मंगलवार, 2 सितंबर 2014

ये चित्र २००६ में बिजनौर का  है। …यनि ८ साल पुराना। ।हिन्दू महासभा की और से मैं और मेरे साथी ने २००६ से ही पश्चिमी उत्तर प्रदेश में हर जिले में घूम घूम कर लविंग जेहाद का विरोध करके हिन्दू समाज में जाग्रति लाने की कोशिश करते थे ---- किन्तु उस समय हमारा मजाक उड़ाया जाता था कि हमने हिन्दू व मुसलमानो को लड़ाने के लिए लविंग जेहाद नामक  शब्द गढ़ लिया है।

मंगलवार, 12 नवंबर 2013

१४ नवंबर नेहरू के जन्म दिन पर विशेष 


हमें नेहरुओं के बारे में कुछ नई सूचनाएं प्राप्त हुई हैं, जिसे हम
पाठकों को  बताना चाहते हैं। हम आप को सूचित कर चुके हैं कि जवाहर के
पितामह यानी दादा का नाम गंगाद्दर कौल था। मुगल राज्य में गंगाद्धर पुलिस
अधिकारी  था। वह नहर के किनारे रहता था, इसीलिए इस परिवार ने नेहरू नाम
धारण कर लिया। ऐसा बताया जाता है।
अब सूचना मिली है कि गंगधर नकली नाम था। जवाहर का पैतृक पितामह वास्तव
में मुगलवंशीय था। तब उसने कश्मीरी हिंदू नाम क्यों धारण किया? हमें जो
कारण बताए गए हैं, वे निम्नलिखित हैं,
1857 के गदर में अंग्रेज सभी जगह सभी मुगलों को कत्ल कर रहे थे। ताकि
भारतीय साम्राज्य का कोई दावेदार न बचे। उस समय हिंदू अंग्रेजों के
निशाने पर नहीं थे। जब तक कि, किसी विशेष परिस्थिति में, पिछले संबंधों
के कारण, कोई हिंदू मुगलों का पक्ष लेते हुए न पाया जाए। यही कारण था कि
मुसलमानों द्वारा हिंदुओं का नाम अपनाए जाने का उस समय चलन हो चुका था।
इसी कारण से, मालूम होता है कि, गंगाधर नाम भी किसी मुसलमान ने, अपनी जान
बचाने के लिए धारण कर लिया।
अपने आत्मचरित्र वर्णन में जवाहरलाल लिखता है कि उसने अपने पितामह का
मुगल राजवंशीय वेशभूषा में बना चित्र देखा था। अपने संस्मरण में जवाहर की
दूसरी बहन कृष्णा हथीसिंह ने लिखा है कि 1857 के गदर के पूर्व गंगाद्दर
दिल्ली का शहर कोतवाल था। लेकिन पूरी छानबीन करके लिखे गए अभिलेख
‘‘बहादुर शाह द्वितीय और 1857 का दिल्ली का गदर’’ महदी हुसेन लिखित, (
1987 का प्रकाशन, प्रकाशक एमएन प्रकाशन, डब्लू-112 ग्रेटर कैलाश भाग 1,
नईदिल्ली) के अनुसार 1857 के गदर के आसपास कार्यरत नगर कोतवाल दिल्ली का
नाम फैजुल्ला खान था। उसकी नियुक्ति नगर राज्यपाल और कोतवाल मिर्जा
मनीरुद्दीन के स्थान पर हुई थी। मिर्जा मनीरुद्दीन पर अंग्रेजों का जासूस
होने का आरोप था। इसी कारण से उसे सुल्तान ने नौकरी से निकाला था और
राज्यपाल का पद भी समाप्त कर दिया था। उस समय नायब कोतवाल श्री भाव सिंह
और लाहौरी गेट के थानेदार श्री काशीनाथ थे। गंगाधर नाम के व्यक्ति का
उपरोक्त अभिलेख में कहीं पता नहीं है। स्पष्टतः यह विषय किसी सुयोग्य
इतिहासकार द्वारा जांच करने के योग्य है।
1857 में दिल्ली पर कब्जे के बाद अंग्रेजों ने सारा दिल्ली खाली करा
लिया। दिल्ली के बाहर लोगों को छोलदारियों में रहना पड़ा। प्रत्येक घर की
अच्छी तरह तलाशी ली गई। जिसमें अकूत द्दन मिला। इसे अंग्रेजों ने जब्त कर
लिया। दिल्ली के बाहरी भागों की भी अंग्रेजों ने तलाशी ली। जो भी मुगल
मिला उसे अंग्रेजों ने मार डाला ताकि दिल्ली सिंहासन का कोई दावेदार न
बचे। लगभग दो माह बाद हिंदुओं को अपने घरों में वापस जाने की अनुमति दी
गई। बाद में मुसलमानों को अपने घरों में वापस जाने की अनुमति मिली।
19वीं सदी के उर्दू साहित्यकारों, विशेषकर ख्वाजा हसन निजामी के साहित्य
में, उस समय की मुगलों और मुसलमानों के दुखदायी जीवन परिपाटी का उल्लेख
मिलता है। साहित्यकारों ने यह भी बताया है कि किस प्रकार अपनी जान बचाने
के लिए मुगल और मुसलमान शहरों को छोड़ कर भाग रहे थे। जवाहर लाल ने भी
अपने आत्मचरित्र में लिखा है कि मुगलों से प्रभावित स्थान आगरा जाते हुए
रास्ते में अंग्रेजों ने मुगलवेशभूषा के कारण उसके दादा यानी पितामह के
परिवार को रोक लिया था। लेकिन कश्मीरी पंडित कहने पर उसके पितामह को जाने
दिया था। इस उद्धरण से इस बात को बल मिलता है कि हो न हो फैजुल्ला खान ही
गंगाद्दर कौल बन गया था। कुछ काल पहले राजकीय पद के लिए मुगल बताने के
लिए कश्मीर का सम्बन्द्द जोड़ा जाता था फिर हिंदू बताने के लिए कश्मीर का
सम्बन्द्द जोड़ा जाने लगा।
श्री टी.एल. शर्मा अपने गंभीर खोजपूर्ण लेख ‘‘हिंदू-मुस्लिम रिलेशन’’
पृष्ट 3-से-5 ( बी.आर. पब्लिशिंग कार्प, 29/9 शक्तिनगर, दिल्ली 7, 1987)
में मसीर उल उमारा के अद्दिकार से लिखते हैं,
‘‘मुगलकाल में अभारतीय वंशज का इतना महत्व था कि उच्च सरकारी पदों के लिए
विदेशी मूल के होने का झूठा प्रमाण गढ़ा जाता था। बहुधा वे कश्मीरी
लड़कियों से निकाह करते थे ताकि उनका रूपरंग तुर्कों और इरानियों के
वंशजों की भांति दिखाई दे।’’ ( आज, इस्लामी पाकिस्तान और बंगलादेश में
उच्च पदाधिकारी मुसलमान स्वयं को अरब मूल का बताते हैं।)
इस प्रकार फैजुल्ला खान ने अपना झूठा नाम ‘गंगाधर कौल’ रख लिया। नेहरू
शब्द भी प्रश्न पैदा करता है। यदि नेहरू उपाधि परशियन शब्द नहर के कारण
पड़ा तो वहां के अन्य निवासियों ने यह उपाधि  क्यों नहीं धारण किया?
मोतीलाल ने ही इस नाम को क्यों चुना?
ऐसा प्रतीत होता है कि दिल्ली से भागने के पश्चात मोतीलाल ने अपना
सम्माननीय पारिवारिक नाम ‘कौल’ छोड़ कर नेहरू रख लिया। जिससे इस परिवार के
वैवाहिक संबन्द्द कश्मीरी पंडितों से होने लगे। फिर भी यह महत्वपूर्ण बात
है कि इस परिवार के सभी नजदीकी संबंध  मुसलमानों से ही रहे। यहां तक कि
उनका खानसामा भी मुसलमान ही रहा। इतना ही नहीं नेहरू वंश हिंदुओं के साथ
असंतुष्टि अनुभव करते हैं। विशेषकर जवाहरलाल को हिंदू और हिंदी से विशेष
नफरत थी। फिर भी इस खान वंश को पूरे भारत में कश्मीरी पंडित कहा जाता है!
जो जवाहरलाल नेहरू यज्ञोपवीत नहीं पहनता था, संस्कृत की कौन कहे हिंदी तक
को पढ़ नहीं सकता था, इस देश के मूर्ख ब्राह्मण उसके पीछे लग गए। जब इस
देश की संस्कृति के सिरमौर ही उसके पीछे लग गए तो जो होना था हुआ। देश
बंटा और कंगाल हो गया। वैदिक संस्कृति मिट गई। इंदिरा के जवाहरलाल की
पुत्री होने पर भी संदेह है। जिसकी चर्चा हम आगे करेंगे। ऐसा प्रतीत होता
है कि जवाहर लाल और इंदिरा दोनो अपने मुगल वंश के होने से परिचित थे।
सोनिया तक आते आते यह परिवार न तो मुगलवंशी रहा और न अंग्रेज ही रहा।
क्या   कारण है कि मुगल वंशीय इतिहास को दिल्ली में सुरक्षित रखा गया है।
मुगलों के नाम पर सड़कें हैं। नेशनल कौंसिल आफ एजुकेशनल रिसर्च एंड
ट्रेनिंग  यानी एनसीईआरटी मुगलकाल की आज भी प्रशंसक है। प्रसंगवश बता दें
कि 1947 के पूर्व की ऐतिहासिक पुस्तकें गुप्त काल को भारत का स्वर्णयुग
बताती हैं।
तत्कालीन भारत के पूर्व विदेशमंत्री नटवर सिंह ने इंदिरा के मुगलों से
संबन्‍ध  पर एक महत्वपूर्ण रहस्योद्घाटन किया है। अपनी पुस्तक ‘प्रोफाइल
एंड लेटर्स’, प्रकाशक स्टर्लिगं पब्लिशर्स, एल 10 ग्रीनपार्क एक्सटेंशन,
दिल्ली 16, में, जिसका निचोड़ दैनिक हिंदुस्तान टाइम्स संस्करण, नवंबर 16,
1997, में छपा था , श्री नटवर सिंह लिखते हैं कि तत्कालीन प्रधानमंत्री
इंदिरा सरकारी यात्रा पर 1968 में अफगानिस्तान गई थी। नटवर सिंह भारत के
विदेश मंत्रालय के विशेष नियुक्ति के कारण उनके साथ थे। दिन भर के ब्यस्त
कार्यक्रम के बाद इंदिरा सायं घूमना चाहती थी। कार में लंबे यात्रा के
बाद इंदिरा ने बाबर के कब्र को देखना चाहा। यह वीरान स्थान था। इंदिरा
बाबर के कब्र के पास गई। सम्मान में कब्र के सामने कुछ मिनटों तक सिर
झुकाया और मौन रही।
याद रखिए! बाबर मुगलवंश का संस्थापक था। यह यात्रा उसके कार्यक्रम में
उल्लिखित नहीं थी। अतः अफगान अधिकारियों ने इंदिरा को मना भी किया।
इंदिरा फिर भी नहीं मानी। इंदिरा ने नटवर सिंह से कहा कि आज हमने अपने
इतिहास को तरोताजा किया है। इसमें संदेह नहीं कि यदि इंदिरा गांधी
प्रधानमंत्री रहती तो अयोध्या के बाबरी मस्जिद कांड में मुलायमसिंह से
दसगुना अधिक नरसंहार हुआ होता, उसी प्रकार जिस प्रकार हरमंदर साहिब मंदिर
में 1984 में हुआ। याद रखें! गोरक्षा की मांग करने वाले संतों पर 7
नवंबर, 1966 को गोली इसी खूंखार औरत ने चलवाई थी।
इंदिरा का पुत्र राजीव गांधी , यद्यपि भारतीय या विदेशी इतिहास का जानकार
नहीं था, तथापि उसे मुगलवंशी होने पर काफी गर्व था। यद्यपि वह कहा करता
था कि उसका केाई निजी धर्म नहीं है और उसकी पत्नी कैथोलिक ईसाई है, तथापि
वह ब्यवहार में इस्लामी था। 15 अगस्त 1988 को उसने लाल किले के प्राचीर
से ललकारा था, ‘‘हमारा प्रयत्न इस देश केा 250 से 300 वर्ष पूर्व के काल
की बुलंदियों तक ले जाने के लिए होना चाहिए।’’ यही वह काल था जब जजिया
विशेषज्ञ औरंगजेब कत्ल किए गए हिंदुओं के सवा मन यज्ञोपवीत तौलने के बाद
ही पानी पीता था और मंदिर तोड़ने में जिसे महारत हासिल थी।
मोतीलाल-वैश्यालय मालिकः
मोती और लाल शब्‍दों का मतलब है। मोतीलाल का नाम नरायनदास या मदन मोहन
अथवा उस प्रकार का कोई और नहीं था। मोतीलाल में पंथनिरपेक्षता का बीज
पहले ही बोया गया था, जो कश्मीर की इस्लामिक उपज थी और ( वास्तव में जब
भी उपयुक्त लगा) उसने मिथ्या अपने ब्राह्मण होने का दंभ किया।
मोतीलाल अधिक पढ़ा लिखा नहीं था। कम उम्र में विवाह कर वह जीविका के लिए
इलाहाबाद ( अल्लाह के शहर) आ गया। हमें यह पता नहीं कि निश्चित रूप से वह
उस समय इलाहाबाद में कहां बसा। फिर भी हम विश्वास नहीं करते कि उसके बसने
की जगह वह मीरगंज रही होगी, जहां तुर्क और मुगल अपहृत हिंदू महिलाओं को
अपने मनोरंजन के लिए रखते थे। ( यहीं उर्दू की उत्पत्ति हुई)। हम ऐसा कह
रहे हैं क्यों कि अब हम अच्छी तरह जानते हैं कि मोतीलाल अपने दूसरे पत्नी
के साथ मीरगंज के रंडियों के इलाके में रहा। ( हम यह नहीं जानते कि
मोतीलाल दूसरी पत्नी को सचमुच ब्याह के लाया था अथवा दुराचार के लिए भगा
कर लाया था।)
पहली पत्नी पुत्र पैदा होने के समय मर गई। पुत्र भी मर गया। उसके तुरंत
बाद मोतीलाल कश्मीर लौट गया, वहां उसे गरीब परिवार की अत्यंत सुंदर उसकी
तथाकथित पत्नी मिली जिसे वह इलाहाबाद ले आया। वह मीर गंज में बस गया।
मोतीलाल ने सहायक जीविका के रूप में वैश्यालय चलाने का निश्चय किया।
क्यों कि उसके पास जीविका का अन्य साधन नहीं था। जो भी हो किसी का अपनी
(दूसरी नई पत्नी के साथ भी) वैश्याओं के मुहल्ले में रहना और अपने बच्चों
को वहीं पालना सुने? तो उसका मतलब क्या लगाएगा? हम शीघ्र ही  देखेंगे कि
जवाहर, मोतीलाल का दूसरा लड़का(?), जो जीवित बचा, बहुत दिनों तक उस मीरगंज
में पाला नहीं गया। लेकिन उसकी दोनों बहनों का विकास व पालन पोषण उसी
मीरगंज में वर्षों तक होता रहा।
दिन के समय मोतीलाल इलाहाबाद कचहरी में ‘मुख्तार’, जो वकील से छोटा पद
होता था, का कार्य करता था। उन दिनों मुख्तार को भी उच्च न्यायालय में
वकालत की अनुमति थी। फिर भी, इससे मोतीलाल की आय बहुत अल्प थी।
उसी उच्च न्यायालय में, एक प्रसिद्ध कानूनी सलाह देने वाला अन्य वकील भी
था। वह शिया मुसलमान मुबारक अली था। उसकी वकालत खूब चलती थी। इशरत मंजिल
नाम का उसका बड़ा मकान था। यह भी बताना आवश्यक है कि उस समय इलाहाबाद में
दो  इशरत मंजिल थे। दूसरे इशरत  मंजिल का मालिक अकबर इलाहाबादी था। इससे
डाक इधर-उधर  हो जाती थी। मुबारक अली का इशरत  मंजिल बाद में मोतीलाल को
बेच दिया गया; जिसका नाम बदल कर ‘आनन्द भवन’ हो गया। अब इसे ‘स्वराज्य
भवन’ कहा जाता है और राष्‍ट्र  की धरोहर है।
मेातीलाल मुबारक से मिलाः
शाम को, मोतीलाल अपनी वकालत के बाद घर लौटता था। अधिकतर, वह मीरगंज के
वैश्याओं के इलाके के अपने निवास में पैदल आता था। मुबारक अली, अन्य धनी
मुसलमानों की भांति, मौज मस्ती के लिए मीरगंज आता रहता था। मुबारक अपनी
बग्गी में आया करता था। मोतीलाल सदा मुबारक से संबंध  बनाना चाहता था और
एक शाम ऐसा हुआ कि मुबारक ने, जब वह न्यायालय परिसर में अपने बग्गी में
सवार हो रहा था, इस फटी पैंट पहने हिंदू को देखा। विनम्रता से  मोबारक ने
उसे अपनी बग्गी में बैठने के लिए पूछा। दोनों ही, वास्तव में, विभिन्न
कारणों से मीरगंज जा रहे थे, अतः मोतीलाल बग्गी में सामने बैठ गया।
इच्छुक मोतीलाल को स्पष्ट हो गया कि मोबारक अली किसी खूबसूरत वैश्या के
साथ रात बिताना चाहता था। मोतीलाल ने अपनी नई नवेली सुंदर पत्नी के साथ
मुबारक को रात बिताने का निमंत्रण दिया। सौदा पट गया। और इस प्रकार
मुबारक और मोतीलाल इसके पश्चात् बहुधा  साथ-साथ मीरगंज आते थे।
मुबारक ने मोतीलाल को अपने कानूनी कार्यालय में छोटी नौकरी करने का
निमंत्रण दिया। कश्मीरी पंडित ने कामुक मुसलमान के यहां, जो अब उसका
मालिक था, नौकरी कर ली। काफी समय बाद मोतीलाल ने अपना कार्यालय ले लिया।
अनुवादक की टिप्पणीः और यहीं से पंथनिरपेक्षता की नींव पड़ी।
इटावा और अमेठी की विधवाः
इसके बाद के कुछ वर्षों में काफी कुछ घटा। इटावा का राजा निःसंतान मर
गया। ब्रिटिश कानून के अनुसार निःसंतान विधवा की सम्पत्ति ब्रिटिश  सरकार
की हो जाती थी। अतः विधवा को अपनी संपत्ति गवांनी पड़ती। विधवा मुबारक अली
से अपने मुकदमे की पैरवी कराने के लिए आई।
मुबारक ने यह कार्य मोतीलाल को सौंपा। उसने पीछे से कार्य किया। मुबारक
के आदेश  पर मोतीलाल रानी (स्वर्गीय राजा इटावा की विधवा) से मिला और
बताया कि मुबारक आप के केस लड़कर जीत सकते हैं। उसने मुबारक की फीस बताई।
यह पांच लाख रूपए थी (उस समय के लिए एक बड़ी रकम)। असहाय रानी ने देना
स्वीकार किया। रकम मुबारक अली और मोतीलाल में बराबर बंट गई। लेकिन निचली
अदालत में मुबारक अली और मोतीलाल रानी का मुकदमा हार गए। अविचलित, दोनों
ने ऊपरी अदालत में रानी के मुकदमे को लड़ने की घोषणा की। फीस फिर 5 लाख
रूपए तय हुई जिसे दोनों ने बराबर बराबर बांट लिया। वे उच्च न्यायालय में
भी मुकदमा हार गए।
चतुर मुबारक ने मुकदमे को प्रीवी कौंसिल लंदन लड़ने की सलाह दी। इस बार
रानी को लंदन आने जाने का ब्यय और बैरिस्टर की फीस भी देनी पड़ी। मुबारक
ने उच्च कोटि का बैरिस्टर नियुक्त किया। बैरिस्टर ने अपने बहस मे बताया
कि राजा के मृत्यु के पूर्व रानी गर्भवती थी। इस कार्य के लिए एक उचित
लड़का ढूंढ़ लिया गया और अदालत को बताया गया कि यही राजा का लड़का है और
रानी उसकी मां है। इस बार मुकदमा जीत लिया गया और रानी ने अपने मृतक पति
के राज्य के स्वामित्व को बचा लिया।
इसी बीच मोतीलाल की पत्नी गर्भवती हो गई। एक सुहावने प्रातः अपने भारी
पांव लिए मोतीलाल के साथ गंगा स्नान को गई। एक सन्यासी ने उन्हें देखा और
मोतीलाल को एक किनारे ले जा कर झिड़का कि उसने जिस गर्भ को ठहरने दिया है
वह भारत को बर्बाद  कर देगा। उसने मोतीलाल को गर्भ को जहर देने की सलाह
दी, ताकि गर्भ नष्ट हो जाए। पत्नी दूरी के कारण सारी बात तो न सुन सकी
परंतु जहर शब्‍द  सुन लिया। मोतीलाल पत्नी के पास झाड़ सह कर वापस आया और
पत्नी को समझाया कि सन्यासी ने लड़के का नाम जवाहर रखने के लिए कहा है। यह
पता नहीं कि भावी मां ने, चिरस्थाई झूठे मोतीलाल की बात का विश्वास किया
या नहीं।
मोतीलाल ने अपने मालिक मुबारक से उसके निवास इशरत मंजिल में भावी संतान
के जन्म के लिए अनुरोध किया। मुबारक ने ऐसा नहीं होने दिया। मुबारक ने
माना कि बच्चा उसी का है। लेकिन वह अपने घर में इसका जन्म नहीं होने
देगा। शरीयत के अनुसार वर्णसंकर का भी संपत्ति पर उतना ही अधिकार  है
जितना अपनी संतान का। मुबारक ने जच्चा बच्चा का खर्च वहन करना स्वीकार
किया और अंत में बच्चा जवाहर मीरगंज के वैश्यालय में ही पैदा हुआ। जैसे
ही जवाहर प्रधान  मंत्री बना उसने वह मीरगंज का मकान ही गिरवा दिया और
अफवाह फैलाया कि जवाहर आनंद भवन में पैदा हुआ था। याद रखिए उसके जन्म समय
में कोई आनन्द भवन नहीं था। उस समय वह इशरत मंजिल ही था। लेकिन भारत में
परेशानी में डालने वाले प्रश्न कोई नहीं पूछता। इसी प्रकार तथाकथित गैर
मुसलमान राजीव के पिता का क्या नाम था? अथवा क्यों इंदिरा व फिरोज ने
शपपथपत्र द्वारा अपने नाम गांधी  रख लिये? अथवा कैसे जवाहर की मृत्यु छूत
यानी संक्रमण की बीमारी सूजाक यानी आत्यक रोग से हुई, जिससे वह मरा? क्या
ऐसा किसी से हाथ मिलाने से हो गया या खुले में मुंह पोंछने से हो गया?
किसी ने नहीं पूछा।
मुबारक का संबंध  बड़े प्रभुत्‍वशाली  मुसलमानों से था। अवध के नवाब ने
बच्चे जवाहर की वैश्यालय में परवरिश का विरोध  किया और अपने महल में
परवरिश  के लिए कहा। इस प्रकार बालक जवाहर ने जन्म के शीघ्र  बाद ही
मीरगंज छोड़ दिया और राजमहल में रहने व परवरिश के लिए आ गया। जवाहर राजमहल
में दस वर्ष की उम्र तक रहा। इसके बाद पढ़ने के लिए लंदन चला गया। मोतीलाल
ने तब तक इतना पैसा कमा लिया था कि अपने जवाहर की पढ़ाई पर ब्यय वहन कर
सकता था।
नवाब के बगल में खड़े जवाहर की आदमकद  तस्वीर लखनऊ के पास महल के पहले
मंजिल में लगी थी। नवाब के महल में परवरिश  के कारण ही जवाहर गर्व से
कहता था कि उसकी परवरिश विदेश में हुई, इस्लाम के तौर तरीके से उसका
विकास हुआ और हिंदू तो वह दुर्घटनावश ही था!
मीरगंज के वैश्यालय में दो बच्चों का और जन्म हुआ था। दोनों लड़कियां थीं।
यह पता नहीं कि क्या वे भी मुबारक की नाजायद संतानें थीं? शायद हां और
नहीं भी। लेकिन तब मोतीलाल, एक सिद्ध मनचले ऐय्याश, के भी दो नाजायज
संतानें शेख अब्दुल्ला और सयूद हुसेन, जो उसकी बेटी विजया लक्ष्मी को भगा
ले गया था, थीं। यही वह कारण था जिसने मोतीलाल को हुसेन और विजयालक्ष्मी
को शादी करने से रोका था। प्रेमी हुसेन के साथ भाग जाने के बाद दोनों कुछ
दिन साथ रहे थे। यही कारण है कि विजया लक्ष्मी की पहली बेटी चंद्रलेखा की
सूरत हुसेन से मिलती है जो उसका पिता था न कि आर. एस. पंडित से। किसी को
भी चंद्रलेखा, नयनतारा और रीता की सूरतों  को मिलाने से यह पता लग जाएगा
कि बाद की दोनों लड़कियां ही पंडित की हैं पहली चंद्रलेखा नहीं।
छलिया जवाहर लालः
जवाहर लाल एक अलग तरह का बैरिस्टर बना। टिनिटी  कालेज में उसका मुख्य
विषय वनस्पति विज्ञान था। उस समय, मोहम्मद अली जिन्नाह, एक अन्य शिया
मुसलमान, निवास व कार्यालय मुंबई के मलाबार हिल्स में, रहता था। उसकी
वकालत खूब चलती थी। सदा के ज्‍वलनशील  जवाहर ने अपना कार्यालय वहीं खोला।
उसकी वकालत नहीं चली। एक दिन जवाहर को अपने महिला कर्मचारी को, अपने ही
कार्यालय में, जो पारसी थी, छेड़ने के कारण पुलिस ने गिरफ्तार कर लिया।
सेसन अभिलेखागार, मुंबई में  आज भी वे कागजात सु‍रक्षित हैं। मोतीलाल भाग
कर मुंबई गया और अपने हद  और प्रभाव का प्रयोग कर जवाहर को छुड़ा कर
इलाहाबाद ले आया। जवाहर की वकालत खत्म हो गई। वह राजनीति करने लगा। यहां
यह बता दूं कि जवाहर की एक से दस वर्ष तक की कोई तस्वीर उपलब्‍ध  नहीं
है। इस दौरान वह नवाब के महल में रहा। मोतीलाल के वैश्यालय में नहीं।
तस्वीर बनाना इस्लाम में निषिद्ध है। दस वर्ष  के हो जाने के बाद वह
विलायत चला गया। दोनों बहनों को जवाहर से कुछ लेना देना नहीं था। बहनों
के बचपन की बहुत तस्वीरें हैं परंतु जवाहर की एक भी नहीं। जवाहर के खर्च
का बड़ा भाग मुबारक ने दिया था। मोतीलाल के पास तब इतने पैसे नहीं थे।
इटावा के विधवा रानी की कृपा से मोतीलाल के पास काफी पैसा आ गया।
विधूर  जवाहर से ईसाई बच्चे का जन्मः
जैसा बाप वैसा बेटा बल्कि बाप से आगे ही। जवाहर ने अपने भारत के प्रधान
मंत्रित्व का पूर्ण फायदा उठाया। जवाहर की सुंदर औरतों की तलाश  और
आधीरात में गुप्त समागम अंदर खाने सबको अच्छी तरह पता लग गई। जवाहर ने एक
हिंदू नन को गर्भवती कर दिया। उसे अस्पताल नहीं भेजा गया बल्कि
वैरागिनियों की कुटी यानी ननरी में भेजा गया। क्यों कि अस्पताल भेजने पर
लोगों को मालूम हो जाता। यही कारण है कि ईसाइयों को पंथनिरपेक्ष भारत में
विशेष दर्जा प्राप्त है। ताकि वे अपने ओठ सिले रखें और जब चाहें ब्लैक
मेल कर सकें। विधूर जवाहर के पुत्र को भारत के बाहर एक अच्छा ईसाई जार्ज
बनाने के लिए भेज दिया गया। लेकिन यह कोई नई बात नहीं है। भारत पर सदा ही
शासन जारजों का रहा और आज भी है। इसे आप जवाहर के निजी सचिव कैथोलिक ईसाई
मथाई की पुस्तकों, माई डेज विथ नेहरू और नेहरू युग की स्मृतियां से पढ़
सकते हैं।
जवाहर, झूठाः
सदावहार झूठा नेहरू, जो लाउडस्पीकर पर लालकिले की प्राचीर से दिल्ली चलो
और जै हिंद का नारा लगाता था, अपने आफिस में आते ही क्लिमेंट एटली,
तत्कालीन ब्रिटिश  प्रधानमंत्री, को पत्र लिखवाता था, कि वह स्टालिन पर
नेता जी को सौंपने के लिए, जिन्होंने ब्रिटिश  साम्राज्य के विरुद्ध
युद्ध घोषित  कर दिया था, दबाव डाले। ताकि नेता जी पर अभियोग चलाया जा
सके।
ज्यों ही श्यामा प्रसाद मुखर्जी को, अपने मुस्लिम डाक्टर से जहर की सुई
लगवा कर, शेख अब्दुल्ला ने कश्मीर में मरवा दिया, जवाहर लंदन से तुरंत उड़
आया और मुखर्जी जी की निजी डायरी अपने कब्जे में ले ली और उनकी दुखिया
मां को बार बार के गुहार पर भी कभी नहीं लौटाई।
यद्यपि नेहरू को इसका प्रतिकार भी मिला। जिस व्यक्ति को भाग्य ने 15
अगस्त 1947 के रात्रि में सत्ता के सर्वोच्च स्थान पर बिठाया, वह, जैसा
वे बताते हैं, दिल का दौरा पड़ने से नहीं, बल्कि सूजाक की बीमारी से मरा।
और मुझ पर भरोसा कीजिए, यह बीमारी किसी अल्पाहारालाय के लोटे में के पानी
पीने से नहीं हुई।

पुस्तक नेहरू खान वंश
मानव रक्षा संघ प्रकाशन
अनुवादकः अयोध्या प्रसाद त्रिपाठी
मूल लेखक: अरविंद घोष

सोमवार, 3 दिसंबर 2012


द्रोपदी के पांच पति थे या एक: क्या कहती है महाभारत?


-राकेश कुमार आर्य
द्रोपदी महाभारत की एक आदर्श पात्र है। लेकिन द्रोपदी जैसी विदुषी नारी के साथ हमने बहुत अन्याय किया है। सुनी सुनाई बातों के आधार पर हमने उस पर कई ऐसे लांछन लगाये हैं जिससे वह अत्यंत पथभ्रष्ट और धर्म भ्रष्ट नारी सिद्घ होती है। एक ओर धर्मराज युधिष्ठर जैसा परमज्ञानी उसका पति है, जिसके गुणगान करने में हमने कमी नही छोड़ी। लेकिन द्रोपदी पर अतार्किक आरोप लगाने में भी हम पीछे नही रहे।
द्रोपदी पर एक आरोप है कि उसके पांच पति थे। हमने यह आरोप महाभारत की साक्षी के आधार पर नही बल्कि सुनी सुनाई कहानियों के आधार पर लगा दिया। बड़ा दु:ख होता है जब कोई पढ़ा लिखा व्यक्ति भी इस आरोप को अपने लेख में या भाषण में दोहराता है। ऐसे व्यक्ति की बुद्घि पर तरस आता है, और मैं सोचा करता हूं कि ये लोग अध्ययन के अभाव में ऐसा बोल रहे हैं, पर इन्हें यह नही पता कि ये भारतीय संस्कृति का कितना अहित कर रहे हैं।
आईए महाभारत की साक्षियों पर विचार करें! जिससे हमारी शंका का समाधान हो सके कि द्रोपदी के पांच पति थे या एक, और यदि एक था तो फिर वह कौन था?
जिस समय द्रोपदी का स्वयंवर हो रहा था उस समय पांडव अपना वनवास काट रहे थे। ये लोग एक कुम्हार के घर में रह रहे थे और भिक्षाटन के माध्यम से अपना जीवन यापन करते थे, तभी द्रोपदी के स्वयंवर की सूचना उन्हें मिली। स्वयंवर की शर्त को अर्जुन ने पूर्ण किया। स्वयंवर की शर्त पूरी होने पर द्रोपदी को उसके पिता द्रुपद ने पांडवों को भारी मन से सौंप दिया। राजा द्रुपद की इच्छा थी कि उनकी पुत्री का विवाह किसी पांडु पुत्र के साथ हो, क्योंकि उनकी राजा पांडु से गहरी मित्रता रही थी। राजा दु्रपद पंडितों के भेष में छुपे हुए पांडवों को पहचान नही पाए, इसलिए उन्हें यह चिंता सता रही थी कि आज बेटी का विवाह उनकी इच्छा के अनुरूप नही हो पाया। पांडव द्रोपदी के साथ अपनी माता कुंती के पास पहुंच गये।
माता कुंती ने क्या कहा
पांडु पुत्र भीमसेन, अर्जुन, नकुल और सहदेव ने प्रतिदिन की भांति अपनी भिक्षा को लाकर उस सायंकाल में भी अपने ज्येष्ठ भ्राता युधिष्ठर को निवेदन की। तब उदार हृदया कुंती माता द्रोपदी से कहा-’भद्रे! तुम भोजन का प्रथम भाग लेकर उससे बलिवैश्वदेवयज्ञ करो तथा ब्राहमणों को भिक्षा दो। अपने आसपास जो दूसरे मनुष्य आश्रित भाव से रहते हैं उन्हें भी अन्न परोसो। फिर जो शेष बचे उसका आधा हिस्सा भीमसेन के लिए रखो। पुन: शेष के छह भाग करके चार भाईयों के लिए चार भाग पृथक-पृथक रख दो, तत्पश्चात मेरे और अपने लिए भी एक-एक भाग अलग-अलग परोस दो। उनकी माता कहती हैं कि कल्याणि! ये जो गजराज के समान शरीर वाले, हष्ट-पुष्ट गोरे युवक बैठे हैं इनका नाम भीम है, इन्हें अन्न का आधा भाग दे दो क्योंकि यह वीर सदा से ही बहुत खाने वाले हैं।
महाभारत की इस साक्षी से स्पष्ट है कि माता कुंती से पांडवों ने ऐसा नही कहा था कि आज हम तुम्हारे लिए बहुत अच्छी भिक्षा लाए हैं और न ही माता कुंती ने उस भिक्षा को (द्रोपदी को) अनजाने में ही बांट कर खाने की बात कही थी। माता कुंती विदुषी महिला थीं, उन्हें द्रोपदी को अपनी पुत्रवधु के रूप में पाकर पहले ही प्रसन्नता हो चुकी थी।
राजा दु्रपद के पुत्र धृष्टद्युम्न पांडवों के पीछे-पीछे उनका सही ठिकाना जानने और उन्हें सही प्रकार से समझने के लिए भेष बदलकर आ रहे थे, उन्होंने पांडवों की चर्चा सुनी उनका शिष्टाचार देखा। पांडवों के द्वारा दिव्यास्त्रों, रथों, हाथियों, तलवारों, गदाओं और फरसों के विषय में उनका वीरोचित संवाद सुना। जिससे उनका संशय दूर हो गया और वह समझ गये कि ये पांचों लोग पांडव ही हैं इसलिए वह खुशी-खुशी अपने पिता के पास दौड़ लिये। तब उन्होंने अपने पिता से जाकर कहा-’पिताश्री! जिस प्रकार वे युद्घ का वर्णन करते थे उससे यह मान लेने में तनिक भी संदेह रह जाता कि वह लोग क्षत्रिय शिरोमणि हैं। हमने सुना है कि वे कुंती कुमार लाक्षागृह की अग्नि में जलने से बच गये थे। अत: हमारे मन में जो पांडवों से संबंध करने की अभिलाषा थी, निश्चय ही वह सफल हुई जान पड़ती है।
राजकुमार से इस सूचना को पाकर राजा को बहुत प्रसन्नता हुई। तब उन्होंने अपने पुरोहित को पांडवों के पास भेजा कि उनसे यह जानकारी ली जाए कि क्या वह महात्मा पांडु के पुत्र हैं? तब पुरोहित ने जाकर पांडवों से कहा -
‘वरदान पाने के योग्य वीर पुरूषो!
वर देने में समर्थ पांचाल देश के राजा दु्रपद आप लोगों का परिचय जाननाा चाहते हैं। इस वीर पुरूष को लक्ष्यभेद करते देखकर उनके हर्ष की सीमा न रही। राजा दु्रपद की इच्छा थी कि मैं अपनी इस पुत्री का विवाह पांडु कुमार से करूं। उनका कहना है कि यदि मेरा ये मनोरथ पूरा हो जाए तो मैं समझूंगा कि यह मेरे शुभकर्मों का फल प्राप्त हुआ है।
तब पुरोहित से धर्मराज युधिष्ठर ने कहा-पांचाल राज दु्रपद ने यह कन्या अपनी इच्छा से नही दी है, उन्होंने लक्ष्यभेद की शर्त रखकर अपनी पुत्री देने का निश्चय किया था। उस वीर पुरूष ने उसी शर्त को पूर्ण करके यह कन्या प्राप्त की है, परंतु हे ब्राहमण! राजा दु्रपद की जो इच्छा थी वह भी पूर्ण होगी, (युधिष्ठर कह रहे हैं कि द्रोपदी का विवाह उसके पिता की इच्छानुसार पांडु पुत्र से ही होगा) इस राज कन्या को मैं (यानि स्वयं अपने लिए, अर्जुन के लिए नहीं ) सर्वथा ग्रहण करने योग्य एवं उत्तम मानता हूं…पांचाल राज को अपनी पुत्री के लिए पश्चात्ताप करना उचित नही है।
तभी पांचाल राज के पास से एक व्यक्ति आता है, और कहता है-राजभवन में आप लोगों के लिए भोजन तैयार है। तब उन पांडवों को वीरोचित और राजोचित सम्मान देते हुए राजा द्रुपद के राज भवन में ले जाया जाता है।
महाभारत में आता है कि सिंह के समान पराक्रम सूचक चाल ढाल वाले पांडवों को राजभवन में पधारे हुए देखकर राजा दु्रपद, उनके सभी मंत्री, पुत्र, इष्टमित्र आद सबके सब अति प्रसन्न हुए। पांडव सब भोग विलास की सामग्रियाों को छोड़कर पहले वहां गये जहां युद्घ की सामग्रियां रखी गयीं थीं। जिसे देखकर राजा दु्रपद और भी अधिक प्रसन्न हुए, अब उन्हें पूरा विश्वास हो गया कि ये राजकुमार पांडु पुत्र ही हैं।
तब युधिष्ठर ने पांचाल राज से कहा कि राजन! आप प्रसन्न हों क्योंकि आपके मन में जो कामना थी वह पूर्ण हो गयी है। हम क्षत्रिय हैं और महात्मा पांडु के पुत्र हैं। मुझे कुंती का ज्येष्ठ पुत्र युधिष्ठर समझिए तथा ये दोनों भीम और अर्जुन हैं। उधर वे दोनों नकुल और सहदेव हैं।
महाभारतकार का कहना है कि युधिष्ठर के मुंह से ऐसा कथन सुनकर महाराज दु्रपद की आंखों में हर्ष के आंसू छलक पड़े। शत्रु संतापक दु्रपद ने बड़े यत्न से अपने हर्ष के आवेग को रोका, फिर युधिष्ठर को उनके कथन के अनुरूप ही उत्तर दिया। सारी कुशलक्षेम और वारणाव्रत नगर की लाक्षागृह की घटना आदि पर विस्तार से चर्चा की। तब उन्होंने उन्हें अपने भाईयों सहित अपने राजभवन में ही ठहराने का प्रबंध किया। तब पांडव वही रहने लगे। उसके बाद महाराज दु्रपद ने अगले दिन अपने पुत्रों के साथ जाकर युधिष्ठर से कहा-
‘कुरूकुल को आनंदित करने वाले ये महाबाहु अर्जुन आज के पुण्यमय दिवस में मेरी पुत्री का विधि पूर्वक पानी ग्रहण करें तथा अपने कुलोचित मंगलाचार का पालन करना आरंभ कर दें।
तब धर्मात्मा राजा युधिष्ठर ने उनसे कहा-’राजन! विवाह तो मेरा भी करना होगा।
द्रुपद बोले-’हे वीर! तब आप ही विधि पूर्वक मेरी पुत्री का पाणिग्रहण करें। अथवा आप अपने भाईयों में से जिसके साथ चाहें उसी के साथ मेरी पुत्री का विवाह करने की आज्ञा दें।
दु्रपद के ऐसा कहने पर पुरोहित धौम्य ने वेदी पर प्रज्वलित अग्नि की स्थापना करके उसमें मंत्रों की आहुति दी और युधिष्ठर व कृष्णा (द्रोपदी) का विवाह संस्कार संपन्न कराया।
इस मांगलिक कार्यक्रम के संपन्न होने पर द्रोपदी ने सर्वप्रथम अपनी सास कुंती से आशीर्वाद लिया, तब माता कुंती ने कहा-’पुत्री! जैसे इंद्राणी इंद्र में, स्वाहा अग्नि में… भक्ति भाव एवं प्रेम रखती थीं उसी प्रकार तुम भी अपने पति में अनुरक्त रहो।’
इससे सिद्घ है कि द्रोपदी का विवाह अर्जुन से नहीं बल्कि युधिष्ठर से हुआ इस सारी घटना का उल्लेख आदि पर्व में दिया गया है। उस साक्षी पर विश्वास करते हुए हमें इस दुष्प्रचार से बचना चाहिए कि द्रोपदी के पांच पति थे। माता कुंती भी जब द्रोपदी को आशीर्वाद दे रही हैं तो उन्होंने भी कहा है कि तुम अपने पति में अनुरक्त रहो, माता कुंती ने पति शब्द का प्रयोग किया है न कि पतियों का। इससे यह भी स्पष्ट हो जाता है कि द्रोपदी पांच पतियों की पत्नी नही थी।
माता कुंती आगे कहती हैं कि भद्रे! तुम अनंत सौख्य से संपन्न होकर दीर्घजीवी तथा वीरपुत्रों की जननी बनो। तुम सौभाग्यशालिनी, भोग्य सामग्री से संपन्न, पति के साथ यज्ञ में बैठने वाली तथा पतिव्रता हो।
माता कुंती यहां पर अपनी पुत्रवधू द्रोपदी को पतिव्रता होने का निर्देश भी कर रही हैं। यदि माता कुंती द्रोपदी को पांच पतियों की नारी बनाना चाहतीं तो यहां पर उनका ऐसा उपदेश उसके लिए नही होता।
सुबुद्घ पाठकबृंद! उपरोक्त वर्णन से स्पष्ट है कि हमने द्रोपदी के साथ अन्याय किया है। यह अन्याय हमसे उन लोगों ने कराया है जो नारी को पुरूष की भोग्या वस्तु मानते हैं, उन लम्पटों ने अपने पाप कर्मों को बचाने व छिपाने के लिए द्रोपदी जैसी नारी पर दोषारोपण किया। इस दोषारोपण से भारतीय संस्कृति का बड़ा अहित हुआ।
ईसाईयों व मुस्लिमों ने हमारी संस्कृति को अपयश का भागी बनाने में कोई कसर नही छोड़ी। जिससे वेदों की पावन संस्कृति अनावश्यक ही बदनाम हुई। आज हमें अपनी संस्कृति के बचाव के लिए इतिहास के सच उजागर करने चाहिए जिससे हम पुन: गौरव पूर्ण अतीत की गौरवमयी गाथा को लिख सकें और दुनिया को ये बता सकें कि क्या थे और कैसे थे?
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गुरुवार, 20 सितंबर 2012

शैतान कहने पर हैरान क्यों?


किया की विपरीत प्रतिक्रिया होती है। हिंसा के विरोध में प्रतिहिंसा भी होती है। दुनिया में कोई सर्वशक्तिमान नहीं होता है? सर्वशक्तिमान समझने वाली शक्ति को भी चुनौती मिलती है। अराजक और अनियत्रित शक्ति, समूह और व्यवस्था की मानसिकता का दमन होता है, पतन भी होता है। यह सब हम बार-बार देखते हैं। यह देखिये दुनिया को अपनी हिंसक, अराजक, अनियंत्रित अनुदारवादी मानसिकता और आतंकवाद से तबाह करने पर तुली मुस्लिम आबादी को मिली चुनौती और जैसा को तैसा की भाषा में मिलां जवाव।
मुस्लिम आबादी एकात्मक मजहबवाद से ग्रसित दूसरे धर्म समूहों को काफिर कहने और दूसरे धर्म के प्रतीक चिन्हों के साथ हस्यास्पद, घृणात्मक, हिंसात्मक खेल-खेलने से नहीं चुकती है और इन पर यह असर भी नहीं होता कि इससे दूसरे धर्म समूहों की धार्मिक भावनाएं आहत होगी। ‘इनोसेंट आॅफ मुस्लिमस‘ नामक फिल्म जिसकों लेकर दुनिया भर में मुस्लिम आबादी हिंसक राजनीतिक और हिंसा की अग्निनल जला रखी है, मुस्लिम आबादी की हिंसा में लीबिया स्थित अमेरिकी राजदूत तक जल गये, अफगानिस्तान में नाटो सैनिको के ठिकाने पर हमला कर कई सैनिको को मौत का घाट उतार दिया गया, कथितरूप से उदार समझेजाने वाले मिश्र, तुर्क, और अफ्रीकी मुस्लिम देशो में ‘मुस्लिमस बदरहुड‘ जैसी हिंसक और एकात्मक मजहबी मानसिकता से ग्रसित शक्ति ने हिंसा की ऐसी आग जलायी जिससे देख कर दुनिया की जनमत हैरान-परेशान हैं। अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता क्या सिर्फ मुस्लिम आबादी और मुस्लिम हिंसात्मक, घृणात्मक,हास्यास्पद मानसिकता के पोषक के लिए ही है? इनोसेंट ऑफ मुस्लिमस‘ फिल्म भी अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की परिधि में आती है?
इनोसेंट ऑफ मुस्लिमस फिल्म सिर्फ इस्लाम के विरोध मे ही नहीं है बल्कि दुनिया को संदेश भी देती है। मुस्लिम आबादी की काफिरवाद की धृणा से, बालात मतातंतर-धर्मातंरण से, आतंकवादी मानसिकता के वीजारोपन से, उटंग पैयजामा, घुटने के नीचे तक कुर्ता और छेदा टोपी-अधकटी-अर्धबढ़ी दाढी की संस्कृति से अगाह करती है और आईना दिखाती है कि किस प्रकार अमेरिका, यूरोप और गैर मुस्लिम दुनिया खतरनाक स्थिति में पहुंच चुकी है। यह सब हमारे देश में भी घट रहा है। मुबंई में घट रहा है, मुलायम के राज में घट रहा है, राजस्थान में घट रहा है, बिहार में घट रहा है? कश्मीर से हिन्दू खदेड दिये गये, केरल से हिन्दू खदेड़े जा रहे हैं, असम-कोकराझार की कहानी आपको मालूम ही है।
फिल्म निर्माता का अभिशप्त अनुभव
इनोसेंट ऑफ मुस्लिमस‘ फिल्म के निर्माता ‘नकौला वसीली‘ हैं। नाकौला वसीली कभी मिश्रवासी थे। मिश्र से भागकर अमेरिका पहुंचकर उन्होंने अमेरिकी नागरिकता स्वीकार कर ली थी। नाकौला वसीली ईसाई हैं। नकौला वसीली ने मिश्र में जो कुछ भुगता और जो कुछ देखा वह न केवल खतरनाक, डरावना था बल्कि इस्लाम किस प्रकार से मानवता का दुश्मन के रूप में सामने खड़ा है, इसका भी वह एक गवाह के रूप में दुनिया के  सामने मौजूद है। मिश्र की सम्यता कभी दुनिया में चिर्चित थी। अरब से जैसे ही इस्लाम मिश्र में पहुंचा वैसे ही मिश्र की चर्चित सभ्यता का पतन हो गया। इस्लाम के पहुंचते ही गैर इस्लामिक धार्मिक समूहों को जबरन इस्लाम स्वीकार करने के लिए हिंसा, दबाव, शोषण और उपेक्षा की प्रक्रियाएं चलायी गयी। जिस प्रकार से हमारे देश में ‘लव जेहाद‘ मुस्लिम आबादी का चल रही है उसी तरह मिश्र में लव जेहाद जारी है। हाल के वर्षो तक मिश्र की आबादी में ईसाई आबादी अच्छी-खासी संख्या में थी पर अब ईसाई आबादी की संख्या आश्चर्यरूप से घटी है। बड़ी संख्या में ईसाई अपना जीवन बचाने के लिए इस्लाम स्वीकार करने के लिए बाध्य हुए  हैं और जो संपन्न थे वे अमेरिका-यूरोप चले गये। इन्ही अनुभवों पर नकौला वसीली ने एक पुस्तक लिखी थी जिस पर उन्होंने ‘इनोसेंट आफ मुस्लिमस नामक फिल्म बना डाली।

फिल्म का कथानक
फिल्म में दिखाया गया है कि मुसलमानों को नहीं मालूम है कि वे क्या कर रहे हैं, और मुसलमान क्यों हिंसात्मक, घृणात्मक, काफिरात्मक और आतंकी जेहाद चला रहे हैं, उन्हें नहीं मालूम। एक शैतान है जो मुसलमानो से हिंसा कराता है, गैर मुस्लिम आबादी से घृणा कराता है, आतंकी हिंसा करता है, तेजाबी मानसिकता के जकड़न में मानवता को कैद कराता है? वह शैतान कौन है? फिल्म में वह शैतान और कोई नहीं बल्कि हजरत मुहम्मद है। वह शैतान हिंसा फैलाता, दंगा कराता है अमेरिकी वल्र्ड टेड सेटर पर हमला कराता है चैचन्या के स्कूल में सैकड़ों अबोध बालकों की हत्या करता है। इस्लाम के नाम दूसरे धर्म के लोगों पर अत्याचार करने वाले, हिंसा करने वाले, आतंक फैलाने वाले और जबरन इस्लाम स्वीकार करान वालों को पुरस्कार देता है,जन्नत में भेजने और मनोरंजन-उपभोग के लिए छोटी-छोटी बच्चियां और हुर यानी लड़के दिलाने का भरोसा,वही शैतान देता है। हजरत मुहम्मद खुद बुढ़ापी में मात्र ग्यारह साल की अपनी भतीजी से शादी की थी और सैक्सतृष्णा को तृप्त किया था। फिल्म में यह दिखाया गया है कि मक्का में जिस पत्थर का मुसलमान पूजा करते हैं वह पत्थर मुसलमानों के पाप और हिंसा से भरा हुआ है। मक्का का वह पत्थर अब काला हो रहा है और जिस दिन मक्का का वह पत्थर पूरी तरह से काला हो जायेंगा उस दिन मुसलमानों का अंत हो जायेगा। फिल्म में यह भी दिखाया गया है कि मक्का का वह पत्थर आडम को ईश्वर ने उपर से भेजा था जिसे मक्का में कैद कर रखा गया है। कयामत उस दिन जरूर आ जायेगी जिस दिन मक्का का वह ईश्वरीय पत्थर मुसलमानों के पाप से पूरी तरह काला हो जायेगा, पूरा मक्का कीचड़ और मलवों के ढेर में तब्दील हो जायेगा?

इस्लाम की काफिरवादी हिंसा को मिला आधार
इनोसेंट आफ मुस्लिमस फिल्म के कथानक से स्पष्ट होता है कि इस्लाम और मुसलमानों को लेकर कोई नयी प्रस्थापना, कोई नया तर्क, कोई नया खुलासा नही है। इनोसेंट आफ मुस्लिमस के कथानक से दुनिया सिर्फ आज नहीं बल्कि इस्लाम के स्थापना काल से ही अभिशप्त है और भुगत रही है। हजरत मुहम्मद ने तलवार की जोर से इस्लाम फैलाया था? कालांतर में इस्लाम यहूदी और इस्लाम ईसाई संघर्ष भी उल्लेखनीय है। भारत में मुस्लिम आक्रमणकारियो और मुस्लिम सत्ता ने इस्लाम के नाम पर किस तरह से शिक्षा के विश्वप्रसिद्ध स्थल नालंदा, तक्षशिला आदि को जलाया था, नष्ट किया था और हिन्दुओं पर जजिया टैक्स लगायी थी? मुस्लिम देशो में गैर मुस्लिम आबादी को भागने या फिर मुस्लिम बनने मात्र का अवसर दिया जाता है। भारतीय कश्मीर, चैचन्याचीन आदि जहां तर भी मुस्लिम हिंसक आंदोलन चल रहा है वहां पर मुस्लिम आतंकवादियों का तर्क क्या यह नही होता है कि हमें पैगम्बर हजरत मुहम्मद की शिक्षाओं के अनुसार इस्लामिक शासन स्थापित करना है।ं अमेरिकी वल्र्ड टेड सेंटर पर हमला करने वाले आतंकवादी और हमला कराने वाला ओसामा बिन लादेन इस्लाम के दहशतगर्द और पैगम्बर की शिक्षाओं से प्रेरित नहीं थे।

बर्बर हिंसा क्यों?
मुस्लिम आबादी बर्बर होती है। मुस्लिम आबादी अराजक होती है। मुस्लिम आबादी अनियंत्रित होती है। मुस्लिम आबादी के लिए अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का कोई मायने नहीं होता है। मुस्लिम आबादी के लिए कानून-संविधान भी कोई मायने नहीं रखता है। वह तो सिर्फ और सिर्फ इस्लाम के कानून और संविधान का आग्रही होती है। यह सब एक बार फिर प्रमाणित हुई है। अगर आप असहमत है तो फिर इनोसेंट आफ मुस्लिमस फिल्म के विरोध में लीबिया में अमेरिकी राजदूत की वीभत्स हत्या, अफगानिस्तान में अमेरिकी ठिकानों पर हिंसक हमला, मिश्र, तुर्की जैसे देशो में मुस्लिम बदरहुट की हिंसा की संस्कृति और प्रक्रिया को देख लीजिये। कुछ समय पहले तक दुनिया भर में मिश्र में मुस्लिम बदरहुड की बहुत तारीफ हुई थी और उसे उदारवाद का प्रतीक बताया जा रहा था। यही मुस्लिम बदरहुड जब इस्लाम और हजरते मुहम्मद की शिक्षाओं की आड मे हिंसा फैलाते हैं तब मुस्लिम बदरहुड और मुस्लिम आबादी विरोध प्रदर्शन करती क्यों नहीं है? इसका जवाब इनोसेंट आफ मुस्लिमस फिल्म के कथानक में ही है।

अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को संरक्षण क्यों नहीं?
अमेरिका ने फिल्म पर प्रतिबध न लगा कर अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को संरक्षण देने की अपनी जिम्मेदारी निभायी है और कट्टर, हिंसक मुस्लिम आबादी के सामने झुकने से इनकार कर दिया है। अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और मुस्लिम आतंकवाद के दमन के परिपेक्ष्य में यह चाकचैबंद और दूरदर्शी कदम है। पर हमारी मुस्लिम परस्त सरकार ने गूगल को इनोसेंट ऑफ मुस्लिमस फिल्म को प्रतिबधित करने के लिए बाध्य किया है। जबकि भारतीय परिपेक्ष्य में यह फिल्म काफी उल्लेखनीय है और मुबंई, मुलायम राज, राजस्थान, बिहार, केरल जैसी घटनाओं पर आईना दिखाती है। लेकिन हमारी राजनीतिक व्यवस्था को इससे सबक लेने का समय कहां है और न ही विचार है। हम कल मिश्र में ईसाइयों की तरह भारत से भागने या फिर मुस्लिम बनने के लिए बाध्य होंगे।

साभार .......विस्फोट.कॉम( लेखक  ----  )

मंगलवार, 11 सितंबर 2012

एक थी नीरजा

एक थी नीरजा

5 सितम्बर 1986 को आधुनिक भारत की एक विरांगना जिसने इस्लामिक आतंकियों से लगभग 400 यात्रियों को जान बचाते हुए अपना जीवन बलिदान कर दिया। भारत के कितने नवयुवक और नवयुवतियां उसका नाम जानते है।
कैटरिना कैफ, करीना कपूर, प्रियंका चैपड़ा, दीपिका पादुकोड़, विद्याबालन और अब तो सनी लियोन जैसा बनने की होड़ लगाने वाली युवती क्या नीरजा भनोत का नाम जानती है। नहीं सुना न ये नाम। मैं बताता हूँ इस महान विरांगना के बारे में। 7 सितम्बर 1964 को चंड़ीगढ़ के हरीश भनोत जी के यहाँ जब एक

बच्ची का जन्म हुआ था तो किसी ने भी नहीं सोचा था कि भारत का सबसे बड़ा नागरिक सम्मान इस बच्ची को मिलेगा। बचपन से ही इस बच्ची को वायुयान में बैठने और आकाश में उड़ने की प्रबल इच्छा थी।
नीरजा ने अपनी वो इच्छा एयर लाइन्स पैन एम ज्वाइन करके पूरी की। 16 जनवरी 1986 को नीरजा को आकाश छूने वाली इच्छा को वास्तव में पंख लग गये थे। नीरजा पैन एम एयरलाईन में बतौर एयर होस्टेज का काम करने लगी। 5 सितम्बर 1986 की वो घड़ी आ गयी थी जहाँ नीरजा के जीवन की असली परीक्षा की बारी थी। पैन एम 73 विमान करांची, पाकिस्तान के एयरपोर्ट पर अपने पायलेट का इंतजार कर रहा था। विमान में लगभग 400 यात्री बैठे हुये थे। अचानक 4 आतंकवादियों ने पूरे विमान को गन प्वांइट पर ले लिया। उन्होंने पाकिस्तानी सरकार पर दबाव बनाया कि वो जल्द में जल्द विमान में पायलट को भेजे। किन्तु पाकिस्तानी सरकार ने मना कर दिया। तब आतंकियांे ने नीरजा और उसकी सहयोगियों को बुलाया कि वो सभी यात्रियों के पासपोर्ट एकत्रित करे ताकि वो किसी अमेरिकन नागरिक को मारकर पाकिस्तान पर दबाव बना सके। नीरजा ने सभी यात्रियों के पासपोर्ट एकत्रित किये और विमान में बैठे 5 अमेरिकी यात्रियों के पासपोर्ट छुपाकर बाकी सभी आतंकियों को सौंप दिये। उसके बाद आतंकियों ने एक ब्रिटिश को विमान के गेट पर लाकर पाकिस्तानी सरकार को धमकी दी कि यदि पायलट नहीं भेजे तो वह उसको मार देगे। किन्तु नीरजा ने उस आतंकी से बात करके उस ब्रिटिश नागरिक को भी बचा लिया। धीरे-धीरे 16 घंटे बीत गये। पाकिस्तान सरकार और आतंकियों के बीच बात का कोई नतीजा नहीं निकला। अचानक नीरजा को ध्यान आया कि प्लेन में फ्यूल किसी भी समय समाप्त हो सकता है और उसके बाद अंधेरा हो जायेगा। जल्दी उसने अपनी सहपरिचायिकाओं को यात्रियों को खाना बांटने के लिए कहा और साथ ही विमान के आपातकालीन द्वारों के बारे में समझाने वाला कार्ड भी देने को कहा। नीरजा को पता लग चुका था कि आतंकवादी सभी यात्रियों को मारने की सोच चुके हैं।
उसने सर्वप्रथम खाने के पैकेट आतंकियों को ही दिये क्योंकि उसका सोचना था कि भूख से पेट भरने के बाद शायद वो शांत दिमाग से बात करे। इसी बीच सभी यात्रियों ने आपातकालीन द्वारों की पहचान कर ली। नीरजा ने जैसा सोचा था वही हुआ। प्लेन का फ्यूल समाप्त हो गया और चारो ओर अंधेरा छा गया। नीरजा तो इसी समय का इंतजार कर रही थी। तुरन्त उसने विमान के सारे आपातकालीन द्वार खोल दिये। योजना के अनुरूप ही यात्री तुरन्त उन द्वारों के नीचे कूदने लगे। वहीं आतंकियों ने भी अंधेरे में फायरिंग शुरू कर दी। किन्तु नीरजा ने अपने साहस से लगभग सभी यात्रियों को बचा लिया था। कुछ घायल अवश्य हो गये थे किन्तु ठीक थे अब विमान से भागने की बारी नीरजा की थी किन्तु तभी उसे बच्चों के रोने की आवाज सुनाई दी। दूसरी ओर पाकिस्तानी सेना के कमांडो भी विमान में आ चुके थे। उन्होंने तीन आतंकियों को मार गिराया। इधर नीरजा उन तीन बच्चों को खोज चुकी थी और उन्हें लेकर विमान के आपातकालीन द्वार की ओर बढ़ने लगी। कि अचानक बचा हुआ चैथा आतंकवादी उसके सामने आ खड़ा हुआ। नीरजा ने बच्चों को आपातकालीन द्वार की ओर धकेल दिया और स्वयं उस आतंकी से भिड़ गई। कहाँ वो दुर्दांत आतंकवादी और कहाँ वो 23 वर्ष की पतली-दुबली लड़की। आतंकी ने कई गोलियां उसके सीने में उतार डाली। नीरजा ने अपना बलिदान दे दिया। उस चैथे आतंकी को भी पाकिस्तानी कमांडों ने मार गिराया किन्तु वो नीरजा को न बचा सके। नीरजा भी अगर चाहती तो वो आपातकालीन द्वार से सबसे पहले भाग सकती थी। किन्तु वो भारत माता की सच्ची बेटी थी। उसने सबसे पहले सारा विमान खाली कराया और स्वयं को उन दुर्दांत राक्षसों के हाथों सौंप दिया। नीरजा के बलिदान के बाद भारत सरकार ने नीरजा को सर्वोच्च नागरिक सम्मान अशोक चक्र प्रदान किया तो वहीं पाकिस्तान की सरकार ने भी नीरजा को तमगा-ए-इन्सानियत प्रदान किया। नीरजा वास्तव में स्वतंत्र भारत की महानतम विरांगना है। ऐसी विरागना को मैं कोटि-कोटि नमन करता हूँ। (2004 में नीरजा भनोत पर टिकट भी जारी हो चुका है।)