शनिवार, 18 जुलाई 2015

बन्दर नाच (tufail chaturvedi ji )

                                                                 
महाराष्ट्र सरकार ने उन मदरसों के, जो आधुनिक विषय नहीं पढ़ा रहे हैं, को स्कूल न मानने और उनका अनुदान बंद करने का निर्णय लिया है। इस पर कई मुस्लिम और कांग्रेसी राजनेता, पत्रकार, मीडिया चैनल चिल्ल-पौं मचा रहे हैं। लगभग "भरतपुर लुट गयो रात मोरी अम्मा' वाली नौटंकी चल रही है। ये अनुकूल समय है कि इसी बहाने शिक्षा के उद्देश्य, उसको प्राप्त करने की दिशा में मदरसा प्रणाली की सफलता और उन राजनेताओं, पत्रकारों की भी छान-फटक कर ली जाये। आख़िर किसी योजना के शुरू करने, वर्षों चलाने के बाद उसको लक्ष्य प्राप्ति की कसौटी पर खरा-खोटा जांचा जायेगा कि नहीं ? ये पैसा महाराष्ट्र में लम्बे समय तक शासन करने वाले कॉंग्रेसी मुख्यमंत्रियों, शिक्षा मंत्रियों के घर का पैसा नहीं था। ये धन समाज का है और समाज का धन नष्ट करने के लिये निश्चित ही नहीं होता।
सदैव से शिक्षा का मुख्य उद्देश्य मनुष्य को अर्थोपार्जन की धारा में डालना होता है। इसी से जुड़ा या अन्तर्निहित लक्ष्य ये भी होता है कि धन की प्राप्ति का मार्ग संवैधानिक ही होना चाहिये यानी व्यक्ति के संस्कार का विषय भी धन कमाने से जुड़ा होता है। ज़ाहिर है ऐसे लोग भी होते हैं जो जेब काटने, ठगी करने, चोरी करने, डाका डालने, अपहरण करके फिरौती वसूलने को भी घन प्राप्ति का माध्यम मानते हैं और ऐसा करते हैं। मध्य काल के अनेक योद्धा समूह इसी तरह से जीवन जीते रहे हैं। ब्रिटिश शासन के भारत में भी कंजर, हबोड़े, सांसी, नट इत्यादि अनेकों जातियों के समूह इसी प्रकार से जीवन यापन करते रहे हैं। प्रशासन, पुलिस के दबाव और सभ्यता के विकास के साथ उनका इस प्रकार का जीवन भी बदला और वो सब सभ्य समाज के साथ समरस होने लगे हैं। यहाँ एक प्रश्न टी वी चैनलों पर अंतहीन बहस करने-करवाने वाले ऐंकरों और उनसे सीखे-तैयार किये भेजों में कुलबुलायेगा कि सभ्य होने की सबकी अपनी-अपनी परिभाषा हैं। ऐसा कलुषित जीवन जीने वाले भी अपने को सर्वाधिक सभ्य मान सकते हैं।
इसलिये इसकी बिल्कुल सतही, बेसिक परिभाषा से काम चलाते हैं। प्रत्येक मनुष्य के सामान अधिकार, स्त्रियों तथा पुरुषों के बराबर के अधिकार, रजस्वला हो जाने के बाद ही लड़की का विवाह, दास-प्रथा का विरोध, जीवन का अधिकार मूल अधिकार { इसका अर्थ ये है कि राज्य ही अत्यंत-विशेष परिस्थिति में किसी व्यक्ति के प्राण ले सकता है और ऐसा करने के लिये भी अभयोग लगाने, सुनवाई करने की ठोस-सिक्काबंद न्याय व्यवस्था आवश्यक है। यानी शिक्षा का मुख्य उद्देश्य मनुष्य को संवैधानिक मार्गों से ही धन अर्जन करने का माध्यम सुझाना है।
यहाँ से मैं मदरसा की शिक्षण प्रणाली पर बात करना चाहता हूँ। भारत में मदरसों का प्रारम्भ बाबर ने किया था। हम सब जानते हैं बाबर मुग़ल आक्रमणकारी था। भारत में उस समय पचासों आक्रमणकारियों के नृशंस कार्यों, विद्धवंस के बाद भी गांव-गांव में अपनी गुरुकुल प्रणाली चल रही थी। हमें उस समय किसी नए शिक्षण की आवश्यकता नहीं थी। आइये विचार करें बाबर के भारत की भूमि में इस प्रणाली के बीज रोपने का क्या उद्देश्य रहा होगा ? इसे जानने के लिए उपयुक्त है कि मदरसों का सामान्य पाठ्यक्रम क्या है, वहां क्या पढ़ाया जाता है, इस पर विचार किया जाये।
मदरसा इस्लामी शिक्षा का माध्यम है। अब यहाँ क़ुरआन { अज़बर-उसे कंठस्थ करना, क़िरअत-उसे लय से पढ़ना, तफ़सीर-उसका विवेचन करना }, हदीस { मुहम्मद जी के जीवन की घटनाओं का लिपिबद्ध स्वरूप}, फ़िक़ा { इस्लामी क़ानून }, सर्फ़ उन्नव { अरबी व्याकरण } दीनियात { इस्लाम के बारे में अध्ययन }, मंतिक़ और फ़लसफ़ा { तर्क और दर्शन } पढ़ाये जाते हैं। इसके अतिरिक्त इस्लाम के विषय में अन्य सभी प्रकार का शिक्षण दिया जाता है। कुछ मदरसों में कंप्यूटर, अंग्रेजी, तारीख़ { मूलतः इस्लाम का इतिहास और कुछ भारत का भी इतिहास } पढ़ाया जाता है।
मैं आग्रह करूँगा कि मिडिया, प्रेस, सभाओं में हाय-हत्या करने वाले कोई भी सज्जन-दुर्जन-कुज्जन देवबंद, सहारनपुर, लखनऊ, बरेली, बनारस, सूरत, पटना, दरभंगा, कलकत्ता, थाणे कहीं के भी मदरसों में जा कर केवल एक किनारे चुपचाप खड़े हो कर वहां की चहलपहल देखें। वहां पूरा वातावरण मध्य युगीन होता है। ढीले-ढाले कपड़े पहने, प्रचलित व्यवहार से बिलकुल भिन्न टोपियां लगाये इन छात्रों की आँखों में झांकें। आप पायेंगे इनकी आँखों में विकास करने, आगे बढ़ने, समाज के हित में कुछ करने की ललक, सपने हैं ही नहीं। आप वहां इतिहास की अजीब सी व्याख्या, उसके कुछ हिस्सों का मनमाना पाठ, अरबी सीखने के नाम पर कुछ अपरिचित आवाज़ें रटते लोगों को पाते हैं। ऐसे लोग जो मानते हैं औरत आदमी की पसली से बनायी गयी है। उसमें बुद्धि नहीं होती और वो नाक़िस उल अक़्ल है। उसे परदे में रहना चाहिये। उसका काम मुस्लिम बच्चे पैदा करना, घर की अंदरूनी देखभाल है। जो आज भी समझते हैं कि धरती गोल नहीं चपटी है। सूरज शाम को कीचड़ भरे तालाब में डूब जाता है।
Till, when he reached the setting-place of the sun, he found it setting in muddy spring, and found a people thereabout: We said: O Dhu'l-Qarneyn! Either punish him or show them kindness { Quraan Ayat 86 chapter 18 Al-Kahaf }
ऐसे छात्र जो समझते हैं कि केवल वो जिस सिमित जीवन-शैली के बारे में जानते हैं, वही सही है और शेष दुनिया शैतानी है। प्रकृति के प्रत्येक कण के प्रति आभारी-आस्थावान प्रकृति पूजक, मूर्ति-पूजक, ईसाई, यहूदी, पारसी, बौद्ध, शिन्तो, नास्तिक अर्थात उसके अतिरिक्त सारे ही लोग वाजिबुल-क़त्ल हैं। इन सबको मारे अथवा मुसलमान बनाये संसार में चैन नहीं आ सकता। संसार एक ईश्वर बल्कि अरबी अल्लाह की उसकी सीखी-पढ़ाई व्यवस्था से इबादत करने के लिये अभिशप्त है। आज नहीं तो कल सारी दुनिया इस्लाम क़ुबूल कर लेगी और क़ुरआन के रास्ते पर आ जाएगी। उन के जीवन का उद्देश्य इसी दावानल का ईंधन बनना है। संसार के बारे में ऐसी अटपटी, अजीब दृष्टि बनाना केवल इसी लिये संभव होता है चूँकि ये लोग असीम आकाश को चालाक लोगों की बनायी गयी बहुत छोटी सी खिड़की से देखते हैं। ये काफ़ी कुछ कुएँ के मेढक द्वारा समुद्र से आये मेंढक के बताने पर समुद्र की लम्बाई-चौड़ाई का अनुमान लगाने की तरह है। कुएँ में लगायी गयी कितनी भी छलाँगें, ढेरों उछल-कूद समुद्र के विस्तार को कैसे बता सकती है ? कुँए में रहने वाला समुद्र की कल्पना ही कैसे कर सकता है ? उसे समझ ही कैसे सकता है ?
मदरसा मूलतः इस्लामी चिंतन के संसार पर दृष्टिपात का उपकरण है। स्वाभाविक है ऐसी आँखें फोड़ने वाली विचित्र शिक्षा के बाद निकले छात्र जीवनयापन की दौड़ से स्वयं को बाहर पाते हैं। उन्हें मदरसे से बाहर की दुनिया पराई लगती है। इन तथ्यों की उपस्थिति में निस्संकोच ये निष्पत्ति हाथ आती है कि मदरसा दुनिया को देखने का ऐसा टेलिस्कोप है जिसके दोनों तरफ़ के शीशे पहले दिन से ही कोलतार से पुते हुए थे। इसका प्रयोग देखने वाले को कुछ उपलब्ध नहीं कराता बल्कि उसे समाज से काट देता है। वो कुछ न दिखाई देने के लिये अपनी बौड़म बुद्धि, ग़लत टेलिस्कोप को ज़िम्मेदार नहीं ठहराता बल्कि इसके लिए बेतुके तर्क ढूंढता है और उसे मंतिक़-फ़िक़ा का नाम देता है। मदरसे की जड़ में इस्लामी जीवन पद्धति है और ये पद्धति सारे समाज से स्वयं को काट कर रखती है। आप सारे विश्व में मुस्लिम बस्तियां अन्य समाजों से अलग पाते हैं। स्वयं सोचिये आपके मुस्लिम दोस्त कितने हैं ? वो आपको कितना अपने घर बुलाते हैं ? वो अपने समाज के अतिरिक्त अन्य समाज के लोगों में कितना समरस होते हैं ?
साहिबो यही बाबर का उद्देश्य था। भारत में भारत के पूरी तरह ख़िलाफ़, अटपटी तरह से सोचने-जीने वाला, आतंरिक विदेशी मानस पैदा करना। इसी तरह से भारत में इस मिटटी के लिये पराई सोच का पौधा जड़ें जमा सकता था। यही वो उपकरण है जिसने कश्मीर में आतंकवाद पनपाया है। वृहत्तर भारत की छोड़ें, इसी उपकरण के कारण अभी हमसे अफगानिस्तान, पाकिस्तान, बांग्ला देश अलग हुए थे। इसी उपकरण के उपयोग के कारण सारे संसार में वहाबियत फ़ैल रही है। यही वो अजीब से शिक्षण-प्रणाली है जो मनमाने ढंग से तर्क की कसौटी पर स्वयं को कसे बिना पूर्णरूपेण सही और दूसरों को घृणा-योग्य ग़लत समझती है। इसी वहाबी सोच के कारण वो संसार भर में नृशंस हत्याकांडों को आवश्यक समझती है। सबको मार डालने का ये दर्शन नरबलि देने वाले अघोरियों जैसा बल्कि उससे कहीं अधिक खतरनाक है चूँकि अघोरी विचार समूह का विचार नहीं है।
आज नहीं तो कल इससे तो हम निबट ही लेंगे मगर इस संस्थान से उपजी खर-पतवार का क्या किया जाये ? ये बाजार में बिकती नहीं और फिर मंडी पर ही पक्षपात का आरोप लगाने लगती है। सच्चर महाशय जिस निष्कर्ष पर पहुंचे थे वो इसी संस्थान की शिक्षा प्रणाली का परिणाम है। इस प्रणाली के पक्ष में विधवा-विलाप करने वाले किसी भी व्यक्ति का बेटा-बेटी मदरसे में आखिर क्यों नहीं पढ़ता ? ये लोग मदरसे में पढ़ी लड़की को अपनी बहू क्यों नहीं बनाते ? मदरसे के छात्र को दामाद क्यों नहीं बनाते ? सच्चाई उन्हें भी पता है मगर उनको लगता है कि मुल्ला पार्टी इस हाय हाय मचने से उनके पक्ष में वोट डलवा देगी। आखिर बिहार और उत्तर प्रदेश के चुनाव सन्निकट हैं और मुल्ला टोलियां अपने पक्ष में घुमानी हैं या नहीं ? मित्रो ! ये बन्दर नाच इसी लिए हो रहा है

मंगलवार, 9 जून 2015

भविष्य पुराण के अनुसार महामद ( मुहम्मद ) एक पैशाच धर्म स्थापक !               राकेश रंजन

इस्लाम के प्रचारक हिन्दुओं का धर्म परिवर्तन कराने के लिए तरह तरह के हथकण्डे अपनाते रहते हैं , कभी सेकुलर बन कर गंगा जमुनी तहजीब की वकालत करने लगते हैं , कभी इस्लाम और हिन्दू धर्म में समानता साबित करने लगते हैं , लेकिन इनका असली उद्देश्य हिन्दुओं को गुमराह करके इस्लाम के चंगुल में फँसाना ही होता है , क्योंकि अधिकांश हिन्दू इस्लाम से अनभिज्ञ और हिन्दू धर्म से उदासीन होते हैं , इस समय इस्लाम के प्रचारकों में जाकिर नायक का नाम सबसे ऊपर है। जो एक "सलफ़ी जिहादी" गिरोह से सम्बंधित है। यह गिरोह जिहाद में आतंकवाद को उचित मानता है। जाकिर नायक का पूरा नाम "जाकिर अब्दुल करीम नायक " है ,इसका जन्म 18 अक्टूबर सन 1965 में हुआ था। इसने मेडिकल डाक्टर की ट्रेनिंग छोड़ कर इस्लाम का प्रचार करना शुरू कर दिया और दुबई (UAE ) में इस्लामिक रिसर्च फाउंडेशन (Islamic Research Foundation ) नामकी एक संस्था बनाई , यही नहीं जाकिर "पीस टीवी (Peace TV ) नामका निजी चैनल भी चलाता है , जिसका मुख्यालय भी दुबई में है। जाकिर अक्सर अपने चैनल पर चर्चा के लिए दूसरे धर्म के लोगों को आमंत्रित करता है , फिर उन्हीं के धर्म ग्रन्थ से कुछ ऐसे अंश पेश करता है , जिनसे साबित हो सके कि उनके धर्मग्रन्थ में भी मुहम्मद , अल्लाह और रसूल का उल्लेख है,जिससे भोले भले लोग मुसलमान बन जाएँ।
जाकिर नायक ने ऐसी ही एक चाल 20 फरवरी 2014 को चली , जिसमे हिंदुओं को भ्रमित करने के लिए दावा कर दिया कि हिन्दुओं के धर्मग्रन्थ " भविष्य पुराण " में मुहम्मद का वर्णन है और उनको अवतार बताया गया है। जाकिर नायक ने बड़ी मक्कारी से हिन्दुओं को धोखा देने के लिए यह साबित करने का प्रयास किया है कि भविष्य पुराण में मुहम्मद का वर्णन एक अवतार के रूप में किया गया है , इसलिए हिन्दू मुहम्मद को एक अवतार मान कर सम्मान दें और उसके धर्म इस्लाम को स्वीकार कर लें। हो सकता है कि कुछ मूर्ख जाकिर जाल में फंस कर जाकिर की बात को सही मान बैठे हों , लेकिन भविष्य पुराण में मुहम्मद को " महामद " त्रिपुरासुर का अवतार , धर्म दूषक और पिशाच धर्म का प्रवर्तक बताया गया है। यही नहीं भविष्य पुराण में इस्लाम को पिशाच धर्म और मुसलमानों को " लिंगोच्छेदी "यानि लिंग कटवाने वाले कहा गया है। भविष्य पुराण के जिस भाग में महामद वर्णन है ,वह मूल संस्कृत और उसके हिंदी अनुवाद के साथ दिया जा रहा है। ताकि लोगों का यह भ्रम दूर हो जाए की भविष्य पुराण में महामद को एक अवतार के रूप में प्रस्तुत किया गया है।
भविष्य पुराण में महामद ( मुहम्मद ) एक पैशाच धर्म स्थापक -भविष्य पुराण, प्रतिसर्ग पर्व, खण्ड 3, अध्याय 3 श्लोक . 1 -31
श्री सूत उवाच-
1. शालिवाहन वंशे च राजानो दश चाभवन्। राज्यं पञ्चशताब्दं च कृत्वा लोकान्तरं ययुः। ( श्री सूत जी ने कहा - राजा शालिवाहन के वंश में दस राजा हुए थे। उन सबने पञ्च सौ वर्ष पर्यन्त राज्य शासन किया था और अंत में दुसरे लोक में चले गए थे।)
2. मर्य्यादा क्रमतो लीना जाता भूमण्डले तदा। भूपतिर्दशमो यो वै भोजराज इति स्मृतः।( उस समय में इस भूमण्डल में क्रम से मर्यादा लीन हो गयी थी। जो इनमे दशम राजा हुआ है वह भोजराज नाम से प्रसिद्द हुआ।)
3. दृष्ट्वा प्रक्षीणमर्य्यादां बली दिग्विजयं ययौ। सेनया दशसाहस्र्या कालिदासेन संयुतः।( मर्यादा क्षीण होते देखकर परम बलवान उसने(राजा ने) दिग्विजय करने को गमन किया था। सेना में दस सहस्त्र सैनिक के साथ कविश्रेष्ठ कालिदास थे।)
4. तथान्यैर्ब्राह्मणैः सार्द्धं सिन्धुपारमुपाययौ जित्वा गान्धारजान् म्लेच्छान् काश्मीरान् आरवान् शठान्।( तथा अन्य ब्राह्मणों के सहित वह सिन्धु नदी के पार प्राप्त हुआ(अर्थात पार किया) था। और उसने गान्धारराज, मलेच्छ, काश्मीर, नारव और शठों को दिग्विजय में जीता।)
5. तेषां प्राप्य महाकोषं दण्डयोग्यानकारयत् एतस्मिन्नन्तरे म्लेच्छ आचार्येण समन्वितः।( उनका बहुत सा कोष प्राप्त करके उन सबको योग्य दण्ड दिया था। इसी समय काल में मलेच्छों का एक आचार्य हुआ।)
6. महामद इति ख्यातः शिष्यशाखा समन्वितः नृपश्चैव महादेवं मरुस्थलनिवासिनम्।(महामद शिष्यों की अपने शाखाओं में बहुत प्रसिद्द था। नृप(राजा) ने मरुस्थल में निवास करने वाले महादेव को नमन किया।)
7. गंगाजलैश्च सस्नाप्य पञ्चगव्य समन्वितैः। चन्दनादिभिरभ्यर्च्य तुष्टाव मनसा हरम् ।(पञ्चजगव्य से युक्त गंगा के जल से स्नान कराके तथा चन्दन आदि से अभ्याचना(भक्तिपूर्वकभाव से याचना) करके हर(महादेव) की स्तुति की ।)
भोजराज उवाच-
8. नमस्ते गिरिजानाथ मरुस्थलनिवासिने। त्रिपुरासुरनाशाय बहुमायाप्रवर्त्तिने।(भोजराज ने कहा - हे गिरिजा नाथ ! मरुस्थल में निवास करने वाले, बहुत सी माया में प्रवत होने त्रिपुरासुर नाशक वाले हैं।)
9. म्लेच्छैर्गुप्ताय शुद्धाय सच्चिदानन्दरूपिणे। त्वं मां हि किंकरं विद्धि शरणार्थमुपागतम् ।(मलेच्छों से गुप्त, शुद्ध और सच्चिदानन्द रूपी, मैं आपकी विधिपूर्वक शरण में आकर प्रार्थना करता हूँ।)
सूत उवाच-
10. इति श्रुत्वा स्तवं देवः शब्दमाह नृपाय तम्। गन्तव्यं भोजराजेन महाकालेश्वरस्थले ।( सूत जी ने कहा - महादेव ने प्रकार स्तुति सुन राजा से ये शब्द कहे "हे भोजराज आपको महाकालेश्वर तीर्थ जाना चाहिए।")
11. म्लेच्छैस्सुदूषिता भूमिर्वाहीका नाम विश्रुता। आर्य्यधर्मो हि नैवात्र वाहीके देशदारुणे ।(यह वाह्हीक भूमि मलेच्छों द्वारा दूषित हो चुकी है। इस दारुण(हिंसक) प्रदेश में आर्य(श्रेष्ठ)-धर्म नहीं है।)
12. बभूवात्र महामायी योऽसौ दग्धो मया पुरा। त्रिपुरो बलिदैत्येन प्रेषितः पुनरागतः ।(जिस महामायावी राक्षस को मैंने पहले माया नगरी में भेज दिया था(अर्थात नष्ट किया था) वह त्रिपुर दैत्य कलि के आदेश पर फिर से यहाँ आ गया है।)
13. अयोनिः स वरो मत्तः प्राप्तवान् दैत्यवर्द्धनः। महामद इति ख्यातः पैशाच कृति तत्परः ।(वह मुझसे वरदान प्राप्त अयोनिज(pestle, मूसल, मूलहीन) हैं। एवं दैत्य समाज की वृद्धि कर रहा है। महामद के नाम से प्रसिद्द और पैशाचिक कार्यों के लिए तत्पर है।)
14. नागन्तव्यं त्वया भूप पैशाचे देशधूर्तके। मत् प्रसादेन भूपाल तव शुद्धिः प्रजायते ।( हे भूप(भोजराज) ! आपको मानवता रहित धूर्त देश में नहीं जाना चाहिए। मेरी प्रसाद(कृपा) से तुम विशुद्ध राजा हो।)
15. इति श्रुत्वा नृपश्चैव स्वदेशान् पुनरागमत्। महामदश्च तैः सार्द्धं सिन्धुतीरमुपाययौ ।(यह सुनने पर राजा ने स्वदेश को वापस प्रस्थान किया। और महामद उनके पीछे सिन्धु नदी के तीर(तट) पर आ गया।)
16. उवाच भूपतिं प्रेम्णा मायामदविशारदः। तव देवो महाराज मम दासत्वमागतः ।( मायामद माया के ज्ञाता(महामद) ने राजा से झूठ कहा - हे महाराज ! आपके देव ने मेरा दासत्व स्वीकार किया है अतः वे मेरे दास हो गए हैं।)
17. ममोच्छिष्टं संभुजीयाद्याथात त्पश्य भो नृप। इति श्रुत्वा तथा परं विस्मयमागतः ।( हे नृप(भोजराज) ! इसलिए आज से आप मुझे ईश्वर के संभुज(बराबर) उच्छिष्ट(पूज्य) मानिए, ये सुन कर राजा विस्मय को प्राप्त भ्रमित हुआ।)
18. म्लेच्छधर्मे मतिश्चासीत्तस्य भूपस्य दारुणे, तच्छृत्वा कालिदासस्तु रुषा प्राह महामदम्।( राजा की दारुण(अहिंसा) मलेच्छ धर्म में रूचि में वृद्धि हुई। यह राजा के श्रवण करते देख, कालिदास ने क्रोध में भरकर महामद से कहा।)
19. माया ते निर्मिता धूर्त नृपम्हन हेतवे हनिष्यामि दुराचारं वाहीकं पुरुषाधमम्।( हे धूर्त ! तूने नृप(राजधर्म) से मोह न करने हेतु माया रची है। दुष्ट आचार वाले पुरुषों में अधम वाहीक को मैं तेरा नाश कर दूंगा।)
20. इत्युक्त्वा स द्विजः श्रीमान् नवार्ण जप तत्परः जप्त्वा दशसहस्रं च तद्दशांशं जुहाव सः।( यह कह श्रीमान ब्राह्मण(कालिदास) ने नर्वाण मंत्र में तत्परता की। नर्वाण मंत्र का दश सहस्त्र जाप किया और उसके दशाश जप किया।)
21. भस्म भूत्वा स मायावी म्लेच्छदेवत्वमागतः, भयभीतस्तु तच्छिष्या देशं वाहीकमाययुः।( वह मायावी भस्म होकर मलेच्छ देवत्व अर्थात मृत्यु को प्राप्त हुआ। भयभीत होकर उसके शिष्य वाहीक देश में आ गए।)
22. गृहीत्वा स्वगुरोर्भस्म मदहीनत्वमागतम्, स्थापितं तैश्च भूमध्ये तत्रोषुर्मदतत्पराः।( उन्होंने अपने गुरु(महामद) की भस्म को ग्रहण कर लिया और और वे मदहीन को गए। भूमध्य में उस भस्म को स्थापित कर दिया। और वे वहां पर ही बस गए।)
23. मदहीनं पुरं जातं तेषां तीर्थं समं स्मृतम्, रात्रौ स देवरूपश्च बहुमायाविशारदः।( वह मदहीन पुर हो गया और उनके तीर्थ के सामान माना जाने लगा। उस बहुमाया के विद्वान(महामद) ने रात्रि में देवरूप धारण किया।)
24. पैशाचं देहमास्थाय भोजराजं हि सोऽब्रवीत् आर्य्यधर्म्मो हि ते राजन् सर्ब धर्मोतमः स्मृतः ।( आत्मा रूप में पैशाच देह को धारण कर भोजराज से कहा। हे राजन(भोजराज) !मेरा यह आर्य समस्त धर्मों में अतिउत्तम है।
25. ईशाज्ञया करिष्यामि पैशाचं धर्मदारुणम् लिंगच्छेदी शिखाहीनः श्मश्रुधारी स दूषकः।(अपने ईश की आज्ञा से पैशाच दारुण धर्म मैं करूँगा। मेरे लोग लिंगछेदी(खतना किये हुए), शिखा(चोटी) रहित, दाढ़ी रखने वाले दूषक होंगे।)
26. उच्चालापी सर्वभक्षी भविष्यति जनो मम विना कौलं च पशवस्तेषां भक्ष्या मता मम।( ऊंचे स्वर में अलापने वाले और सर्वभक्षी होंगे। हलाल(ईश्वर का नाम लेकर) किये बिना सभी पशु उनके खाने योग्य न होगा।)
27. मुसलेनैव संस्कारः कुशैरिव भविष्यति तस्मात् मुसलवन्तो हि आतयो धर्मदूषकाः।( मूसल से उनका संस्कार किया जायेगा। और मूसलवान हो इन धर्म दूषकों की कई जातियां होंगी।)
28. इति पैशाच धर्म श्च भविष्यति मयाकृतः इत्युक्त्वा प्रययौ देवः स राजा गेहमाययौ।( इस प्रकार भविष्य में मेरे(मायावी महामद) द्वारा किया हुआ यह पैशाच धर्म होगा। यह कहकर वह वह (महामद) चला गया और राजा अपने स्थान पर वापस आ गया।)
29. त्रिवर्णे स्थापिता वाणी सांस्कृती स्वर्गदायिनी,शूद्रेषु प्राकृती भाषा स्थापिता तेन धीमता।( उसने तीनों वर्णों में स्वर्ग प्रदान करने वाली सांस्कृतिक भाषा को स्थापित किया और विस्तार किया। शुद्र वर्ण हेतु वहां प्राकृत भाषा के का ज्ञान स्थापित/विस्तार किया(ताकि शिक्षा और कौशल का आदान प्रदान आसान हो)।)
30. पञ्चाशब्दकालं तु राज्यं कृत्वा दिवं गतः, स्थापिता तेन मर्यादा सर्वदेवोपमानिनी।( राजा ने पचास वर्ष काल पर्यंत राज(शासन) करते हुए दिव्य गति(परलोक) को प्राप्त हुआ। तब सभी देवों की मानी जाने वाली मर्यादा स्थापित हुई।)
31. आर्य्यावर्तः पुण्यभूमिर्मध्यंविन्ध्यहिमालयोः आर्य्य वर्णाः स्थितास्तत्र विन्ध्यान्ते वर्णसंकराः।( विन्ध्य और हिमाचल के मध्य में आर्यावर्त परम पुण्य भूमि है अर्थात सबसे उत्तम(पवित्र) भूमि है, आर्य(श्रेष्ठ) वर्ण यहाँ स्थित हुए। और विन्ध्य के अंत में अन्य कई वर्ण मिश्रित हुए।)
भविष्य पुराण, प्रतिसर्ग पर्व, खण्ड 3, अध्याय 3 श्लोक . 1 -31
भविष्य पुराण के इन सभी श्लोकों को एक साथ पढ़कर महामद (मौहम्मद)के बारे में स्पष्ट जानकारी प्राप्त हो जाती है कि भविष्य पुराण में महामद के बारे में क्या लिखा है और क्या नही। अब जाकिर नायक बताये कि भविष्य पुराण के पैशाच धर्म के संस्थापक ही मुहम्मद साहब है तो वह हिन्दुओं के अवतार कैसे हुए ?

सोमवार, 30 मार्च 2015

कभी ना अंतर मिट पायेगा पूजा और अजान में,
कभी ना अंतर मिट पायेगा पूजा और अजान में,
काफिरों के सर काट दो लिक्खा यही कुरआन में
पूजा में हम यही मांगते, सब मंगल हों , अच्छा हो
गैर मुस्लिमो तुम काफिर हो,मुल्ला कहे ये शान में ,
कभी ना अंतर मिट पायेगा पूजा और अजान में,
जो आया उसको अपनाया ,सार धर्म ने यही बताया,
काफ़िर की जो गर्दन काटे ,उनका वो गाजी कहलाया।
हमने कभी ना अंतर बरता ,मस्जिद और शिवालों में ,
उनकी नंगी शमशीरों ने मासूमों का रक्त बहाया।
चीर हरण बहनो के, कर डाले ,पूरे हिन्दुस्तान में,
कभी ना अंतर मिट पायेगा पूजा और अजान में।
वेदों के हम रहे पुजारी ,गीता का भी ज्ञान सुनाया,
पर अहिंसा के गीतों ने हमको कैसा हीज़ बनाया।
वीरों की इस राष्ट्र भूमि ने कभी ना हिंसा पाली थी पर ,
धर्म ध्वजा की मर्यादा में,हर दुश्मन को मार भगाया।
भारत माँ की आन लुट गयी ,असि गई जब म्यान में
कभी ना अंतर मिट पायेगा पूजा और अजान में,
बम धमाके करते रहते ,मुजाहिद कहलाते है ,
वोटों की खातिर आँखों के,ये तारे बन जाते है।
दूध पिलाने हम साँपों को,पीरों पर ही जायेंगे ,
पी पी कर ये खून हमारा तालिबान बन जाते हैं।
सारा भारत देखना चाहते ये तो पाकिस्तान में.,
कभी ना अंतर मिट पायेगा पूजा और आजान में।
भारत माँ को डायन कहते,जो ना कभी लजाते हैं,
छुप छुप कर हैं हमला करते,कायरता सदा दिखाते हैं।
बार- बार ये धमकी- देकर,राजभवन -को ठगते है ,
ध्वज तिरंगा अग्नि में दे, हरा रंग फहराते है।
मारो काफ़िर काटो काफ़िर रहता हरदम ध्यान में,
कभी ना अंतर मिट पायेगा पूजा और अज़ान में।

मंगलवार, 2 सितंबर 2014

ये चित्र २००६ में बिजनौर का  है। …यनि ८ साल पुराना। ।हिन्दू महासभा की और से मैं और मेरे साथी ने २००६ से ही पश्चिमी उत्तर प्रदेश में हर जिले में घूम घूम कर लविंग जेहाद का विरोध करके हिन्दू समाज में जाग्रति लाने की कोशिश करते थे ---- किन्तु उस समय हमारा मजाक उड़ाया जाता था कि हमने हिन्दू व मुसलमानो को लड़ाने के लिए लविंग जेहाद नामक  शब्द गढ़ लिया है।

मंगलवार, 12 नवंबर 2013

१४ नवंबर नेहरू के जन्म दिन पर विशेष 


हमें नेहरुओं के बारे में कुछ नई सूचनाएं प्राप्त हुई हैं, जिसे हम
पाठकों को  बताना चाहते हैं। हम आप को सूचित कर चुके हैं कि जवाहर के
पितामह यानी दादा का नाम गंगाद्दर कौल था। मुगल राज्य में गंगाद्धर पुलिस
अधिकारी  था। वह नहर के किनारे रहता था, इसीलिए इस परिवार ने नेहरू नाम
धारण कर लिया। ऐसा बताया जाता है।
अब सूचना मिली है कि गंगधर नकली नाम था। जवाहर का पैतृक पितामह वास्तव
में मुगलवंशीय था। तब उसने कश्मीरी हिंदू नाम क्यों धारण किया? हमें जो
कारण बताए गए हैं, वे निम्नलिखित हैं,
1857 के गदर में अंग्रेज सभी जगह सभी मुगलों को कत्ल कर रहे थे। ताकि
भारतीय साम्राज्य का कोई दावेदार न बचे। उस समय हिंदू अंग्रेजों के
निशाने पर नहीं थे। जब तक कि, किसी विशेष परिस्थिति में, पिछले संबंधों
के कारण, कोई हिंदू मुगलों का पक्ष लेते हुए न पाया जाए। यही कारण था कि
मुसलमानों द्वारा हिंदुओं का नाम अपनाए जाने का उस समय चलन हो चुका था।
इसी कारण से, मालूम होता है कि, गंगाधर नाम भी किसी मुसलमान ने, अपनी जान
बचाने के लिए धारण कर लिया।
अपने आत्मचरित्र वर्णन में जवाहरलाल लिखता है कि उसने अपने पितामह का
मुगल राजवंशीय वेशभूषा में बना चित्र देखा था। अपने संस्मरण में जवाहर की
दूसरी बहन कृष्णा हथीसिंह ने लिखा है कि 1857 के गदर के पूर्व गंगाद्दर
दिल्ली का शहर कोतवाल था। लेकिन पूरी छानबीन करके लिखे गए अभिलेख
‘‘बहादुर शाह द्वितीय और 1857 का दिल्ली का गदर’’ महदी हुसेन लिखित, (
1987 का प्रकाशन, प्रकाशक एमएन प्रकाशन, डब्लू-112 ग्रेटर कैलाश भाग 1,
नईदिल्ली) के अनुसार 1857 के गदर के आसपास कार्यरत नगर कोतवाल दिल्ली का
नाम फैजुल्ला खान था। उसकी नियुक्ति नगर राज्यपाल और कोतवाल मिर्जा
मनीरुद्दीन के स्थान पर हुई थी। मिर्जा मनीरुद्दीन पर अंग्रेजों का जासूस
होने का आरोप था। इसी कारण से उसे सुल्तान ने नौकरी से निकाला था और
राज्यपाल का पद भी समाप्त कर दिया था। उस समय नायब कोतवाल श्री भाव सिंह
और लाहौरी गेट के थानेदार श्री काशीनाथ थे। गंगाधर नाम के व्यक्ति का
उपरोक्त अभिलेख में कहीं पता नहीं है। स्पष्टतः यह विषय किसी सुयोग्य
इतिहासकार द्वारा जांच करने के योग्य है।
1857 में दिल्ली पर कब्जे के बाद अंग्रेजों ने सारा दिल्ली खाली करा
लिया। दिल्ली के बाहर लोगों को छोलदारियों में रहना पड़ा। प्रत्येक घर की
अच्छी तरह तलाशी ली गई। जिसमें अकूत द्दन मिला। इसे अंग्रेजों ने जब्त कर
लिया। दिल्ली के बाहरी भागों की भी अंग्रेजों ने तलाशी ली। जो भी मुगल
मिला उसे अंग्रेजों ने मार डाला ताकि दिल्ली सिंहासन का कोई दावेदार न
बचे। लगभग दो माह बाद हिंदुओं को अपने घरों में वापस जाने की अनुमति दी
गई। बाद में मुसलमानों को अपने घरों में वापस जाने की अनुमति मिली।
19वीं सदी के उर्दू साहित्यकारों, विशेषकर ख्वाजा हसन निजामी के साहित्य
में, उस समय की मुगलों और मुसलमानों के दुखदायी जीवन परिपाटी का उल्लेख
मिलता है। साहित्यकारों ने यह भी बताया है कि किस प्रकार अपनी जान बचाने
के लिए मुगल और मुसलमान शहरों को छोड़ कर भाग रहे थे। जवाहर लाल ने भी
अपने आत्मचरित्र में लिखा है कि मुगलों से प्रभावित स्थान आगरा जाते हुए
रास्ते में अंग्रेजों ने मुगलवेशभूषा के कारण उसके दादा यानी पितामह के
परिवार को रोक लिया था। लेकिन कश्मीरी पंडित कहने पर उसके पितामह को जाने
दिया था। इस उद्धरण से इस बात को बल मिलता है कि हो न हो फैजुल्ला खान ही
गंगाद्दर कौल बन गया था। कुछ काल पहले राजकीय पद के लिए मुगल बताने के
लिए कश्मीर का सम्बन्द्द जोड़ा जाता था फिर हिंदू बताने के लिए कश्मीर का
सम्बन्द्द जोड़ा जाने लगा।
श्री टी.एल. शर्मा अपने गंभीर खोजपूर्ण लेख ‘‘हिंदू-मुस्लिम रिलेशन’’
पृष्ट 3-से-5 ( बी.आर. पब्लिशिंग कार्प, 29/9 शक्तिनगर, दिल्ली 7, 1987)
में मसीर उल उमारा के अद्दिकार से लिखते हैं,
‘‘मुगलकाल में अभारतीय वंशज का इतना महत्व था कि उच्च सरकारी पदों के लिए
विदेशी मूल के होने का झूठा प्रमाण गढ़ा जाता था। बहुधा वे कश्मीरी
लड़कियों से निकाह करते थे ताकि उनका रूपरंग तुर्कों और इरानियों के
वंशजों की भांति दिखाई दे।’’ ( आज, इस्लामी पाकिस्तान और बंगलादेश में
उच्च पदाधिकारी मुसलमान स्वयं को अरब मूल का बताते हैं।)
इस प्रकार फैजुल्ला खान ने अपना झूठा नाम ‘गंगाधर कौल’ रख लिया। नेहरू
शब्द भी प्रश्न पैदा करता है। यदि नेहरू उपाधि परशियन शब्द नहर के कारण
पड़ा तो वहां के अन्य निवासियों ने यह उपाधि  क्यों नहीं धारण किया?
मोतीलाल ने ही इस नाम को क्यों चुना?
ऐसा प्रतीत होता है कि दिल्ली से भागने के पश्चात मोतीलाल ने अपना
सम्माननीय पारिवारिक नाम ‘कौल’ छोड़ कर नेहरू रख लिया। जिससे इस परिवार के
वैवाहिक संबन्द्द कश्मीरी पंडितों से होने लगे। फिर भी यह महत्वपूर्ण बात
है कि इस परिवार के सभी नजदीकी संबंध  मुसलमानों से ही रहे। यहां तक कि
उनका खानसामा भी मुसलमान ही रहा। इतना ही नहीं नेहरू वंश हिंदुओं के साथ
असंतुष्टि अनुभव करते हैं। विशेषकर जवाहरलाल को हिंदू और हिंदी से विशेष
नफरत थी। फिर भी इस खान वंश को पूरे भारत में कश्मीरी पंडित कहा जाता है!
जो जवाहरलाल नेहरू यज्ञोपवीत नहीं पहनता था, संस्कृत की कौन कहे हिंदी तक
को पढ़ नहीं सकता था, इस देश के मूर्ख ब्राह्मण उसके पीछे लग गए। जब इस
देश की संस्कृति के सिरमौर ही उसके पीछे लग गए तो जो होना था हुआ। देश
बंटा और कंगाल हो गया। वैदिक संस्कृति मिट गई। इंदिरा के जवाहरलाल की
पुत्री होने पर भी संदेह है। जिसकी चर्चा हम आगे करेंगे। ऐसा प्रतीत होता
है कि जवाहर लाल और इंदिरा दोनो अपने मुगल वंश के होने से परिचित थे।
सोनिया तक आते आते यह परिवार न तो मुगलवंशी रहा और न अंग्रेज ही रहा।
क्या   कारण है कि मुगल वंशीय इतिहास को दिल्ली में सुरक्षित रखा गया है।
मुगलों के नाम पर सड़कें हैं। नेशनल कौंसिल आफ एजुकेशनल रिसर्च एंड
ट्रेनिंग  यानी एनसीईआरटी मुगलकाल की आज भी प्रशंसक है। प्रसंगवश बता दें
कि 1947 के पूर्व की ऐतिहासिक पुस्तकें गुप्त काल को भारत का स्वर्णयुग
बताती हैं।
तत्कालीन भारत के पूर्व विदेशमंत्री नटवर सिंह ने इंदिरा के मुगलों से
संबन्‍ध  पर एक महत्वपूर्ण रहस्योद्घाटन किया है। अपनी पुस्तक ‘प्रोफाइल
एंड लेटर्स’, प्रकाशक स्टर्लिगं पब्लिशर्स, एल 10 ग्रीनपार्क एक्सटेंशन,
दिल्ली 16, में, जिसका निचोड़ दैनिक हिंदुस्तान टाइम्स संस्करण, नवंबर 16,
1997, में छपा था , श्री नटवर सिंह लिखते हैं कि तत्कालीन प्रधानमंत्री
इंदिरा सरकारी यात्रा पर 1968 में अफगानिस्तान गई थी। नटवर सिंह भारत के
विदेश मंत्रालय के विशेष नियुक्ति के कारण उनके साथ थे। दिन भर के ब्यस्त
कार्यक्रम के बाद इंदिरा सायं घूमना चाहती थी। कार में लंबे यात्रा के
बाद इंदिरा ने बाबर के कब्र को देखना चाहा। यह वीरान स्थान था। इंदिरा
बाबर के कब्र के पास गई। सम्मान में कब्र के सामने कुछ मिनटों तक सिर
झुकाया और मौन रही।
याद रखिए! बाबर मुगलवंश का संस्थापक था। यह यात्रा उसके कार्यक्रम में
उल्लिखित नहीं थी। अतः अफगान अधिकारियों ने इंदिरा को मना भी किया।
इंदिरा फिर भी नहीं मानी। इंदिरा ने नटवर सिंह से कहा कि आज हमने अपने
इतिहास को तरोताजा किया है। इसमें संदेह नहीं कि यदि इंदिरा गांधी
प्रधानमंत्री रहती तो अयोध्या के बाबरी मस्जिद कांड में मुलायमसिंह से
दसगुना अधिक नरसंहार हुआ होता, उसी प्रकार जिस प्रकार हरमंदर साहिब मंदिर
में 1984 में हुआ। याद रखें! गोरक्षा की मांग करने वाले संतों पर 7
नवंबर, 1966 को गोली इसी खूंखार औरत ने चलवाई थी।
इंदिरा का पुत्र राजीव गांधी , यद्यपि भारतीय या विदेशी इतिहास का जानकार
नहीं था, तथापि उसे मुगलवंशी होने पर काफी गर्व था। यद्यपि वह कहा करता
था कि उसका केाई निजी धर्म नहीं है और उसकी पत्नी कैथोलिक ईसाई है, तथापि
वह ब्यवहार में इस्लामी था। 15 अगस्त 1988 को उसने लाल किले के प्राचीर
से ललकारा था, ‘‘हमारा प्रयत्न इस देश केा 250 से 300 वर्ष पूर्व के काल
की बुलंदियों तक ले जाने के लिए होना चाहिए।’’ यही वह काल था जब जजिया
विशेषज्ञ औरंगजेब कत्ल किए गए हिंदुओं के सवा मन यज्ञोपवीत तौलने के बाद
ही पानी पीता था और मंदिर तोड़ने में जिसे महारत हासिल थी।
मोतीलाल-वैश्यालय मालिकः
मोती और लाल शब्‍दों का मतलब है। मोतीलाल का नाम नरायनदास या मदन मोहन
अथवा उस प्रकार का कोई और नहीं था। मोतीलाल में पंथनिरपेक्षता का बीज
पहले ही बोया गया था, जो कश्मीर की इस्लामिक उपज थी और ( वास्तव में जब
भी उपयुक्त लगा) उसने मिथ्या अपने ब्राह्मण होने का दंभ किया।
मोतीलाल अधिक पढ़ा लिखा नहीं था। कम उम्र में विवाह कर वह जीविका के लिए
इलाहाबाद ( अल्लाह के शहर) आ गया। हमें यह पता नहीं कि निश्चित रूप से वह
उस समय इलाहाबाद में कहां बसा। फिर भी हम विश्वास नहीं करते कि उसके बसने
की जगह वह मीरगंज रही होगी, जहां तुर्क और मुगल अपहृत हिंदू महिलाओं को
अपने मनोरंजन के लिए रखते थे। ( यहीं उर्दू की उत्पत्ति हुई)। हम ऐसा कह
रहे हैं क्यों कि अब हम अच्छी तरह जानते हैं कि मोतीलाल अपने दूसरे पत्नी
के साथ मीरगंज के रंडियों के इलाके में रहा। ( हम यह नहीं जानते कि
मोतीलाल दूसरी पत्नी को सचमुच ब्याह के लाया था अथवा दुराचार के लिए भगा
कर लाया था।)
पहली पत्नी पुत्र पैदा होने के समय मर गई। पुत्र भी मर गया। उसके तुरंत
बाद मोतीलाल कश्मीर लौट गया, वहां उसे गरीब परिवार की अत्यंत सुंदर उसकी
तथाकथित पत्नी मिली जिसे वह इलाहाबाद ले आया। वह मीर गंज में बस गया।
मोतीलाल ने सहायक जीविका के रूप में वैश्यालय चलाने का निश्चय किया।
क्यों कि उसके पास जीविका का अन्य साधन नहीं था। जो भी हो किसी का अपनी
(दूसरी नई पत्नी के साथ भी) वैश्याओं के मुहल्ले में रहना और अपने बच्चों
को वहीं पालना सुने? तो उसका मतलब क्या लगाएगा? हम शीघ्र ही  देखेंगे कि
जवाहर, मोतीलाल का दूसरा लड़का(?), जो जीवित बचा, बहुत दिनों तक उस मीरगंज
में पाला नहीं गया। लेकिन उसकी दोनों बहनों का विकास व पालन पोषण उसी
मीरगंज में वर्षों तक होता रहा।
दिन के समय मोतीलाल इलाहाबाद कचहरी में ‘मुख्तार’, जो वकील से छोटा पद
होता था, का कार्य करता था। उन दिनों मुख्तार को भी उच्च न्यायालय में
वकालत की अनुमति थी। फिर भी, इससे मोतीलाल की आय बहुत अल्प थी।
उसी उच्च न्यायालय में, एक प्रसिद्ध कानूनी सलाह देने वाला अन्य वकील भी
था। वह शिया मुसलमान मुबारक अली था। उसकी वकालत खूब चलती थी। इशरत मंजिल
नाम का उसका बड़ा मकान था। यह भी बताना आवश्यक है कि उस समय इलाहाबाद में
दो  इशरत मंजिल थे। दूसरे इशरत  मंजिल का मालिक अकबर इलाहाबादी था। इससे
डाक इधर-उधर  हो जाती थी। मुबारक अली का इशरत  मंजिल बाद में मोतीलाल को
बेच दिया गया; जिसका नाम बदल कर ‘आनन्द भवन’ हो गया। अब इसे ‘स्वराज्य
भवन’ कहा जाता है और राष्‍ट्र  की धरोहर है।
मेातीलाल मुबारक से मिलाः
शाम को, मोतीलाल अपनी वकालत के बाद घर लौटता था। अधिकतर, वह मीरगंज के
वैश्याओं के इलाके के अपने निवास में पैदल आता था। मुबारक अली, अन्य धनी
मुसलमानों की भांति, मौज मस्ती के लिए मीरगंज आता रहता था। मुबारक अपनी
बग्गी में आया करता था। मोतीलाल सदा मुबारक से संबंध  बनाना चाहता था और
एक शाम ऐसा हुआ कि मुबारक ने, जब वह न्यायालय परिसर में अपने बग्गी में
सवार हो रहा था, इस फटी पैंट पहने हिंदू को देखा। विनम्रता से  मोबारक ने
उसे अपनी बग्गी में बैठने के लिए पूछा। दोनों ही, वास्तव में, विभिन्न
कारणों से मीरगंज जा रहे थे, अतः मोतीलाल बग्गी में सामने बैठ गया।
इच्छुक मोतीलाल को स्पष्ट हो गया कि मोबारक अली किसी खूबसूरत वैश्या के
साथ रात बिताना चाहता था। मोतीलाल ने अपनी नई नवेली सुंदर पत्नी के साथ
मुबारक को रात बिताने का निमंत्रण दिया। सौदा पट गया। और इस प्रकार
मुबारक और मोतीलाल इसके पश्चात् बहुधा  साथ-साथ मीरगंज आते थे।
मुबारक ने मोतीलाल को अपने कानूनी कार्यालय में छोटी नौकरी करने का
निमंत्रण दिया। कश्मीरी पंडित ने कामुक मुसलमान के यहां, जो अब उसका
मालिक था, नौकरी कर ली। काफी समय बाद मोतीलाल ने अपना कार्यालय ले लिया।
अनुवादक की टिप्पणीः और यहीं से पंथनिरपेक्षता की नींव पड़ी।
इटावा और अमेठी की विधवाः
इसके बाद के कुछ वर्षों में काफी कुछ घटा। इटावा का राजा निःसंतान मर
गया। ब्रिटिश कानून के अनुसार निःसंतान विधवा की सम्पत्ति ब्रिटिश  सरकार
की हो जाती थी। अतः विधवा को अपनी संपत्ति गवांनी पड़ती। विधवा मुबारक अली
से अपने मुकदमे की पैरवी कराने के लिए आई।
मुबारक ने यह कार्य मोतीलाल को सौंपा। उसने पीछे से कार्य किया। मुबारक
के आदेश  पर मोतीलाल रानी (स्वर्गीय राजा इटावा की विधवा) से मिला और
बताया कि मुबारक आप के केस लड़कर जीत सकते हैं। उसने मुबारक की फीस बताई।
यह पांच लाख रूपए थी (उस समय के लिए एक बड़ी रकम)। असहाय रानी ने देना
स्वीकार किया। रकम मुबारक अली और मोतीलाल में बराबर बंट गई। लेकिन निचली
अदालत में मुबारक अली और मोतीलाल रानी का मुकदमा हार गए। अविचलित, दोनों
ने ऊपरी अदालत में रानी के मुकदमे को लड़ने की घोषणा की। फीस फिर 5 लाख
रूपए तय हुई जिसे दोनों ने बराबर बराबर बांट लिया। वे उच्च न्यायालय में
भी मुकदमा हार गए।
चतुर मुबारक ने मुकदमे को प्रीवी कौंसिल लंदन लड़ने की सलाह दी। इस बार
रानी को लंदन आने जाने का ब्यय और बैरिस्टर की फीस भी देनी पड़ी। मुबारक
ने उच्च कोटि का बैरिस्टर नियुक्त किया। बैरिस्टर ने अपने बहस मे बताया
कि राजा के मृत्यु के पूर्व रानी गर्भवती थी। इस कार्य के लिए एक उचित
लड़का ढूंढ़ लिया गया और अदालत को बताया गया कि यही राजा का लड़का है और
रानी उसकी मां है। इस बार मुकदमा जीत लिया गया और रानी ने अपने मृतक पति
के राज्य के स्वामित्व को बचा लिया।
इसी बीच मोतीलाल की पत्नी गर्भवती हो गई। एक सुहावने प्रातः अपने भारी
पांव लिए मोतीलाल के साथ गंगा स्नान को गई। एक सन्यासी ने उन्हें देखा और
मोतीलाल को एक किनारे ले जा कर झिड़का कि उसने जिस गर्भ को ठहरने दिया है
वह भारत को बर्बाद  कर देगा। उसने मोतीलाल को गर्भ को जहर देने की सलाह
दी, ताकि गर्भ नष्ट हो जाए। पत्नी दूरी के कारण सारी बात तो न सुन सकी
परंतु जहर शब्‍द  सुन लिया। मोतीलाल पत्नी के पास झाड़ सह कर वापस आया और
पत्नी को समझाया कि सन्यासी ने लड़के का नाम जवाहर रखने के लिए कहा है। यह
पता नहीं कि भावी मां ने, चिरस्थाई झूठे मोतीलाल की बात का विश्वास किया
या नहीं।
मोतीलाल ने अपने मालिक मुबारक से उसके निवास इशरत मंजिल में भावी संतान
के जन्म के लिए अनुरोध किया। मुबारक ने ऐसा नहीं होने दिया। मुबारक ने
माना कि बच्चा उसी का है। लेकिन वह अपने घर में इसका जन्म नहीं होने
देगा। शरीयत के अनुसार वर्णसंकर का भी संपत्ति पर उतना ही अधिकार  है
जितना अपनी संतान का। मुबारक ने जच्चा बच्चा का खर्च वहन करना स्वीकार
किया और अंत में बच्चा जवाहर मीरगंज के वैश्यालय में ही पैदा हुआ। जैसे
ही जवाहर प्रधान  मंत्री बना उसने वह मीरगंज का मकान ही गिरवा दिया और
अफवाह फैलाया कि जवाहर आनंद भवन में पैदा हुआ था। याद रखिए उसके जन्म समय
में कोई आनन्द भवन नहीं था। उस समय वह इशरत मंजिल ही था। लेकिन भारत में
परेशानी में डालने वाले प्रश्न कोई नहीं पूछता। इसी प्रकार तथाकथित गैर
मुसलमान राजीव के पिता का क्या नाम था? अथवा क्यों इंदिरा व फिरोज ने
शपपथपत्र द्वारा अपने नाम गांधी  रख लिये? अथवा कैसे जवाहर की मृत्यु छूत
यानी संक्रमण की बीमारी सूजाक यानी आत्यक रोग से हुई, जिससे वह मरा? क्या
ऐसा किसी से हाथ मिलाने से हो गया या खुले में मुंह पोंछने से हो गया?
किसी ने नहीं पूछा।
मुबारक का संबंध  बड़े प्रभुत्‍वशाली  मुसलमानों से था। अवध के नवाब ने
बच्चे जवाहर की वैश्यालय में परवरिश का विरोध  किया और अपने महल में
परवरिश  के लिए कहा। इस प्रकार बालक जवाहर ने जन्म के शीघ्र  बाद ही
मीरगंज छोड़ दिया और राजमहल में रहने व परवरिश के लिए आ गया। जवाहर राजमहल
में दस वर्ष की उम्र तक रहा। इसके बाद पढ़ने के लिए लंदन चला गया। मोतीलाल
ने तब तक इतना पैसा कमा लिया था कि अपने जवाहर की पढ़ाई पर ब्यय वहन कर
सकता था।
नवाब के बगल में खड़े जवाहर की आदमकद  तस्वीर लखनऊ के पास महल के पहले
मंजिल में लगी थी। नवाब के महल में परवरिश  के कारण ही जवाहर गर्व से
कहता था कि उसकी परवरिश विदेश में हुई, इस्लाम के तौर तरीके से उसका
विकास हुआ और हिंदू तो वह दुर्घटनावश ही था!
मीरगंज के वैश्यालय में दो बच्चों का और जन्म हुआ था। दोनों लड़कियां थीं।
यह पता नहीं कि क्या वे भी मुबारक की नाजायद संतानें थीं? शायद हां और
नहीं भी। लेकिन तब मोतीलाल, एक सिद्ध मनचले ऐय्याश, के भी दो नाजायज
संतानें शेख अब्दुल्ला और सयूद हुसेन, जो उसकी बेटी विजया लक्ष्मी को भगा
ले गया था, थीं। यही वह कारण था जिसने मोतीलाल को हुसेन और विजयालक्ष्मी
को शादी करने से रोका था। प्रेमी हुसेन के साथ भाग जाने के बाद दोनों कुछ
दिन साथ रहे थे। यही कारण है कि विजया लक्ष्मी की पहली बेटी चंद्रलेखा की
सूरत हुसेन से मिलती है जो उसका पिता था न कि आर. एस. पंडित से। किसी को
भी चंद्रलेखा, नयनतारा और रीता की सूरतों  को मिलाने से यह पता लग जाएगा
कि बाद की दोनों लड़कियां ही पंडित की हैं पहली चंद्रलेखा नहीं।
छलिया जवाहर लालः
जवाहर लाल एक अलग तरह का बैरिस्टर बना। टिनिटी  कालेज में उसका मुख्य
विषय वनस्पति विज्ञान था। उस समय, मोहम्मद अली जिन्नाह, एक अन्य शिया
मुसलमान, निवास व कार्यालय मुंबई के मलाबार हिल्स में, रहता था। उसकी
वकालत खूब चलती थी। सदा के ज्‍वलनशील  जवाहर ने अपना कार्यालय वहीं खोला।
उसकी वकालत नहीं चली। एक दिन जवाहर को अपने महिला कर्मचारी को, अपने ही
कार्यालय में, जो पारसी थी, छेड़ने के कारण पुलिस ने गिरफ्तार कर लिया।
सेसन अभिलेखागार, मुंबई में  आज भी वे कागजात सु‍रक्षित हैं। मोतीलाल भाग
कर मुंबई गया और अपने हद  और प्रभाव का प्रयोग कर जवाहर को छुड़ा कर
इलाहाबाद ले आया। जवाहर की वकालत खत्म हो गई। वह राजनीति करने लगा। यहां
यह बता दूं कि जवाहर की एक से दस वर्ष तक की कोई तस्वीर उपलब्‍ध  नहीं
है। इस दौरान वह नवाब के महल में रहा। मोतीलाल के वैश्यालय में नहीं।
तस्वीर बनाना इस्लाम में निषिद्ध है। दस वर्ष  के हो जाने के बाद वह
विलायत चला गया। दोनों बहनों को जवाहर से कुछ लेना देना नहीं था। बहनों
के बचपन की बहुत तस्वीरें हैं परंतु जवाहर की एक भी नहीं। जवाहर के खर्च
का बड़ा भाग मुबारक ने दिया था। मोतीलाल के पास तब इतने पैसे नहीं थे।
इटावा के विधवा रानी की कृपा से मोतीलाल के पास काफी पैसा आ गया।
विधूर  जवाहर से ईसाई बच्चे का जन्मः
जैसा बाप वैसा बेटा बल्कि बाप से आगे ही। जवाहर ने अपने भारत के प्रधान
मंत्रित्व का पूर्ण फायदा उठाया। जवाहर की सुंदर औरतों की तलाश  और
आधीरात में गुप्त समागम अंदर खाने सबको अच्छी तरह पता लग गई। जवाहर ने एक
हिंदू नन को गर्भवती कर दिया। उसे अस्पताल नहीं भेजा गया बल्कि
वैरागिनियों की कुटी यानी ननरी में भेजा गया। क्यों कि अस्पताल भेजने पर
लोगों को मालूम हो जाता। यही कारण है कि ईसाइयों को पंथनिरपेक्ष भारत में
विशेष दर्जा प्राप्त है। ताकि वे अपने ओठ सिले रखें और जब चाहें ब्लैक
मेल कर सकें। विधूर जवाहर के पुत्र को भारत के बाहर एक अच्छा ईसाई जार्ज
बनाने के लिए भेज दिया गया। लेकिन यह कोई नई बात नहीं है। भारत पर सदा ही
शासन जारजों का रहा और आज भी है। इसे आप जवाहर के निजी सचिव कैथोलिक ईसाई
मथाई की पुस्तकों, माई डेज विथ नेहरू और नेहरू युग की स्मृतियां से पढ़
सकते हैं।
जवाहर, झूठाः
सदावहार झूठा नेहरू, जो लाउडस्पीकर पर लालकिले की प्राचीर से दिल्ली चलो
और जै हिंद का नारा लगाता था, अपने आफिस में आते ही क्लिमेंट एटली,
तत्कालीन ब्रिटिश  प्रधानमंत्री, को पत्र लिखवाता था, कि वह स्टालिन पर
नेता जी को सौंपने के लिए, जिन्होंने ब्रिटिश  साम्राज्य के विरुद्ध
युद्ध घोषित  कर दिया था, दबाव डाले। ताकि नेता जी पर अभियोग चलाया जा
सके।
ज्यों ही श्यामा प्रसाद मुखर्जी को, अपने मुस्लिम डाक्टर से जहर की सुई
लगवा कर, शेख अब्दुल्ला ने कश्मीर में मरवा दिया, जवाहर लंदन से तुरंत उड़
आया और मुखर्जी जी की निजी डायरी अपने कब्जे में ले ली और उनकी दुखिया
मां को बार बार के गुहार पर भी कभी नहीं लौटाई।
यद्यपि नेहरू को इसका प्रतिकार भी मिला। जिस व्यक्ति को भाग्य ने 15
अगस्त 1947 के रात्रि में सत्ता के सर्वोच्च स्थान पर बिठाया, वह, जैसा
वे बताते हैं, दिल का दौरा पड़ने से नहीं, बल्कि सूजाक की बीमारी से मरा।
और मुझ पर भरोसा कीजिए, यह बीमारी किसी अल्पाहारालाय के लोटे में के पानी
पीने से नहीं हुई।

पुस्तक नेहरू खान वंश
मानव रक्षा संघ प्रकाशन
अनुवादकः अयोध्या प्रसाद त्रिपाठी
मूल लेखक: अरविंद घोष