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दिग्विजय सिंह इसाई है,(digvijay is a converted christian)

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दिग्विजय सिंह के तेवर हिन्दुओं के विरुद्ध कुछ ज्यादा ही गर्म हो रहे हैं।कोई भी नहीं समझ पा रहा है कि वो ऐसा क्यों कर रहा है। अगर इस बात को सत्य माना जाय कि दिग्विजय हिन्दू ही नहीं है ( http://en.wikipedia.org/wiki/Digvijay_Singh_(politician ) (Digvijay Singh was born in the royal family of Raghogarh principality, in Guna district of Madhya Pradesh. He is a rajput also known popularly as Diggi Raja.He studied at the Daly College , Indore, a private school established in 1882. During his school days he was an outstanding sportsman. He was a member of the school team in cricket, hockey and soccer. He represented Central Zone schools in cricket, and also played hockey and football at the college level.He also excelled in squash, and was the Central India champion at the junior level for six years from 1960 to 1966.He also held national ranking in this game.[ clarification needed ]. He is a converted christian.) तब इसका अंदाजा स्यवं ही लगाया जा सकता है।क्यों कि इसाई बनने के बाद हिंदुत्व क...

गणित विद्या और शून्य का आविष्कार

सभी यह जानते हैं कि गणित में शून्य और दशमलव का आविष्कार भारत ने किया है किन्तु यह आंशिक सत्य है क्योंकि गणित विद्या का मूल(कारण) वेदों में है जिसमें न केवल शून्य से लेकर ९ तक सभी प्राकृतिक अंको का वर्णन है वरन अंक गणित, बीज गणित और रेखा गणित सभी गणित विद्या के ३ आधार ईश्वर ने हमको दिये हैं। बहुत से लोग यह मानते हैं आर्य भट्ट ने शून्य का या दशमलव का आविष्कार किया था जोकि गलत है क्योंकि यह तो पहले से ही वेदों में है, आर्य भट्ट निश्चित तौर पर एक महान गणितज्ञ थे इसमें कोई सन्देह नहीं है किन्तु प्राकृतिक संख्याओं के निर्माण का विज्ञान मानव ज्ञान से बहार की बात है। मैं यहाँ वेदों के मन्त्र तो नहीं लिख रहा हूँ किन्तु उनमें से उधृत कुछ एक बातों को लिख रहा हूँ प्रमाण के तौर पर। अंक, बीज और रेखा भेद से जो तीन प्रकार की गणित विद्या सिद्ध की जाती है , उनमें से प्रथम अंक(१) जो संख्या है, सो दो बार गणने से २ की वाचक होती है। जैसे १+१=२। ऐसे ही एक के आगे एक तथा एक के आगे दो, वा दो के आगे १ आदि जोड़ने से ९ तक अंक होते हैं। इसी प्रकार एक के साथ तीन(३) जोड़ने से चार (४) तथा तीन(३) को तीन(३) के साथ जोड़न...

साम्यवादी क्रान्ति के सूत्रधार लेनिन भी वीर सावरकर के घोर प्रशंसक थे.

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भारत की संसद में जब वीर सावरकर के चित्र की प्रतिस्थापना की गयी तो उस समय के सारे कोंग्रेसी सांसद सोनिया मैनो के नेर्तत्व में तथा सारे कम्युनिष्ट सांसद समारोह का बहिष्कार करके चले गए थे। केवल मात्र सोमनाथ चटर्जी ही राजग के सांसदों के साथ संसद में उपस्थित थे। वीर सावरकर मात्र एक सशस्त्र क्रांतिकारी ही नहीं वरन एक युगद्रष्टा थे। युगद्रष्टा के साथ साथ वे एक राष्ट्र स्रष्टा भी थे। वे विश्व क्रांतिकारिता के सूत्रधार और व्यवस्थापक भी थे। उनकी वीरता, धीरता व पांडित्य और कुशल नेत्रत्व को देखकर पूरा विश्व चकित था। साम्यवादी क्रांति के सूत्रधार लेनिन भी वीर सावरकर की विलक्षणता के अत्यधिक प्रभावित थे। जब रूस के क्रांति की प्रष्ट भूमि तैयार हो रही थी,तब लेनिन रूस से जाकर वीर सावरकर के पास जाकर इंग्लेंड में इण्डिया हाउस में छिपे थे।लेनिन अपने अज्ञात वास में वीर सावरकर से रोज घंटों भावी अर्थव्यवस्था पर विचार-विमर्श करते थे। रुसी क्रान्ति सफल हो जाने के पश्चात लेनिन ने अपने प्रथम बजट में वीर सावरकर का आदर सहित उल्लेख किया। उसके पश्चात लेनिन सावरकर से तीन बार और मिले। दोनों के बीच वैचारिक सम्बन्ध लम्...

हिन्दू धर्म के बिना भारत का कोई भविष्य नहीं है .

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डॉ० एनी बेसेंट का हिन्दू धर्म को कोसने वालों के मूह पर तमाचा भूलिये नहीं ! हिन्दू धर्म के बिना भारत का कोई भविष्य नहीं है। हिन्दू धर्म वह भूमि है जिसमे भारत की जड़े गहरी जमी हुई हैं और यदि इस भूमि से इसे उखाड़ा गया तो भारत वैसे ही सूख जायेगा जैसे कोई वृक्ष भूमि से उखाड़ने पर सूख जाता है। भारत में अनेक मत,संप्रदाय और वंशों के लोग पनप रहे हैं,किन्तु उनमे से कोई भी न तो भारत के अतीत के उषा काल में था, न उनमे कोई राष्ट्र के रूप में उसके स्थायित्व के लिए अनिवार्यत: आवयशक है। यदि आप हिन्दू धर्म छोड़ते है तो आप अपनी भारत माता के ह्रदय में छुरा घोंपते हैं।यदि भारत माता के जीवन-रक्त स्वरुप हिन्दू धर्म निकल जाता है तो माता गत-प्राण हो जाएगी। आर्य जाती की यह माता ,यह पद्भ्रष्ट जगत -सम्राज्ञी पहले ही आहत क्षत-विक्षत ,विजित और अवनत हुई है। किन्तु हिन्दू धर्म उसे जीवित रखे हुए है,अन्यथा उसकी गर्णा म्रतों में हुई होती। यदि आप अपने भविष्य को मूल्यवान समझते हैं, अपनी मात्रभूमि से प्रेम करते हैं,तो अपने प्राचीन धर्म की अपनी पकड़ को छोडिये नहीं,उस निष्ठां से अलग मत होइए जिस पर भारत के प्राण निर्भर हैं। ...

भारत का स्वाधीनता यज्ञ और हिन्दी काव्य

"हिमालय के ऑंगन में उसे, प्रथम किरणों का दे उपहार।" “जगे हम लगे जगाने विश्व, देश में फिर फैला आलोक, व्योम तम पुंज हुआ तब नष्ट, अखिल संस्कृति हो उठी अशोक।” परिवर्तन की जीवंत प्रक्रिया सतत् प्रवहमान है। संहार के बाद सृजन, क्रांति के बाद शांति और संघर्ष के बाद विमर्श का सिलसिला मानव के अन्तर्वाह्य जगत में चलता रहता है। मनुष्य का असन्तोष से भरा जीवन आजन्म संधर्ष की स्थिति को झेलता रहता है, लड़ाइयाँ लड़ता है, नयी व्यवस्था के निर्माण के लिए पुरानी व्यवस्था पर आघात करता है, इसी द्वन्द्व की स्थिति में वह जीता मरता रहता है। भारतीय स्वतन्त्रता संग्राम की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि के निर्माण में व्यक्ति की यही संधर्षशील चेतना कार्यरत है। गुलामी के बन्धन को तोड़कर उन्मुक्त होने की कामना ने 1857 में क्रान्ति की नयी जमीन को खोज निकाला। इस क्रान्ति महायज्ञ में प्रथम आहुति देने वाले बलिया जनपद के हलद्वीप गाँव के ब्राह्यण कुलोत्पन्न पंडित मंगल पाण्डेय ने 8 अप्रैल 1857 को अपनी शहादत से स्वतन्त्रता का प्रथम दीप जलाया। आजादी को लेकर देश में व्याप्त उथल-पुथल को हिन्दी कवियों ने अपनी कविता का विषय बनाकर साह...

स्वराज मेरा जन्म सिद्ध अधिकार है,और मै इसे लेकर रहूँगा.

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(२३ जुलाई, 1856- १ अगस्त १९२०) "स्वराज मेरा जन्म सिद्ध अधिकार है,और मै इसे लेकर रहूँगा।" बाल गंगाधर तिलक (२३ जुलाई, 1856- १ अगस्त १९२०) भारत के एक प्रमुख नेता, समाज सुधारक और स्वतन्त्रता सेनानी थे। ये भारतीय स्वतन्त्रता संग्राम के पहले लोकप्रिय नेता थे। इन्होंने सबसे पहले भारत में पूर्ण स्वराज की माँग उठाई। इनका कथन "स्वराज मेरा जन्मसिद्ध अधिकार है और मैं इसे लेकर रहूँगा" बहुत प्रसिद्ध हुआ। इन्हें आदर से "लोकमान्य" कहा जाता था। इन्हें हिन्दू राष्ट्रवाद का पिता भी कहा जाता है। तिलक ने अंग्रेजी सरकार की क्रूरता और भारतीय संस्कृति के प्रति हीन भावना की बहुत आलोचना की। इन्होंने माँग की कि ब्रिटिश सरकार तुरन्त भारतीयों को पूर्ण स्वराज दे। केसरी में छपने वाले उनके लेखों की वजह से उन्हें कई बार जेल भेजा गया। ‘क्या ये सरकार पागल हो गई है?’ और 'बेशर्म सरकार' जैसे उनके लेखों ने आम भारतीयों के मन में रोष की लहर दौड़ा दी। दो वर्षों में ही ‘केसरी’ देश का सबसे ज्यादा बिकने वा...

ये है झांसी की रानी (jhansi ki rani)का असली चित्र.

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मित्रो आज १७ जून को झाँसी की रानी लक्ष्मी बाई की पुन्यथिति है। झांसी की रानी लक्ष्मीबाई का यह एकमात्र फोटो है, जिसे कोलकाता में रहने वाले अंग्रेज फोटोग्राफर जॉनस्टोन एंड हॉटमैन द्वारा 1850 में ही खींचा गया था। यह फोटो अहमदाबाद निवासी चित्रकार अमित अंबालाल के संग्रह में मौजूद है। The only photo of Rani Laxmibai of Jhansi, which living in Calcutta in 1850 by the British photographer Ahugoman Jonstone and was pulled. This photo Ahmedabad resident artist Amit Ambalal exists in the collection.