गुरुवार, 20 अगस्त 2015

पर्वत को हिलाने वाले देवदूत


मुझे पढ़ने का बहुत शौक है किन्तु मै हैरान हूँ कि  मेने आज तक दशरथ मांझी जैसे देव पुरुष को कभी नहीं पढ़ा। दशरथ मांझी ने अपने जीवन के दो दशक हथौड़ी और छेनी से पहाड़ काटकर रास्ता बनाने में व्यतीत कर दिए। उनका जीवन संघर्ष, त्याग, प्रेम और परोपकार का प्रतीक है।
यह सच्ची कहानी है दशरथ मांझी नाम के एक गरीब आदमी की।   दशरथ मांझी का जन्म १९३४ में बिहार के गेलहर गॉंव में एक बहुत गरीब परिवार में हुआ।   वे बिहार के आदिवासी जनजाति में के बहुत निम्न स्तरीय मुसाहर जनजाति से थे।   उनकी पत्नी का नाम फाल्गुनी देवी था।   दशरथ मांझी के लिए पीने का पानी ले जाते फाल्गुनी देवी दुर्घटना की शिकार हुई।  उन्हें तत्काल  डॉक्टरी सहायता नहीं मिल पाई।   शहर उनके गॉंव से ७० किलोमीटर दूर था। लेकिन वहॉं तक तुरंत पहुँचना संभव नहीं था।   दुर्भाग्य से वैद्यकीय उपचार के अभाव में फाल्गुनी देवी की मौत हो गई।   ऐसा प्रसंग किसी और पर न गुजरे, इस विचार ने दशरथमांझी को वो प्रेरणा दी जिसकी मिसाल आम आादमी के तो बस  की बात नही थी।  
समीप के शहर की ७० किलोमीटर की दूरी कैसे पाटी जा सकती है इस दिशा में उनका विचार चक्र चलने लगा।  उनके ध्यान में आया कि, शहर से गॉंव को अलग करने वाला पर्वत हटाया गया तो यह दूरी बहुत कम हो जाएगी।   पर्वत तोडने के बाद शहर से गॉंव तक की सत्तर किलोमीटर दूरी केवल सात किलोमीटर रह जाती। उन्होंने यह काम शुरू करने का दृढ निश्चय किया,लेकिन काम आसान नहीं था।   इसके लिए उन्हें उनका रोजी-रोटी देने का दैनंदिन काम छोडना पड़ता। उन्होंने अपनी बकरियॉं बेचकर छैनी , हथोड़ा  और फावडा खरीदा।   अपनी झोपडी काम के स्थान के पास बनाई. इससे अब वे दिन-रात काम कर सकते थे।   इस काम से उनके परिवार को दुविधाओं का सामना करना पड़ा, कई बार दशरथ को खाली पेट ही काम करना पड़ा।   उनके आस-पास से लोगों का आना-जाना शुरू था।   आस पास के गांवों  में इस काम की चर्चा हो रही थी।  सब लोगों ने दशरथ को पागल मान लिया था।  उनकी हँसी उड़ाई जा रही थी।  उन्हें गॉंव के लोगों की तीव्र आलोचना सहनी पडती थी।   लेकिन वे कभी भी अपने निश्चय से नहीं डिगे।   जैसे-जैसे काम में प्रगति होती उनका निश्चिय भी पक्का होता जाता।   लगातार बाईस वर्ष दिन-रात किए परिश्रम के कारण १९६० में शुरु किया यह असंभव लगने वाला काम १९८२ में पूरा हुआ। उनके अकेले के परिश्रम ने अनिश्चित  लगने वाला कार्य , पर्वत तोडकर ३६० फुट लंबा, २५ फुट ऊँचा और ३० फुट चौडा रास्ता बना डाला।   इससे गया जिले में  आटरी और वझीरगंज इन दो गॉंवों में का अंतर दस किलोमीटर से भी कम रह गया।  उनकी पत्नी फाल्गुनी देवी – जिसकी प्रेरणा से उन्होंने यह असंभव लगने वाला काम पूरा किया, उस समय उनके पास नहीं थी।   लेकिन, गॉंव के लोगों से जैसे बन पड़ा, उन्होंने मिठाई, फल दशरथजी को लाकर दिए और उनके साथ उनकी सफलता की खुशी मनाई।  आज तो उनके छेत्र में युवक भी चॉंव से इस पर्वत को हिलाने वाले देवदूत की कहानी सुनने लगे है।  गॉंव वालों ने दशरथ जी को ‘साधुजी’ पदवी दी है। दशरथ जी कहते थे , ‘‘मेरे काम की प्रथम प्रेरणा है मेरा पत्नी पर का प्रेम. उस प्रेम ने ही पर्वततोडकर रास्ता बनाने की ज्योत मेरे हृदय में जलाई।   करीब के हजारों लोग अपनी रोजाना की  आवश्यकताओं के लिए बिना कष्ट किए समीप के शहर जा सकेगे, यह मेरी आँखो के सामने आने वाला दृश्य  मुझे दैनंदिनकार्य के लिए प्रेरणा देता था।   इस कारण ही मैं चिंता और भय को मात दे सका.’’
आज दशरथ मांझी इस संसार में नही हैं किन्तु उनके कार्य ने उन्हें देवता तो बना ही दिया है।

मंगलवार, 4 अगस्त 2015

क्या भारत के गृहमंत्री पागल हो गए हैं ?


आई एस को लेकर हमारे गृह मंत्री राजनाथ सिंह का बेतुका  बयान  आया है कि आई एस से निपटने के लिए मुसलमानो से बेहतर तालमेल बनाने का प्रयास किया जाएगा तथा भ्रमित नव युवकों को मुख्यधारा में लाने का प्रयास किया जाएगा।  यानि १०० दिन चले अढ़ाई कोस।बिल्कुल कांग्रेस के नेताओं वाला उत्तर।   ऐसा लगता है कि भारत के गृहमंत्री साहब या तो इस्लाम के इतिहास का ज्ञान नहीं रखते हैं या उनका पागलपन कांग्रेस के मुस्लिम प्रेम की हद तक बढ़ता जा रहा है।  
 असल में  जो इस्लामी आन्दोलन  आई एस  चला  रहा है , उस के पीछे इस्लाम की प्रकृति और स्वभाव को समझ लेना भी जरुरी है । इस्लाम के संस्थापक हज़रत मोहम्मद का देहान्त हो जाने के बाद अरब के  विभिन्न कबीलों में  हज़रत मोहम्मद का उत्तराधिकारी कौन हो इसको लेकर जंग शुरु हो गई थी । यह जंग केवल आध्यात्मिक विरासत की जंग नहीं थी । यदि मामला केवल आध्यात्मिक मामलों का ही होता तो शायद जंग का स्वरुप कुछ और होता । यह मामला राजनैतिक सत्ता का भी था क्योंकि हज़रत मोहम्मद अपने जीवन काल में पैग़म्बर व आध्यात्मिक मार्गदर्शन होने के साथ साथ अरब के सम्राट  भी थे । यह राजनैतिक पद ख़लीफ़ा के नाम से प्रसिद्ध हुआ । इस विवाद में 632 में अबू वकर पहले ख़लीफ़ा बने और 634 में उमर दूसरे । लेकिन जब मामला हज़रत मोहम्मद के दामाद अली तक पहुँचा तो उनका नम्बर चौथा था । 661 में अली के के बाद उनके पुत्र हसन की बारी थी । हसन ने गद्दीनशीन होने के बाद ख़लीफ़ा का पद मुवैया के पक्ष में त्याग दिया । लेकिन नये मुसलमान बने अरब कबीलों ने इस मसले का एक बारगी निबटारा कर देना उचित समझा ।
 मोहम्मद के उत्तराधिकार की लड़ाई अपनी चरम सीमा तक पहुँच चुकी थी । अरब के मुसलमानों ने हज़रत मोहम्मद के दोहित्र हुसैन को कर्बला के मैदान में समस्त परिवार सहित १० अक्तूबर ६८० को मार दिया । सत्ता के लालच में किये जा रहे इस अमानवीय कार्य का विरोध भारत ने भी किया । मोहियाल ब्राह्मणों ने हिम्मत के साथ हुसैन को अन्यायपूर्ण तरीक़े से मार रही मुसलमान सेनाओं से लोहा लिया और उसमें अनेक भारतीय शहीद भी हुये ।   इरानी लोग मुसलमानों के विरोध में हुसैन की परम्परा के पक्ष में खड़े हो गये और शिया कहलाने लगे । यह मतान्तरण से अपमान भोग रहे इरान का इस्लाम के प्रति विद्रोह था और अरब के मुसलमानों के हाथों हुई अपमानजनक पराजय का एक प्रकार से परोक्ष बदला था । शिया समाज मुसलमानों के हाथों हुसैन की अमानुषिक हत्या की स्मृति में हर साल ताजिया निकालता था । पर मुसलमानों की दृष्टि में यह मूर्ति पूजा थी , जिसे तुरन्त बंद किया जाना चाहिये ।
बाद के इतिहास में अनेक परिवर्तन हुये । मुसलमानों ने अपने आस पास के देशों को ही नहीं बल्कि यूरोप तक में धावे मार कर उनको जीता और मतान्तरित किया । तुर्क , अफ़ग़ान और मध्य एशिया के लगभग सभी कबीले इसके शिकार हुये लेकिन इस बीच ख़लीफ़ा का पद भी अनेक स्थानों से गुज़रता हुआ अन्त में तुर्की के पास आ गया । अरबों के पास बचा केवल मक्का । इसाईयों और मुसलमानों के बीच हुये भयंकर युद्धों में ही मुसलमानों ने विशाल आटोमन साम्राज्य खड़ा कर लिया । इरान और वर्तमान में इराक़ के नाम से जाना जाने वाला शिया समाज मुसलमानों का मुक़ाबला नहीं कर सका और एक प्रकार से अप्रासंगिक हो गया । परन्तु प्रथम और द्वितीय विश्व युद्धों ने पूरी स्थिति ही बदल दी । विशाल आटोमन साम्राज्य छिन्न भिन्न ही नहीं हुआ बल्कि ख़लीफ़ा का मुकुट धारण करने वाले तुर्की में ही लोगों ने बगावत कर दी और वहाँ के महान स्वतंत्रता सेनानी कमाल पाशा अता तुर्क के नेतृत्व में सत्ता पलट दी । कमाल पाशा ने ख़लीफ़ा के पद को समाप्त किया।
लेकिन आज आई एस ने मुसलमानो के बीच में खलीफा के पद को दोबारा से लाकर  पूरे विश्व में मुसलमानो को जिहाद के लिए ललकारा है।  आई एस को सबसे आसान टारगेट भारत मिला है क्योंकि राजनाथ जी यहां पर करोड़ो की संख्या में भ्रमित नौजवान उनके लिए पलके बिछाए बैठे हैं।  भारत में केरल ,कश्मीर ,उत्तर प्रदेश ,आसाम ,बंगाल ,बिहार जैसी जगहों पर ऐसे करोड़ो भ्रमित नोजैवां आसानी से मिल जायेंगे जिनको बचपन से ही जिहाद का पाठ पढ़ाया जाता है।  उन्हें बचपन से ही सिखाया जाता है कि उन्हें केवल और केवल काफिरों को कत्ल करना है और काफिर कौन है यहां मुझे बताने की आवश्यकता नहीं है।
 गृहमंत्री जी इस पूरी पृष्ठभूमि में मुसलमानों के मन में एक बार फिर विश्व में इस्लामी राज्य स्थापित करने का सपना पैदा हुआ ,ताकि दूसरे विश्व युद्ध के बाद समाप्त हो चुके ख़लीफ़ा और ख़लाफत को फिर ज़िन्दा किया जा सके । और आई एस के इस सपने को पूरा करने के लिए भारत में हजारों की संख्या में मदरसों के रूप ऐसे ही भ्रमित नौजवान बनाने की फैक्ट्रियां लगी हुई हैं।   इसलिए भारत आई एस  का एक सॉफ्ट टारगेट है। राजनाथ जी वैसे भी   ज़्यादा ख़तरा उन देशों को हो सकता है , जिन पर कभी विदेशी इस्लामी सेनाओं ने क़ब्ज़ा भी कर लिया था , उन देशों को इस्लाम में मतान्तरित करने के प्रयास भी किये लेकिन इसमें उन्हें आधी अधूरी सफलता ही मिली।  अब अल बगदादी ने जो नई घोषणा की है , जिसे इराक़ की आधिकारिक सरकार ने नकारा है , उसमें अगला निशाना भारत को ही बताया गया है ।
राजनाथ जी अपने इतिहास का ज्ञान भी जरा सा ठीक करलें कि अगर आप आज हिन्दू हैं तो वो वीर बाप्पा रावल ,राजा दाहिर ,राजा जयपाल ,गुर्जर नरेश नागभट्ट ,पृथ्वी राज चौहान,राजा हेमचन्द्र ,महाराणा प्रताप ,हरिहर बुक्का ,राजा कृष्णदेव राय , गुरु गोविन्द सिंह ,छत्रपति शिवा जी,वीर छत्रसाल वृंदा वैरागी ,महाराजा रणजीत सिंह ,हरि सिंह  नलवा जैसे वीर महान सैनानियों की वजह से हैं जिन्होंने भारत माता की आन- बान की रक्षा के लिए जीवन भर इस्लाम से युद्ध किया। वरना जयचंदों और मानसिह जैसे दोगलों ने भारत के इस्लामीकरण में कोई कोर कसार नहीं छोड़ी।
 ३ जनवरी २०१४  को इस जिहादी सेना ने इस्लामी राज्य के नाम से नये राज्य की घोषणा कर दी , जिसकी राजधानी मोसुल को बनाया गया और   २९ जून २०१४ को अबू बकर अल बगदादी ने अपने आप को इस्लामी राज्य का ख़लीफ़ा घोषित कर दिया । इतना ही नहीं नये ख़लीफ़ा के बन जाने के जोश में मुसलमानों ने जम्मू कश्मीर में भी शिया समाज पर हमले तेज़ कर दिये  ।
 भारत में भी आई एस के समर्थन के स्पष्ट रूप से प्रमाण  मिल रहे हैं । अब बगदादी इन सभी में समन्वय स्थापित करने का प्रयास करेगा ही ।पर  सबसे बड़ी चिन्ता की बात  यह है कि भारत के मुसलमान आई एस के स्वागत के लिए आँखे बिछाये बैठे हैं और वहीँ हमारा गृहमंत्री उन्हें प्यार से भ्रमित नौजवान   कहकर बुला रहा है।