr dh vkkKk dk ikyu djus ij A blfy, geus ;g fu.kZ; fd;k fd ;g ;kstuk dsoy mUgha dks crkbZ tk,] ftudk bl ekxZ ij fo'okl gks vkSj tks bl fo"k; esa izR;sd vkKk dk ikyu djus dks rRij gksaA

¼47½ eSaus ;g lc foLrkj ls blfy, crk;k gS fd eq> ij nks"k yxkrs gq, dgk x;k gS fd eSaus lc dqN lkojdj ds b'kkjs ij fd;k] Lo;a viuh bPNk ls ughaA ,slk dguk fd eSa lkojdj th ij fuHkZj Fkk] esjs O;fDrRo dk] esjs dk;Z dk vkSj fu.kZ; dh {kerk dk vieku gSA ;g lc eSa blfy, dgk jgk gwWa fd esjs fo"k; esa tks HkzkUr /kkj.kk,Waa gksa] os nwj gks tk,WaA eSa bl ckr dks nksgjkrk gwW fd ohj lkojdj dks esjs ml dk;ZØe dk rfud Hkh irk ugha Fkk] ftl ij py dj eSus xka/kh th dk o/k fd;kA eSa bl ckr dks Hkh nksgjkrk gwW fd ;g fujk >wB gS fd vkiVs us esjs lkeus ;k eSaus Lo;a cMxs dks dgk fd gesa lkojdj th us xka/kh] usg: vkSj lqgjkonhZ dks ekjus dh vkKk nh gSA ;g Hkh lp ugha gS fd ge ,slh fdlh ;kstuk ;k "kM~;U= ds ckjs esa Jh cMxs ds lkFk lkojdj th ds vfUre ckj n'kZu djus x, gksa vkSj mUgksaus gesa vk'khZokZn ds ;s 'kCn dgs gksa ^lQy gks vkSj okfil ykSVs&;'kLoh gksa!* ;g vlR; gS fd vkiVs ;k eSaus cMxs dks dgk fd lkojdj us gesa dgk gS fd xka/kh th ds lkS cjl iw.kZ gks pqds gS] blfy, rqe vo'; lQy gks vkvksxsA eSa u rks bruk va/kJ) Fkk fd lkojdj dh Hkfo";ok.kh ds vkk/kkj ij dk;Z djrk vkSj u bruk ew[kZ Fkk fd ,sls Hkfo";&dFku ij Hkjkslk djrkA

Hkkx 2 % xka/kh th jktuhfr dk {k;&n'kZu

miHkkx&1

¼48½ 30 tuojh]1948 dh ?kVuk dk dkj.k jktuSfrd vkSj dsoy jktuSfrd FkkA eSa bl ckr dks lfoLrkj crkÅWxkA eq>s blesa dksbZ vkifRr ugha Fkh fd xka/kh th fgUnw&eqfLye vkSj vU; /keksZ dh ifo= iqLrdksa dk v/;;u djrs Fks ;k os viuh izkFkZuk esa xhrk] dqjku vkSj ckbZfcy ls 'yksd i<+rs FksA lc /keksZ dh iqLrdsa i<+uk eSa cqjk ugha le>rk FkkA fHkUu&fHkUu /keZ&xzaFkksa dk rqyukRed v/;;u djuk esa xq.k le>rk gwwWA esjs erHksn ds dkj.k vkSj FksA

¼49½ mRrj esa ok;O; lhek izkUr ls ysdj nf{k.k esa dqekjh vUrjhi rd vkSj djkph ls vklke rd bl lkjh Hkwfe dks eSa viuh ekr`Hkwfe ekurk jgk gwWA brus fo'kky ns'k esa izR;d /keZ ds yksx jgrs gSaA eSa le>rk gwW fd mu lcdks vius /keZ ij pyus dh LorU=rk gksuh pkfg,A Hkkjr esa fgUnqvksa dh la[;k lcls vf/kd gSA bl ns'k ls ckgj ,slk dksbZ LFkku ugha gS] ftls ge viuk dg ldsaA Hkkjro"kZ izkphudky ls gh fgUnvksa dh ekr`Hkwfe gS vkSj iq.;Hkwfe HkhA fgUnqvksa ds dkj.k ;g ns'k izfl) gqvkA dyk] foKku] /keZ ,oa laLd`fr esa bldks tks [;kkfr feyh] og Hkh fgUnqvksa ds dkj.k feyhA fganqvksa ds i'pkr~ ;gkWa eqlyekuksa dh tula[;k lcls vf/kd gSA eqlyekuksa us nloha 'krkCnh ls ;gkWa izos'k djuk vkjEHk fd;k vkSj fHkUu&fHkUu LFkuksa ij vius jkT; LFkkfir djds Hkkjr ds cgqr cM+s Hkkx ij viuk vkf/kiR; tek fy;kA

¼50½ vaxsztksa ds Hkkjr esa vkus ds igys gh fgUnw vkSj ;ou 'krkfCn;ksa ds vuqHko ds i'pkr~ ;g tku pqds Fks ffd eqlyeku ;gkWa jktk cudj ugha jg ldrs vkSj u gh mUgsa ;gkWa ls fudkyk gh tk ldrk gSA nksuksa ;g tkurs Fks fd nksuksa dks LFkkbZ :i ls ;gkWa jguk gSA ejkBksa dh mUufr] jktiwrksa ds fonzksg vkSj fl[kksa dh 'kfDr ds dkj.k eqlyekuks adk vkf/kiR; cgqr fucZy gks pqdk FkkA oSls rks eqlyeku rc Hkh ;gkWa jkT; tek, j[kus dk bjknk fd, gq, Fks] ijUrq vuqHkoh yksx tkurs Fks fd ,slh vk'kk,Wa fujFkZd gSA nwljh vksj] vaxzst fgUnqvksa vkSj eqlyekuksa ls ;q) esa thrs gq, Fks vkSj uhfr esa bu nksuksa ls vf/kd fuiq.k FksA mUgksaus viuh ;ksX;rk vkSj jkT;&izcU/k ls turk ds thou vkSj lEeku dks lqjf{kr fd;kA fgUnw vkSj eqlyeku] nksuk us mudks ;gkWa dk jktk Lohdkj dj fy;kA fgUnqvksa vkSj eqlyekuksa esa dVqrk rks igys ls gh FkhA vaxzstksa us dVqrk dk ykHk mBk;k vkSj vius jkT; dks vf/kd le; rd tek, j[kus ds fy, fgUnw vkSj eqlyekuksa dh ijLij dVqrk dks vkSj c<+kok fn;k A dkaxzsl ] bl /;s; ls cukbZ xbZ Fkh fd turk dks mlds vf/kdkj fnyk, tk;saA esjs eu esa izkjEHk ls gh] tc eSa dk;Z {ks= esa mrjk] os fopkj cgqr n`<+ gks x, Fks fd fons'kh jkT; dks lekIr djds mlds LFkku ij viuk jkT; LFkkfir fd;k tkuk pkfg,A

¼51½ eSus vius ys[kksa vkSj Hkk"k.kksa esa lnk ;gh ckr dgh gS fd pquko ds le; ;k eU=he.My cukrs vFkok vU; ,sls dk;ksZ esa lEiznk; dk iz'u ugha mBkuk pkfg,A Li"V :i ls le>us ds fy, vki fgUnww&egklHkk ds fcykliqj ds vf/kos'ku ds izLrkoksa dks ns[k ldrs gSa] tks vkxs fn, Hkh x, gSA ¼izLrko i<+s x, ifjf'k"V nsf[k,½ dkaxzsl ds usr`Ro esa ;g fopkkj n`<+ gksrk tk jgk Fkk] ijUrq eqlyekuksa us vxzlj gksdj blesa Hkkx ugha fy;kA ihNs os vaxzstksa dh pky esa vk x,A fgUnw vkSj eqlyekuksa esa QwV Mkydj gh vaxzst ;gkWa jkT; dj ldrs FksA vaxzstks us mudh lgk;rk dh vkSj muls izksRlkfgr gksdj eqlyeku ;g vfHkyk"kk djus yxs fd fganqvksa ij vkxs mudk vkf/kiR; iqu% gks ldsxkA ;g vfHkyk"kk izFke ckj 1906 esa izdV gqbZ] tc okbljk; ykMZ feaVksa dk ladsr ikdj eqlyekuksa us fgUnqvksa ls vyx pquko ds vf/kdkj ekWxsa vkSj vaxzstksa us /kwrZrkiwoZd ;g dgdj vyx pqukoksa dks Lohdkj dj fy;k fd ,slk djus ls vYila[;d vFkkZr~ eqlyekuksa ds vf/kdkj lqjf{kr gks tk,axsA dkaxzsl us igys rks bldk FksM+k&lk fojks/k fd;k] ijUrq 1934 esa mlus bl izLrko dks ikl djkus esa vizR;{k lgk;rk dh A dkaxzsl us dgk& ge bl fo"k; esa u ^gkWa dgrs gS vkSj u ^uk*A

¼52½ bl izdkj ns'k ds foHkktu dh ek¡x dh uhao iM+h vkSj uhao iM+rs gh ;g ekWax c<+hA tks izkjEHk esa tjk&lh ckr Fkh] mlus vUr esa ikfdLrku dk :i /kkj.k dj fy;kA okLrfod xyrh rks ;g gqbZ fd ge lcus ;g lkspk] fd fdlh izdkj lc feytqydj vaxzstksa dks fudky nsaa] fQj vkil ds erHksn Lo;a gh feV tk,axsA

¼53½ fl)kUrr% eSa pquko ds vf/kdkjksa ds foHkktu ds fo:) Fkk] ijUrq gesa ml le; ;g lgu djuk iM+k] fQj Hkh eSaus bl ckr ij tksj fn;k fd nksuksa tkfr;ksa dh la[;k ds vuqlkj gh lnL; fy, tk,aA Øe'k-----------------2



शनिवार, 5 नवंबर 2011

सम्राट विक्रम ने रोम के शासक जुलियस सीजर(juliyas seejar) को भी हराकर उसे बंदी बनाकर उज्जेन की सड़कों पर घुमाया था.


सम्राट विक्रम ने रोम के शासक जुलियस सीजर को भी हराकर उसे बंदी बनाकर उज्जेन की सड़कों पर घुमाया था.

टिपण्णी यह है कि ----------------------

कालिदास-ज्योतिर्विदाभरण-अध्याय२२-ग्रन्थाध्यायनिरूपणम्-

श्लोकैश्चतुर्दशशतै सजिनैर्मयैव ज्योतिर्विदाभरणकाव्यविधा नमेतत् ॥ᅠ२२.६ᅠ॥
विक्रमार्कवर्णनम्-वर्षे श्रुतिस्मृतिविचारविवेकरम्ये श्रीभारते खधृतिसम्मितदेशपीठे।
मत्तोऽधुना कृतिरियं सति मालवेन्द्रे श्रीविक्रमार्कनृपराजवरे समासीत् ॥ᅠ२२.७ᅠ॥
नृपसभायां पण्डितवर्गा-शङ्कु सुवाग्वररुचिर्मणिरङ्गुदत्तो जिष्णुस्त्रिलोचनहरो घटखर्पराख्य।
अन्येऽपि सन्ति कवयोऽमरसिंहपूर्वा यस्यैव विक्रमनृपस्य सभासदोऽमो ॥ᅠ२२.८ᅠ॥
सत्यो वराहमिहिर श्रुतसेननामा श्रीबादरायणमणित्थकुमारसिंहा।
श्रविक्रमार्कंनृपसंसदि सन्ति चैते श्रीकालतन्त्रकवयस्त्वपरे मदाद्या ॥ᅠ२२.९ᅠ॥
नवरत्नानि-धन्वन्तरि क्षपणकामरसिंहशङ्कुर्वेतालभट्टघटखर्परकालिदासा।
ख्यातो वराहमिहिरो नृपते सभायां रत्नानि वै वररुचिर्नव विक्रमस्य ॥ᅠ२२.१०ᅠ॥
यो रुक्मदेशाधिपतिं शकेश्वरं जित्वा गृहीत्वोज्जयिनीं महाहवे।
आनीय सम्भ्राम्य मुमोच यत्त्वहो स विक्रमार्कः समसह्यविक्रमः ॥ २२.१७ ॥
तस्मिन् सदाविक्रममेदिनीशे विराजमाने समवन्तिकायाम्।
सर्वप्रजामङ्गलसौख्यसम्पद् बभूव सर्वत्र च वेदकर्म ॥ २२.१८ ॥
शङ्क्वादिपण्डितवराः कवयस्त्वनेके ज्योतिर्विदः सभमवंश्च वराहपूर्वाः।
श्रीविक्रमार्कनृपसंसदि मान्यबुद्घिस्तत्राप्यहं नृपसखा किल कालिदासः ॥ २२.१९ ॥
काव्यत्रयं सुमतिकृद्रघुवंशपूर्वं पूर्वं ततो ननु कियच्छ्रुतिकर्मवादः।
ज्योतिर्विदाभरणकालविधानशास्त्रं श्रीकालिदासकवितो हि ततो बभूव ॥ २२.२० ॥
वर्षैः सिन्धुरदर्शनाम्बरगुणै(३०६८)र्याते कलौ सम्मिते, मासे माधवसंज्ञिके च विहितो ग्रन्थक्रियोपक्रमः।
नानाकालविधानशास्त्रगदितज्ञानं विलोक्यादरा-दूर्जे ग्रन्थसमाप्तिरत्र विहिता ज्योतिर्विदां प्रीतये ॥ २२.२१ ॥
ज्योतिर्विदाभरण की रचना ३०६८ कलि वर्ष (विक्रम संवत् २४) या ईसा पूर्व ३३ में हुयी। विक्रम सम्वत् के प्रभाव से उसके १० पूर्ण वर्ष के पौष मास से जुलिअस सीजर द्वारा कैलेण्डर आरम्भ हुआ, यद्यपि उसे ७ दिन पूर्व आरम्भ करने का आदेश था। विक्रमादित्य ने रोम के इस शककर्त्ता को बन्दी बनाकर उज्जैन में भी घुमाया था (७८ इसा पूर्व में) तथा बाद में छोड़ दिया।। इसे रोमन लेखकों ने बहुत घुमा फिराकर जलदस्युओं द्वारा अपहरण बताया है तथा उसमें भी सीजर का गौरव दिखाया है कि वह अपना अपहरण मूल्य बढ़ाना चाहता था। इसी प्रकार सिकन्दर की पोरस (पुरु वंशी राजा) द्वारा पराजय को भी ग्रीक लेखकों ने उसकी जीत बताकर उसे क्षमादान के रूप में दिखाया है।
http://en.wikipedia.org/wiki/Julius_Caesar
Gaius Julius Caesar (13 July 100 BC – 15 March 44 BC) --- In 78 BC, --- On the way across the Aegean Sea, Caesar was kidnapped by pirates and held prisoner. He maintained an attitude of superiority throughout his captivity. When the pirates thought to demand a ransom of twenty talents of silver, he insisted they ask for fifty. After the ransom was paid, Caesar raised a fleet, pursued and captured the pirates, and imprisoned them. He had them crucified on his own authority.
Quoted from History of the Calendar, by M.N. Saha and N. C. Lahiri (part C of the Report of The Calendar Reforms Committee under Prof. M. N. Saha with Sri N.C. Lahiri as secretary in November 1952-Published by Council of Scientific & Industrial Research, Rafi Marg, New Delhi-110001, 1955, Second Edition 1992.
Page, 168-last para-“Caesar wanted to start the new year on the 25th December, the winter solstice day. But people resisted that choice because a new moon was due on January 1, 45 BC. And some people considered that the new moon was lucky. Caesar had to go along with them in their desire to start the new reckoning on a traditional lunar landmark.”
ज्योतिर्विदाभरण की कहानी ठीक होने के कई अन्य प्रमाण हैं-सिकन्दर के बाद सेल्युकस्, एण्टिओकस् आदि ने मध्य एसिआ में अपना प्रभाव बढ़ाने की बहुत कोशिश की, पर सीजर के बन्दी होने के बाद रोमन लोग भारत ही नहीं, इरान, इराक तथा अरब देशों का भी नाम लेने का साहस नहीं किये। केवल सीरिया तथा मिस्र का ही उल्लेख कर संतुष्ट हो गये। यहां तक कि सीरिया से पूर्व के किसी राजा के नाम का उल्लेख भी नहीं है। बाइबिल में लिखा है कि उनके जन्म के समय मगध के २ ज्योतिषी गये थे जिन्होंने ईसा के महापुरुष होने की भविष्यवाणी की थी। सीजर के राज्य में भी विक्रमादित्य के ज्योतिषियों की बात प्रामाणिक मानी गयी।

शुक्रवार, 4 नवंबर 2011

सत्ता के हस्तांतरण की संधि ( Transfer of Power Agreement )

writer --anand g sharma

आपने देखा होगा कि राजीव भाई बराबर सत्ता के हस्तांतरण के संधि के बारे में बाट करते थे और आप बार बार सोचते होंगे कि आखिर ये क्या है ? मैंने उनके अलग अलग व्याख्यानों में से इन सब को जोड़ के आप लोगों के लिए लाया हूँ उम्मीद है कि आपको पसंद आएगी | पढ़िए सत्ता के हस्तांतरण की संधि ( Transfer of Power Agreement ) यानि भारत के आज़ादी की संधि | ये इतनी खतरनाक संधि है की अगर आप अंग्रेजों द्वारा सन 1615 से लेकर 1857 तक किये गए सभी 565 संधियों या कहें साजिस को जोड़ देंगे तो उस से भी ज्यादा खतरनाक संधि है ये | 14 अगस्त 1947 की रात को जो कुछ हुआ है वो आजादी नहीं आई बल्कि ट्रान्सफर ऑफ़ पॉवर का एग्रीमेंट हुआ था पंडित नेहरु और लोर्ड माउन्ट बेटन के बीच में | Transfer of Power और Independence ये दो अलग चीजे है | स्वतंत्रता और सत्ता का हस्तांतरण ये दो अलग चीजे है | और सत्ता का हस्तांतरण कैसे होता है ? आप देखते होंगे क़ि एक पार्टी की सरकार है, वो चुनाव में हार जाये, दूसरी पार्टी की सरकार आती है तो दूसरी पार्टी का प्रधानमन्त्री जब शपथ ग्रहण करता है, तो वो शपथ ग्रहण करने के तुरंत बाद एक रजिस्टर पर हस्ताक्षर करता है, आप लोगों में से बहुतों ने देखा होगा, तो जिस रजिस्टर पर आने वाला प्रधानमन्त्री हस्ताक्षर करता है, उसी रजिस्टर को ट्रान्सफर ऑफ़ पॉवर की बुक कहते है और उस पर हस्ताक्षर के बाद पुराना प्रधानमन्त्री नए प्रधानमन्त्री को सत्ता सौंप देता है | और पुराना प्रधानमंत्री निकल कर बाहर चला जाता है | यही नाटक हुआ था 14 अगस्त 1947 की रात को 12 बजे | लार्ड माउन्ट बेटन ने अपनी सत्ता पंडित नेहरु के हाथ में सौंपी थी, और हमने कह दिया कि स्वराज्य आ गया | कैसा स्वराज्य और काहे का स्वराज्य ? अंग्रेजो के लिए स्वराज्य का मतलब क्या था ? और हमारे लिए स्वराज्य का मतलब क्या था ? ये भी समझ लीजिये | अंग्रेज कहते थे क़ि हमने स्वराज्य दिया, माने अंग्रेजों ने अपना राज तुमको सौंपा है ताकि तुम लोग कुछ दिन इसे चला लो जब जरुरत पड़ेगी तो हम दुबारा आ जायेंगे | ये अंग्रेजो का interpretation (व्याख्या) था | और हिन्दुस्तानी लोगों की व्याख्या क्या थी कि हमने स्वराज्य ले लिया | और इस संधि के अनुसार ही भारत के दो टुकड़े किये गए और भारत और पाकिस्तान नामक दो Dominion States बनाये गए हैं | ये Dominion State का अर्थ हिंदी में होता है एक बड़े राज्य के अधीन एक छोटा राज्य, ये शाब्दिक अर्थ है और भारत के सन्दर्भ में इसका असल अर्थ भी यही है | अंग्रेजी में इसका एक अर्थ है "One of the self-governing nations in the British Commonwealth" और दूसरा "Dominance or power through legal authority "| Dominion State और Independent Nation में जमीन आसमान का अंतर होता है | मतलब सीधा है क़ि हम (भारत और पाकिस्तान) आज भी अंग्रेजों के अधीन/मातहत ही हैं | दुःख तो ये होता है की उस समय के सत्ता के लालची लोगों ने बिना सोचे समझे या आप कह सकते हैं क़ि पुरे होशो हवास में इस संधि को मान लिया या कहें जानबूझ कर ये सब स्वीकार कर लिया | और ये जो तथाकथित आज़ादी आयी, इसका कानून अंग्रेजों के संसद में बनाया गया और इसका नाम रखा गया Indian Independence Act यानि भारत के स्वतंत्रता का कानून | और ऐसे धोखाधड़ी से अगर इस देश की आजादी आई हो तो वो आजादी, आजादी है कहाँ ? और इसीलिए गाँधी जी (महात्मा गाँधी) 14 अगस्त 1947 की रात को दिल्ली में नहीं आये थे | वो नोआखाली में थे | और कोंग्रेस के बड़े नेता गाँधी जी को बुलाने के लिए गए थे कि बापू चलिए आप | गाँधी जी ने मना कर दिया था | क्यों ? गाँधी जी कहते थे कि मै मानता नहीं कि कोई आजादी आ रही है | और गाँधी जी ने स्पस्ट कह दिया था कि ये आजादी नहीं आ रही है सत्ता के हस्तांतरण का समझौता हो रहा है | और गाँधी जी ने नोआखाली से प्रेस विज्ञप्ति जारी की थी | उस प्रेस स्टेटमेंट के पहले ही वाक्य में गाँधी जी ने ये कहा कि मै हिन्दुस्तान के उन करोडो लोगों को ये सन्देश देना चाहता हु कि ये जो तथाकथित आजादी (So Called Freedom) आ रही है ये मै नहीं लाया | ये सत्ता के लालची लोग सत्ता के हस्तांतरण के चक्कर में फंस कर लाये है | मै मानता नहीं कि इस देश में कोई आजादी आई है | और 14 अगस्त 1947 की रात को गाँधी जी दिल्ली में नहीं थे नोआखाली में थे | माने भारत की राजनीति का सबसे बड़ा पुरोधा जिसने हिन्दुस्तान की आज़ादी की लड़ाई की नीव रखी हो वो आदमी 14 अगस्त 1947 की रात को दिल्ली में मौजूद नहीं था | क्यों ? इसका अर्थ है कि गाँधी जी इससे सहमत नहीं थे | (नोआखाली के दंगे तो एक बहाना था असल बात तो ये सत्ता का हस्तांतरण ही था) और 14 अगस्त 1947 की रात को जो कुछ हुआ है वो आजादी नहीं आई .... ट्रान्सफर ऑफ़ पॉवर का एग्रीमेंट लागू हुआ था पंडित नेहरु और अंग्रेजी सरकार के बीच में | अब शर्तों की बात करता हूँ , सब का जिक्र करना तो संभव नहीं है लेकिन कुछ महत्वपूर्ण शर्तों की जिक्र जरूर करूंगा जिसे एक आम भारतीय जानता है और उनसे परिचित है ...............

इस संधि की शर्तों के मुताबिक हम आज भी अंग्रेजों के अधीन/मातहत ही हैं | वो एक शब्द आप सब सुनते हैं न Commonwealth Nations | अभी कुछ दिन पहले दिल्ली में Commonwealth Game हुए थे आप सब को याद होगा ही और उसी में बहुत बड़ा घोटाला भी हुआ है | ये Commonwealth का मतलब होता है समान सम्पति | किसकी समान सम्पति ? ब्रिटेन की रानी की समान सम्पति | आप जानते हैं ब्रिटेन की महारानी हमारे भारत की भी महारानी है और वो आज भी भारत की नागरिक है और हमारे जैसे 71 देशों की महारानी है वो | Commonwealth में 71 देश है और इन सभी 71 देशों में जाने के लिए ब्रिटेन की महारानी को वीजा की जरूरत नहीं होती है क्योंकि वो अपने ही देश में जा रही है लेकिन भारत के प्रधानमंत्री और राष्ट्रपति को ब्रिटेन में जाने के लिए वीजा की जरूरत होती है क्योंकि वो दुसरे देश में जा रहे हैं | मतलब इसका निकाले तो ये हुआ कि या तो ब्रिटेन की महारानी भारत की नागरिक है या फिर भारत आज भी ब्रिटेन का उपनिवेश है इसलिए ब्रिटेन की रानी को पासपोर्ट और वीजा की जरूरत नहीं होती है अगर दोनों बाते सही है तो 15 अगस्त 1947 को हमारी आज़ादी की बात कही जाती है वो झूठ है | और Commonwealth Nations में हमारी एंट्री जो है वो एक Dominion State के रूप में है न क़ि Independent Nation के रूप में| इस देश में प्रोटोकोल है क़ि जब भी नए राष्ट्रपति बनेंगे तो 21 तोपों की सलामी दी जाएगी उसके अलावा किसी को भी नहीं | लेकिन ब्रिटेन की महारानी आती है तो उनको भी 21 तोपों की सलामी दी जाती है, इसका क्या मतलब है? और पिछली बार ब्रिटेन की महारानी यहाँ आयी थी तो एक निमंत्रण पत्र छपा था और उस निमंत्रण पत्र में ऊपर जो नाम था वो ब्रिटेन की महारानी का था और उसके नीचे भारत के राष्ट्रपति का नाम था मतलब हमारे देश का राष्ट्रपति देश का प्रथम नागरिक नहीं है | ये है राजनितिक गुलामी, हम कैसे माने क़ि हम एक स्वतंत्र देश में रह रहे हैं | एक शब्द आप सुनते होंगे High Commission ये अंग्रेजों का एक गुलाम देश दुसरे गुलाम देश के यहाँ खोलता है लेकिन इसे Embassy नहीं कहा जाता | एक मानसिक गुलामी का उदहारण भी देखिये ....... हमारे यहाँ के अख़बारों में आप देखते होंगे क़ि कैसे शब्द प्रयोग होते हैं - (ब्रिटेन की महारानी नहीं) महारानी एलिज़ाबेथ, (ब्रिटेन के प्रिन्स चार्ल्स नहीं) प्रिन्स चार्ल्स , (ब्रिटेन की प्रिंसेस नहीं) प्रिंसेस डैना (अब तो वो हैं नहीं), अब तो एक और प्रिन्स विलियम भी आ गए है |
भारत का नाम INDIA रहेगा और सारी दुनिया में भारत का नाम इंडिया प्रचारित किया जायेगा और सारे सरकारी दस्तावेजों में इसे इंडिया के ही नाम से संबोधित किया जायेगा | हमारे और आपके लिए ये भारत है लेकिन दस्तावेजों में ये इंडिया है | संविधान के प्रस्तावना में ये लिखा गया है "India that is Bharat " जब क़ि होना ये चाहिए था "Bharat that was India " लेकिन दुर्भाग्य इस देश का क़ि ये भारत के जगह इंडिया हो गया | ये इसी संधि के शर्तों में से एक है | अब हम भारत के लोग जो इंडिया कहते हैं वो कहीं से भी भारत नहीं है | कुछ दिन पहले मैं एक लेख पढ़ रहा था अब किसका था याद नहीं आ रहा है उसमे उस व्यक्ति ने बताया था कि इंडिया का नाम बदल के भारत कर दिया जाये तो इस देश में आश्चर्यजनक बदलाव आ जायेगा और ये विश्व की बड़ी शक्ति बन जायेगा अब उस शख्स के बात में कितनी सच्चाई है मैं नहीं जानता, लेकिन भारत जब तक भारत था तब तक तो दुनिया में सबसे आगे था और ये जब से इंडिया हुआ है तब से पीछे, पीछे और पीछे ही होता जा रहा है |

भारत के संसद में वन्दे मातरम नहीं गया जायेगा अगले 50 वर्षों तक यानि 1997 तक | 1997 में पूर्व प्रधानमंत्री चंद्रशेखर ने इस मुद्दे को संसद में उठाया तब जाकर पहली बार इस तथाकथित आजाद देश की संसद में वन्देमातरम गाया गया | 50 वर्षों तक नहीं गाया गया क्योंकि ये भी इसी संधि की शर्तों में से एक है | और वन्देमातरम को ले के मुसलमानों में जो भ्रम फैलाया गया वो अंग्रेजों के दिशानिर्देश पर ही हुआ था | इस गीत में कुछ भी ऐसा आपत्तिजनक नहीं है जो मुसलमानों के दिल को ठेस पहुचाये | आपत्तिजनक तो जन,गन,मन में है जिसमे एक शख्स को भारत भाग्यविधाता यानि भारत के हर व्यक्ति का भगवान बताया गया है या कहें भगवान से भी बढ़कर |

इस संधि की शर्तों के अनुसार सुभाष चन्द्र बोस को जिन्दा या मुर्दा अंग्रेजों के हवाले करना था | यही वजह रही क़ि सुभाष चन्द्र बोस अपने देश के लिए लापता रहे और कहाँ मर खप गए ये आज तक किसी को मालूम नहीं है | समय समय पर कई अफवाहें फैली लेकिन सुभाष चन्द्र बोस का पता नहीं लगा और न ही किसी ने उनको ढूँढने में रूचि दिखाई | मतलब भारत का एक महान स्वतंत्रता सेनानी अपने ही देश के लिए बेगाना हो गया | सुभाष चन्द्र बोस ने आजाद हिंद फौज बनाई थी ये तो आप सब लोगों को मालूम होगा ही लेकिन महत्वपूर्ण बात ये है क़ि ये 1942 में बनाया गया था और उसी समय द्वितीय विश्वयुद्ध चल रहा था और सुभाष चन्द्र बोस ने इस काम में जर्मन और जापानी लोगों से मदद ली थी जो कि अंग्रेजो के दुश्मन थे और इस आजाद हिंद फौज ने अंग्रेजों को सबसे ज्यादा नुकसान पहुँचाया था | और जर्मनी के हिटलर और इंग्लैंड के एटली और चर्चिल के व्यक्तिगत विवादों की वजह से ये द्वितीय विश्वयुद्ध हुआ था और दोनों देश एक दुसरे के कट्टर दुश्मन थे | एक दुश्मन देश की मदद से सुभाष चन्द्र बोस ने अंग्रेजों के नाकों चने चबवा दिए थे | एक तो अंग्रेज उधर विश्वयुद्ध में लगे थे दूसरी तरफ उन्हें भारत में भी सुभाष चन्द्र बोस की वजह से परेशानियों का सामना करना पड़ रहा था | इसलिए वे सुभाष चन्द्र बोस के दुश्मन थे |

इस संधि की शर्तों के अनुसार भगत सिंह, चंद्रशेखर आजाद, अशफाकुल्लाह, रामप्रसाद विस्मिल जैसे लोग आतंकवादी थे और यही हमारे syllabus में पढाया जाता था बहुत दिनों तक | और अभी एक महीने पहले तक ICSE बोर्ड के किताबों में भगत सिंह को आतंकवादी ही बताया जा रहा था, वो तो भला हो कुछ लोगों का जिन्होंने अदालत में एक केस किया और अदालत ने इसे हटाने का आदेश दिया है (ये समाचार मैंने इन्टरनेट पर ही अभी कुछ दिन पहले देखा था) |

आप भारत के सभी बड़े रेलवे स्टेशन पर एक किताब की दुकान देखते होंगे "व्हीलर बुक स्टोर" वो इसी संधि की शर्तों के अनुसार है | ये व्हीलर कौन था ? ये व्हीलर सबसे बड़ा अत्याचारी था | इसने इस देश क़ि हजारों माँ, बहन और बेटियों के साथ बलात्कार किया था | इसने किसानों पर सबसे ज्यादा गोलियां चलवाई थी | 1857 की क्रांति के बाद कानपुर के नजदीक बिठुर में व्हीलर और नील नामक दो अंग्रजों ने यहाँ के सभी 24 हजार लोगों को जान से मरवा दिया था चाहे वो गोदी का बच्चा हो या मरणासन्न हालत में पड़ा कोई बुड्ढा | इस व्हीलर के नाम से इंग्लैंड में एक एजेंसी शुरू हुई थी और वही भारत में आ गयी | भारत आजाद हुआ तो ये ख़त्म होना चाहिए था, नहीं तो कम से कम नाम भी बदल देते | लेकिन वो नहीं बदला गया क्योंकि ये इस संधि में है |
इस संधि की शर्तों के अनुसार अंग्रेज देश छोड़ के चले जायेगे लेकिन इस देश में कोई भी कानून चाहे वो किसी क्षेत्र में हो नहीं बदला जायेगा | इसलिए आज भी इस देश में 34735 कानून वैसे के वैसे चल रहे हैं जैसे अंग्रेजों के समय चलता था | Indian Police Act, Indian Civil Services Act (अब इसका नाम है Indian Civil Administrative Act), Indian Penal Code (Ireland में भी IPC चलता है और Ireland में जहाँ "I" का मतलब Irish है वही भारत के IPC में "I" का मतलब Indian है बाकि सब के सब कंटेंट एक ही है, कौमा और फुल स्टॉप का भी अंतर नहीं है) Indian Citizenship Act, Indian Advocates Act, Indian Education Act, Land Acquisition Act, Criminal Procedure Act, Indian Evidence Act, Indian Income Tax Act, Indian Forest Act, Indian Agricultural Price Commission Act सब के सब आज भी वैसे ही चल रहे हैं बिना फुल स्टॉप और कौमा बदले हुए |
इस संधि के अनुसार अंग्रेजों द्वारा बनाये गए भवन जैसे के तैसे रखे जायेंगे | शहर का नाम, सड़क का नाम सब के सब वैसे ही रखे जायेंगे | आज देश का संसद भवन, सुप्रीम कोर्ट, हाई कोर्ट, राष्ट्रपति भवन कितने नाम गिनाऊँ सब के सब वैसे ही खड़े हैं और हमें मुंह चिढ़ा रहे हैं | लार्ड डलहौजी के नाम पर डलहौजी शहर है , वास्को डी गामा नामक शहर है (हाला क़ि वो पुर्तगाली था ) रिपन रोड, कर्जन रोड, मेयो रोड, बेंटिक रोड, (पटना में) फ्रेजर रोड, बेली रोड, ऐसे हजारों भवन और रोड हैं, सब के सब वैसे के वैसे ही हैं | आप भी अपने शहर में देखिएगा वहां भी कोई न कोई भवन, सड़क उन लोगों के नाम से होंगे | हमारे गुजरात में एक शहर है सूरत, इस सूरत शहर में एक बिल्डिंग है उसका नाम है कूपर विला | अंग्रेजों को जब जहाँगीर ने व्यापार का लाइसेंस दिया था तो सबसे पहले वो सूरत में आये थे और सूरत में उन्होंने इस बिल्डिंग का निर्माण किया था | ये गुलामी का पहला अध्याय आज तक सूरत शहर में खड़ा है |

हमारे यहाँ शिक्षा व्यवस्था अंग्रेजों की है क्योंकि ये इस संधि में लिखा है और मजे क़ि बात ये है क़ि अंग्रेजों ने हमारे यहाँ एक शिक्षा व्यवस्था दी और अपने यहाँ अलग किस्म क़ि शिक्षा व्यवस्था रखी है | हमारे यहाँ शिक्षा में डिग्री का महत्व है और उनके यहाँ ठीक उल्टा है | मेरे पास ज्ञान है और मैं कोई अविष्कार करता हूँ तो भारत में पूछा जायेगा क़ि तुम्हारे पास कौन सी डिग्री है ? अगर नहीं है तो मेरे अविष्कार और ज्ञान का कोई मतलब नहीं है | जबकि उनके यहाँ ऐसा बिलकुल नहीं है आप अगर कोई अविष्कार करते हैं और आपके पास ज्ञान है लेकिन कोई डिग्री नहीं हैं तो कोई बात नहीं आपको प्रोत्साहित किया जायेगा | नोबेल पुरस्कार पाने के लिए आपको डिग्री की जरूरत नहीं होती है | हमारे शिक्षा तंत्र को अंग्रेजों ने डिग्री में बांध दिया था जो आज भी वैसे के वैसा ही चल रहा है | ये जो 30 नंबर का पास मार्क्स आप देखते हैं वो उसी शिक्षा व्यवस्था क़ि देन है, मतलब ये है क़ि आप भले ही 70 नंबर में फेल है लेकिन 30 नंबर लाये है तो पास हैं, ऐसा शिक्षा तंत्र से सिर्फ गदहे ही पैदा हो सकते हैं और यही अंग्रेज चाहते थे | आप देखते होंगे क़ि हमारे देश में एक विषय चलता है जिसका नाम है Anthropology | जानते है इसमें क्या पढाया जाता है ? इसमें गुलाम लोगों क़ि मानसिक अवस्था के बारे में पढाया जाता है | और ये अंग्रेजों ने ही इस देश में शुरू किया था और आज आज़ादी के 64 साल बाद भी ये इस देश के विश्वविद्यालयों में पढाया जाता है और यहाँ तक क़ि सिविल सर्विस की परीक्षा में भी ये चलता है |

इस संधि की शर्तों के हिसाब से हमारे देश में आयुर्वेद को कोई सहयोग नहीं दिया जायेगा मतलब हमारे देश की विद्या हमारे ही देश में ख़त्म हो जाये ये साजिस की गयी | आयुर्वेद को अंग्रेजों ने नष्ट करने का भरसक प्रयास किया था लेकिन ऐसा कर नहीं पाए | दुनिया में जितने भी पैथी हैं उनमे ये होता है क़ि पहले आप बीमार हों तो आपका इलाज होगा लेकिन आयुर्वेद एक ऐसी विद्या है जिसमे कहा जाता है क़ि आप बीमार ही मत पड़िए | आपको मैं एक सच्ची घटना बताता हूँ -जोर्ज वाशिंगटन जो क़ि अमेरिका का पहला राष्ट्रपति था वो दिसम्बर 1799 में बीमार पड़ा और जब उसका बुखार ठीक नहीं हो रहा था तो उसके डाक्टरों ने कहा क़ि इनके शरीर का खून गन्दा हो गया है जब इसको निकाला जायेगा तो ये बुखार ठीक होगा और उसके दोनों हाथों क़ि नसें डाक्टरों ने काट दी और खून निकल जाने की वजह से जोर्ज वाशिंगटन मर गया | ये घटना 1799 की है और 1780 में एक अंग्रेज भारत आया था और यहाँ से प्लास्टिक सर्जरी सीख के गया था | मतलब कहने का ये है क़ि हमारे देश का चिकित्सा विज्ञान कितना विकसित था उस समय | और ये सब आयुर्वेद की वजह से था और उसी आयुर्वेद को आज हमारे सरकार ने हाशिये पर पंहुचा दिया है |

इस संधि के हिसाब से हमारे देश में गुरुकुल संस्कृति को कोई प्रोत्साहन नहीं दिया जायेगा | हमारे देश के समृद्धि और यहाँ मौजूद उच्च तकनीक की वजह ये गुरुकुल ही थे | और अंग्रेजों ने सबसे पहले इस देश की गुरुकुल परंपरा को ही तोडा था, मैं यहाँ लार्ड मेकॉले की एक उक्ति को यहाँ बताना चाहूँगा जो उसने 2 फ़रवरी 1835 को ब्रिटिश संसद में दिया था, उसने कहा था "“I have traveled across the length and breadth of India and have not seen one person who is a beggar, who is a thief, such wealth I have seen in this country, such high moral values, people of such caliber, that I do not think we would ever conquer this country, unless we break the very backbone of this nation, which is her spiritual and cultural heritage, and, therefore, I propose that we replace her old and ancient education system, her culture, for if the Indians think that all that is foreign and English is good and greater than their own, they will lose their self esteem, their native culture and they will become what we want them, a truly dominated nation” | गुरुकुल का मतलब हम लोग केवल वेद, पुराण,उपनिषद ही समझते हैं जो की हमारी मुर्खता है अगर आज की भाषा में कहूं तो ये गुरुकुल जो होते थे वो सब के सब Higher Learning Institute हुआ करते थे |
इस संधि में एक और खास बात है | इसमें कहा गया है क़ि अगर हमारे देश के (भारत के) अदालत में कोई ऐसा मुक़दमा आ जाये जिसके फैसले के लिए कोई कानून न हो इस देश में या उसके फैसले को लेकर संबिधान में भी कोई जानकारी न हो तो साफ़ साफ़ संधि में लिखा गया है क़ि वो सारे मुकदमों का फैसला अंग्रेजों के न्याय पद्धति के आदर्शों के आधार पर ही होगा, भारतीय न्याय पद्धति का आदर्श उसमे लागू नहीं होगा | कितनी शर्मनाक स्थिति है ये क़ि हमें अभी भी अंग्रेजों का ही अनुसरण करना होगा |
भारत में आज़ादी की लड़ाई हुई तो वो ईस्ट इंडिया कम्पनी के खिलाफ था और संधि के हिसाब से ईस्ट इंडिया कम्पनी को भारत छोड़ के जाना था और वो चली भी गयी लेकिन इस संधि में ये भी है क़ि ईस्ट इंडिया कम्पनी तो जाएगी भारत से लेकिन बाकि 126 विदेशी कंपनियां भारत में रहेंगी और भारत सरकार उनको पूरा संरक्षण देगी | और उसी का नतीजा है क़ि ब्रुक बोंड, लिप्टन, बाटा, हिंदुस्तान लीवर (अब हिंदुस्तान यूनिलीवर) जैसी 126 कंपनियां आज़ादी के बाद इस देश में बची रह गयी और लुटती रही और आज भी वो सिलसिला जारी है |
अंग्रेजी का स्थान अंग्रेजों के जाने के बाद वैसे ही रहेगा भारत में जैसा क़ि अभी (1946 में) है और ये भी इसी संधि का हिस्सा है | आप देखिये क़ि हमारे देश में, संसद में, न्यायपालिका में, कार्यालयों में हर कहीं अंग्रेजी, अंग्रेजी और अंग्रेजी है जब क़ि इस देश में 99% लोगों को अंग्रेजी नहीं आती है | और उन 1% लोगों क़ि हालत देखिये क़ि उन्हें मालूम ही नहीं रहता है क़ि उनको पढना क्या है और UNO में जा के भारत के जगह पुर्तगाल का भाषण पढ़ जाते हैं |
आप में से बहुत लोगों को याद होगा क़ि हमारे देश में आजादी के 50 साल बाद तक संसद में वार्षिक बजट शाम को 5:00 बजे पेश किया जाता था | जानते है क्यों ? क्योंकि जब हमारे देश में शाम के 5:00 बजते हैं तो लन्दन में सुबह के 11:30 बजते हैं और अंग्रेज अपनी सुविधा से उनको सुन सके और उस बजट की समीक्षा कर सके | इतनी गुलामी में रहा है ये देश | ये भी इसी संधि का हिस्सा है |
1939 में द्वितीय विश्व युद्ध शुरू हुआ तो अंग्रेजों ने भारत में राशन कार्ड का सिस्टम शुरू किया क्योंकि द्वितीय विश्वयुद्ध में अंग्रेजों को अनाज क़ि जरूरत थी और वे ये अनाज भारत से चाहते थे | इसीलिए उन्होंने यहाँ जनवितरण प्रणाली और राशन कार्ड क़ि शुरुआत क़ि | वो प्रणाली आज भी लागू है इस देश में क्योंकि वो इस संधि में है | और इस राशन कार्ड को पहचान पत्र के रूप में इस्तेमाल उसी समय शुरू किया गया और वो आज भी जारी है | जिनके पास राशन कार्ड होता था उन्हें ही वोट देने का अधिकार होता था | आज भी देखिये राशन कार्ड ही मुख्य पहचान पत्र है इस देश में |

अंग्रेजों के आने के पहले इस देश में गायों को काटने का कोई कत्लखाना नहीं था | मुगलों के समय तो ये कानून था क़ि कोई अगर गाय को काट दे तो उसका हाथ काट दिया जाता था | अंग्रेज यहाँ आये तो उन्होंने पहली बार कलकत्ता में गाय काटने का कत्लखाना शुरू किया, पहला शराबखाना शुरू किया, पहला वेश्यालय शुरू किया और इस देश में जहाँ जहाँ अंग्रेजों की छावनी हुआ करती थी वहां वहां वेश्याघर बनाये गए, वहां वहां शराबखाना खुला, वहां वहां गाय के काटने के लिए कत्लखाना खुला | ऐसे पुरे देश में 355 छावनियां थी उन अंग्रेजों के | अब ये सब क्यों बनाये गए थे ये आप सब आसानी से समझ सकते हैं | अंग्रेजों के जाने के बाद ये सब ख़त्म हो जाना चाहिए था लेकिन नहीं हुआ क्योंक़ि ये भी इसी संधि में है |
हमारे देश में जो संसदीय लोकतंत्र है वो दरअसल अंग्रेजों का वेस्टमिन्स्टर सिस्टम है | ये अंग्रेजो के इंग्लैंड क़ि संसदीय प्रणाली है | ये कहीं से भी न संसदीय है और न ही लोकतान्त्रिक है| लेकिन इस देश में वही सिस्टम है क्योंकि वो इस संधि में कहा गया है | और इसी वेस्टमिन्स्टर सिस्टम को महात्मा गाँधी बाँझ और वेश्या कहते थे (मतलब आप समझ गए होंगे) |

ऐसी हजारों शर्तें हैं | मैंने अभी जितना जरूरी समझा उतना लिखा है | मतलब यही है क़ि इस देश में जो कुछ भी अभी चल रहा है वो सब अंग्रेजों का है हमारा कुछ नहीं है | अब आप के मन में ये सवाल हो रहा होगा क़ि पहले के राजाओं को तो अंग्रेजी नहीं आती थी तो वो खतरनाक संधियों (साजिस) के जाल में फँस कर अपना राज्य गवां बैठे लेकिन आज़ादी के समय वाले नेताओं को तो अच्छी अंग्रेजी आती थी फिर वो कैसे इन संधियों के जाल में फँस गए | इसका कारण थोडा भिन्न है क्योंकि आज़ादी के समय वाले नेता अंग्रेजों को अपना आदर्श मानते थे इसलिए उन्होंने जानबूझ कर ये संधि क़ि थी | वो मानते थे क़ि अंग्रेजों से बढियां कोई नहीं है इस दुनिया में | भारत की आज़ादी के समय के नेताओं के भाषण आप पढेंगे तो आप पाएंगे क़ि वो केवल देखने में ही भारतीय थे लेकिन मन,कर्म और वचन से अंग्रेज ही थे | वे कहते थे क़ि सारा आदर्श है तो अंग्रेजों में, आदर्श शिक्षा व्यवस्था है तो अंग्रेजों की, आदर्श अर्थव्यवस्था है तो अंग्रेजों की, आदर्श चिकित्सा व्यवस्था है तो अंग्रेजों की, आदर्श कृषि व्यवस्था है तो अंग्रेजों की, आदर्श न्याय व्यवस्था है तो अंग्रेजों की, आदर्श कानून व्यवस्था है तो अंग्रेजों की | हमारे आज़ादी के समय के नेताओं को अंग्रेजों से बड़ा आदर्श कोई दिखता नहीं था और वे ताल ठोक ठोक कर कहते थे क़ि हमें भारत अंग्रेजों जैसा बनाना है | अंग्रेज हमें जिस रस्ते पर चलाएंगे उसी रास्ते पर हम चलेंगे | इसीलिए वे ऐसी मूर्खतापूर्ण संधियों में फंसे | अगर आप अभी तक उन्हें देशभक्त मान रहे थे तो ये भ्रम दिल से निकाल दीजिये | और आप अगर समझ रहे हैं क़ि वो ABC पार्टी के नेता ख़राब थे या हैं तो XYZ पार्टी के नेता भी दूध के धुले नहीं हैं | आप किसी को भी अच्छा मत समझिएगा क्योंक़ि आज़ादी के बाद के इन 64 सालों में सब ने चाहे वो राष्ट्रीय पार्टी हो या प्रादेशिक पार्टी, प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से राष्ट्रीय स्तर पर सत्ता का स्वाद तो सबो ने चखा ही है | खैर ...............

तो भारत क़ि गुलामी जो अंग्रेजों के ज़माने में थी, अंग्रेजों के जाने के 64 साल बाद आज 2011 में जस क़ि तस है क्योंकि हमने संधि कर रखी है और देश को इन खतरनाक संधियों के मकडजाल में फंसा रखा है | बहुत दुःख होता है अपने देश के बारे जानकार और सोच कर | मैं ये सब कोई ख़ुशी से नहीं लिखता हूँ ये मेरे दिल का दर्द होता है जो मैं आप लोगों से शेयर करता हूँ |

ये सब बदलना जरूरी है लेकिन हमें सरकार नहीं व्यवस्था बदलनी होगी और आप अगर सोच रहे हैं क़ि कोई मसीहा आएगा और सब बदल देगा तो आप ग़लतफ़हमी में जी रहे हैं | कोई हनुमान जी, कोई राम जी, या कोई कृष्ण जी नहीं आने वाले | आपको और हमको ही ये सारे अवतार में आना होगा, हमें ही सड़कों पर उतरना होगा और और इस व्यवस्था को जड मूल से समाप्त करना होगा | भगवान भी उसी की मदद करते हैं जो अपनी मदद स्वयं करता है |

इतने लम्बे पत्र को आपने धैर्यपूर्वक पढ़ा इसके लिए आपका धन्यवाद् | और अच्छा लगा हो तो इसे फॉरवर्ड कीजिये, आप अगर और भारतीय भाषाएँ जानते हों तो इसे उस भाषा में अनुवादित कीजिये (अंग्रेजी छोड़ कर), अपने अपने ब्लॉग पर डालिए, मेरा नाम हटाइए अपना नाम डालिए मुझे कोई आपत्ति नहीं है | मतलब बस इतना ही है की ज्ञान का प्रवाह होते रहने दीजिये |
(anand g sharma )

मंगलवार, 1 नवंबर 2011

मोतीलाल (वेश्यालय मालिक) व नेहरू(nehru) का जन्म वेश्यालय में हुआ था.


मोतीलाल (वेश्यालय मालिक) व नेहरू का जन्म वेश्यालय में हुआ था.
मोतीलाल ( भारत के प्रथम प्रधान मंत्री का पिता ) अधिक पढ़ा लिखा व्यक्ति नहीं था. कम उम्र में विवाह के बाद जीविका की खोज में वह इलाहबाद आ गया था. हमें यह पता नहीं की निश्चित रूप से वह इलाहबाद में कहाँ आकर बसा होगा ,किन्तु हम विश्वास नहीं कर सकते की उसके बसने का स्थान मीरगंज रहा होगा ,जहाँ तुर्क व मुग़ल अपहृत हिन्दू महिलाओं को अपने मनोरंजन के लिए रखते थे. हम एसा इस लिए कह रहे हैं की अब हम अच्छी तरह जान चुके हैं की मोतीलाल अपनी दूसरी पत्नी के साथ मीरगंज में वेश्याओं के इलाके में रहा था. पहली पत्नी एक पुत्र के होने के बाद मर गयी थी. कुछ दिन पश्चात उसका पुत्र भी मर गया .जिसके बाद वह कश्मीर लोट गया. जहाँ पर एक बार फिर तीसरा विवाह किया. और तीसरी पत्नी के साथ फिर से इलाहबाद लोट आया. उसने जीविका चलने के लिए वेश्यालय चलने का निश्चय किया. दिन के समय मोतीलाल कचहरी में मुख्तार का काम करता था.उसी उच्च न्यायलय में एक प्रसिद्द वकील मुबारक अली था जिसकी वकालत बहुत चलती थी. इशरत मंजिल के नाम से उसका एक मकान था.
कचहरी से मोतीलाल पैदल ही अपने घर लोटता था. मुबारक अली भी शाम को रंगीन बनाने के लिए मीरगंज आता रहता था. एक दिन मीरगंज में ही मोतीलाल मुबारक अली से मिला और अपनी नई पत्नी के साथ रात बिताने का निमंत्रण दिया. सोदा पट गया.और इस प्रकार मोतीलाल के सम्बन्ध मुबारक अली से बन गए. दोनों ने इटावा की विधवा रानी को उसका राज्य वापस दिलाने के लिए जमकर लूटा. उस समय लगभग १० लाख की फीस ली. और आधी आधी बाँट ली. यही से मोतीलाल की किस्मत का सितारा बदल गया.
इसी बीच मोतीलाल की बीबी गर्भवती हो गयी. मुबारक ने माना की बच्चा उसी की नाजायज ओलाद है.मोतीलाल ने मुबारक से भावी संतान के लिए इशरत महल में स्थान माँगा. किन्तु मुबारक ने मना कर दिया. किन्तु जच्चा-बच्चा का सारा खर्च वहन किया. अंत में भारत का भावी प्रधान मंत्री मीरगंज के वेश्यालय में पैदा हुआ. जैसे ही जवाहर पी एम् बना वैसे ही तुरंत उसने मीरगंज का वह मकान तुडवा दिया ,और अफवाह फैला दी की वह आनद भवन (इशरत महल)में पैदा हुआ था जबकि उस समय आनंद भवन था ही नहीं.
मुबारक का सम्बन्ध बड़े प्रभुत्वशाली मुसलमानों से था. अवध के नवाब को जब पता चला की मुबारक का एक पुत्र मीरगंज के वेश्यालय में पल रहा है तो उसने मुबारक से उसे इशरत महल लाने को कहा. और इस प्रकार नेहरू की परवरिश इशरत महल में हुई. और इसी बात को नेहरू गर्व से कहता था की उसकी शिक्षा विदेशों में हुई,इश्लाम के तोर तरीके से उसका विकास हुआ.और हिन्दू तो वह मात्र दुर्घटनावश ही था.
(पुस्तक -नेहरु खान वंश ,प्रकाशक-मानव रक्षा संघ )इसे नेट पर पढने के लिएwww.aryavrt.com साईट देखें.

शनिवार, 20 अगस्त 2011

रामदेव हमारे लिए एक खतरा : स्विस बेंक



स्विस बैंक एसोसिएशन और स्विस सरकार ने बताया है की स्विस बैंको में जमा धन में पन्द्रह लाख करोड डॉलर की भयंकर कमी आयी है .. और स्विस इकोनोमी को खतरा पैदा हो गया है .. वहा के सारे अखबारों और टीवी डिबेट में इसे "रामदेव इफेक्ट " कहा जा रहा है . स्विस बैंको में सबसे ज्यादा काला धन भारत से जमा होता है फिर चीन और रूस का नम्बर आता है .. बाबा रामदेव के अभियान से प्रभावित होकर चीन और रूस में भी काले धन के वापस लेन की जोरदार मुहीम चल रही है. चीन सरकार अरब देशो में हुई क्रांति से डरकर तुरंत ही एक कानून बना कर स्विस सरकार से सारा ब्योरा माँगा है और काले धन विदेश में जमा करने वालो को मृतुदंड देने की क़ानूनी बदलाव किया है, रूस में भी पिछले कई दिनों से लोग काले धन के खिलाफ लेनिन स्क्वायर पर प्रदर्शन कर रहे थे आखिरकार रुसी सरकार ने भी २ महीने में सारे काले धन को वापस लेन का देश की जनता को लिखित आश्वाशन दिया है .. रूस के सामाजिक कार्यकर्ता और रूस में काले धन के खिलाफ आन्दोलन चला रहे बदिमिर इलिनोइच ने बाबा रामदेव को प्रेरणाश्रोत मानकर अपना आन्दोलन चलाया ..

स्विटरज़रलैंड के लगभग सभी अखबारों जैसे स्विस टुडे, स्विस इलेस्ट्रेटेड, और टीवी चनेलो ने बाबा रामदेव को एक "खलनायक " के रूप में बता रहे है . इधर भारत में भी कांग्रेस पार्टी और सरकार उपरी मन से चाहे जो कुछ भी कहे लेकिन उसे भी अब जनता के जागरूक होने का डर सताने लगा है . कांग्रेस इस देश की टीवी चनेलो और अखबारों को तो खरीद सकती है लेकिन भारत में तेजी से उभर रही न्यू मीडिया [ वेब पोर्टल , फेसबुक , ट्विटर ] पर चाहकर भी वो प्रतिबन्ध नहीं लगा सकती .. एक सर्वे में पाया गया है की इन्टरनेट पर कांग्रेस के खिलाफ जोरदार अभियान चल रहा है और ये अभियान कोई पार्टी नहीं चला रही है बल्कि इस देश के जागरूक और शिछित युवा चला रहे है जिनका किसी भी राजनितिक पार्टी से कोई लेना देना नहीं है ..


शुक्रवार, 12 अगस्त 2011

कांग्रेस उवाच

























ऐरा-गैरा भ्रष्टन को,आई को विरोध यूं,
नाक के हमारो ही नीचे करवावेगा.

करि के घोटालन को, खरबों की दोलत जो ,
धरी है विदेशन मे,हमसौं छिनवावैगा.

राष्ट्र के दुलारों सुनो, जुर्रत ना करि कोई,
बाबा की नाईं नईं तै ,यूँ ही पछ्तावेगा

मर्जी हमारी हम तैं लूटते रहेंगे यूँ ही
देखहिं कोई पूँछ भी, उखार कैसो पावैगा .

गुरुवार, 11 अगस्त 2011

नामर्दों का देश है ,जल्दी जल्दी लूट. तुझको पूरी छुट है,सब इटली लेके फूट.


अगर देश में किसी एक नेता के दामाद को देश के सर्वोच्च ३१ वी आई पी में केवल इसलिए स्थान दिया जाये की वो इटेलियन मोम सोनिया गाँधी का दामाद है या फिर कहें की केन्द्रीय सरकार ने सोनिया के दामाद को सरकारी दामाद बना रखा है तो आपको कैसा लगेगा?
ज्यादा दिमाग पर जोर देने की आवश्यकता नहीं है है, आप ठीक सोच रहे हैं की यहाँ हम प्रियंका गाँधी के हम नजर,हमदम रॉबर्ट वढेरा की ही बात कर रहे हैं.
ये वाक्या है भारत के सभी एयरपोर्ट्स का,जहाँ पर उन पदों की सूचि लगी रहती है,जो कहीं भी जाएँ तो उनकी तलाशी व उनके सामान की तलाशी नहीं ली जा सकती. सर्वप्रथम आप उन पदों पर एक द्रष्टि डालिए............................
१ राष्ट्रपति व पुर्व राष्ट्रपति २ प्रधान मंत्री व पूर्व प्रधान मंत्री ३ उप राष्ट्रपति ४ उप प्रधान मंत्री ५............... ६...............
७ चीफ जस्टिस ऑफ़ इंडिया
८ लोक सभा स्पीकर
९ केबिनेट मंत्री
१० मुख्यमंत्री
११ उप मुख्या मंत्री
१२ डिप्टी चेयर मेन ऑफ़ प्लानिग्न कमीशन
१३ लोक सभा व राज्य सभा के विपक्ष नेता
१४ भारत रत्न १५ राजदूत १६ सुप्रीम कोर्ट के जज १७ इलेक्शन कमिशनर १८ कंट्रोलर व एडिटर जनरल १९ डिप्टी चेयर मेन राज्य सभा व डिप्टी स्पीकर
२० स्टेट मिनिस्टर (यूनियन कौंसिल) २१ एटमी जनरल २२ कैबिनेट सेकेट्री २३ एस पी गी प्रोतेक्ट्स २४ विजिटर फोर्नर सेम स्टेटस १ ...............९
२५ हाई कोर्ट के जज
२६ केंद्र शासित प्रदेश के मुख्य मंत्री
२७ केबिनेट सेकेट्री २८ दलाई लामा २९ ......................... ३० .........................................३१ रॉबर्ट वढेरा
एयर पोर्ट्स पर लगी ये सूचि भारत के वी आई पी पदों की है जहाँ पर कोई भी नाम नहीं है किन्तु तमाशा देखिये की लिस्ट में एक नाम ऐसा है जो न तो कोई वी आई पी है और न हीं भारत रतन हाँ अगर है तो कोंग्रेस का दामाद,एक तश्कर , एक अपराधी और एक देशद्रोही.
वढेरा एक बिजनेस मेन है,और उस पर हसन अली के साथ मिलकर कई बार तश्करी का आरोप लग चूका है.भारत में हो रहे घपलों में लगातार वढेरा का नाम आ रहा है. वढेरा का बिजनेस भारत व इटली में है. वह भारत से चोरी की मुर्तिया इटली भेजता है,यह आरोप भी उस पर लगातार लगते रहे हैं
किन्तु हाय भारत के लोकतंत्र, सोनिया मैडम का मल मूत्र तक चाटने वाले राजतंत्री कोंग्रेसियो ने वढेरा को सरकारी दामाद बनाकर उसकी तलाशी लेने का सारा मेटर ही समाप्त कर दिया और ये खुली छूट दे दी है की
नामर्दों का देश है ,जल्दी जल्दी लूट
तुझको पूरी छुट है,सब इटली लेके फूट.

देश लूट रहा है ये सरकारी दामाद_ROBERT VADRA इस लिंक को यु ट्यूब पर डालिए
www.youtube.com

शुक्रवार, 5 अगस्त 2011

घपलों के सरताज


कांग्रेस की मोंम सोनिया, उसका अमूल बेबी राहुल,उसकी लोमड़ी जैसी चालाक बेटी प्रियंका व घपलेबाज दामाद वढेरा ये सारे के सारे एक साथ अमेरिका में हैं. कारन है सोनिया का ओपरेशन ,अनोखा संयोग है कि इधर संसद में मानसून सत्र शुरू हुआ और उधर कांग्रेस के दो महानतम (??) नेता अमेरिका में हैं. बिलकुल ऐसा ही संयोग पिछले सत्र मे भी हुआ था जब कोंग्रेसी छुछंदर(सांसद होते हुए भी संसद सत्र के शुरू होते ही बिल में छुप जाता है) राहुल सत्र के शुरू होते ही लन्दन में ऐयाशी करने चला गया था. ये भी अनोखी बात है कि भांडों की तरह गला फाड़ फाड़ कर चिल्लाने वाला भारत का मिडिया इस मामले पर बिलकुल शांत रहता है. राहुल के मूत्र व शोच तक का रंग बताने वाले मिडिया को ये पता नहीं कि सोनिया का किस चीज का ओपरेशन है. और वह एक महीने सांसद सत्र के समय ही भारत से बहार क्यों गयी जबकि वह उस कांग्रेस की अध्यक्ष है जो संसद में लाखों करोडो अरबों व खरबों के घोटालों में घिरी है. स्पष्ट रूप से सोनिया के ओपरेशन में कोई राज जरूर है जो देश के लिए घातक ही सिद्ध होगा.आशा करता हूँ कि कोई न कोई इस राज का भंडा फोड़ अवश्य ही करेगा.

बुधवार, 3 अगस्त 2011

क्या लादेन हेडली कसाब जवाहिरी आतंकवादी हैं


१ - इस्लाम विगत १००० वर्षों से भारत व विश्व के लिए मुसीबत बन गया है विश्व के वे सभी देश जहां मुस्लिम रहते हैं इस्लाम से पीड़ित हैं । इस समस्या सेनिपटने के लिए हमें यह जानना होगा कि वास्तव में समस्या की जड़े कहां है व उनका समाधान किस प्रकार किया जा सकता है । इसी प्रकार इस लेख में हम यह जानने का प्रयास करेंगें कि इस समस्या को सुलझाने के लिए हिन्दुओं द्वारा अब तक क्या प्रयास किए गए है व उन प्रयासों का क्या प्रभाव हुआ है ।लेख को अधिक न बढ़ाते हुए सबसे पहले यह देखना होगा कि समस्या की जड़ कहां है । उसके लिए इस लेख को देखें ।
एक बात पर विचार करें । यदि एक एक बच्चे को बचपन से पढ़ाया जाता है कि अल्लाह व उसका पैगम्बर सबसे महान है । अल्लाह के अतिरिक्त किसी अन्य कोपूजना या अल्लाह के साथ किसी को पूजना दुनिया का सबसे बड़ा अपराध है । मौहम्मद पैगम्बर ने जो कुछ किया वो ठीक है उसमें कोई गलती नहीं हो सकती।मुसलमान अपने पूरे जीवन में वही कार्य करते हैं जो मौहम्मद ने कहा अथवा किया ।
अब आइए देखते हैं मौहम्मद पैगम्बर ने अपने जीवन में क्या क्या किया ।
1- मक्का पर विजय करते ही मौहम्मद पैगम्बर ने सबसे पहले काबे में घुसकर वहां पर मूर्तियों को तोड़ा ।
2- जो व्यक्ति अपनी पकड़ में आया उसे इस्लाम ग्रहण करने के लिए धमकाया ।
3- उसके बाद अपने आस पास के राज्यों के इस्लाम ग्रहण करने युद्ध करने अथवा जजिया देने तीनों में से एक को ग्रहण करने को कहा ।
यही सारा कार्य तो मुसलमान भारत में आज तक करते आए हैं ।
१- मुसलमानों ने हिन्दुओं के हजारों मंदिर इसी कारण तोड़े हैं ।
२- इसीलिए मुसलमान गैर मुसलमान को मुसलमान बनने के लिए विवश करते हैं ।
कश्मीर समस्या-
इसी प्रकार कश्मीर में क्या समस्या है इसे समझें । मुसलमानो ने भारत का बंटवारा 1947 मे करवाया ।कश्मीरी जनता भी दरअसल1947 में पाकिस्तान में अपने विलय का सपना देख रही थी । परतुं महाराजा हरिसिंह ने उनकी आशाओं के विपरीत भारत के साथ विलय पर हस्ताक्षर कर दिए । मुसलमानों का पाक स्थान ( पाकिस्तान ) में रहने का सपना समाप्त हो गया । अब मुसलमान सीधे तो भारतीय सेना से लड़ नहीं सकते थे । अतः उन्होंने कश्मीर को आजाद करने के लिए जिहाद का सहारा 1980 के दशक में लेना प्रारम्भ करदिया। कुरान में लिखा है कि सारी पृथ्वी अल्लाह की है । अब जब सारी पृथ्वी अल्लाह की है तो उसके जायज हकदार तो मुसलमान ही हुए । ( पैगम्बर मुहम्मद ने मदीना के बैतउल मिदरास में बैठे यहूदियों से कहाः ''ओ यहूदियों! सारी पृथ्वी अल्लाह और उसके 'रसूल' की है। यदि तुम इस्लाम स्वीकार कर लो तो तुम रक्षित रह सकोगे।'' मैं तुम्हें इस देश से निकालना चाहता हूँ। इसलिए यदि तुममें से किसी के पास सम्पत्ति है तो उसे इस सम्पत्ति को बेचने की आज्ञा दी जातीहै। वर्ना तुम्हें मालूम होना चाहिए कि सारी पृथ्वी अल्लाह और उसके रसूल की है''। (बुखारी, खंड ४:३९२, खंड ४:३९२, पृ. २५९-२६०, मिश्कत, खंड २:२१७, पृ.४४२)। ) अब मुसलमानों ने कश्मीर में अपनी भूमि छुड़वाने के लिए जिहाद शुरू कर दिया । उनके द्वारा फैलायी गयी हिसां के शिकार वहां के हिन्दू हुए जिन्हे अपना घरबार छोड़कर वहां से भागना पड़ा । इसी हिंसा का शिकार वहां के सुरक्षा बल के कर्मचारी भी हुए । इसी के कारण सेना के जवानों द्वारा वहां क्रोध वकामवासना का शिकार वहां की कुछ मुस्लिम बच्चे व महिलाएं हुई । जिन्हें उनकी प्रत्यक्ष गलती न होने के कारण भी बलात्कार या मृत्यु का शिकार होना पड़ा ( उनकी गलती केवल यह हो सकती है कि वे कुरान को सही मानती हैं इस बात को सही मानती है कि सारी पृथ्वी तो अल्लाह के रसूल की है तो उनसे मिलने वाले सभी मुसलमानों के मन में सुरक्षा बलों के प्रति अविश्वास की खाई और चौड़ी हो गयी । सुरक्षा बल की इन ज्यादतियों को देखते हुए मदरसे में पढ़ने वाले बच्चों को व मस्जिद में मुसलमानों को नफरत का पाठ पढ़ाया गया जिससे दोनों पक्षों की बीच की दीवारे इतनी चौड़ी हो गयी जिसे सुरक्षा बल द्वारा अपने किसी भी अभियान ( जैसे दवाइयां बांटने या कपड़े या मुसलमानों को किसी भी प्रकार की सहायता देने ) से समाप्त नहीं किया जा सकता ।
आतंकवादी कैसे बनता है ? माने एक बच्चा जिसकी उम्र 2 साल की है और वह मदरसे में जाना शुरू कर देता है । जहां उसे गैर मुसलमानों को नष्ट करने सारी दुनिया को इस्लाम में बदलने की शिक्षा दी जाती है । उसे बताया जाता है मूर्ति पूजा अथवा अल्लाह के अलावा किसी और की पूजा सबसे बड़ा ( हत्या से भी बड़ा अपराध है ) यही बात सोचकर वह बड़ा होता है तो देखता है कि उसके पास जैसे पाकिस्तान या अफगानिस्तान में अमेरिकी फौन निरपराध नागरिकों की हत्या कर रही है। भारत में जन्म लेता है तो देखता है कि उसके भाई बहिनों के साथ कश्मीर और गुजरात में अत्याचार हो रहें हैं । मुस्लिम औरतों के साथ हिन्दू बहुल भारत में ( गुजरात व कश्मीर ) में बलात्कार किए जा रहे हैं । भारत में रहता है तो देखता है कि कई जगह उसके मुस्लिम होने के कारण उसे संदेह से देखा जाता है । ( यही कारण है कि अजहरूद्दीन जैसा व्यक्ति जिसे भारतीय क्रिकेट टीम का कप्तान तक बनाया गया यह कहता है कि उसके साथ मुसलमान होने के कारण सट्टेबाजी में फंसाया जा रहा है ) ये सारी बाते उसके दिमाग में विद्रोह को भर देती हैं और वह अपने भाई मुसलमानों पर होने वाले अत्याचारों के विरूद्ध जिहाद के लिए तैयार हो जाता है । वह बेचारा आत्मघाती बन जाता है वह विस्फोट करके अपने को उड़ा देता है । यही सारी बात हाल ही की फिल्म कुरबान में दिखायी गयी है । वह बेचारा कीट पतंगें की तरह है जो दीए की लौ में खुद ही भस्म हो जाता है । अब आप स्वयं फैसला करें कि क्या जो कार्य लादेन, हेडली, कसाब, जवाहिरी इत्यादि इस्लाम पीडि़त ( आतंकवादी ) लोग कर रहे है उसे किसी भी तरह से गलत ठहराया जा सकता है ।
सारी दुनिया मे इस्लाम फ़ैलाने के उद्देश्य से ही इस्लाम में गर्भ निरोधक को हराम बता दिया है । अब स्वयंविचार करें कि वह औरत जिसके पेटया गोदी में हर समय एक बच्चा हो वह क्या अपने घर के अलावा कुछ और सोचने की स्थिति में होगी ।
मुसलमान सारी दुनिया में वास्तव में सबसे दुखी कौम है । मुसलमान कहते हैं सारी दुनिया इस्लाम को समाप्त करने की साजिश कर रही है । वे ऐसा क्यों कहते हैं वे ऐसा इसीलिए कहते हैं क्योंकि वे खुद सारी गैर मुस्लिम दुनिया को समाप्त करके सारी दुनिया को इस्लाम के हरे रंग में रंगने की तैयारी कर रहे हैं । चूंकि वे खुद सारी दुनिया के हजार वर्ष से दुश्मन बनें हैं अतः उन्हें सारी दुनिया भी मुसलमानो की दुश्मन नजर आती है । दिया । अब हथियारों का उत्तर किसी भी दुनिया में अंहिसा से नहीं दिया जा सकता अतएव भारत सरकार ने भी मजबूरी में अपनी सेना को कश्मीर में लगाना पड़ा । अब लगातार 25 वर्षों से कश्मीर भारत से केवल सेना के बल पर ही रूका हुआ है अगर आज भारत सरकार कश्मीर से सेना हटा लेती है तो निश्चित रूप से कश्मीरी मुसलमान कश्मीर का पाकिस्तान में विलय कर देंगे ये मुसलमानों की मजबूरी है । कुरान व मौहम्मद के आदेश से मुसलमान इंकार कर नहीं सकते । इसीलिए वह कश्मीरी जिसकी प्रति व्यक्ति आय आतंकवाद के शुरू होने से पहले भारत में सबसे अधिक थी आज हजारों करोड़ की मदद से दाना पानी खा रहे हैं । अब जरा राष्ट्रवादी मुस्लिम की स्थिति पर भी विचार करें वह भारत के लिए सोचता है । कट्टरता से भी ग्रस्त नहीं है पर जब वह हिन्दुओं का व्यवहार देखता है कि सारे हिन्दू उसे संदेह की नजर से देखते हैं तो उसके दिल पर क्या बीतती होगी यह केवल वही जानता । उसी के दिल की व्यथा को भारतीय फिल्मों में दिखाया जाता है । कुरान की आयतों ने ही पूरे मुस्लिम व गैर मुस्लिम समाज को परेशान कर रखा है । मुसलमान और गैर मुसलमान के बीच शत्रुता की खाई को तब तक के लिए खोद दिया है जब तक कि सारे गैर मुसलमान मुसलमान न बन जाएं । समस्या यह है कि कुरान नफरत के बीज फैला रही है और जब यह बीज बढ़कर गोधरा जैसे नरसंहार का कारण बनते हैं तो उसके प्रति नफरत फैलना दूसरे समाज के लिए स्वाभाविक है । परंतु यदि हम जड़ पर कोई प्रहार नहीं करेंगे तो इसी प्रकार के नरसंहार होते ही रहेंगे ।
आइए अब तस्वीर के दूसरे पहलू की ओर नजर करते हैं । गैर मुसलमान या अपनी समझ में जरा जल्दी आएगा हिन्दू इस्लाम से क्यों नाराज है
इसे आपको इस लेख से पता चला जाएगा । सारांश में हिन्दुओं को समझ में नहीं आता कि कश्मीर में आखिर जेहाद क्यो चलाया जा रहा वहां से कश्मीरी पंडितों को क्यों बाहर निकाल दिया गया है । गुजरात में गोधरा में क्यों आग लगायी गयी थी । मुसलमानों ने हिन्दुओ की हजारों मंदिर क्यों तोड़े । भारत में इतने विस्फोट क्यों किए जा रहे हैं । इसका कोई जवाब उन्हें नहीं मिलता । ऐसे हजारों वर्षों के लाखों कारणों की वजह से हिन्दुओं का गुस्सा कहीं कहीं बाहर फूट पड़ता है । जैसे गुजरात में गोधरा के बाद फूटा पर उस गुस्से का और उल्टा असर होता है और यही गुस्सा नए हजारों आतंकवादियों के बनने में उत्प्रेरक का कार्य करता है ।
मुसलमानों की गैर मुसलमानों से इस तरह के व्यवहार से सभी गैर मुसलमान परेशान हो चुके हैं । पर उसका इलाज उन पर गुस्सा करना नहीं है ।
अब आइए देखते हैं हिन्दुओं द्वारा भारत में अब इस्लाम से निपटने के लिए क्या क्या उपाय किए गए हैं अथवा हिन्दू क्या सोचते है ?
एक साधारण उपाय हिन्दु कहते हैं कि पाकिस्तान के आतंकवादी शिविरों पर हमला कर उन्हें नष्ट कर देना चाहिए । पर वह काम तो अमेरिका कर ही रहा है और उससे आतंकवाद के समाप्त होने का कोई निशान दूर दूर तक नजर नहीं आ रहा है । लादेन के मरने से आतंकवाद समाप्त नहीं हुआ है। कुरान व हदीस में गैर मुसलमानों के विरूद्ध जहर के रहते मदरसे हर साल लाखों की संख्या में लादेन व उसके अनुयायी पैदा करते ही रहेंगे । हिन्दुओं द्वारा स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद अब तक जो इस्लाम की आंधी को रोकने के लिए किए गए कार्य किए गए उनमें सबसे पहले श्यामा प्रसाद मुखर्जी ने अनुच्छेद 370 को हटाने का मुद्दा उठाया इसी के लिए अपना बलिदान दिया । पर उनके बलिदान के आज 50 वर्ष से भी अधिक बीत जाने के बावजूद धारा 370 हटाये जाने के कोई आसार नहीं हैं । न हीं समान नागरिक संहिता लागू करने के कोई आसार दिखाई देते हैं । उसके बाद राम मंदिर आंदोलन व हाल ही में कश्मीर में अमरनाथ मंदिर के लिए भूमि का आवंटन करने के लिए भी हिन्दुओं द्वारा आंदोलन किया गया है परंतु इन सभी आंदोलनों से समस्या की जड़ पर कोई प्रहार नहीं हुआ बल्कि इस्लाम का अपनी आबादी बढ़ाना और मदरसों द्वारा उस आबादी को कट्टर बनाने का कार्य निर्बाध रूप से जारी है । अब मान ले हम अपने उपरोक्त आंदोलन में सफल हो भी जाते हैं तो इन सबसे समस्या का समाधान किसी भी स्तर पर नहीं होगा । यदि राम मंदिर हिन्दुओं को अदालत के आदेश से मिल भी जाता है तो आने वाले समय में पुनः छिन जाएगा । अनुच्छेद 370 को हटा भी दिया जाता है तो आने वाले समय में पूरा भारत कश्मीर की तरह हो जाएगा व पूरे भारत से हिन्दुओं को कश्मीर की तरह से निकालने की साजिश की जाएगी । समस्या की जड़ तक पहुंच कर जब तक उस पर प्रहार नहीं किया जाएगा तबतक केवल इसकी फूल पत्तियों या टहनियों को काट कर को समाधान नहीं मिल पाएगा । जड़ के रहते वे फिर से आ जांएगी । अतः अब प्रहार सीधे जड़ पर करना होगा । और जड़ कुरान व हदीस में लिखें मौहम्मद पैगम्बर का संदेश है । अब इसका केवल एक ही उपाय है कि सारे गैर मुसलमान मुसलमानों से कहें कुरान में जो गैर मुसलमानों के विरूद्ध लिखा गया है उसे मानना अथवा कुरान को मानना ( अर्थात इस्लाम छोड़ दें ) बंद करें । मुसीबत को और बढ़ने से रोकने के लिए मुसलमानों की जनसंख्या पर तुरंत रोक लगाने का उपाय किया जाए । सारे गैर मुसलानों को इस प्रयास में युद्ध स्तर पर लग जाना चाहिए । अब इसका केवल एक ही उपाय दिखायी देता है कि सारे गैर मुसलमान मुसलमानों से कहें कुरान में जो गैर मुसलमानों के विरूद्ध लिखा गया है उसे मानना अथवा कुरान को मानना ( अर्थात इस्लाम छोड़ दें ) बंद करें । मुसीबत को और बढ़ने से रोकने के लिए मुसलमानों की जनसंख्या पर तुरंत रोक लगाने का उपाय किया जाए ।
एक गैर मुसलमान को जो प्रश्न मुसलमानों से पूछने चाहिए सारे गैर मुसलानों को इस प्रयास में युद्ध स्तर पर लग जाना चाहिए । एक गैर मुसलमान को जो प्रश्न मुसलमानों से पूछने चाहिए
1- सउदी अरब में मंदिर या चर्च बनाने की इजाजत क्यों नहीं है। 2- मौहम्मद साहब ने मक्का विजय के बाद काबा में मूर्तियों का क्यों तोड़ा था । 3- मौहम्मद साहब व उनके बाद के इस्लामी शासकों ने अन्य देशों पर इस्लाम स्वीकार करने जजिया देने या युद्ध का विकल्प रखने के लिए क्यों संदेश भेजा था 4- कश्मीर से सारे कश्मीरी पंडितों किसने निकाला है। 5- गर्भ निरोधक क्यों हराम है । 6- इन दोनों फतवों का क्या अर्थ है ।
१- क्या ग़ैर-मुस्लिम पर इस्लाम स्वीकार करना अनिवार्य है?
२- धर्मों की एकता के लिए निमंत्रण का हुक्म
यदि आप मानते हैं कि उपरोक्त लेख देश के इस्लामीकरण को रोकने में सहायत हो सकता है तो इस लेख का प्रचार करें ।
(साभार--हिंदुस्तान गौरव)