शुक्रवार, 29 जुलाई 2011

शहीद उधम सिंह(udham singh) का परिवार आज मजदूरी कर अपना पेट पाल रहा है और सरकारों ने अब तक कुछ नहीं किया।






मित्रों मेरे पास हाल ही में एक मेल आई है ,मेल नितिन अत्रे जी ने भेजी है.मेल के लिंक मे स्वतंत्र भारत में हरामी नेताओं की करतूत जग जाहिर होती है, कि किस प्रकार भडुए भारत पर राज करने लगे और किस प्रकार महान क्रांतिकारियों के परिवारों को आज दिहाड़ी मजदूरी करनी पड़ रही है.

http://www.ndtv.com/video/player/news/video-story/196485

रविवार, 24 जुलाई 2011

यदि आप बटुकेश्वर दत्त(batukeshvar datt) हैं तो प्रमाण लाइए.

एक वाक्य में क्रान्ति शब्द का अर्थप्रगति केलियेपरिवर्तन की भावना एवँ आकाँक्षाहै लोगसाधारणतया जीवन की परम्परागत दशाओं केसाथचिपक जाते हैं और परिवर्तन के विचार से हीकाँपनेलगते हैं यही एक अकर्मण्यता की भावना है,जिसकेस्थान पर क्रान्तिकारी भावना जागृत करनेकीआवश्यकता है दूसरे शब्दों में कहा जा सकता हैकिअकर्मण्यता का वातावरण निर्मित हो जाता हैऔररूढ़ीवादी शक्तियाँ मानव समाज को कुमार्ग परलेजाती हैं यही परिस्थितियाँ मानव समाजकीउन्नति में गतिरोध का कारण बन जाती हैं क्रान्तिकी इस भावना से मनुष्य जाति की आत्मा स्थायी रूप पर ओतप्रोत रहनी चाहिये, जिससे किरूढ़ीवादीशक्तियाँ मानव समाज की प्रगति की दौड़ में बाधा डालने के लिये सँगठित हो सकें यहआवश्यक हैकि पुरानी व्यवस्था सदैव रहे और वह नयी व्यवस्था के लिये स्थान रिक्त करती रहे,जिससे कि एकआदर्श व्यवस्था सँसार को बिगड़ने से रोक सके यह है हमारा अभिप्राय जिसको हृदय मेंरख कर हमइन्क़लाब ज़िन्दाबादका नारा ऊँचा करते हैं 22, दिसम्बर, 1929 भगत सिंह - बी. के.दत्त पत्र कामूलपाठ आभार - भगतसिंह और उनके साथियों के दस्तावेज़ / प्रथम सँस्करण 1986

क्या मेरे प्यारे देशवासी भगत सिंह के साथी बी० के० दत्त यानि की बटुकेश्वर दत्त के बारे में जानतेहैं?अगर आप असेम्बली में भगत सिंह के साथ बम फेंककर पूरे विश्व को भोच्च्का कर देने वालेक्रन्तिकारीको सोच रहे हैं तो आप बिलकुल सही हैं

किन्तु क्या किसी को मालूम है कि सन १९३० के पश्चात उस महान हुतात्मा का क्या हुआ

असेम्बली में बम फेंक कर भगत सिंह के साथ अपनी ग्रिफ्तारी देकर बटुकेश्वर जी को लम्बी कारावासहोगयी इससे पहले इनका जीवन सम्पन्नता के साथ बीत रहा था लम्बे कारावास के बाद स्वतंत्रभारतमें उनके साथ क्या हुआ?स्वतंत्र भारत ने उन्हें क्या दिया?
आजादी की खातिर 15 साल जेल की सलाखों के पीछे गुजारने वाले बटुकेश्वर दत्त को आजाद भारत में रोजगार मिला एक सिगरेट कंपनी में एजेंट का, जिससे वह पटना की सड़कों पर खाक छानने को विवश हो गये।

बाद में उन्होंने बिस्कुट और डबलरोटी का एक छोटा सा कारखाना खोला, लेकिन उसमें काफी घाटा हो गया और जल्द ही बंद हो गया। कुछ समय तक टूरिस्ट एजेंट एवं बस परिवहन का काम भी किया ,किन्तु वहां भी वे असफल रहे.
उनके पास जीविका का कोई साधन नहीं थादो-दोदिनजेल काटने वाले और उन चोर उचक्कों को जो कांग्रेसियों के चमचे थे उन पर आजाद सरकारसरकारीपरमिट,बस परमिट लुटा रही थी लोगों के समझाने के पश्चात् दत्त साहब एक बस के परमिट केलिएपटना के जिलाधिकारी के पास गए
जिलाधिकारी ने उन्हें पहचानने से भी इनकार कर दिया ,
और उनसे कहा की यदि आप बटुकेश्वर दत्त हैं तो प्रमाण लेकर आईये. जब दत्त जी के साथ गए लोगों ने जिलाधिकारी को समझाना चाहा तो वहां पर उपस्थित कांग्रेसी गुंडों ने उन्हें वहां से धकियाकर बहार निकाल दिया.अत :वे वहां से आकर पटना में ही एक अनजान से स्थान पर अपनी पत्नी अंजली दत्त के साथ गरीबी में ही जीवन काटने लगे. १९६२ के आस पास जब वो बीमार रहने लगे,तब कुछ राष्ट्रभक्तों ने इनके बारे में जनता को जागरूक करने का बीड़ा उठाया. ।बटुकेश्वर दत्त के 1962 में अचानक बीमार होने के बाद उन्हें गंभीर हालत में पटना के सरकारी अस्पताल में भर्ती कराया गया। इस पर उनके मित्र चमनलाल आजाद ने एक लेख में लिखा, क्या दत्त जैसे कांतिकारी को भारत में जन्म लेना चाहिए, परमात्मा ने इतने महान शूरवीर को हमारे देश में जन्म देकर भारी भूल की है। खेद की बात है कि जिस व्यक्ति ने देश को स्वतंत्र कराने के लिए प्राणों की बाजी लगा दी और जो फांसी से बाल-बाल बच गया, वह आज नितांत दयनीय स्थिति में अस्पताल में पड़ा एडियां रगड़ रहा है और उसे कोई पूछने वाला नहीं है।

इसके बाद सत्ता के गलियारों में हड़कंप मच गया और आजाद, केंद्रीय गृहमंत्री गुलजारी लाल नंदा और पंजाब के मंत्री भीमलाल सच्चर से मिले। पंजाब सरकार ने एक हजार रुपए का चेक बिहार सरकार को भेजकर वहां के मुख्यमंत्री केबी सहाय को लिखा कि यदि वे उनका इलाज कराने में सक्षम नहीं हैं तो वह उनका दिल्ली या चंडीगढ़ में इलाज का व्यय वहन करने को तैयार हैं।

बिहार सरकार की उदासीनता और उपेक्षा के कारण क्रांतिकारी बैकुंठनाथ शुक्ला पटना के सरकारी अस्पताल में असमय ही दम तोड़ चुके थे। अत: बिहार सरकार हरकत में आयी और पटना मेडिकल कॉलेज में ड़ॉ मुखोपाध्याय ने दत्त का इलाज शुरू किया। मगर उनकी हालत बिगड़ती गयी, क्योंकि उन्हें सही इलाज नहीं मिल पाया था और 22 नवंबर 1964 को उन्हें दिल्ली लाया गया।

दिल्ली पहुंचने पर उन्होंने पत्रकारों से कहा था, मुझे स्वप्न में भी ख्याल न था कि मैं उस दिल्ली में जहां मैने बम डाला था, एक अपाहिज की तरह स्ट्रेचर पर लाया जाउंगा। उन्हें सफदरजंग अस्पताल में भर्ती किया गया। पीठ में असहनीय दर्द के इलाज के लिए किए जाने वाले कोबाल्ट ट्रीटमेंट की व्यवस्था केवल एम्स में थी, लेकिन वहां भी कमरा मिलने में देरी हुई। 23 नवंबर को पहली दफा उन्हें कोबाल्ट ट्रीटमेंट दिया गया और 11 दिसंबर को उन्हें एम्स में भर्ती किया गया।

बाद में पता चला कि दत्त बाबू को कैंसर है और उनकी जिंदगी के चंद दिन ही शेष बचे हैं। भीषण वेदना झेल रहे दत्त चेहरे पर शिकन भी न आने देते थे।

पंजाब के मुख्यमंत्री रामकिशन जब दत्त से मिलने पहुंचे और उन्होंने पूछ लिया, हम आपको कुछ देना चाहते हैं, जो भी आपकी इच्छा हो मांग लीजिए। छलछलाई आंखों और फीकी मुस्कान के साथ उन्होंने कहा, हमें कुछ नहीं चाहिए। बस मेरी यही अंतिम इच्छा है कि मेरा दाह संस्कार मेरे मित्र भगत सिंह की समाधि के बगल में किया जाए।

श्री दत्त की मृत्यु 20 जुलाई, 1965 को नई दिल्ली स्थित अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान में हुई। मृत्यु के बाद इनका दाह संस्कार इनके अन्य क्रांतिकारी साथियों-भगत सिंह, राजगुरु एवं सुखदेव की समाधि स्थल पंजाब के हुसैनी वाला में किया गया .

बुधवार, 20 जुलाई 2011

राष्ट्र विरोधी व् हिन्दू विरोधी था गाँधी का असहयोग आन्दोलन




मह्रिषी अरविन्द ने १९०९ में कहा था "प्रारंभ से ही कोंग्रेस ने राजनीति में सदैव अपनी द्रष्टि को समाज से अलग केवल ब्रिटिश शासन की स्वामिभक्ति की ओर ही लगाए रक्खा"
"१९०६ के आस-पास से ही कोंग्रेसमें मतभेद शुरू हो गए थेकोंग्रेस नरम गरम दलों में विभाजित हो गयी थी"
नरम दल यानि अंग्रेजों की स्वामिभक्ति करने वाला दल था जिसके नेता थे गोखले मोती लालनेहरू दूसरा गरम दल जिसके नेता लोक मान्य तिलक थे तिलक का नारा था ,"स्वराज मेराजन्म सिद्ध अधिकार है और मै उसे लेकर रहूँगा " या कह सकते हैं कि कोंग्रेस का गरम दल वास्तव में एकराष्ट्रवादी कोंग्रेस का रूप था यानि कि १९०६ से १९२० तक तिलक के नेर्तत्व में कोंग्रेस एक राष्ट्रवादी दल रहा लेकिन १९१६ में गाँधी के अफ्रीका से आने के बाद स्थिति बदलनी शुरू हो गयीसन १९२० में तिलक जी के स्वर्गवास के पश्चात अचानक परिस्थितियों ने अवसर दिया और गाँधी कोंग्रेस का बड़ा नेता बन गया

गाँधी अगर चाहते तो वह तिलक के पूर्ण स्वराज्य की मांग को मजबूती प्रदान कर सकते थेकिन्तु गाँधी जी ने ऐसा नहीं किया गाँधी जी ने स्वतंत्रता प्राप्ति के लिए अपना पहला आन्दोलन शुरू किया,जो इतिहास में असहयोग आन्दोलन के नाम से प्रसिद्ध हुआ

वास्तव में असहयोग आन्दोलन, खिलाफत आन्दोलन(खिलाफत क्या बाला थी ,इसे आगे जानेंगे) का एक हिस्सा था स्यवं गाँधी के शब्दों में ,"मुसलमानों के लिए स्वराज का अर्थ है,जो होना चाहिए खिलाफत की समस्या के लिए.......खिलाफत के सहयोग के लिए आवश्यक पड़ने पर मै स्वराज्य प्राप्ति को भी सहर्ष स्थगित कर देने को तैयार हूँ"

अब सबसे प्रथम यह जानना आवश्यक है कि खिलाफत आन्दोलन क्या बला थी?

भारतीय इतिहास में खिलाफत आन्दोलन का वर्णन तो है किन्तु कही विस्तार से नहीं बताया गयाकि खिलाफत आन्दोलन वस्तुत:भारत की स्वाधीनता के लिए नहीं अपितु वह एक राष्ट्र विरोधी हिन्दू विरोधी आन्दोलन था

खिलाफत आन्दोलन दूर देश तुर्की के खलीफा को गद्दी से हटाने के विरोध में भारतीय मुसलमानों द्वारा चलाया गया आन्दोलन था असहयोग आन्दोलन भी खिलाफत आन्दोलन की सफलता के लिए चलाया गया आन्दोलन था आज भी अधिकांश भारतीयों को यही पता है कि असहयोगआन्दोलन स्वतंत्रता प्राप्ति को चलाया गया कोंग्रेस का प्रथम आन्दोलन था किन्तु सत्य तो यही है कि इस आन्दोलन का कोई भी रास्ट्रीय लक्ष्य नहीं था

प्रथम विश्व युद्ध में तुर्की की हार के पश्चात अंग्रेजों ने वहां के खलीफा को गद्दी से पदच्युत कर दियाथा खिलाफत+असहयोग आंदोलनों का लक्ष्य तुर्की के सुलतान की गद्दी वापस दिलाने के लिए चलाया गया आन्दोलन था

यहाँ एक हास्यप्रद बात और है कि तुर्की की जनता ने स्वं ही कमाल अता तुर्क के नेर्तत्व्य में तुर्की के खलीफा को देश निकला दे दिया था

भारत में मोहम्मद अली जोहर शोकत अली जोहर दो भाई खिलाफत का नेर्तत्व कर रहे थे गाँधी ने खिलाफत के सहयोग के लिए ही असहयोग आन्दोलन की घोषणा कर डाली जब कुछ राष्ट्रवादी कोंग्रेसियों ने इसका विरोध किया तो गाँधी ने यहाँ तक कह डाला,"जो खिलाफत का विरोधी है तो वह कोंग्रेस का भी शत्रु है "
इतिहास साक्षी है कि जिस समय खिलाफत आन्दोलन फेल हो गया ,तो मुसलमानों ने इसका सारा गुस्सा हिदू जनता पर निकला,मुसलमान जहाँ कहीं भी संख्या में अधिक थे ,हिन्दू समाज पर हमला करने लगे. हजारों हिदू ओरतों से बलात्कार हुए,लाखों की संख्या में तलवार के बल पर मुसलमान बना दिए गए. सबसे भयंकर स्थिति केरल में मालाबार में हुए जो इतिहास में मोपला कांड के नाम से जानी जाती है.

मोपला कांड में ही अकेले २० हजार हिन्दुओं को काट डाला गया ,२० हजार से ज्यादा को मुस्लमान बना डाला. १० हजार से अधिक हिदू ओरतों के बलात्कार हुए . और यह सब हुआ गाँधी के असहयोग आन्दोलन के कारण.

इस प्रकार कहा जा सकता है कि १९२० तक तिलक की जिस कोंग्रेस का लक्ष्य स्वराज्य प्राप्ति था गाँधी ने अचानक उसे बदलकर एक दूर देश तुर्की के खलीफा के सहयोग और मुस्लिम आन्दोलन में बदल डाला, जिसे वहांके जनता ने भी लात मरकर देश निकला दे दिया
दूर देश में मुस्लिम राज्य की स्थापना के लिए स्वराज्य की मांग को कोंग्रेस द्वारा ठुकराना इस आन्दोलन को चलाना किस प्रकार राष्ट्रवादी था या कितना राष्ट्रविरोधी भारतीय इतिहास में इससत्य का लिखा जाना अत्यंत आवश्यक है अन्यथा भारतीय आजादी का दंभ भरने वाली कोंग्रेस लगातार भारत को इसे ही झूठ भरे इतिहास के साथ गहन अन्धकार की और रहेगी.