रविवार, 1 नवंबर 2015

अगर मुस्लिम जनसंख्या का बढ़ता घनत्व न रुका तो फिर होंगी सीधी कार्यवाहियाँ

अभी हाल ही में आरएसएस के सह-सरकार्यवाह कृष्ण गोपाल ने कहा कि 2011 की जनगणना के धार्मिक आंकड़ों ने जनसंख्या नीति की समीक्षा को जरूरी बना दिया है।  प्रस्ताव में कहा गया है, "1951 से 2011 के बीच मूल भारतीय धर्मों से संबंध रखने वाले लोगों की जनसंख्या 88 प्रतिशत से घटकर 83.5 प्रतिशत रह गई है जबकि मुस्लिम आबादी 9.8 फ़ीसदी से बढ़कर 14.23 प्रतिशत हो गई है."प्रस्ताव में साथ ही कहा गया है कि 'सीमावर्ती राज्यों असम, पश्चिम बंगाल और बिहार में मुसलमानों की आबादी बढ़ने की दर राष्ट्रीय औसत से ज्यादा है जो इस बात का संकेत है कि बांग्लादेश की तरफ घुसपैठ जारी है."पूर्वोत्तर राज्यों में जनसंख्या के ‘‘धार्मिक असंतुलन’’ को गंभीर करार देते हुए प्रस्ताव में कहा गया है कि 1951 में अरुणाचल प्रदेश में भारतीय मूल के लोग 99.21 फ़ीसदी थे लेकिन 2011 में उनकी आबादी घटकर 67 फ़ीसदी रह गई।  
पश्चिमी उत्तर प्रदेश में  हिन्दू महासभा  जैसे हिन्दू संगठन पिछले कई वर्षों से ऐसी ही मांग करते  आ रहे हैं  ।  शायद इन हिन्दू संगठनों की  मेहनत  का नतीजा  है कि आज आर एस  एस को भी इस बात को बोलने पर मजबूर होना पड़ा है।पर सोचने वाली बात ये है कि आखिर ये सब मुस्लिम जनसंख्या की अनुपात को बढ़ता देखकर चिंतित क्यों हैं ?  
 इसके उत्तर के लिए इस्लाम को थोड़ा सा जानना जरुरी हो जाता है।  जमात-ए-इस्लामी के संस्थापक मौलाना मौदूदी कहते हैं कि कुरान के अनुसार विश्व दो भागों में बँटा हुआ है, एक वह जो अल्लाह की तरफ़ हैं और दूसरा वे जो शैतान की तरफ़ हैं। देशो की सीमाओं को देखने का इस्लामिक नज़रिया कहता है कि विश्व में कुल मिलाकर सिर्फ़ दो खेमे हैं, पहला दार-उल-इस्लाम (यानी मुस्लिमों द्वारा शासित) और दार-उल-हर्ब (यानी “शैतान ” द्वारा शासित)। उनकी निगाह में शैतान  का अर्थ है जो अल्लाह को नहीं मानता, क्योंकि विश्व के किसी भी धर्म के भगवानों को मुसलमान  मान्यता ही नहीं देते हैं।
इस्लाम सिर्फ़ एक धर्म ही नहीं है, असल में इस्लाम एक पूजापद्धति तो है ही, लेकिन उससे भी बढ़कर यह एक समूची “व्यवस्था” के रूप में मौजूद रहता है। इस्लाम की कई शाखायें जैसे धार्मिक, न्यायिक, राजनैतिक, आर्थिक, सामाजिक, सैनिक होती हैं। इन सभी शाखाओं में सबसे ऊपर, सबसे प्रमुख और सभी के लिये बन्धनकारी होती है धार्मिक शाखा, जिसकी सलाह या निर्देश (बल्कि आदेश) सभी धर्मावलम्बियों को मानना बाध्यकारी होता है। किसी भी देश, प्रदेश या क्षेत्र के “इस्लामीकरण” करने की एक प्रक्रिया है। जब भी किसी देश में मुस्लिम जनसंख्या एक विशेष अनुपात से ज्यादा हो जाती है तब वहाँ इस्लामिक आंदोलन शुरु होते हैं। शुरुआत में उस देश विशेष की राजनैतिक व्यवस्था सहिष्णु और बहु-सांस्कृतिकवादी बनकर मुसलमानों को अपना धर्म मानने, प्रचार करने की इजाजत दे देती है, उसके बाद इस्लाम की “अन्य शाखायें” उस व्यवस्था में अपनी टाँग अड़ाने लगती हैं। 
ऐसी बात नहीं कि भारतियों को पता नहीं कि वो पहले भी इस्लाम की क्रूरता को झेल चुके हैं।  पुराना इतिहास अगर छोड़ भी दिया जाय  तो अंग्रेजों के भारत से जाने के तुरंत पहले सीधी कार्यवाही के बारे में पढ़ लिया जाय जहां पाकिस्तान की मांग को लेकर जिन्हा ने बंगाल के गवर्नर सुहार वर्दी को हिन्दुओं का कत्लेआम और उनकी औरते और संपत्ति को लूटने का मुसलमानो से खुला निमंत्रण दे दिया था।   जब मिस्टर जिन्ना को लगा कि अब पाकिस्तान निर्माण का सपना पूरा नहीं होगा ,तो  जिन्ना ने २९ जुलाई १९४६ को मुस्लिम लीग परिषद की बैठक बुलाकर दो प्रस्ताव किये।  एक मंत्रिमंडल प्रस्ताव की स्वीकृति को वापस लेना और दूसरा सीधी कार्रवाई की स्वीकृति।  सीधी कार्रवाई की व्याख्या करते हुए लियाकत अली खान (लीग नेता ) ने एसोसिएटेड प्रेस आफ अमेरिका को बताया कि सीधी कार्रवाई का मतलब है  '' असंवैधानिक  तरीकों को अपनाना '' हम किसी भी तरीके से इंकार नहीं करते।   एक अन्य नेता अब्दुल रब निस्तार ने कहा कि ''पाकिस्तान रक्तपात से ही प्राप्त किया जा सकता है।   यदि अवसर मिला तो हम गैर मुस्लिमों का अवश्य खून बहायेंगे।   मुसलमान अहिंसा में विश्वास नहीं रखते हैं। ''
   सीधी  कार्रवाई दिवस की तिथि तय हुई १६ अगस्त सन १९४६।   फिर शुरू हुआ इस योजना के तंत्र को बनाने का सिलसिला , सुहरावर्दी जो उस समय बंगाल के प्रीमियर तथा क़ानून और व्यवस्था मामलों के मंत्री थे , उन्हें इस योजना को सफल बनाने की  जिम्मेदारी  सौंपी गयी।  उन्होंने अपने मंत्री पद का दुरुपयोग करते हुए महत्वपूर्ण पदों से हिन्दू पुलिस अधिकारियों  के स्थानांतरण की व्यवस्था की।   १६ अगस्त को कलकत्ता के २४ पुलिस थानों में से २२ पर मुस्लिम अधिकारियों को प्रभारी बनाया जा चुका था।   शेष दो पर एंग्लो इंडियन का नियंत्रण था  अर्थात सभी थाने हिन्दुओं की पहुँच से बहुत दूर कर दिए गए थे।  
    उसके  बाद कई प्रकार के पर्चे बांटे गए।   एक पर्चे पर हाथ में तलवार लिए हुए जिन्ना के चित्र के साथ लिखा था --  '' हम मुसलमानों का ही राज था और हमने ही शासन किया है।   काफिरों से प्रेम का परिणाम अच्छा नहीं होता।   ऐ काफ़िर अहंकार  और ख़ुशी में मत आओ , तुम्हारे दंड का समय निकट है , जब कत्लेआम  होगा।  ''
  १६ अगस्त  आते आते लीग के स्वयंसेवक और  मुस्लिम गुंडों को एक स्थान पर पहुचाने की व्यवस्था की गई।   मंत्रियों को पेट्रोल कूपन जारी किये गए।   भारी संख्या में हथियार मंगवाए गए।   कुछ लोगों ने पुलिस को इस परिस्थिति से अवगत भी कराया परन्तु कोई लाभ नहीं हुआ।   उपद्रवियों को  सभी प्रकार के हथियार बांटे गए।   १५ अगस्त १९४६ की रात से ही शुरू हो गया  नंगा नांच।    ५०-६० गुंडों का पहला झुण्ड हाथ में  लाठी डंडों वा छुरों से लैस होकर आगे बाजार में उतरा , दूकान खुली मिलने पर दुकानदार की पिटाई , यात्रियों के साथ बदसलूकी  व मारपीट , सुबह ६ बजते ही  पुलिस नियंत्रण कक्ष को सूचनाएं आने लगीं लेकिन पुलिस का एक ही जवाब होता था - '' हमें कोई आदेश नहीं है।  ''
पहचान हेतु  मुसलमानों की दुकानों पर लिखा हुआ था -- ''मुसलमान की दूकान '' ताकि उन्हें भीड़ की कार्रवाई से बचाया जा सके . अनेक मंदिरों को जलाकर ध्वस्त कर दिया गया।  कुछ इलाकों में तो दंगाई लगातार ४० घंटे से हत्या व लूट में लगे हुए थे , सडकों पर लाशें बिखरी हुई थीं जिनसे दुर्गन्ध आना प्रारम्भ हो गई थी।   सडकों के मैन हाल भी लाशों से भर गए थे।   नदी में लाशें तैरती हुई दिखाई पड़ रहीं थीं।   बच्चों  को छतों से नीचे पटका जा रहा था।   छोटे बच्चों को उबलते हुए तेल में डाल दिया जाता था महिलाओं  और बालिकाओं से पहले बलात्कार फिर अंग भंग और अंत में ह्त्या कर दी जाती थी।   चार दिनों तक यह राक्षसीपन लगातार चलता रहा। यही था सीधी कार्रवाई प्रस्ताव का परिणाम जिसमें ३१७३ शव सरकारी रिकार्ड के अनुसार प्राप्त हुए , न जाने कितनी और संख्या का पता भी  नहीं लग पाया  और ये सब क्यों हुआ ,क्या कारण था इस सीढ़ी कार्यवाही का। इसका उत्तर केवल और केवल एक ही है कि  उस स्थान पर मुसलमानो की आबादी हिन्दुओं की आबादी से ज्यादा हो गयी थी।  
कश्मीर घाटी में क्या हुआ ?इस बात को भी सभी जानते हैं।  केरल में क्या हो रहा है ,आसाम में बांग्लादेशियों ने वहां के आम हिन्दू जातियों का जीना दुष्कर कर रखा है। बांग्लादेश की सीमा  से सटे  लगभग ५००० गांव हिन्दू विहीन हो चुके है। बंगाल में सैकड़ों गावों में हिन्दू अपने मंदिरों में पूजा नहीं कर सकते।  हिन्दुओं के धार्मिक जुलूसों पर हमले आम हो गए हैं। क्या कारण  है इन सभी घटनाओ का। उत्तर केवल एक है उन स्थानो पर मुस्लिम जनसंख्या का बढ़ता घनत्व।  
मुस्लिमो की बढ़ती आबादी प्रतिशत का प्रभाव देश के हित  में नहीं है यह सोच  केवल मात्र संघ की सोच नही है।  यह सोच हर उस भारतवासी की है जो भारतीय भूमि को अपनी कर्मभूमि के साथ  साथ इसे अपनी मातृभूमि ,पुण्यभूमि व पितृभूमि भी मानता है और अगर भारतभूमि को पूजने वाला उसका सनातनी  विदेशी मजहबों की बढ़ती जनसंख्या पर रोष प्रकट करता है तो ये उसका अधिकार है  क्योकि अपने धर्म की आन और भारत माता की शान  के लिए सनातनियों  ने   हजारों वर्षों से करोड़ों बलिदान दिए है।  

स्वर्ग उसी जगह है जहाँ मुल्ला नहीं हैं और उनका शोर सुनाई नहीं देता-दारा शिकोह (तुफैल चतुर्वेदी जी का लेख )

बहिश्तो-जा कि मुल्ला-ए-न बायद ज़ि मुल्ला शोरो-गोगा-ए-न बायद   
{ स्वर्ग उसी जगह है जहाँ मुल्ला नहीं हैं और उनका शोर सुनाई नहीं देता-दारा शिकोह }
दक्षिण एशिया यानी अफगानिस्तान, पाकिस्तान, बांग्ला देश, भारत की स्थिति दिनों-दिन खराब होती जा रही है. अफगानिस्तान से अमरीका के हटने के बाद वहां हमारी उपस्थिति, पाकिस्तान के उत्पात, पाकिस्तान, बांग्ला देश में इस्लामी जिहादियों की हिंसा के तांडव, अल्पसंख्यकों पर बढ़ते हमले, इन घटनाओं पर छायी चुप्पी, गहरी चिंता में डाल रहे हैं. ये क्षण विस्तृत योजना बनाने और उन पर तब तक अमल करने का है जब तक वांछित परिणाम न आ जाएं।
सामान्य जानकारी ये है कि 1979 में रूस ने अफगानिस्तान के तत्कालीन नेतृत्व के निमंत्रण पर अफगानिस्तान में अपनी सेनाएं भेजी थीं. अमरीका वियतनाम की हार के कारण आहत था और बदला लेने की ताक में था. उसने पाकिस्तान के तत्कालीन राष्ट्रपति जिया-उल-हक़, सऊदी अरब, संयुक्त अरब अमीरात के नेतृत्व को तैयार किया. जिसके कारण धरती का ये भाग कराह रहा है. यहाँ सबसे बड़े कारण का जिक्र नहीं होता कि इन सब कारकों को इकट्ठा तो अमरीका की बदले की भावना ने किया मगर इन सबको मिला कर जो विषैला पदार्थ बना उसे टिकाने वाला, जोड़े रखने वाला Bainding force क्या था ? एक ऐसे देश में लड़ाई के लिए जिससे उनकी सीमाएं भी नहीं लगतीं, अपने खरबों डॉलर झोंकने के लिए सऊदी अरब, संयुक्त अरब अमीरात क्यों तैयार हो गए ? अगर ये इस्लाम नहीं था तो वो कारण क्या था ?
सबको स्वीकारने, सबको जीवन का अधिकार देने, सबको अपनी इच्छानुसार उपासना करने, सबको स्वतंत्र सांस लेने का अधिकार देने वाली समावेशी मूर्तिपूजक, प्रकृतिपूजक संस्कृति जिसे इस भाग में हिन्दू संस्कृति कहा जाता है, ही विश्व की मूल संस्कृति है. विश्व भर में एक ईश्वर या अल्लाह जैसा कुछ मानने वाले सेमेटिक मजहबों ने इसी के हिस्से तोड़-तोड़ कर अपने साम्राज्य खड़े किये हैं. निकटतम अतीत में हमसे पाकिस्तान और बांग्ला देश छीने गए हैं. जिन दिनों पाकिस्तान बनाने का आंदोलन चल रहा था, मुस्लिम नेता शायर इकबाल की पंक्तियाँ बहुत पढ़ते थे. इकबाल की 'शिकवा' जवाबे-शिकवा' नामक दो लम्बी नज्मों में इस्लाम का मूल दर्शन लिखा हुआ है. उसकी एक बहुत चर्चित पंक्ति है
" तू शाहीं है बसेरा कर पहाड़ों की चटानों पर"
शाहीं यानी बाज़ जो आकाश में सारे पक्षियों से ऊपर उड़ता है. स्वतंत्र जीवन जीता है. पहाड़ों में रहने वाले, छोटी चिड़ियों का झपट्टा मार कर शिकार करने वाले, उनका मांस नोच-नोच कर खाने वाले बाज़ के जीवन-दर्शन को इस्लामी नेतृत्व ने अपने समाज के लिए आदर्श माना। इक़बाल का ही इसी सिलसिले का एक शेर और उद्धृत करना चाहूंगा।
जो कबूतर पर झपटने में मजा है ऐ पिसर { बाज अपने बेटे से कह रहा है }
वो मजा शायद कबूतर के लहू में भी नहीं
पुरानी कहावत है कि नाग पालने वाले नागों से डँसे जाने के लिए अभिशप्त होते हैं. जिस रूपक की सभ्य समाज उपेक्षा करता, घृणा करता, उसे इस्लामियों ने अपना प्रेरणा-स्रोत माना। अब ये बाजों के झुण्ड कबूतर पर झपटने का मज़ा अधिक पाने के लिए पेशावर में उतर आये हैं. यहां थे की जगह हैं प्रयोग जान-बूझ कर कर रहा हूँ कि ये कोई नई घटना नहीं है. इस्लामी इतिहास को देखें तो मुहम्मद जी ने अपने साथियों के साथ उत्तरी अरब में रहने वाले एक यहूदी कबीले बनू कुरैजाह पर आक्रमण किया. 25 दिन तक युद्ध करने के बाद यहूदियों के इस कबीले ने आत्मसमर्पण कर दिया। इस्लामी सूत्रों के हवाले से एक औरत सहित सारे पुरुषों के गले धड़ से अलग कर दिए गये. अन्य सूत्रों के अनुसार यहूदियों के 400 से 900 पुरुषों के गले काट डाले गए जिनमें बच्चे भी थे. भारत में दसवीं पादशाही गुरु गोविन्द सिंह के दो बेटे साहबज़ादे जोरावर सिंह, साहिबजादे फतह सिंह मुगल नवाब के काल में काजी के फतवे पे दीवार में चुनवा दिए गए थे. 7 साल के बच्चे वीर हकीकत राय की मसलमान न बनने के कारण बोटियाँ नोच ली गयी थीं. भारत में इस तरह की घटनाओं के तो मुस्लिम इतिहासकारों के स्वयं लिखित असंख्य वर्णन मिलते हैं. 2004 में रूस के बेसलान नगर में इस्लामी आतंकवादियों ने एक स्कूल पर कब्ज़ा कर 777 बच्चों सहित 1100 लोगों को बंधक बना लिया था. 3 दिन चले इस संघर्ष में 186 बच्चों सहित 385 बंधक मारे गए.
ये इस्लामियों का गैरइस्लामी लोगों के साथ सामान्य व्यवहार है. आइये पेशावर की घटना पर लौटते हैं. पेशावर में अरबी नहीं बोली जाती। पेशावर से अरबी बोलने वाले क्षेत्र सैकड़ों किलोमीटर दूर हैं. अपने क्षेत्र से वहां अरबी बोलने वाले मारने-मरने क्यों आये ? छोटे-छोटे बच्चों की आँखों में, सर में गोलियां मारने वाले केवल जुनूनी हत्यारे नहीं हो सकते ? इन लोगों की मग्ज-धुलाई, वो भी इस तरह कि हत्यारे जान लेते हुए अपनी जान देने के लिए आतुर हो जाएं, कोई सामान्य षड्यंत्र का परिणाम नहीं हो सकता. भारत का अरीब और उसके कुछ साथी जिहाद के लिए सीरिया क्यों गए ? नाइजीरिया के स्कूल में रात के दो बजे आग लगा कर ग्यारह साल से अट्ठारह साल के चालीस बच्चों को जला कर क्यों बोको-हराम के लोगों ने मार डाला ?
ये हत्यारे आप-मुझ जैसे पहनावे वाले, खान-पान वाले लोग हैं मगर इनका मानस बिलकुल अलग है. दिन में पांच बार एक विशेष प्रकार के अराध्य की नमाज़ पढने वाले, हर नमाज़ में एक उंगली उठा कर गवाही देने वाले " अल्लाह एक है, उसमें कोई शरीक नहीं, मुहम्मद उसका पैगम्बर है", चौबीसों घंटे स्वयं को शैतानों से भरे समाज में मानने-समझने वाले अगर ऐसा करने पर उतारू हो जाएँ तो ये कोई असामान्य बात नहीं है. ये "कत्ताल फ़ी सबीलल्लाह जिहाद फ़ी सबीलल्लाह" की सामान्य परिणिति है. "अल्लाह की राह में क़त्ल करो-अल्लाह की राह में जिहाद करो" पर अटूट विश्वास का परिणाम है.
इस सोच की नींव हिलाये बगैर ये दर्शन कैसे ध्वस्त होगा ? सदियों से सभ्य समाज ने इस विषैली विचारधारा को नजरअंदाज किया है. किसी कैंसर-ग्रस्त व्यक्ति के ये मानने से ' मैं स्वस्थ हूँ' वो स्वस्थ नहीं हो जाता. पाकिस्तान का जन्म मुसलमानों ने स्वयं को काफिरों से श्रेष्ठ मानने, सदियों तक अपने गुलाम रहे हिन्दुओं के प्रजातंत्र के कारण स्वयं पर हावी हो जाने की संभावना से बचने के लिए किया था. इसी अनैतिहासिक और ऊटपटांग दर्शन के कारण उन्होंने पाकिस्तान की शिक्षा प्रणाली भी ऐसी ही मूर्खतापूर्ण बनायी. अब इस विषवृक्ष के फल आ गए हैं. इस विचारधारा को माशाअल्लाह और इंशाअल्लाह जप कर ढेर नहीं किया जा सकता.
इसके लिए मानव सभ्यता के पहले चरण " सभी मनुष्य बराबर हैं " का आधार ले कर इसके विपरीत हर विचार को तर्क, दंडात्मक कारवाही से नष्ट करने के अतिरिक्त कोई उपाय नहीं है. इसे परास्त बल्कि नष्ट करने के लिए वैचारिक स्तर पर, उन देशों से जहाँ-जहाँ इसके विष-बीज मौजूद हैं, प्रत्येक स्तर पर लड़ाई लड़नी पड़ेगी. जनतंत्र के सामान्य सिद्धांत " प्रत्येक मनुष्य बराबर है, सभी के अधिकार बराबर हैं. जीवन का अधिकार मौलिक अधिकार है " को विश्व का दर्शन बनाना पड़ेगा। इसके विपरीत विचार रखने वाले व्यक्ति-समूह-समाज का हर प्रकार से दमन करना पड़ेगा. ये जितना पाकिस्तान, अफगानिस्तान, बांग्ला देश के लिए आवश्यक है उतना हमारे लिए भी आवश्यक है.
पाकिस्तानी पड़ौसियो ! मैं इस दारुण दुःख में आपके साथ हूँ और आपके गम में रोना चाहता हूँ मगर मैं क्या करूँ मेरी आँखे तो बारह सौ साल से लहू रो रही हैं. तो ऐसा करता हूँ मैं इस घटना पर उतना ही दुःख मना लेता हूँ जितना मुंबई में ताज होटल और यहूदी धर्मस्थल पर हुए आतंकी आक्रमण के समय आपने मनाया था
लेखक: तुफैल चतुर्वेदी -