रविवार, 1 नवंबर 2015

अगर मुस्लिम जनसंख्या का बढ़ता घनत्व न रुका तो फिर होंगी सीधी कार्यवाहियाँ

अभी हाल ही में आरएसएस के सह-सरकार्यवाह कृष्ण गोपाल ने कहा कि 2011 की जनगणना के धार्मिक आंकड़ों ने जनसंख्या नीति की समीक्षा को जरूरी बना दिया है।  प्रस्ताव में कहा गया है, "1951 से 2011 के बीच मूल भारतीय धर्मों से संबंध रखने वाले लोगों की जनसंख्या 88 प्रतिशत से घटकर 83.5 प्रतिशत रह गई है जबकि मुस्लिम आबादी 9.8 फ़ीसदी से बढ़कर 14.23 प्रतिशत हो गई है."प्रस्ताव में साथ ही कहा गया है कि 'सीमावर्ती राज्यों असम, पश्चिम बंगाल और बिहार में मुसलमानों की आबादी बढ़ने की दर राष्ट्रीय औसत से ज्यादा है जो इस बात का संकेत है कि बांग्लादेश की तरफ घुसपैठ जारी है."पूर्वोत्तर राज्यों में जनसंख्या के ‘‘धार्मिक असंतुलन’’ को गंभीर करार देते हुए प्रस्ताव में कहा गया है कि 1951 में अरुणाचल प्रदेश में भारतीय मूल के लोग 99.21 फ़ीसदी थे लेकिन 2011 में उनकी आबादी घटकर 67 फ़ीसदी रह गई।  
पश्चिमी उत्तर प्रदेश में  हिन्दू महासभा  जैसे हिन्दू संगठन पिछले कई वर्षों से ऐसी ही मांग करते  आ रहे हैं  ।  शायद इन हिन्दू संगठनों की  मेहनत  का नतीजा  है कि आज आर एस  एस को भी इस बात को बोलने पर मजबूर होना पड़ा है।पर सोचने वाली बात ये है कि आखिर ये सब मुस्लिम जनसंख्या की अनुपात को बढ़ता देखकर चिंतित क्यों हैं ?  
 इसके उत्तर के लिए इस्लाम को थोड़ा सा जानना जरुरी हो जाता है।  जमात-ए-इस्लामी के संस्थापक मौलाना मौदूदी कहते हैं कि कुरान के अनुसार विश्व दो भागों में बँटा हुआ है, एक वह जो अल्लाह की तरफ़ हैं और दूसरा वे जो शैतान की तरफ़ हैं। देशो की सीमाओं को देखने का इस्लामिक नज़रिया कहता है कि विश्व में कुल मिलाकर सिर्फ़ दो खेमे हैं, पहला दार-उल-इस्लाम (यानी मुस्लिमों द्वारा शासित) और दार-उल-हर्ब (यानी “शैतान ” द्वारा शासित)। उनकी निगाह में शैतान  का अर्थ है जो अल्लाह को नहीं मानता, क्योंकि विश्व के किसी भी धर्म के भगवानों को मुसलमान  मान्यता ही नहीं देते हैं।
इस्लाम सिर्फ़ एक धर्म ही नहीं है, असल में इस्लाम एक पूजापद्धति तो है ही, लेकिन उससे भी बढ़कर यह एक समूची “व्यवस्था” के रूप में मौजूद रहता है। इस्लाम की कई शाखायें जैसे धार्मिक, न्यायिक, राजनैतिक, आर्थिक, सामाजिक, सैनिक होती हैं। इन सभी शाखाओं में सबसे ऊपर, सबसे प्रमुख और सभी के लिये बन्धनकारी होती है धार्मिक शाखा, जिसकी सलाह या निर्देश (बल्कि आदेश) सभी धर्मावलम्बियों को मानना बाध्यकारी होता है। किसी भी देश, प्रदेश या क्षेत्र के “इस्लामीकरण” करने की एक प्रक्रिया है। जब भी किसी देश में मुस्लिम जनसंख्या एक विशेष अनुपात से ज्यादा हो जाती है तब वहाँ इस्लामिक आंदोलन शुरु होते हैं। शुरुआत में उस देश विशेष की राजनैतिक व्यवस्था सहिष्णु और बहु-सांस्कृतिकवादी बनकर मुसलमानों को अपना धर्म मानने, प्रचार करने की इजाजत दे देती है, उसके बाद इस्लाम की “अन्य शाखायें” उस व्यवस्था में अपनी टाँग अड़ाने लगती हैं। 
ऐसी बात नहीं कि भारतियों को पता नहीं कि वो पहले भी इस्लाम की क्रूरता को झेल चुके हैं।  पुराना इतिहास अगर छोड़ भी दिया जाय  तो अंग्रेजों के भारत से जाने के तुरंत पहले सीधी कार्यवाही के बारे में पढ़ लिया जाय जहां पाकिस्तान की मांग को लेकर जिन्हा ने बंगाल के गवर्नर सुहार वर्दी को हिन्दुओं का कत्लेआम और उनकी औरते और संपत्ति को लूटने का मुसलमानो से खुला निमंत्रण दे दिया था।   जब मिस्टर जिन्ना को लगा कि अब पाकिस्तान निर्माण का सपना पूरा नहीं होगा ,तो  जिन्ना ने २९ जुलाई १९४६ को मुस्लिम लीग परिषद की बैठक बुलाकर दो प्रस्ताव किये।  एक मंत्रिमंडल प्रस्ताव की स्वीकृति को वापस लेना और दूसरा सीधी कार्रवाई की स्वीकृति।  सीधी कार्रवाई की व्याख्या करते हुए लियाकत अली खान (लीग नेता ) ने एसोसिएटेड प्रेस आफ अमेरिका को बताया कि सीधी कार्रवाई का मतलब है  '' असंवैधानिक  तरीकों को अपनाना '' हम किसी भी तरीके से इंकार नहीं करते।   एक अन्य नेता अब्दुल रब निस्तार ने कहा कि ''पाकिस्तान रक्तपात से ही प्राप्त किया जा सकता है।   यदि अवसर मिला तो हम गैर मुस्लिमों का अवश्य खून बहायेंगे।   मुसलमान अहिंसा में विश्वास नहीं रखते हैं। ''
   सीधी  कार्रवाई दिवस की तिथि तय हुई १६ अगस्त सन १९४६।   फिर शुरू हुआ इस योजना के तंत्र को बनाने का सिलसिला , सुहरावर्दी जो उस समय बंगाल के प्रीमियर तथा क़ानून और व्यवस्था मामलों के मंत्री थे , उन्हें इस योजना को सफल बनाने की  जिम्मेदारी  सौंपी गयी।  उन्होंने अपने मंत्री पद का दुरुपयोग करते हुए महत्वपूर्ण पदों से हिन्दू पुलिस अधिकारियों  के स्थानांतरण की व्यवस्था की।   १६ अगस्त को कलकत्ता के २४ पुलिस थानों में से २२ पर मुस्लिम अधिकारियों को प्रभारी बनाया जा चुका था।   शेष दो पर एंग्लो इंडियन का नियंत्रण था  अर्थात सभी थाने हिन्दुओं की पहुँच से बहुत दूर कर दिए गए थे।  
    उसके  बाद कई प्रकार के पर्चे बांटे गए।   एक पर्चे पर हाथ में तलवार लिए हुए जिन्ना के चित्र के साथ लिखा था --  '' हम मुसलमानों का ही राज था और हमने ही शासन किया है।   काफिरों से प्रेम का परिणाम अच्छा नहीं होता।   ऐ काफ़िर अहंकार  और ख़ुशी में मत आओ , तुम्हारे दंड का समय निकट है , जब कत्लेआम  होगा।  ''
  १६ अगस्त  आते आते लीग के स्वयंसेवक और  मुस्लिम गुंडों को एक स्थान पर पहुचाने की व्यवस्था की गई।   मंत्रियों को पेट्रोल कूपन जारी किये गए।   भारी संख्या में हथियार मंगवाए गए।   कुछ लोगों ने पुलिस को इस परिस्थिति से अवगत भी कराया परन्तु कोई लाभ नहीं हुआ।   उपद्रवियों को  सभी प्रकार के हथियार बांटे गए।   १५ अगस्त १९४६ की रात से ही शुरू हो गया  नंगा नांच।    ५०-६० गुंडों का पहला झुण्ड हाथ में  लाठी डंडों वा छुरों से लैस होकर आगे बाजार में उतरा , दूकान खुली मिलने पर दुकानदार की पिटाई , यात्रियों के साथ बदसलूकी  व मारपीट , सुबह ६ बजते ही  पुलिस नियंत्रण कक्ष को सूचनाएं आने लगीं लेकिन पुलिस का एक ही जवाब होता था - '' हमें कोई आदेश नहीं है।  ''
पहचान हेतु  मुसलमानों की दुकानों पर लिखा हुआ था -- ''मुसलमान की दूकान '' ताकि उन्हें भीड़ की कार्रवाई से बचाया जा सके . अनेक मंदिरों को जलाकर ध्वस्त कर दिया गया।  कुछ इलाकों में तो दंगाई लगातार ४० घंटे से हत्या व लूट में लगे हुए थे , सडकों पर लाशें बिखरी हुई थीं जिनसे दुर्गन्ध आना प्रारम्भ हो गई थी।   सडकों के मैन हाल भी लाशों से भर गए थे।   नदी में लाशें तैरती हुई दिखाई पड़ रहीं थीं।   बच्चों  को छतों से नीचे पटका जा रहा था।   छोटे बच्चों को उबलते हुए तेल में डाल दिया जाता था महिलाओं  और बालिकाओं से पहले बलात्कार फिर अंग भंग और अंत में ह्त्या कर दी जाती थी।   चार दिनों तक यह राक्षसीपन लगातार चलता रहा। यही था सीधी कार्रवाई प्रस्ताव का परिणाम जिसमें ३१७३ शव सरकारी रिकार्ड के अनुसार प्राप्त हुए , न जाने कितनी और संख्या का पता भी  नहीं लग पाया  और ये सब क्यों हुआ ,क्या कारण था इस सीढ़ी कार्यवाही का। इसका उत्तर केवल और केवल एक ही है कि  उस स्थान पर मुसलमानो की आबादी हिन्दुओं की आबादी से ज्यादा हो गयी थी।  
कश्मीर घाटी में क्या हुआ ?इस बात को भी सभी जानते हैं।  केरल में क्या हो रहा है ,आसाम में बांग्लादेशियों ने वहां के आम हिन्दू जातियों का जीना दुष्कर कर रखा है। बांग्लादेश की सीमा  से सटे  लगभग ५००० गांव हिन्दू विहीन हो चुके है। बंगाल में सैकड़ों गावों में हिन्दू अपने मंदिरों में पूजा नहीं कर सकते।  हिन्दुओं के धार्मिक जुलूसों पर हमले आम हो गए हैं। क्या कारण  है इन सभी घटनाओ का। उत्तर केवल एक है उन स्थानो पर मुस्लिम जनसंख्या का बढ़ता घनत्व।  
मुस्लिमो की बढ़ती आबादी प्रतिशत का प्रभाव देश के हित  में नहीं है यह सोच  केवल मात्र संघ की सोच नही है।  यह सोच हर उस भारतवासी की है जो भारतीय भूमि को अपनी कर्मभूमि के साथ  साथ इसे अपनी मातृभूमि ,पुण्यभूमि व पितृभूमि भी मानता है और अगर भारतभूमि को पूजने वाला उसका सनातनी  विदेशी मजहबों की बढ़ती जनसंख्या पर रोष प्रकट करता है तो ये उसका अधिकार है  क्योकि अपने धर्म की आन और भारत माता की शान  के लिए सनातनियों  ने   हजारों वर्षों से करोड़ों बलिदान दिए है।  

स्वर्ग उसी जगह है जहाँ मुल्ला नहीं हैं और उनका शोर सुनाई नहीं देता-दारा शिकोह (तुफैल चतुर्वेदी जी का लेख )

बहिश्तो-जा कि मुल्ला-ए-न बायद ज़ि मुल्ला शोरो-गोगा-ए-न बायद   
{ स्वर्ग उसी जगह है जहाँ मुल्ला नहीं हैं और उनका शोर सुनाई नहीं देता-दारा शिकोह }
दक्षिण एशिया यानी अफगानिस्तान, पाकिस्तान, बांग्ला देश, भारत की स्थिति दिनों-दिन खराब होती जा रही है. अफगानिस्तान से अमरीका के हटने के बाद वहां हमारी उपस्थिति, पाकिस्तान के उत्पात, पाकिस्तान, बांग्ला देश में इस्लामी जिहादियों की हिंसा के तांडव, अल्पसंख्यकों पर बढ़ते हमले, इन घटनाओं पर छायी चुप्पी, गहरी चिंता में डाल रहे हैं. ये क्षण विस्तृत योजना बनाने और उन पर तब तक अमल करने का है जब तक वांछित परिणाम न आ जाएं।
सामान्य जानकारी ये है कि 1979 में रूस ने अफगानिस्तान के तत्कालीन नेतृत्व के निमंत्रण पर अफगानिस्तान में अपनी सेनाएं भेजी थीं. अमरीका वियतनाम की हार के कारण आहत था और बदला लेने की ताक में था. उसने पाकिस्तान के तत्कालीन राष्ट्रपति जिया-उल-हक़, सऊदी अरब, संयुक्त अरब अमीरात के नेतृत्व को तैयार किया. जिसके कारण धरती का ये भाग कराह रहा है. यहाँ सबसे बड़े कारण का जिक्र नहीं होता कि इन सब कारकों को इकट्ठा तो अमरीका की बदले की भावना ने किया मगर इन सबको मिला कर जो विषैला पदार्थ बना उसे टिकाने वाला, जोड़े रखने वाला Bainding force क्या था ? एक ऐसे देश में लड़ाई के लिए जिससे उनकी सीमाएं भी नहीं लगतीं, अपने खरबों डॉलर झोंकने के लिए सऊदी अरब, संयुक्त अरब अमीरात क्यों तैयार हो गए ? अगर ये इस्लाम नहीं था तो वो कारण क्या था ?
सबको स्वीकारने, सबको जीवन का अधिकार देने, सबको अपनी इच्छानुसार उपासना करने, सबको स्वतंत्र सांस लेने का अधिकार देने वाली समावेशी मूर्तिपूजक, प्रकृतिपूजक संस्कृति जिसे इस भाग में हिन्दू संस्कृति कहा जाता है, ही विश्व की मूल संस्कृति है. विश्व भर में एक ईश्वर या अल्लाह जैसा कुछ मानने वाले सेमेटिक मजहबों ने इसी के हिस्से तोड़-तोड़ कर अपने साम्राज्य खड़े किये हैं. निकटतम अतीत में हमसे पाकिस्तान और बांग्ला देश छीने गए हैं. जिन दिनों पाकिस्तान बनाने का आंदोलन चल रहा था, मुस्लिम नेता शायर इकबाल की पंक्तियाँ बहुत पढ़ते थे. इकबाल की 'शिकवा' जवाबे-शिकवा' नामक दो लम्बी नज्मों में इस्लाम का मूल दर्शन लिखा हुआ है. उसकी एक बहुत चर्चित पंक्ति है
" तू शाहीं है बसेरा कर पहाड़ों की चटानों पर"
शाहीं यानी बाज़ जो आकाश में सारे पक्षियों से ऊपर उड़ता है. स्वतंत्र जीवन जीता है. पहाड़ों में रहने वाले, छोटी चिड़ियों का झपट्टा मार कर शिकार करने वाले, उनका मांस नोच-नोच कर खाने वाले बाज़ के जीवन-दर्शन को इस्लामी नेतृत्व ने अपने समाज के लिए आदर्श माना। इक़बाल का ही इसी सिलसिले का एक शेर और उद्धृत करना चाहूंगा।
जो कबूतर पर झपटने में मजा है ऐ पिसर { बाज अपने बेटे से कह रहा है }
वो मजा शायद कबूतर के लहू में भी नहीं
पुरानी कहावत है कि नाग पालने वाले नागों से डँसे जाने के लिए अभिशप्त होते हैं. जिस रूपक की सभ्य समाज उपेक्षा करता, घृणा करता, उसे इस्लामियों ने अपना प्रेरणा-स्रोत माना। अब ये बाजों के झुण्ड कबूतर पर झपटने का मज़ा अधिक पाने के लिए पेशावर में उतर आये हैं. यहां थे की जगह हैं प्रयोग जान-बूझ कर कर रहा हूँ कि ये कोई नई घटना नहीं है. इस्लामी इतिहास को देखें तो मुहम्मद जी ने अपने साथियों के साथ उत्तरी अरब में रहने वाले एक यहूदी कबीले बनू कुरैजाह पर आक्रमण किया. 25 दिन तक युद्ध करने के बाद यहूदियों के इस कबीले ने आत्मसमर्पण कर दिया। इस्लामी सूत्रों के हवाले से एक औरत सहित सारे पुरुषों के गले धड़ से अलग कर दिए गये. अन्य सूत्रों के अनुसार यहूदियों के 400 से 900 पुरुषों के गले काट डाले गए जिनमें बच्चे भी थे. भारत में दसवीं पादशाही गुरु गोविन्द सिंह के दो बेटे साहबज़ादे जोरावर सिंह, साहिबजादे फतह सिंह मुगल नवाब के काल में काजी के फतवे पे दीवार में चुनवा दिए गए थे. 7 साल के बच्चे वीर हकीकत राय की मसलमान न बनने के कारण बोटियाँ नोच ली गयी थीं. भारत में इस तरह की घटनाओं के तो मुस्लिम इतिहासकारों के स्वयं लिखित असंख्य वर्णन मिलते हैं. 2004 में रूस के बेसलान नगर में इस्लामी आतंकवादियों ने एक स्कूल पर कब्ज़ा कर 777 बच्चों सहित 1100 लोगों को बंधक बना लिया था. 3 दिन चले इस संघर्ष में 186 बच्चों सहित 385 बंधक मारे गए.
ये इस्लामियों का गैरइस्लामी लोगों के साथ सामान्य व्यवहार है. आइये पेशावर की घटना पर लौटते हैं. पेशावर में अरबी नहीं बोली जाती। पेशावर से अरबी बोलने वाले क्षेत्र सैकड़ों किलोमीटर दूर हैं. अपने क्षेत्र से वहां अरबी बोलने वाले मारने-मरने क्यों आये ? छोटे-छोटे बच्चों की आँखों में, सर में गोलियां मारने वाले केवल जुनूनी हत्यारे नहीं हो सकते ? इन लोगों की मग्ज-धुलाई, वो भी इस तरह कि हत्यारे जान लेते हुए अपनी जान देने के लिए आतुर हो जाएं, कोई सामान्य षड्यंत्र का परिणाम नहीं हो सकता. भारत का अरीब और उसके कुछ साथी जिहाद के लिए सीरिया क्यों गए ? नाइजीरिया के स्कूल में रात के दो बजे आग लगा कर ग्यारह साल से अट्ठारह साल के चालीस बच्चों को जला कर क्यों बोको-हराम के लोगों ने मार डाला ?
ये हत्यारे आप-मुझ जैसे पहनावे वाले, खान-पान वाले लोग हैं मगर इनका मानस बिलकुल अलग है. दिन में पांच बार एक विशेष प्रकार के अराध्य की नमाज़ पढने वाले, हर नमाज़ में एक उंगली उठा कर गवाही देने वाले " अल्लाह एक है, उसमें कोई शरीक नहीं, मुहम्मद उसका पैगम्बर है", चौबीसों घंटे स्वयं को शैतानों से भरे समाज में मानने-समझने वाले अगर ऐसा करने पर उतारू हो जाएँ तो ये कोई असामान्य बात नहीं है. ये "कत्ताल फ़ी सबीलल्लाह जिहाद फ़ी सबीलल्लाह" की सामान्य परिणिति है. "अल्लाह की राह में क़त्ल करो-अल्लाह की राह में जिहाद करो" पर अटूट विश्वास का परिणाम है.
इस सोच की नींव हिलाये बगैर ये दर्शन कैसे ध्वस्त होगा ? सदियों से सभ्य समाज ने इस विषैली विचारधारा को नजरअंदाज किया है. किसी कैंसर-ग्रस्त व्यक्ति के ये मानने से ' मैं स्वस्थ हूँ' वो स्वस्थ नहीं हो जाता. पाकिस्तान का जन्म मुसलमानों ने स्वयं को काफिरों से श्रेष्ठ मानने, सदियों तक अपने गुलाम रहे हिन्दुओं के प्रजातंत्र के कारण स्वयं पर हावी हो जाने की संभावना से बचने के लिए किया था. इसी अनैतिहासिक और ऊटपटांग दर्शन के कारण उन्होंने पाकिस्तान की शिक्षा प्रणाली भी ऐसी ही मूर्खतापूर्ण बनायी. अब इस विषवृक्ष के फल आ गए हैं. इस विचारधारा को माशाअल्लाह और इंशाअल्लाह जप कर ढेर नहीं किया जा सकता.
इसके लिए मानव सभ्यता के पहले चरण " सभी मनुष्य बराबर हैं " का आधार ले कर इसके विपरीत हर विचार को तर्क, दंडात्मक कारवाही से नष्ट करने के अतिरिक्त कोई उपाय नहीं है. इसे परास्त बल्कि नष्ट करने के लिए वैचारिक स्तर पर, उन देशों से जहाँ-जहाँ इसके विष-बीज मौजूद हैं, प्रत्येक स्तर पर लड़ाई लड़नी पड़ेगी. जनतंत्र के सामान्य सिद्धांत " प्रत्येक मनुष्य बराबर है, सभी के अधिकार बराबर हैं. जीवन का अधिकार मौलिक अधिकार है " को विश्व का दर्शन बनाना पड़ेगा। इसके विपरीत विचार रखने वाले व्यक्ति-समूह-समाज का हर प्रकार से दमन करना पड़ेगा. ये जितना पाकिस्तान, अफगानिस्तान, बांग्ला देश के लिए आवश्यक है उतना हमारे लिए भी आवश्यक है.
पाकिस्तानी पड़ौसियो ! मैं इस दारुण दुःख में आपके साथ हूँ और आपके गम में रोना चाहता हूँ मगर मैं क्या करूँ मेरी आँखे तो बारह सौ साल से लहू रो रही हैं. तो ऐसा करता हूँ मैं इस घटना पर उतना ही दुःख मना लेता हूँ जितना मुंबई में ताज होटल और यहूदी धर्मस्थल पर हुए आतंकी आक्रमण के समय आपने मनाया था
लेखक: तुफैल चतुर्वेदी - 

गुरुवार, 20 अगस्त 2015

पर्वत को हिलाने वाले देवदूत


मुझे पढ़ने का बहुत शौक है किन्तु मै हैरान हूँ कि  मेने आज तक दशरथ मांझी जैसे देव पुरुष को कभी नहीं पढ़ा। दशरथ मांझी ने अपने जीवन के दो दशक हथौड़ी और छेनी से पहाड़ काटकर रास्ता बनाने में व्यतीत कर दिए। उनका जीवन संघर्ष, त्याग, प्रेम और परोपकार का प्रतीक है।
यह सच्ची कहानी है दशरथ मांझी नाम के एक गरीब आदमी की।   दशरथ मांझी का जन्म १९३४ में बिहार के गेलहर गॉंव में एक बहुत गरीब परिवार में हुआ।   वे बिहार के आदिवासी जनजाति में के बहुत निम्न स्तरीय मुसाहर जनजाति से थे।   उनकी पत्नी का नाम फाल्गुनी देवी था।   दशरथ मांझी के लिए पीने का पानी ले जाते फाल्गुनी देवी दुर्घटना की शिकार हुई।  उन्हें तत्काल  डॉक्टरी सहायता नहीं मिल पाई।   शहर उनके गॉंव से ७० किलोमीटर दूर था। लेकिन वहॉं तक तुरंत पहुँचना संभव नहीं था।   दुर्भाग्य से वैद्यकीय उपचार के अभाव में फाल्गुनी देवी की मौत हो गई।   ऐसा प्रसंग किसी और पर न गुजरे, इस विचार ने दशरथमांझी को वो प्रेरणा दी जिसकी मिसाल आम आादमी के तो बस  की बात नही थी।  
समीप के शहर की ७० किलोमीटर की दूरी कैसे पाटी जा सकती है इस दिशा में उनका विचार चक्र चलने लगा।  उनके ध्यान में आया कि, शहर से गॉंव को अलग करने वाला पर्वत हटाया गया तो यह दूरी बहुत कम हो जाएगी।   पर्वत तोडने के बाद शहर से गॉंव तक की सत्तर किलोमीटर दूरी केवल सात किलोमीटर रह जाती। उन्होंने यह काम शुरू करने का दृढ निश्चय किया,लेकिन काम आसान नहीं था।   इसके लिए उन्हें उनका रोजी-रोटी देने का दैनंदिन काम छोडना पड़ता। उन्होंने अपनी बकरियॉं बेचकर छैनी , हथोड़ा  और फावडा खरीदा।   अपनी झोपडी काम के स्थान के पास बनाई. इससे अब वे दिन-रात काम कर सकते थे।   इस काम से उनके परिवार को दुविधाओं का सामना करना पड़ा, कई बार दशरथ को खाली पेट ही काम करना पड़ा।   उनके आस-पास से लोगों का आना-जाना शुरू था।   आस पास के गांवों  में इस काम की चर्चा हो रही थी।  सब लोगों ने दशरथ को पागल मान लिया था।  उनकी हँसी उड़ाई जा रही थी।  उन्हें गॉंव के लोगों की तीव्र आलोचना सहनी पडती थी।   लेकिन वे कभी भी अपने निश्चय से नहीं डिगे।   जैसे-जैसे काम में प्रगति होती उनका निश्चिय भी पक्का होता जाता।   लगातार बाईस वर्ष दिन-रात किए परिश्रम के कारण १९६० में शुरु किया यह असंभव लगने वाला काम १९८२ में पूरा हुआ। उनके अकेले के परिश्रम ने अनिश्चित  लगने वाला कार्य , पर्वत तोडकर ३६० फुट लंबा, २५ फुट ऊँचा और ३० फुट चौडा रास्ता बना डाला।   इससे गया जिले में  आटरी और वझीरगंज इन दो गॉंवों में का अंतर दस किलोमीटर से भी कम रह गया।  उनकी पत्नी फाल्गुनी देवी – जिसकी प्रेरणा से उन्होंने यह असंभव लगने वाला काम पूरा किया, उस समय उनके पास नहीं थी।   लेकिन, गॉंव के लोगों से जैसे बन पड़ा, उन्होंने मिठाई, फल दशरथजी को लाकर दिए और उनके साथ उनकी सफलता की खुशी मनाई।  आज तो उनके छेत्र में युवक भी चॉंव से इस पर्वत को हिलाने वाले देवदूत की कहानी सुनने लगे है।  गॉंव वालों ने दशरथ जी को ‘साधुजी’ पदवी दी है। दशरथ जी कहते थे , ‘‘मेरे काम की प्रथम प्रेरणा है मेरा पत्नी पर का प्रेम. उस प्रेम ने ही पर्वततोडकर रास्ता बनाने की ज्योत मेरे हृदय में जलाई।   करीब के हजारों लोग अपनी रोजाना की  आवश्यकताओं के लिए बिना कष्ट किए समीप के शहर जा सकेगे, यह मेरी आँखो के सामने आने वाला दृश्य  मुझे दैनंदिनकार्य के लिए प्रेरणा देता था।   इस कारण ही मैं चिंता और भय को मात दे सका.’’
आज दशरथ मांझी इस संसार में नही हैं किन्तु उनके कार्य ने उन्हें देवता तो बना ही दिया है।

मंगलवार, 4 अगस्त 2015

क्या भारत के गृहमंत्री पागल हो गए हैं ?


आई एस को लेकर हमारे गृह मंत्री राजनाथ सिंह का बेतुका  बयान  आया है कि आई एस से निपटने के लिए मुसलमानो से बेहतर तालमेल बनाने का प्रयास किया जाएगा तथा भ्रमित नव युवकों को मुख्यधारा में लाने का प्रयास किया जाएगा।  यानि १०० दिन चले अढ़ाई कोस।बिल्कुल कांग्रेस के नेताओं वाला उत्तर।   ऐसा लगता है कि भारत के गृहमंत्री साहब या तो इस्लाम के इतिहास का ज्ञान नहीं रखते हैं या उनका पागलपन कांग्रेस के मुस्लिम प्रेम की हद तक बढ़ता जा रहा है।  
 असल में  जो इस्लामी आन्दोलन  आई एस  चला  रहा है , उस के पीछे इस्लाम की प्रकृति और स्वभाव को समझ लेना भी जरुरी है । इस्लाम के संस्थापक हज़रत मोहम्मद का देहान्त हो जाने के बाद अरब के  विभिन्न कबीलों में  हज़रत मोहम्मद का उत्तराधिकारी कौन हो इसको लेकर जंग शुरु हो गई थी । यह जंग केवल आध्यात्मिक विरासत की जंग नहीं थी । यदि मामला केवल आध्यात्मिक मामलों का ही होता तो शायद जंग का स्वरुप कुछ और होता । यह मामला राजनैतिक सत्ता का भी था क्योंकि हज़रत मोहम्मद अपने जीवन काल में पैग़म्बर व आध्यात्मिक मार्गदर्शन होने के साथ साथ अरब के सम्राट  भी थे । यह राजनैतिक पद ख़लीफ़ा के नाम से प्रसिद्ध हुआ । इस विवाद में 632 में अबू वकर पहले ख़लीफ़ा बने और 634 में उमर दूसरे । लेकिन जब मामला हज़रत मोहम्मद के दामाद अली तक पहुँचा तो उनका नम्बर चौथा था । 661 में अली के के बाद उनके पुत्र हसन की बारी थी । हसन ने गद्दीनशीन होने के बाद ख़लीफ़ा का पद मुवैया के पक्ष में त्याग दिया । लेकिन नये मुसलमान बने अरब कबीलों ने इस मसले का एक बारगी निबटारा कर देना उचित समझा ।
 मोहम्मद के उत्तराधिकार की लड़ाई अपनी चरम सीमा तक पहुँच चुकी थी । अरब के मुसलमानों ने हज़रत मोहम्मद के दोहित्र हुसैन को कर्बला के मैदान में समस्त परिवार सहित १० अक्तूबर ६८० को मार दिया । सत्ता के लालच में किये जा रहे इस अमानवीय कार्य का विरोध भारत ने भी किया । मोहियाल ब्राह्मणों ने हिम्मत के साथ हुसैन को अन्यायपूर्ण तरीक़े से मार रही मुसलमान सेनाओं से लोहा लिया और उसमें अनेक भारतीय शहीद भी हुये ।   इरानी लोग मुसलमानों के विरोध में हुसैन की परम्परा के पक्ष में खड़े हो गये और शिया कहलाने लगे । यह मतान्तरण से अपमान भोग रहे इरान का इस्लाम के प्रति विद्रोह था और अरब के मुसलमानों के हाथों हुई अपमानजनक पराजय का एक प्रकार से परोक्ष बदला था । शिया समाज मुसलमानों के हाथों हुसैन की अमानुषिक हत्या की स्मृति में हर साल ताजिया निकालता था । पर मुसलमानों की दृष्टि में यह मूर्ति पूजा थी , जिसे तुरन्त बंद किया जाना चाहिये ।
बाद के इतिहास में अनेक परिवर्तन हुये । मुसलमानों ने अपने आस पास के देशों को ही नहीं बल्कि यूरोप तक में धावे मार कर उनको जीता और मतान्तरित किया । तुर्क , अफ़ग़ान और मध्य एशिया के लगभग सभी कबीले इसके शिकार हुये लेकिन इस बीच ख़लीफ़ा का पद भी अनेक स्थानों से गुज़रता हुआ अन्त में तुर्की के पास आ गया । अरबों के पास बचा केवल मक्का । इसाईयों और मुसलमानों के बीच हुये भयंकर युद्धों में ही मुसलमानों ने विशाल आटोमन साम्राज्य खड़ा कर लिया । इरान और वर्तमान में इराक़ के नाम से जाना जाने वाला शिया समाज मुसलमानों का मुक़ाबला नहीं कर सका और एक प्रकार से अप्रासंगिक हो गया । परन्तु प्रथम और द्वितीय विश्व युद्धों ने पूरी स्थिति ही बदल दी । विशाल आटोमन साम्राज्य छिन्न भिन्न ही नहीं हुआ बल्कि ख़लीफ़ा का मुकुट धारण करने वाले तुर्की में ही लोगों ने बगावत कर दी और वहाँ के महान स्वतंत्रता सेनानी कमाल पाशा अता तुर्क के नेतृत्व में सत्ता पलट दी । कमाल पाशा ने ख़लीफ़ा के पद को समाप्त किया।
लेकिन आज आई एस ने मुसलमानो के बीच में खलीफा के पद को दोबारा से लाकर  पूरे विश्व में मुसलमानो को जिहाद के लिए ललकारा है।  आई एस को सबसे आसान टारगेट भारत मिला है क्योंकि राजनाथ जी यहां पर करोड़ो की संख्या में भ्रमित नौजवान उनके लिए पलके बिछाए बैठे हैं।  भारत में केरल ,कश्मीर ,उत्तर प्रदेश ,आसाम ,बंगाल ,बिहार जैसी जगहों पर ऐसे करोड़ो भ्रमित नोजैवां आसानी से मिल जायेंगे जिनको बचपन से ही जिहाद का पाठ पढ़ाया जाता है।  उन्हें बचपन से ही सिखाया जाता है कि उन्हें केवल और केवल काफिरों को कत्ल करना है और काफिर कौन है यहां मुझे बताने की आवश्यकता नहीं है।
 गृहमंत्री जी इस पूरी पृष्ठभूमि में मुसलमानों के मन में एक बार फिर विश्व में इस्लामी राज्य स्थापित करने का सपना पैदा हुआ ,ताकि दूसरे विश्व युद्ध के बाद समाप्त हो चुके ख़लीफ़ा और ख़लाफत को फिर ज़िन्दा किया जा सके । और आई एस के इस सपने को पूरा करने के लिए भारत में हजारों की संख्या में मदरसों के रूप ऐसे ही भ्रमित नौजवान बनाने की फैक्ट्रियां लगी हुई हैं।   इसलिए भारत आई एस  का एक सॉफ्ट टारगेट है। राजनाथ जी वैसे भी   ज़्यादा ख़तरा उन देशों को हो सकता है , जिन पर कभी विदेशी इस्लामी सेनाओं ने क़ब्ज़ा भी कर लिया था , उन देशों को इस्लाम में मतान्तरित करने के प्रयास भी किये लेकिन इसमें उन्हें आधी अधूरी सफलता ही मिली।  अब अल बगदादी ने जो नई घोषणा की है , जिसे इराक़ की आधिकारिक सरकार ने नकारा है , उसमें अगला निशाना भारत को ही बताया गया है ।
राजनाथ जी अपने इतिहास का ज्ञान भी जरा सा ठीक करलें कि अगर आप आज हिन्दू हैं तो वो वीर बाप्पा रावल ,राजा दाहिर ,राजा जयपाल ,गुर्जर नरेश नागभट्ट ,पृथ्वी राज चौहान,राजा हेमचन्द्र ,महाराणा प्रताप ,हरिहर बुक्का ,राजा कृष्णदेव राय , गुरु गोविन्द सिंह ,छत्रपति शिवा जी,वीर छत्रसाल वृंदा वैरागी ,महाराजा रणजीत सिंह ,हरि सिंह  नलवा जैसे वीर महान सैनानियों की वजह से हैं जिन्होंने भारत माता की आन- बान की रक्षा के लिए जीवन भर इस्लाम से युद्ध किया। वरना जयचंदों और मानसिह जैसे दोगलों ने भारत के इस्लामीकरण में कोई कोर कसार नहीं छोड़ी।
 ३ जनवरी २०१४  को इस जिहादी सेना ने इस्लामी राज्य के नाम से नये राज्य की घोषणा कर दी , जिसकी राजधानी मोसुल को बनाया गया और   २९ जून २०१४ को अबू बकर अल बगदादी ने अपने आप को इस्लामी राज्य का ख़लीफ़ा घोषित कर दिया । इतना ही नहीं नये ख़लीफ़ा के बन जाने के जोश में मुसलमानों ने जम्मू कश्मीर में भी शिया समाज पर हमले तेज़ कर दिये  ।
 भारत में भी आई एस के समर्थन के स्पष्ट रूप से प्रमाण  मिल रहे हैं । अब बगदादी इन सभी में समन्वय स्थापित करने का प्रयास करेगा ही ।पर  सबसे बड़ी चिन्ता की बात  यह है कि भारत के मुसलमान आई एस के स्वागत के लिए आँखे बिछाये बैठे हैं और वहीँ हमारा गृहमंत्री उन्हें प्यार से भ्रमित नौजवान   कहकर बुला रहा है।  

शनिवार, 18 जुलाई 2015

बन्दर नाच (tufail chaturvedi ji )

                                                                 
महाराष्ट्र सरकार ने उन मदरसों के, जो आधुनिक विषय नहीं पढ़ा रहे हैं, को स्कूल न मानने और उनका अनुदान बंद करने का निर्णय लिया है। इस पर कई मुस्लिम और कांग्रेसी राजनेता, पत्रकार, मीडिया चैनल चिल्ल-पौं मचा रहे हैं। लगभग "भरतपुर लुट गयो रात मोरी अम्मा' वाली नौटंकी चल रही है। ये अनुकूल समय है कि इसी बहाने शिक्षा के उद्देश्य, उसको प्राप्त करने की दिशा में मदरसा प्रणाली की सफलता और उन राजनेताओं, पत्रकारों की भी छान-फटक कर ली जाये। आख़िर किसी योजना के शुरू करने, वर्षों चलाने के बाद उसको लक्ष्य प्राप्ति की कसौटी पर खरा-खोटा जांचा जायेगा कि नहीं ? ये पैसा महाराष्ट्र में लम्बे समय तक शासन करने वाले कॉंग्रेसी मुख्यमंत्रियों, शिक्षा मंत्रियों के घर का पैसा नहीं था। ये धन समाज का है और समाज का धन नष्ट करने के लिये निश्चित ही नहीं होता।
सदैव से शिक्षा का मुख्य उद्देश्य मनुष्य को अर्थोपार्जन की धारा में डालना होता है। इसी से जुड़ा या अन्तर्निहित लक्ष्य ये भी होता है कि धन की प्राप्ति का मार्ग संवैधानिक ही होना चाहिये यानी व्यक्ति के संस्कार का विषय भी धन कमाने से जुड़ा होता है। ज़ाहिर है ऐसे लोग भी होते हैं जो जेब काटने, ठगी करने, चोरी करने, डाका डालने, अपहरण करके फिरौती वसूलने को भी घन प्राप्ति का माध्यम मानते हैं और ऐसा करते हैं। मध्य काल के अनेक योद्धा समूह इसी तरह से जीवन जीते रहे हैं। ब्रिटिश शासन के भारत में भी कंजर, हबोड़े, सांसी, नट इत्यादि अनेकों जातियों के समूह इसी प्रकार से जीवन यापन करते रहे हैं। प्रशासन, पुलिस के दबाव और सभ्यता के विकास के साथ उनका इस प्रकार का जीवन भी बदला और वो सब सभ्य समाज के साथ समरस होने लगे हैं। यहाँ एक प्रश्न टी वी चैनलों पर अंतहीन बहस करने-करवाने वाले ऐंकरों और उनसे सीखे-तैयार किये भेजों में कुलबुलायेगा कि सभ्य होने की सबकी अपनी-अपनी परिभाषा हैं। ऐसा कलुषित जीवन जीने वाले भी अपने को सर्वाधिक सभ्य मान सकते हैं।
इसलिये इसकी बिल्कुल सतही, बेसिक परिभाषा से काम चलाते हैं। प्रत्येक मनुष्य के सामान अधिकार, स्त्रियों तथा पुरुषों के बराबर के अधिकार, रजस्वला हो जाने के बाद ही लड़की का विवाह, दास-प्रथा का विरोध, जीवन का अधिकार मूल अधिकार { इसका अर्थ ये है कि राज्य ही अत्यंत-विशेष परिस्थिति में किसी व्यक्ति के प्राण ले सकता है और ऐसा करने के लिये भी अभयोग लगाने, सुनवाई करने की ठोस-सिक्काबंद न्याय व्यवस्था आवश्यक है। यानी शिक्षा का मुख्य उद्देश्य मनुष्य को संवैधानिक मार्गों से ही धन अर्जन करने का माध्यम सुझाना है।
यहाँ से मैं मदरसा की शिक्षण प्रणाली पर बात करना चाहता हूँ। भारत में मदरसों का प्रारम्भ बाबर ने किया था। हम सब जानते हैं बाबर मुग़ल आक्रमणकारी था। भारत में उस समय पचासों आक्रमणकारियों के नृशंस कार्यों, विद्धवंस के बाद भी गांव-गांव में अपनी गुरुकुल प्रणाली चल रही थी। हमें उस समय किसी नए शिक्षण की आवश्यकता नहीं थी। आइये विचार करें बाबर के भारत की भूमि में इस प्रणाली के बीज रोपने का क्या उद्देश्य रहा होगा ? इसे जानने के लिए उपयुक्त है कि मदरसों का सामान्य पाठ्यक्रम क्या है, वहां क्या पढ़ाया जाता है, इस पर विचार किया जाये।
मदरसा इस्लामी शिक्षा का माध्यम है। अब यहाँ क़ुरआन { अज़बर-उसे कंठस्थ करना, क़िरअत-उसे लय से पढ़ना, तफ़सीर-उसका विवेचन करना }, हदीस { मुहम्मद जी के जीवन की घटनाओं का लिपिबद्ध स्वरूप}, फ़िक़ा { इस्लामी क़ानून }, सर्फ़ उन्नव { अरबी व्याकरण } दीनियात { इस्लाम के बारे में अध्ययन }, मंतिक़ और फ़लसफ़ा { तर्क और दर्शन } पढ़ाये जाते हैं। इसके अतिरिक्त इस्लाम के विषय में अन्य सभी प्रकार का शिक्षण दिया जाता है। कुछ मदरसों में कंप्यूटर, अंग्रेजी, तारीख़ { मूलतः इस्लाम का इतिहास और कुछ भारत का भी इतिहास } पढ़ाया जाता है।
मैं आग्रह करूँगा कि मिडिया, प्रेस, सभाओं में हाय-हत्या करने वाले कोई भी सज्जन-दुर्जन-कुज्जन देवबंद, सहारनपुर, लखनऊ, बरेली, बनारस, सूरत, पटना, दरभंगा, कलकत्ता, थाणे कहीं के भी मदरसों में जा कर केवल एक किनारे चुपचाप खड़े हो कर वहां की चहलपहल देखें। वहां पूरा वातावरण मध्य युगीन होता है। ढीले-ढाले कपड़े पहने, प्रचलित व्यवहार से बिलकुल भिन्न टोपियां लगाये इन छात्रों की आँखों में झांकें। आप पायेंगे इनकी आँखों में विकास करने, आगे बढ़ने, समाज के हित में कुछ करने की ललक, सपने हैं ही नहीं। आप वहां इतिहास की अजीब सी व्याख्या, उसके कुछ हिस्सों का मनमाना पाठ, अरबी सीखने के नाम पर कुछ अपरिचित आवाज़ें रटते लोगों को पाते हैं। ऐसे लोग जो मानते हैं औरत आदमी की पसली से बनायी गयी है। उसमें बुद्धि नहीं होती और वो नाक़िस उल अक़्ल है। उसे परदे में रहना चाहिये। उसका काम मुस्लिम बच्चे पैदा करना, घर की अंदरूनी देखभाल है। जो आज भी समझते हैं कि धरती गोल नहीं चपटी है। सूरज शाम को कीचड़ भरे तालाब में डूब जाता है।
Till, when he reached the setting-place of the sun, he found it setting in muddy spring, and found a people thereabout: We said: O Dhu'l-Qarneyn! Either punish him or show them kindness { Quraan Ayat 86 chapter 18 Al-Kahaf }
ऐसे छात्र जो समझते हैं कि केवल वो जिस सिमित जीवन-शैली के बारे में जानते हैं, वही सही है और शेष दुनिया शैतानी है। प्रकृति के प्रत्येक कण के प्रति आभारी-आस्थावान प्रकृति पूजक, मूर्ति-पूजक, ईसाई, यहूदी, पारसी, बौद्ध, शिन्तो, नास्तिक अर्थात उसके अतिरिक्त सारे ही लोग वाजिबुल-क़त्ल हैं। इन सबको मारे अथवा मुसलमान बनाये संसार में चैन नहीं आ सकता। संसार एक ईश्वर बल्कि अरबी अल्लाह की उसकी सीखी-पढ़ाई व्यवस्था से इबादत करने के लिये अभिशप्त है। आज नहीं तो कल सारी दुनिया इस्लाम क़ुबूल कर लेगी और क़ुरआन के रास्ते पर आ जाएगी। उन के जीवन का उद्देश्य इसी दावानल का ईंधन बनना है। संसार के बारे में ऐसी अटपटी, अजीब दृष्टि बनाना केवल इसी लिये संभव होता है चूँकि ये लोग असीम आकाश को चालाक लोगों की बनायी गयी बहुत छोटी सी खिड़की से देखते हैं। ये काफ़ी कुछ कुएँ के मेढक द्वारा समुद्र से आये मेंढक के बताने पर समुद्र की लम्बाई-चौड़ाई का अनुमान लगाने की तरह है। कुएँ में लगायी गयी कितनी भी छलाँगें, ढेरों उछल-कूद समुद्र के विस्तार को कैसे बता सकती है ? कुँए में रहने वाला समुद्र की कल्पना ही कैसे कर सकता है ? उसे समझ ही कैसे सकता है ?
मदरसा मूलतः इस्लामी चिंतन के संसार पर दृष्टिपात का उपकरण है। स्वाभाविक है ऐसी आँखें फोड़ने वाली विचित्र शिक्षा के बाद निकले छात्र जीवनयापन की दौड़ से स्वयं को बाहर पाते हैं। उन्हें मदरसे से बाहर की दुनिया पराई लगती है। इन तथ्यों की उपस्थिति में निस्संकोच ये निष्पत्ति हाथ आती है कि मदरसा दुनिया को देखने का ऐसा टेलिस्कोप है जिसके दोनों तरफ़ के शीशे पहले दिन से ही कोलतार से पुते हुए थे। इसका प्रयोग देखने वाले को कुछ उपलब्ध नहीं कराता बल्कि उसे समाज से काट देता है। वो कुछ न दिखाई देने के लिये अपनी बौड़म बुद्धि, ग़लत टेलिस्कोप को ज़िम्मेदार नहीं ठहराता बल्कि इसके लिए बेतुके तर्क ढूंढता है और उसे मंतिक़-फ़िक़ा का नाम देता है। मदरसे की जड़ में इस्लामी जीवन पद्धति है और ये पद्धति सारे समाज से स्वयं को काट कर रखती है। आप सारे विश्व में मुस्लिम बस्तियां अन्य समाजों से अलग पाते हैं। स्वयं सोचिये आपके मुस्लिम दोस्त कितने हैं ? वो आपको कितना अपने घर बुलाते हैं ? वो अपने समाज के अतिरिक्त अन्य समाज के लोगों में कितना समरस होते हैं ?
साहिबो यही बाबर का उद्देश्य था। भारत में भारत के पूरी तरह ख़िलाफ़, अटपटी तरह से सोचने-जीने वाला, आतंरिक विदेशी मानस पैदा करना। इसी तरह से भारत में इस मिटटी के लिये पराई सोच का पौधा जड़ें जमा सकता था। यही वो उपकरण है जिसने कश्मीर में आतंकवाद पनपाया है। वृहत्तर भारत की छोड़ें, इसी उपकरण के कारण अभी हमसे अफगानिस्तान, पाकिस्तान, बांग्ला देश अलग हुए थे। इसी उपकरण के उपयोग के कारण सारे संसार में वहाबियत फ़ैल रही है। यही वो अजीब से शिक्षण-प्रणाली है जो मनमाने ढंग से तर्क की कसौटी पर स्वयं को कसे बिना पूर्णरूपेण सही और दूसरों को घृणा-योग्य ग़लत समझती है। इसी वहाबी सोच के कारण वो संसार भर में नृशंस हत्याकांडों को आवश्यक समझती है। सबको मार डालने का ये दर्शन नरबलि देने वाले अघोरियों जैसा बल्कि उससे कहीं अधिक खतरनाक है चूँकि अघोरी विचार समूह का विचार नहीं है।
आज नहीं तो कल इससे तो हम निबट ही लेंगे मगर इस संस्थान से उपजी खर-पतवार का क्या किया जाये ? ये बाजार में बिकती नहीं और फिर मंडी पर ही पक्षपात का आरोप लगाने लगती है। सच्चर महाशय जिस निष्कर्ष पर पहुंचे थे वो इसी संस्थान की शिक्षा प्रणाली का परिणाम है। इस प्रणाली के पक्ष में विधवा-विलाप करने वाले किसी भी व्यक्ति का बेटा-बेटी मदरसे में आखिर क्यों नहीं पढ़ता ? ये लोग मदरसे में पढ़ी लड़की को अपनी बहू क्यों नहीं बनाते ? मदरसे के छात्र को दामाद क्यों नहीं बनाते ? सच्चाई उन्हें भी पता है मगर उनको लगता है कि मुल्ला पार्टी इस हाय हाय मचने से उनके पक्ष में वोट डलवा देगी। आखिर बिहार और उत्तर प्रदेश के चुनाव सन्निकट हैं और मुल्ला टोलियां अपने पक्ष में घुमानी हैं या नहीं ? मित्रो ! ये बन्दर नाच इसी लिए हो रहा है

मंगलवार, 9 जून 2015

भविष्य पुराण के अनुसार महामद ( मुहम्मद ) एक पैशाच धर्म स्थापक !               राकेश रंजन

इस्लाम के प्रचारक हिन्दुओं का धर्म परिवर्तन कराने के लिए तरह तरह के हथकण्डे अपनाते रहते हैं , कभी सेकुलर बन कर गंगा जमुनी तहजीब की वकालत करने लगते हैं , कभी इस्लाम और हिन्दू धर्म में समानता साबित करने लगते हैं , लेकिन इनका असली उद्देश्य हिन्दुओं को गुमराह करके इस्लाम के चंगुल में फँसाना ही होता है , क्योंकि अधिकांश हिन्दू इस्लाम से अनभिज्ञ और हिन्दू धर्म से उदासीन होते हैं , इस समय इस्लाम के प्रचारकों में जाकिर नायक का नाम सबसे ऊपर है। जो एक "सलफ़ी जिहादी" गिरोह से सम्बंधित है। यह गिरोह जिहाद में आतंकवाद को उचित मानता है। जाकिर नायक का पूरा नाम "जाकिर अब्दुल करीम नायक " है ,इसका जन्म 18 अक्टूबर सन 1965 में हुआ था। इसने मेडिकल डाक्टर की ट्रेनिंग छोड़ कर इस्लाम का प्रचार करना शुरू कर दिया और दुबई (UAE ) में इस्लामिक रिसर्च फाउंडेशन (Islamic Research Foundation ) नामकी एक संस्था बनाई , यही नहीं जाकिर "पीस टीवी (Peace TV ) नामका निजी चैनल भी चलाता है , जिसका मुख्यालय भी दुबई में है। जाकिर अक्सर अपने चैनल पर चर्चा के लिए दूसरे धर्म के लोगों को आमंत्रित करता है , फिर उन्हीं के धर्म ग्रन्थ से कुछ ऐसे अंश पेश करता है , जिनसे साबित हो सके कि उनके धर्मग्रन्थ में भी मुहम्मद , अल्लाह और रसूल का उल्लेख है,जिससे भोले भले लोग मुसलमान बन जाएँ।
जाकिर नायक ने ऐसी ही एक चाल 20 फरवरी 2014 को चली , जिसमे हिंदुओं को भ्रमित करने के लिए दावा कर दिया कि हिन्दुओं के धर्मग्रन्थ " भविष्य पुराण " में मुहम्मद का वर्णन है और उनको अवतार बताया गया है। जाकिर नायक ने बड़ी मक्कारी से हिन्दुओं को धोखा देने के लिए यह साबित करने का प्रयास किया है कि भविष्य पुराण में मुहम्मद का वर्णन एक अवतार के रूप में किया गया है , इसलिए हिन्दू मुहम्मद को एक अवतार मान कर सम्मान दें और उसके धर्म इस्लाम को स्वीकार कर लें। हो सकता है कि कुछ मूर्ख जाकिर जाल में फंस कर जाकिर की बात को सही मान बैठे हों , लेकिन भविष्य पुराण में मुहम्मद को " महामद " त्रिपुरासुर का अवतार , धर्म दूषक और पिशाच धर्म का प्रवर्तक बताया गया है। यही नहीं भविष्य पुराण में इस्लाम को पिशाच धर्म और मुसलमानों को " लिंगोच्छेदी "यानि लिंग कटवाने वाले कहा गया है। भविष्य पुराण के जिस भाग में महामद वर्णन है ,वह मूल संस्कृत और उसके हिंदी अनुवाद के साथ दिया जा रहा है। ताकि लोगों का यह भ्रम दूर हो जाए की भविष्य पुराण में महामद को एक अवतार के रूप में प्रस्तुत किया गया है।
भविष्य पुराण में महामद ( मुहम्मद ) एक पैशाच धर्म स्थापक -भविष्य पुराण, प्रतिसर्ग पर्व, खण्ड 3, अध्याय 3 श्लोक . 1 -31
श्री सूत उवाच-
1. शालिवाहन वंशे च राजानो दश चाभवन्। राज्यं पञ्चशताब्दं च कृत्वा लोकान्तरं ययुः। ( श्री सूत जी ने कहा - राजा शालिवाहन के वंश में दस राजा हुए थे। उन सबने पञ्च सौ वर्ष पर्यन्त राज्य शासन किया था और अंत में दुसरे लोक में चले गए थे।)
2. मर्य्यादा क्रमतो लीना जाता भूमण्डले तदा। भूपतिर्दशमो यो वै भोजराज इति स्मृतः।( उस समय में इस भूमण्डल में क्रम से मर्यादा लीन हो गयी थी। जो इनमे दशम राजा हुआ है वह भोजराज नाम से प्रसिद्द हुआ।)
3. दृष्ट्वा प्रक्षीणमर्य्यादां बली दिग्विजयं ययौ। सेनया दशसाहस्र्या कालिदासेन संयुतः।( मर्यादा क्षीण होते देखकर परम बलवान उसने(राजा ने) दिग्विजय करने को गमन किया था। सेना में दस सहस्त्र सैनिक के साथ कविश्रेष्ठ कालिदास थे।)
4. तथान्यैर्ब्राह्मणैः सार्द्धं सिन्धुपारमुपाययौ जित्वा गान्धारजान् म्लेच्छान् काश्मीरान् आरवान् शठान्।( तथा अन्य ब्राह्मणों के सहित वह सिन्धु नदी के पार प्राप्त हुआ(अर्थात पार किया) था। और उसने गान्धारराज, मलेच्छ, काश्मीर, नारव और शठों को दिग्विजय में जीता।)
5. तेषां प्राप्य महाकोषं दण्डयोग्यानकारयत् एतस्मिन्नन्तरे म्लेच्छ आचार्येण समन्वितः।( उनका बहुत सा कोष प्राप्त करके उन सबको योग्य दण्ड दिया था। इसी समय काल में मलेच्छों का एक आचार्य हुआ।)
6. महामद इति ख्यातः शिष्यशाखा समन्वितः नृपश्चैव महादेवं मरुस्थलनिवासिनम्।(महामद शिष्यों की अपने शाखाओं में बहुत प्रसिद्द था। नृप(राजा) ने मरुस्थल में निवास करने वाले महादेव को नमन किया।)
7. गंगाजलैश्च सस्नाप्य पञ्चगव्य समन्वितैः। चन्दनादिभिरभ्यर्च्य तुष्टाव मनसा हरम् ।(पञ्चजगव्य से युक्त गंगा के जल से स्नान कराके तथा चन्दन आदि से अभ्याचना(भक्तिपूर्वकभाव से याचना) करके हर(महादेव) की स्तुति की ।)
भोजराज उवाच-
8. नमस्ते गिरिजानाथ मरुस्थलनिवासिने। त्रिपुरासुरनाशाय बहुमायाप्रवर्त्तिने।(भोजराज ने कहा - हे गिरिजा नाथ ! मरुस्थल में निवास करने वाले, बहुत सी माया में प्रवत होने त्रिपुरासुर नाशक वाले हैं।)
9. म्लेच्छैर्गुप्ताय शुद्धाय सच्चिदानन्दरूपिणे। त्वं मां हि किंकरं विद्धि शरणार्थमुपागतम् ।(मलेच्छों से गुप्त, शुद्ध और सच्चिदानन्द रूपी, मैं आपकी विधिपूर्वक शरण में आकर प्रार्थना करता हूँ।)
सूत उवाच-
10. इति श्रुत्वा स्तवं देवः शब्दमाह नृपाय तम्। गन्तव्यं भोजराजेन महाकालेश्वरस्थले ।( सूत जी ने कहा - महादेव ने प्रकार स्तुति सुन राजा से ये शब्द कहे "हे भोजराज आपको महाकालेश्वर तीर्थ जाना चाहिए।")
11. म्लेच्छैस्सुदूषिता भूमिर्वाहीका नाम विश्रुता। आर्य्यधर्मो हि नैवात्र वाहीके देशदारुणे ।(यह वाह्हीक भूमि मलेच्छों द्वारा दूषित हो चुकी है। इस दारुण(हिंसक) प्रदेश में आर्य(श्रेष्ठ)-धर्म नहीं है।)
12. बभूवात्र महामायी योऽसौ दग्धो मया पुरा। त्रिपुरो बलिदैत्येन प्रेषितः पुनरागतः ।(जिस महामायावी राक्षस को मैंने पहले माया नगरी में भेज दिया था(अर्थात नष्ट किया था) वह त्रिपुर दैत्य कलि के आदेश पर फिर से यहाँ आ गया है।)
13. अयोनिः स वरो मत्तः प्राप्तवान् दैत्यवर्द्धनः। महामद इति ख्यातः पैशाच कृति तत्परः ।(वह मुझसे वरदान प्राप्त अयोनिज(pestle, मूसल, मूलहीन) हैं। एवं दैत्य समाज की वृद्धि कर रहा है। महामद के नाम से प्रसिद्द और पैशाचिक कार्यों के लिए तत्पर है।)
14. नागन्तव्यं त्वया भूप पैशाचे देशधूर्तके। मत् प्रसादेन भूपाल तव शुद्धिः प्रजायते ।( हे भूप(भोजराज) ! आपको मानवता रहित धूर्त देश में नहीं जाना चाहिए। मेरी प्रसाद(कृपा) से तुम विशुद्ध राजा हो।)
15. इति श्रुत्वा नृपश्चैव स्वदेशान् पुनरागमत्। महामदश्च तैः सार्द्धं सिन्धुतीरमुपाययौ ।(यह सुनने पर राजा ने स्वदेश को वापस प्रस्थान किया। और महामद उनके पीछे सिन्धु नदी के तीर(तट) पर आ गया।)
16. उवाच भूपतिं प्रेम्णा मायामदविशारदः। तव देवो महाराज मम दासत्वमागतः ।( मायामद माया के ज्ञाता(महामद) ने राजा से झूठ कहा - हे महाराज ! आपके देव ने मेरा दासत्व स्वीकार किया है अतः वे मेरे दास हो गए हैं।)
17. ममोच्छिष्टं संभुजीयाद्याथात त्पश्य भो नृप। इति श्रुत्वा तथा परं विस्मयमागतः ।( हे नृप(भोजराज) ! इसलिए आज से आप मुझे ईश्वर के संभुज(बराबर) उच्छिष्ट(पूज्य) मानिए, ये सुन कर राजा विस्मय को प्राप्त भ्रमित हुआ।)
18. म्लेच्छधर्मे मतिश्चासीत्तस्य भूपस्य दारुणे, तच्छृत्वा कालिदासस्तु रुषा प्राह महामदम्।( राजा की दारुण(अहिंसा) मलेच्छ धर्म में रूचि में वृद्धि हुई। यह राजा के श्रवण करते देख, कालिदास ने क्रोध में भरकर महामद से कहा।)
19. माया ते निर्मिता धूर्त नृपम्हन हेतवे हनिष्यामि दुराचारं वाहीकं पुरुषाधमम्।( हे धूर्त ! तूने नृप(राजधर्म) से मोह न करने हेतु माया रची है। दुष्ट आचार वाले पुरुषों में अधम वाहीक को मैं तेरा नाश कर दूंगा।)
20. इत्युक्त्वा स द्विजः श्रीमान् नवार्ण जप तत्परः जप्त्वा दशसहस्रं च तद्दशांशं जुहाव सः।( यह कह श्रीमान ब्राह्मण(कालिदास) ने नर्वाण मंत्र में तत्परता की। नर्वाण मंत्र का दश सहस्त्र जाप किया और उसके दशाश जप किया।)
21. भस्म भूत्वा स मायावी म्लेच्छदेवत्वमागतः, भयभीतस्तु तच्छिष्या देशं वाहीकमाययुः।( वह मायावी भस्म होकर मलेच्छ देवत्व अर्थात मृत्यु को प्राप्त हुआ। भयभीत होकर उसके शिष्य वाहीक देश में आ गए।)
22. गृहीत्वा स्वगुरोर्भस्म मदहीनत्वमागतम्, स्थापितं तैश्च भूमध्ये तत्रोषुर्मदतत्पराः।( उन्होंने अपने गुरु(महामद) की भस्म को ग्रहण कर लिया और और वे मदहीन को गए। भूमध्य में उस भस्म को स्थापित कर दिया। और वे वहां पर ही बस गए।)
23. मदहीनं पुरं जातं तेषां तीर्थं समं स्मृतम्, रात्रौ स देवरूपश्च बहुमायाविशारदः।( वह मदहीन पुर हो गया और उनके तीर्थ के सामान माना जाने लगा। उस बहुमाया के विद्वान(महामद) ने रात्रि में देवरूप धारण किया।)
24. पैशाचं देहमास्थाय भोजराजं हि सोऽब्रवीत् आर्य्यधर्म्मो हि ते राजन् सर्ब धर्मोतमः स्मृतः ।( आत्मा रूप में पैशाच देह को धारण कर भोजराज से कहा। हे राजन(भोजराज) !मेरा यह आर्य समस्त धर्मों में अतिउत्तम है।
25. ईशाज्ञया करिष्यामि पैशाचं धर्मदारुणम् लिंगच्छेदी शिखाहीनः श्मश्रुधारी स दूषकः।(अपने ईश की आज्ञा से पैशाच दारुण धर्म मैं करूँगा। मेरे लोग लिंगछेदी(खतना किये हुए), शिखा(चोटी) रहित, दाढ़ी रखने वाले दूषक होंगे।)
26. उच्चालापी सर्वभक्षी भविष्यति जनो मम विना कौलं च पशवस्तेषां भक्ष्या मता मम।( ऊंचे स्वर में अलापने वाले और सर्वभक्षी होंगे। हलाल(ईश्वर का नाम लेकर) किये बिना सभी पशु उनके खाने योग्य न होगा।)
27. मुसलेनैव संस्कारः कुशैरिव भविष्यति तस्मात् मुसलवन्तो हि आतयो धर्मदूषकाः।( मूसल से उनका संस्कार किया जायेगा। और मूसलवान हो इन धर्म दूषकों की कई जातियां होंगी।)
28. इति पैशाच धर्म श्च भविष्यति मयाकृतः इत्युक्त्वा प्रययौ देवः स राजा गेहमाययौ।( इस प्रकार भविष्य में मेरे(मायावी महामद) द्वारा किया हुआ यह पैशाच धर्म होगा। यह कहकर वह वह (महामद) चला गया और राजा अपने स्थान पर वापस आ गया।)
29. त्रिवर्णे स्थापिता वाणी सांस्कृती स्वर्गदायिनी,शूद्रेषु प्राकृती भाषा स्थापिता तेन धीमता।( उसने तीनों वर्णों में स्वर्ग प्रदान करने वाली सांस्कृतिक भाषा को स्थापित किया और विस्तार किया। शुद्र वर्ण हेतु वहां प्राकृत भाषा के का ज्ञान स्थापित/विस्तार किया(ताकि शिक्षा और कौशल का आदान प्रदान आसान हो)।)
30. पञ्चाशब्दकालं तु राज्यं कृत्वा दिवं गतः, स्थापिता तेन मर्यादा सर्वदेवोपमानिनी।( राजा ने पचास वर्ष काल पर्यंत राज(शासन) करते हुए दिव्य गति(परलोक) को प्राप्त हुआ। तब सभी देवों की मानी जाने वाली मर्यादा स्थापित हुई।)
31. आर्य्यावर्तः पुण्यभूमिर्मध्यंविन्ध्यहिमालयोः आर्य्य वर्णाः स्थितास्तत्र विन्ध्यान्ते वर्णसंकराः।( विन्ध्य और हिमाचल के मध्य में आर्यावर्त परम पुण्य भूमि है अर्थात सबसे उत्तम(पवित्र) भूमि है, आर्य(श्रेष्ठ) वर्ण यहाँ स्थित हुए। और विन्ध्य के अंत में अन्य कई वर्ण मिश्रित हुए।)
भविष्य पुराण, प्रतिसर्ग पर्व, खण्ड 3, अध्याय 3 श्लोक . 1 -31
भविष्य पुराण के इन सभी श्लोकों को एक साथ पढ़कर महामद (मौहम्मद)के बारे में स्पष्ट जानकारी प्राप्त हो जाती है कि भविष्य पुराण में महामद के बारे में क्या लिखा है और क्या नही। अब जाकिर नायक बताये कि भविष्य पुराण के पैशाच धर्म के संस्थापक ही मुहम्मद साहब है तो वह हिन्दुओं के अवतार कैसे हुए ?

सोमवार, 30 मार्च 2015

कभी ना अंतर मिट पायेगा पूजा और अजान में,
कभी ना अंतर मिट पायेगा पूजा और अजान में,
काफिरों के सर काट दो लिक्खा यही कुरआन में
पूजा में हम यही मांगते, सब मंगल हों , अच्छा हो
गैर मुस्लिमो तुम काफिर हो,मुल्ला कहे ये शान में ,
कभी ना अंतर मिट पायेगा पूजा और अजान में,
जो आया उसको अपनाया ,सार धर्म ने यही बताया,
काफ़िर की जो गर्दन काटे ,उनका वो गाजी कहलाया।
हमने कभी ना अंतर बरता ,मस्जिद और शिवालों में ,
उनकी नंगी शमशीरों ने मासूमों का रक्त बहाया।
चीर हरण बहनो के, कर डाले ,पूरे हिन्दुस्तान में,
कभी ना अंतर मिट पायेगा पूजा और अजान में।
वेदों के हम रहे पुजारी ,गीता का भी ज्ञान सुनाया,
पर अहिंसा के गीतों ने हमको कैसा हीज़ बनाया।
वीरों की इस राष्ट्र भूमि ने कभी ना हिंसा पाली थी पर ,
धर्म ध्वजा की मर्यादा में,हर दुश्मन को मार भगाया।
भारत माँ की आन लुट गयी ,असि गई जब म्यान में
कभी ना अंतर मिट पायेगा पूजा और अजान में,
बम धमाके करते रहते ,मुजाहिद कहलाते है ,
वोटों की खातिर आँखों के,ये तारे बन जाते है।
दूध पिलाने हम साँपों को,पीरों पर ही जायेंगे ,
पी पी कर ये खून हमारा तालिबान बन जाते हैं।
सारा भारत देखना चाहते ये तो पाकिस्तान में.,
कभी ना अंतर मिट पायेगा पूजा और आजान में।
भारत माँ को डायन कहते,जो ना कभी लजाते हैं,
छुप छुप कर हैं हमला करते,कायरता सदा दिखाते हैं।
बार- बार ये धमकी- देकर,राजभवन -को ठगते है ,
ध्वज तिरंगा अग्नि में दे, हरा रंग फहराते है।
मारो काफ़िर काटो काफ़िर रहता हरदम ध्यान में,
कभी ना अंतर मिट पायेगा पूजा और अज़ान में।