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दिल्ली सल्तनत इतिहास के दो सुनहरे वर्ष

अलाउद्दीन की हत्या के बाद उसका पुत्र मुबारक अपने सभी विरोधिओं कोकत्ल करने के बाद दिल्ली का सुलतान बन बैठा । उसकी इस कार्य में सबसे अधिक सहायता उसके सेनापति खुसरुखान ने की। खुसरुखान एक हिंदू गुलाम था। १२९७ में मालिक काफूर ने जब गुजरात पर आक्रमण किया था,तब एक सुंदर व तेजस्वी लड़का गुलाम के रूप में पकड़ा गया। जो अल्लाउद्दीन को सोंप दिया गया। उस हिंदू लड़के को इस्लाम में दिक्षितकिया गया तथा उसका नाम हसन रखा गया। धीरे धीरे हसन एक वीर योद्धा बनता चला गया। मुबारक के सुलतान बनने पर वह खुसरुखान के नाम से उसका सेनापति बना।
गुजरात के राजा की पुत्री देवल देवी को भी मालिक काफूर युद्ध में उठा लाया था,और अलाउद्दीन के पुत्र खिज्र्खान से जबर दस्ती उसका निकाह पडवा दिया। गुर्जर वंश की यह राजकन्या खिज्र्खान की हत्या के बाद सुलतान मुबारक के हट लग गई,और मुबारक ने उससे निकाह कर लिया।
हिंदू बालक से हसन व हसन से खुसरुखान बने युवक के दिल में अपने पुराने धर्म व अपने राष्ट्र के लिए अपार प्रेम जाग्रत था। इसी ज्वाला में हिंदू गुर्जर राजकन्या देवल देवी भी धधक रही थी । इसी कारण खुसरुखान ने एक दूरगामी योजना बना डाली। सुलतान मुबारक के अतिविश्वास पात्र होने के कारण खुसरुखान का महल में बेरोकटोक आना जाना था। खुसरुखान ने सुलतान को विश्वास में लेकर गुजरात की अपनी पुरानी हिंदू जाती परिया(पवार)के चुने हुए लगभग २०००० युवा सेना में भरती कर लिए .ये सारी योजनाएं महल में बन रही थी। देवल देवी इन योजनाओं में खुसरू का पूरा साथ दे रही थी।महल के भीतर भी सारे अंग रक्षक व पहरेदार भी बदल डाले गए।समय आने पर खुसरुखान ने मुबारक को मोंत के घाट उतर दिया.और नसुरुद्दीन के नम से दिल्ली का सुलतान बन गया। देवल देवी से उसने हिंदू रीतिरिवाज से विवाह किया।
उसने नसुरुद्दीन (जिसका अर्थ होता है धर्म रक्षक ) के नाम से ही अपने को हिंदू सम्राट घोषित कर दिया। जेल में पड़े सभी हिन्दुओं को छोड़ दिया गया। जबरदस्ती मुस्लमान बनाए लोगो का शुद्धिकरण कराय जाने लगा। जजिया समाप्त हो गया। नए हिंदू सम्राट ने हिंदू व मुस्लिम सैनिको दोनों की पगार बढ़ा दी। परंतु मुस्लिम सेना ने समय आने पर सुलतान के साथ धोखा किया.
अब इतना कुछ होने पर मुस्लिम समाज विरोध होनाथा।नसुरुद्दीन की ताकत के सामने २ वर्ष तक तो सब ठीक रहा। परंतु २ वर्ष बाद पंजाब प्रान्त के शासक गयासुद्दीन ने अपनी ताकत बढ़ा ली और दिल्ली पर काफिर के शासक को ख़त्म करने के लिए उस पर आक्रमण कर दिया। हिंदू सम्राट नसुरुद्दीन की मुस्लिम सेना समर छेत्र में पंजाब के शासक के साथ मिल गई। बचे हुए हिंदू वीर वीरता से लड़े परंतु नसुरुद्दीन के साथ युद्ध में वीरगति को प्राप्त हो गए.रानी देवल ने भी महल से कूदकर अपनी जान दे दी। नसुरुद्दीन का नाम भारतीय इतिहास में स्वर्ण अक्षरो में लिखा जाना चाहिए था। परन्तु इतिहासकारों ने दिल्ली सल्तनत के २ सुनहरे वर्ष बिल्कुल भुला दिए।

टिप्पणियाँ

  1. गुर्जर वंश की यह राजकन्या खिज्र्खान की हत्या के बाद सुलतान मुबारक के हट लग गई,और मुबारक ने उससे निकाह कर लिया।

    hamara durbhagy hai ki hum aaj apne itihaas se ddor hote ja rahe hai.jo apne itihas ko kho deta hai ..der saver vo khud bhi andheroN mein kho jate hai.itihas ki galtiyon se sabak lkar hi ek acche bhavisy ka nirman hota hai.

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  2. इस देश का सबसे बड़ा दुर्भाग्य ही यही है की सही इतिहास न पढ़ना |अब जरुरत है भारतीयों के जागने की

    आप की लेखनी का बहुत बहुत धन्यवाद्

    जवाब देंहटाएं
  3. अबे चूतिये, देवल देवी गुजरात के बाघेला राजपूत वंश के शासक कर्ण की पुत्री थी,
    न कि गुर्जर राजवंश(?) की

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