सीधे मुख्य सामग्री पर जाएं

यह मेरे इस देश को हो गया क्या आज है.


यह मेरे इस देशं को ये हो गया क्या आज है
ये जिन्दगी की प्रात है या जिन्दगी की सांझ है।

उद्देश्यहीन भीड़ क्यों हर तरफ खड़ी हुई।
हर आदमी के चेहरे पे गम की परत चढ़ी हुई।
यूं देखने मे हर कोई लगता तो पास-पास है।
लेकिन दिलों की दूरियां!! कैसा विरोधाभास है?
क्यों जिन्दगी के गीत की ये बेसुरी आवाज है।
ये मेरे इस ............................................................ ॥


हर सुबह की धूप का सूरज कही है को गया ।
चांदनी समेटकर अब चाँद भी है सो गया।
हर गली के बीच में वहशियाना शोर है।
क्यों खुद की आत्मा का खुद आदमी ही चोर है?
जाने कैसा बज रहा ये जिन्दगी का साज है।
ये मेरे इस देश .............................................. ॥


हर तरफ है नाचती हिंसा भरी जवानिया ।
मेरे वतन में रह गयी अहिंसा की बस कहानिया।
अन्न महंगा है तो क्या खून तो सस्ता हुआ।
यहाँ आदमी को आदमी है खा रहा हँसता हुआ।
गाँधी के सपनो पे बना ये कैसा रामराज है !!!!!
ये मेरे इस देश को .................................................... ॥


जीने की लालसा लिए बस जी रहा है आदमी ।
यूं विष का घूँट आप ही तो पी रहा है आदमी।
असत्य और कपट की जब बू रही हो खेतियाँ।
पाएंगी कहाँ से सच फिर आने वाली पीढियां।
फूलों भरे चमन का ये कैसा बुरा आगाज है।
ये मेरे इस ............................................................. ॥


इतने मुखोंटे आदमी के पास रहते है यहाँ।
हर बार चेहरे और ही हर बार दीखते हैं यहाँ।
यूं आदमी को जिन्दगी के दर्द का अहसास है।
पर जी रहा है इसलिए क़ल पर उसे विश्वास है।
ये जिन्दगी के जीने का कैसा नया अंदाज है।
ये मेरे इस देश को हो गया क्या आज है।


( यह रचना मेरे पिताजी ने १९७५ में रची थी । किन्तु आज भी ज्यों की त्यों प्रासंगिक है।)

टिप्पणियाँ

  1. यूं आदमी को जिन्दगी के दर्द का अहसास है।
    पर जी रहा है इसलिए क़ल पर उसे विश्वास है।
    vah vah vah ................................................................................................................................................................................

    जवाब देंहटाएं
  2. हर सुबह की धूप का सूरज कही है को गया ।
    चांदनी समेटकर अब चाँद भी है सो गया।
    हर गली के बीच में वहशियाना शोर है।
    क्यों खुद की आत्मा का खुद आदमी ही चोर है?

    जवाब देंहटाएं
  3. "क्यों खुद की आत्मा का खुद आदमी ही चोर है"
    बड़ी गहरी बात है
    प्रभावशाली चिरयुवा विचारों से बनी कविता
    लेखक और लेखनी को प्रणाम करता हूँ

    जवाब देंहटाएं
  4. उद्देश्यहीन भीड़ क्यों हर तरफ खड़ी हुई।
    हर आदमी के चेहरे पे गम की परत चढ़ी हुई।
    यूं देखने मे हर कोई लगता तो पास-पास है।
    लेकिन दिलों की दूरियां!! कैसा विरोधाभास है
    bahut hi sundar rachna hai.

    जवाब देंहटाएं
  5. बहुत सटीक रचना की थी आपके पिताजी ने .. सचमुच आज भी प्रासंगिक है ये .. इसे प्रेषित करने के लिए धन्‍यवाद !!

    जवाब देंहटाएं
  6. इतने मुखोंटे आदमी के पास रहते है यहाँ।
    हर बार चेहरे और ही हर बार दीखते हैं यहाँ।
    यूं आदमी को जिन्दगी के दर्द का अहसास है।
    पर जी रहा है इसलिए क़ल पर उसे विश्वास है।

    Kya baat hai

    जवाब देंहटाएं
  7. यूं आदमी को जिन्दगी के दर्द का अहसास है।
    पर जी रहा है इसलिए क़ल पर उसे विश्वास है।
    ये जिन्दगी के जीने का कैसा नया अंदाज है।
    ये मेरे इस देश को हो गया क्या आज है।



    kya baat kahi hai javab nahi ..laajavab

    जवाब देंहटाएं
  8. इस टिप्पणी को लेखक द्वारा हटा दिया गया है.

    जवाब देंहटाएं
  9. हर तरफ है नाचती हिंसा भरी जवानिया ।
    मेरे वतन में रह गयी अहिंसा की बस कहानिया।
    अन्न महंगा है तो क्या खून तो सस्ता हुआ।
    यहाँ आदमी को आदमी है खा रहा हँसता हुआ।
    गाँधी के सपनो पे बना ये कैसा रामराज है !!!!!

    आजभी समयानुसार प्रासंगिक है यह महान रचना !! बस पिताजी से मेरी विनती है कि इस गाँधी के नाम को हटाकर किसी संत का नाम लगादें तो अधिक बेहतर होगा क्योंकि जो इस कविता से परिलक्षित होता है उसके कारणों में से गाँधी भी एक बहुत बड़ा कारण था.

    जवाब देंहटाएं
  10. vartman paridrashya me bhi ekdam sateek...

    इतने मुखोंटे आदमी के पास रहते है यहाँ।
    हर बार चेहरे और ही हर बार दीखते हैं यहाँ।
    यूं आदमी को जिन्दगी के दर्द का अहसास है।
    पर जी रहा है इसलिए क़ल पर उसे विश्वास है।
    ये जिन्दगी के जीने का कैसा नया अंदाज है।


    गाँधी जी का तीन बन्दर का सिद्धांत-एक नकारात्मक सिद्धांत http://bit.ly/b4zIa2

    जवाब देंहटाएं
  11. इस देश का भला जब होगा....
    जब यह मुसड़ो को निकला जायेगा..
    यह लोग वंदे मातरम नाही बोलते...
    इन की जगह तो अफगान/पाकिस्तान में है ...
    जहाँ इन के लोग आपस में लड़कर मर रहे है...
    अगर इन लोगो को अल्लाह से इतना प्यार है ..???
    तोह हम लोग रेअद्य है . उन को अल्लाह के पास भेजंगे के लिए...
    तब अल्लाह अल्लाह मुस्लिम ..खुदा करते बैठना...
    जय हिंद .. वन्दे मातरम

    जवाब देंहटाएं

एक टिप्पणी भेजें

इस ब्लॉग से लोकप्रिय पोस्ट

कुरान और गैर मुस्लमान

इस लेख को लिखने से मेरा किसी भी धर्म का विरोध करने का कोई उद्देश्य नही है। अपितु य ह लेख इस्लाम के प्रचार के लि ए है । कुरान मुसलमानों का मजहबी ग्रन्थ है.मुसलमानों के आलावा इसका ज्ञान गैर मुस्लिमों को भी होना आवश्यक है। ............................................................. मानव एकता और भाईचारे के विपरीत कुरान का मूल तत्व और लक्ष्य इस्लामी एकता व इस्लामी भाईचारा है. गैर मुसलमानों के साथ मित्रता रखना कुरान में मना है. कुरान मुसलमानों को दूसरे धर्मो के विरूद्ध शत्रुता रखने का निर्देश देती है । कुरान के अनुसार जब कभी जिहाद हो ,तब गैर मुस्लिमों को देखते ही मार डालना चाहिए। कुरान में मुसलमानों को केवल मुसलमानों से मित्रता करने का आदेश है। सुरा ३ की आयत ११८ में लिखा है कि, "अपने (मजहब) के लोगो के अतिरिक्त किन्ही भी लोगो से मित्रता मत करो। " लगभग यही बात सुरा ३ कि आयत २७ में भी कही गई है, "इमां वाले मुसलमानों को छोड़कर किसी भी काफिर से मित्रता न करे। " सन १९८४ में हिंदू महासभा के दो कार्यकर्ताओं ने कुरान की २४ आयातों का एक पत्रक छपवाया । उस पत्रक को छपवाने

सनातन धर्म का रक्षक महान सम्राट पुष्यमित्र शुंग

मोर्य वंश के महान सम्राट चन्द्रगुप्त के पोत्र महान अशोक (?) ने कलिंग युद्ध के पश्चात् बौद्ध धर्म अपना लिया। अशोक अगर राजपाठ छोड़कर बौद्ध भिक्षु बनकर धर्म प्रचार में लगता तब वह वास्तव में महान होता । परन्तु अशोक ने एक बौध सम्राट के रूप में लग भाग २० वर्ष तक शासन किया। अहिंसा का पथ अपनाते हुए उसने पूरे शासन तंत्र को बौद्ध धर्म के प्रचार व प्रसार में लगा दिया। अत्यधिक अहिंसा के प्रसार से भारत की वीर भूमि बौद्ध भिक्षुओ व बौद्ध मठों का गढ़ बन गई थी। उससे भी आगे जब मोर्य वंश का नौवा अन्तिम सम्राट व्रहद्रथ मगध की गद्दी पर बैठा ,तब उस समय तक आज का अफगानिस्तान, पंजाब व लगभग पूरा उत्तरी भारत बौद्ध बन चुका था । जब सिकंदर व सैल्युकस जैसे वीर भारत के वीरों से अपना मान मर्दन करा चुके थे, तब उसके लगभग ९० वर्ष पश्चात् जब भारत से बौद्ध धर्म की अहिंसात्मक निति के कारण वीर वृत्ति का लगभग ह्रास हो चुका था, ग्रीकों ने सिन्धु नदी को पार करने का साहस दिखा दिया। सम्राट व्रहद्रथ के शासनकाल में ग्रीक शासक मिनिंदर जिसको बौद्ध साहित्य में मिलिंद कहा गया है ,ने भारत वर्ष पर आक्रमण की योजना बनाई। मिनिंदर ने सबसे प

ये है झांसी की रानी (jhansi ki rani)का असली चित्र.

मित्रो आज १७ जून को झाँसी की रानी लक्ष्मी बाई की पुन्यथिति है। झांसी की रानी लक्ष्मीबाई का यह एकमात्र फोटो है, जिसे कोलकाता में रहने वाले अंग्रेज फोटोग्राफर जॉनस्टोन एंड हॉटमैन द्वारा 1850 में ही खींचा गया था। यह फोटो अहमदाबाद निवासी चित्रकार अमित अंबालाल के संग्रह में मौजूद है। The only photo of Rani Laxmibai of Jhansi, which living in Calcutta in 1850 by the British photographer Ahugoman Jonstone and was pulled. This photo Ahmedabad resident artist Amit Ambalal exists in the collection.