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क्या श्री राम(shree ram) ने शुद्र(shudr) तपस्वी शम्बूक(shambook) का वध किया था?

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कई बार एसा हुआ है कि हिन्दू धर्म के विषय में कुछ लोगों ने मह्रिषी शम्बूक की हत्या (श्री राम के द्वारा ) की बात करके मुझे चुप रहने के लिए मजबूर कर दिया है. मैंने भी बहुत सोचा कि जिस राम कि हम पूजा करते हैं ,जिनको एक आदर्श पुरुष मानकर पूरा भारत पूजता है,वे इतने निर्दयी कैसे हो सकते हैं कि बिना किसी कारन एक शम्बूक का वध केवल मात्र इसलिए कर दें कि शम्बूक शुद्र थे. सर्वप्रथम तो में यहाँ पर एक बात अवश्य बताना चाहूँगा कि यह प्रसंग भव्भूती द्वारा रचित उत्तर रामायण के तृतीय चरण में शम्बूक वध में आता है. और यह काव्य रूप में है. काव्य में भावार्थ निकाला जाता है,और हजारों वर्ष पूर्व रचित उत्तर रामायण का भावार्थ कोई ज्ञानी पंडित ही लिख सकता है. मै भी कुछ लोगों से मिला. शम्बूक वध को कई ब्लोगों में पढ़ा,कई पुस्तके पढ़ी, तो एक निष्कर्ष पर पहुंचा कि इस प्रसंग को ब्रह्मण व शुद्र का प्रसंग बताने वाले या तो महामूर्ख हैं या फिर देशद्रोही. शम्बूक वध के तीसरे भाग आता है कि राम के प्रहार से शुद्र शम्बूक का वध हो गया.राम को बदनाम करने वाले केवल यही बात लोगों को बहकाने के लिए कहते हैं ,और दलितों का धर्मा...

प्राचीन भारतीय विज्ञानं के सन्दर्भ में सुरेशसोनी(suresh soni) जी का विद्युत् शास्त्र से सम्बंधित लेख

अगस्त्य संहिता का विद्युत्‌ शास्त्र राव साहब कृष्णाजी वझे ने १८९१ में पूना से इंजीनियरिंग की परीक्षा पास की। भारत में विज्ञान संबंधी ग्रंथों की खोज के दौरान उन्हें उज्जैन में दामोदर त्र्यम्बक जोशी के पास अगस्त्य संहिता के कुछ पन्ने मिले। यह शक संवत्‌ १५५० के करीब के थे। आगे चलकर इस संहिता के पन्नों में उल्लिखित वर्णन को पढ़कर नागपुर में संस्कृत के विभागाध्यक्ष रहे डा। एम.सी. सहस्रबुद्धे को आभास हुआ कि यह वर्णन डेनियल सेल से मिलता-जुलता है। अत: उन्होंने नागपुर में इंजीनियरिंग के प्राध्यापक श्री पी.पी. होले को वह दिया और उसे जांचने को कहा। अगस्त्य का सूत्र निम्न प्रकार था- संस्थाप्य मृण्मये पात्रेताम्रपत्रं सुसंस्कृतम्‌। छादयेच्छिखिग्रीवेनचार्दाभि: काष्ठापांसुभि:॥ दस्तालोष्टो निधात्वय: पारदाच्छादितस्तत:। संयोगाज्जायते तेजो मित्रावरुणसंज्ञितम्‌॥ अगस्त संहिताइसका तात्पर्य था, एक मिट्टी का पात्र (कठ्ठद्धद्यण्ड्ढद द्रदृद्य) लें, उसमें ताम्र पट्टिका (क्दृद्रद्रड्ढद्ध च्ण्ड्ढड्ढद्य) डालें तथा शिखिग्रीवा डालें, फिर बीच में गीली काष्ट पांसु (ध्र्ड्ढद्य द्मठ्ठध्र्‌ क़्द्वद्मद्य) लगायें, ऊपर पारा (थ...
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आप सभी को नववर्ष विक्रमी संवत 2068 की हार्दिक शुभकामनाएं मित्रों जब अब से 2 वर्ष पूर्व मैंने ब्लॉग लिखना शुरू किया था ,तब सबसे प्रथम सम्राट विक्र्मद्वित्तीय के ऊपर दो लेख लिखे थे। विक्रमी संवत 2067 समाप्त हो रहा है। संवत 2068 का आरम्भ होने जा रहा है। भारतीय नव वर्ष कि हार्दिक शुभकामनाओं के साथ मै विक्रमी संवत के प्रवर्तक सम्राट विक्र्माद्वितीय को नमन करते हुए वे दोनों लेख आपको दुबारा प्रस्तुत कर रहा हूँ। विश्व विजेता सम्राट विक्रमादित्य ईसा से कई शताब्दी पूर्व भारत भू मि पर एक साम्रराज्य था मालव गण। मालव गण की राजधानी थी भारत की प्रसिद्ध नगरी उज्जेन । उज्जैन एक प्राचीन गणतंत्र राज्य था । प्रजावात्सल्या राजा नाबोवाहन की म्रत्यु के पश्चात उनके पुत्र गंधर्वसेन ने "महाराजाधिराज मालवाधिपति महेंद्राद्वित्तीय "की उपाधि धारण करके मालव गण को राजतन्त्र में बदल दिया । उस समय भारत में चार शक शासको का राज्य था। शक राजाओं के भ्रष्ट आचरणों की चर्चाएँ सुनकर गंधर्वसेन भी कामुक व निरंकुश हो गया। एकं बार मालव गण की राजधानी में एक जैन साध्वी पधारी।उनके रूप की सुन्दरता की चर्चा के कारण गंधर्व सेन...

स्टॉक(staak) बहुत है.

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मित्रों अभी हाल ही के मेरे पास ललित कर्मा जी एक मेल आई ।बहुत अच्छी लगी। इसलिए आपके सामने प्रस्तुत कर रहा हूँ। वैसे एक राय में भी आपको दे रहा हूँ कि खरीदने की जल्द बाजी न करें ,स्टाक बहुत है। बुरा न मानो होली है। होली की हार्दिक शुभकामनायें।

चित्तौडग़ढ़ में हुआ था विश्व का सबसे पहला कत्ले-आम - PART -2

( रामदास सोनी) at hindugatha.blogspot.com घमासान युद्ध आरंभ हो चुका था। दो रात और एक दिन तो युद्ध के कारण दोनों पक्षों के सैनिक खाना-सोना तक भूल गए थे। किले के नागरिकों से राजपूतों को भरपूर सहायता मिल रही थी। वे अपने घरों से ज्वलनशील सामग्री ला लाकर मोर्चों पर पहुँचा रहे थे। शस्त्रों का अनवरत निर्माण कर रहे थे। प्राचीरों पर पत्थरों का ढेर लगा था , यदा कदा स्वयं भी शाही सेना पर पथराव के द्वारा प्रत्यक्ष युद्ध में भाग ले रहे । राजपूताने के इतिहास में यह प्रथम अवसर था जब युद्ध विधा से अपरिचत नागरिकों , स्त्रियों और बालकों तक ने मातृभूमि की रक्षा के लिये युद्ध में भाग लिया था। चारों ओर रण मद छाया था। अपनी कमज़ोर स्थिति के बावज़ूद उनका उत्साह भंग नहीं हो रहा था। नागरिकों का मनोबल देख सैनिकों व सरदारों का हौसला भी दुगुना हुआ जाता था। यह देख रनिवासों की राजपूतानियाँ भी घूँघट उलट युद्ध में आ कूदीं। उनका मनोबल देख कर किसी भी सरदार को उन्हें रोकने का साहस नहीं हुआ। जयमल्ल द्वारा उन्हें महलों में रह कर ही युद्ध का परिणाम देखने की बात सुनते ही पत्ता चूंडावत की माँ सज्जन बाई सोनगरी बिफर उ...

चित्तौडग़ढ़ में हुआ था विश्व का सबसे पहला कत्ले-आम - PART -1

मेवाड़ राज्य की राजधानी चित्तौडग़ढ़ का राजप्रासाद। मेड़तिया राठौड़ जयमल्ल वीरमदेवोत,चूंडावत सरदार रावत साईदास, बल्लू सोलंकी, ईसरदास चहुवान, राज राणा सुलतान सहित दुर्ग के सभी प्रमुख रण बांकुरे सरदारों के तेजस्वी वेहरों पर चिन्ताभरी उत्सुकता दिखाई दे रही थी। सभी की निगाहें बादशाह अकबर के पास समझौता प्रस्ताव लेकर गए रावत साहिब खान चहुवान और डोडिया ठाकुर सांडा पर टिकी थी। अकबर के शिविर से लौटे दोनों ठाकुरों का मौन अच्छी खबर का परिचायक न होने के बावज़ूद भी वे युद्ध टलने की आशा न छोड़ पा रहे थे। वातावरण की निस्तब्धता भंग की जयमल्ल ने। उसने पूछा- ''क्या बात है सरदारों आपके चेहरों पर खिन्नता क्यों है? क्या बादशाह ने हमारी समझौते की पेशकश ठुकरा दी? अथवा उसमें कोई असंभव सी शर्त लगाई है?'' डोडिया ठाकुर ने मातृभूमि के लिये सर कटाने को तैयार बैठे जुझारू सरदारों की ओर देखा ''आप ठीक समझे। बादशाह चित्तौड़ विजय के साथ महाराणा उदयसिंह का समर्पण भी चाहता है। उसने कहा है कि महाराणा के हाजिर हुए बगैर किसी भी तरह संधि संभव नहीं है। बादशाह के अमीरों और सलाहकारों ने भी उसे समझौता कर ल...

अंतरताने पर हिंदुत्व के योद्धा सुरेश(suresh) (पांचजन्य ३० जनवरी २०११)

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सबसे पहले तो में अपने सभी अनुसरनकर्ताओं को धन्यवाद देता हूँ कि आपने मुझे शतकधारी बनाया । आपका समय समय पर सहयोग मिलता रहा । किन्तु कभी तो कार्य भार की वजह से , तो कभी स्वास्थ्य के कारण लेखन में निरंतरता की कमी रही । ब्लॉग लेखन को २ वर्ष पुरे होने वाले हैं। आशा करता हूँ कि आपका प्यार व सहयोग हमेशा की तरह मिलता रहेगा । २६ फ़रवरी को ब्लॉग लेखन के मेरे २ वर्ष पूरे हो जायेंगे । इस अवसर पर मैं ब्लॉग जगत के उस महारथी को याद करना चाहता हूँ , जिसके ब्लॉग को पढ़कर मुझे ब्लॉग लेखन की प्रेरणा मिली । अभी हाल ही में मैंने पांचजन्य पत्रिका में धांकड़ ब्लोगर सुरेश चिपलूनकर के बारे में एक आर्टिकिल पढ़ा , आपके सामने वही आर्टिकिल प्रस्तुत कर रहा हूँ । "सुरेश चिपलूनकर का चेहरा जितना शांत दीखता है उतना ही तेज उनकी आँखों में ' उतनी ही तेजस्विता है । हिंदुत्व और राष्ट्रवाद के रक्षक और हिंदुत्व द्रोहियों , राष्ट्र विरोधियों , छध्म सेकुलरवाद , आतंकवाद ...