शनिवार, 22 अगस्त 2009

भारतीय क्रांति की एक अति रोमांचकारी व साहसिक घटना.

१८ अप्रैल १९३० को चटगाव कांड(क्रांतिकारियों ने शस्त्रागार पर हमला कर दिया था.) के बाद सारा बंगाल क्रांति की ज्वाला से धधक उठा। वहीं अंग्रेजो ने भी एक एक व्यक्ति पर नजर रखनी शुरू कर दी,तथा क्रांतिकारियों के दमन की प्रक्रिया तेज कर दी।
२४ दिसम्बर १९३० को एक ऐसी घटना घटी जिसने पूरी अंग्रेजी सत्ता को झकझोर कर रख दिया। पूरे विश्व का ध्यान इस घटना ने अपनी और खीच लिया। क्यों कि इस घटना को अंजाम देने वाली १४ वर्षीय दो मासूम स्कूली छात्राएं थी। जिनके नाम थे शान्ति घोष व सुनीति चौधरी।
चट्गावं कांड के बाद पूर्वी बंगाल में प्रय्तेक नागरिक को परिचय पत्र दिया जाने लगा। किसी भी व्यक्ति से कहीं भी परिचय पत्र माँगा जा सकता था। ऐसा न करने पर गोली तक मारने के भी आदेश थे। क्रांतिकारियों का एक स्थान से दूसरे स्थान पर जाना बहुत ही कठिन हो गया था। इतनी कठोर व्यवस्था होने पर भी त्रिपुरा के जिला मजिस्ट्रेट को जान से मरने के पत्र मिल रहे थे। क्यों कि परिचय पत्र वाली व्यवस्था में उसका भी बड़ा हाथ था।
मजिस्ट्रेट स्तिवेंशन की सुरक्षा बहुत ही कड़ी कर दी गई।स्तिवेंशन ने एक प्रकार से अपने को नजरबन्द कर लिया था।
२४ दिसम्बर १९३० को देश भक्ति की प्रेरणा से वे दो छोटी बालिका मजिस्ट्रेट के बंगले पर पहुँची। गेट पर सिपाही ने रोककर आने का कारण पूंछा। इस पर उन छात्रायों ने कहा की लड़कियों की तेराकी प्रतियोगिता है।साहब से प्रार्थना पत्र पर साइन कराने है कि उस दिन वहां से कोई स्टीमर और नौका न निकले। लड़कियों की भोली सूरत देखकर सिपाही ने स्टीवेंसन से फोन पर बात की ,स्टीवेंसन ने दोनों लड़कियों को अन्दर बुला लिया। आगे जासूसी विभाग के लोगो ने रोककर पूछताछ की।स्टीवेंसन अपने कमरे से बहार आया और उनके प्रार्थना पत्र को देखते हुए कहा कि ये कार्य तो पुलिस का है,में इसको पुलिस ऑफिसर को फोरवर्ड कर देता हूँ।लड़कियों ने कहा ठीक है। जैसे ही मेज पर पत्र रखकर उसने साइन करने शुरू किए,दोनों भोली भाली लड़कियों ने माँ दुर्गा का रूप धारण कर लिया और तुंरत पिस्तोलें निकली और ५-५ गोलियां मजिस्ट्रेट पर बरसा दी।जब तक कोई समझ पाता स्टीवेंसन धरती पर गिर चुका था और दम तोड़ दिया था।
शान्ति व सुनीति ने अपनी-अपनी पिस्तोलें फैक दी और वन्देमातरम के नारों से मजिस्ट्रेट का बंगला गूंजा दिया।दोनों को बंदी बना लिया गया। नाबालिक होने के कारण दोनों को काले पानी की सजा दी गई।रिहा होने के बाद वो कहाँ गई ,उनका क्या हुआ,इस बात का विवरण मुझे नही मिल पाया है
इन १४ वर्षीय लड़कियों के कारनामे से पूरा देश रोमांचित हो गया था। शान्ति घोष व सुनीति चौधरी भारतीय क्रांति की सबसे छोटी उम्र की क्रांतिकारी थी। इनके बलिदान को सत्ता भुनाने वाले लोगो ने व्यर्थ कर दिया। छोटे छोटे बच्चों को बचपन से ही गाँधी को बापू व नेहरू को चाचा बताकर रटवाया जाता है। परंतु ऐसी क्रांतिकारी लड़कियों को इतिहास से भुला दिया जाता है।
हमारे बच्चों को अगर ऐसे क्रांतिकारिओं का भी इतिहास में पढाया जाता,तो हमारी आने वाली पीढी का भविष्य उज्ज्वलता के शिखर पर होता,और उन्हें भी पता चलता कि देश गाँधी की अहिंसा से नही बल्कि ऐसे बलिदानों से स्वतन्त्र हुआ है।

शुक्रवार, 21 अगस्त 2009

वतन पे मरने वालों का यही बाकि निशाँ होगा.

भारतीय स्वतंत्रता संग्राम में एक क्रांतिकारी थे भगवतीचरण वोहरा। भगत सिंह जी का पूरा संगठन उनको बड़ा भाई मानता था। उनकी धर्मपत्नी का नाम था दुर्गा, और यही दुर्गा इतिहास में दुर्गा भाभी का नाम पाकर अमर हो गई।
जिस समय सरदार भगत सिंह जी व उनके साथियों ने लाला लाजपत राय जी की म्रत्यु का बदला लेने के लिए दिन दहाड़े सांडर्स को गोलियों से उड़ा दिया था। तो अंग्रेज एकदम बोखला गए थे। उन्होंने चप्पे चप्पे पर क्रांतिकारियों को पकड़ने के लिए निगरानी शुरू कर दी। क्रांतिकारियों के लाहोर से निकलने में दुर्गा भाभी का योगदान अविस्मरनीय है।
उस समय भगवतीचरण वोहरा फरार थे। दुर्गा भाभी लाहोर की एक छोटी सी गली में एक मकान में रह रही थी। भगत सिंह जी की पत्नी बनकर उन्होंने भगतसिंह व राजगुरु को लाहोर स्टेशन से लखनऊ तक पहुचाया। उनके साथ उनका पुत्र शचीन्द्र भी था। राजगुरु जी उन के नोकर के रूप में थे। इसके बाद भगत सिंह व बटुकेश्वर दत्त ने दिल्ली असेम्बली में बम फैंका, और अपनी ग्रिफतारी दे दी।उसके पश्चात् जब भगत सिंह, राजगुरु व सुखदेव को फांसी की सजा हो गई तब दुर्गा भाभी,सुसीला दीदी तथा साथियों ने मिलकर जेल से भगत सिंह व साथियों को छुटाने के लिए एक योजना बनाई । इसके अर्न्तगत दिल्ली में एक छोटी सी बम फैक्ट्री बनाई गई। इसमे बने बम का परिक्षन करते हुए दुर्गा भाभी के पति वोहरा जी की मौत हो गई। पति की म्रत्यु के पश्चात् दुर्गा भाभी ने भगत सिंह को छुड़ाने का कार्य अपने हाथ में ले लिया। परन्तु दुर्भाग्य से उस बम फैक्ट्री में विष्फोट हो गया,और दुर्गा भाभी व साथियों को भूमिगत होना पड़ा।दुर्गा भाभी की सारी संपत्ति जब्त कर ली गई,किंतु वे अपने पथ पर अग्रसर होती रही। वे भगत सिंह की रिहाई के लिए गाँधी से भी मिली,किंतु कोई फायदा नही हुआ।
भगत सिंह व साथियों को फंसी लगने के बाद वे अत्यन्त दुखी हुई। उन्होंने अंग्रेजों से बदला लेने के लिए पुलिस कमिश्नर को मारने का निर्णय किया। उन्होंने अपना बच्चा अपने एक रिश्तेदार के पास छोड़ दिया। अपनी इस योजना को कार्य रूप देने के लिए वे मुंबई जा पहुची।
एक रात काली साडी पहनकर वे कमिश्नर के बंगले पर जा पहुची। क्रन्तिकारी प्रथ्वी सिंह उनके साथ थे। कुछ अंग्रेज कमिश्नर के बंगले की और से आते दिखाई दिएदुर्गा भाभी अत्यन्त आवेश व गुस्से में थी। उन्होंने तुंरत गोली चला दी। कमिश्नर उन लोगों में नही था। गोली लगने से तीन अंग्रेज घायल हो गए।वहाँ से भागकर उन्होंने तुंरत मुंबई को छोड़ दिया। काफी समय तक वो पुलिस से बचती रही। लेकिन बाद में गिरफ्तार हो गयीं। सबूतों के अभाव के कारण उनको कोई सजा तो नही हुई किंतु फ़िर भी उनको नजरबन्द रक्खा गया,तथा बाद में रिहा कर दिया गया।
उनके सभी साथी शहीद हो चुके थे। वे बिल्कुल बेसहारा हो चुकी थी। अंत में थक हारकर बैठने के बजाय वे समाज सेवा में लग गई। १९३७ से १९८२ तक वे लखनऊ में वे एक शिक्षा केन्द्र चलाती रही। उसके बाद वे गाजियाबाद में आकर बस गई। १५ ओक्टुबर १९९९ को उनका स्वर्गवास हो गया। उनकी मौत एक गुमनामी की मौत रही। उनकी शवयात्रा में देश का कोई बड़ा नेता तो नेता गाजियाबाद का भी कोई क्षेत्रिय नेता भी शामिल नही हुआ।हाँ कुछ पत्रकारों द्बारा सरकार की खिल्ली जरूर उडाई गई।

तुम सो रहे हो नोजवानो देश बिकता है,
तुम्हारी संस्कृति का है खुला परिवेश बिकता है।
सिंहासनों के लोभियों के हाथ में पड़कर ,
तुम्हारे देश के इतिहास का अवशेष बिकता है ।
पिशाचों से बचालो देश को,अभिमान ये होगा,
तुम्हारा राष्ट्र को अर्पित किया सम्मान ये होगा।

गुरुवार, 20 अगस्त 2009

केवल हिंदू ही राष्ट्र है.

किसी भी देश की उन्नति उस देश में रहने वाले उस समुदाय से होती है,जो कि उस देश की धरती को अपनी मात्र भूमि, पितृ भूमि व पुज्य्भूमि मानता है। जिसकी निष्ठां देश को समर्पित हो। भारत में रहने वाला ऐसा समाज केवल हिंदू है,और हिंदू की परिभाषा भी यही कहती है कि जो व्यक्ति भारत भूमि को अपनी मात्रभूमि, पितृ भूमि ,व पुण्यभूमि मानता है वह हिंदू है । ऐसे में कहा जा सकता है कि मुसलमान व इसाई को छोढ़कर भारत में प्रय्तेक पंथ को मानने वाला व्यक्ति, चाहे वह सनातनी हो,बोद्ध हो,जैन हो,सिक्ख हो , हिंदू है।
कुछ लोग इस बात को जरूर पूछना चाहेंगे की मुसलमान व इसाई हिंदू क्यो नही है? तो इसका कारण है उनकी पुन्य भूमि।एक मुसलमान मुसलमान पहले है भारतीय बाद में। क्यो कि भारत से ज्यादा उसका लगाव अरब से है ,मक्का से है। इसी प्रकार एक इसाई भारत से पहले जेरूसलम को पूजता है। उस पोप की आज्ञा उसकी उस राष्ट्रभक्ति पर भारी पड़ती है जो उसे वेटिकन सिटी से मिलती है।
भारत में जो भी हिस्सा हिंदू बहुल नही रहता वह हिस्सा या तो अलग हो जाता है या फ़िर अलग होने का प्रयास शुरू कर देता है। यूँ तो भारत में खालिस्तान की मांग भी उठी किंतु आम सिक्ख खालिस्तान का कभी समर्थक नही रहा। आज का जो पकिस्तान व बांग्लादेश है वह इस बात का सबसे बड़ा उदहारण है कि हिंदू कम होने पर वह हिस्सा भारत से कट गया। कश्मीर की समस्या पूरे विश्व के सामने है। इस समस्या का कारण सिर्फ़ वहाँ पर मुसलमानों की बहुलता होना है।आसाम की स्थिति भी मुस्लिमो की आबादी तेजी के साथ बढ़ने के कारण हाथ से निकलती जा रही है। वहां पर मुसलमानों ने चुनाव में अपने लिए अलग विधानसभा सीटों की मांग शुरू कर दी है।
नागालेंड,मिजोरम मेघालय की स्थिति इसलिए जटिल होती जा रही है क्यों कि ये राज्य इसाई बहुसंख्यक हो चुके है,और स्वतंत्र इसाई राष्ट्र की मांग कर रहे है। इनमे विदेशी पादरियों की भूमिका स्पष्ट दिखाई देती है।
स्वामी विवेकानंद के अनुसार "जब कोई हिंदू धर्म परिवर्तन करता है तब एक हिंदू ही कम नही होता ,बल्कि उसका एक शत्रु भी बढ़ जाता है। "
बाबा भीमराव आंबेडकर ने भी लिखा है कि "जब एक हिंदू का धर्मान्तरण होता है तो वह राष्ट्र वाद से बिल्कुल कट जाता है ।उसकी भक्ति मक्का व वेटिकन सिटी से जुड़ जाती है।
इन दो महापुरुषों ने भी यही बात अपने उपरोक्त शब्दों में स्पष्ट रूप से बता दी है कि भारत में राष्ट्र वाद केवल हिंदू में है। बाकि सब राष्ट्र विरोधी है।
भारत एक धर्मनिरपेक्स देश है। परन्तु देखिये की कश्मीर व नागालैंड में आप लोग जमीन नही खरीद सकते, केवल मात्र इसलिए की वो प्रदेश मुस्लिम बाहुल्य व इसाई बाहुल्य हैं।ये तो धर्म के नाम पर साफ बंटवारा है।
अतःस्पष्ट है की भारत में राष्ट्रवाद व हिंदू समाज दोनों ही एक शब्द के पर्यायवाची है। भारत में राष्ट्र व राष्ट्रवाद वहीं है जहाँ हिंदू बाहुल्य में है,अन्यथा भारत के कई टुकड़े हो चुके है।

बुधवार, 19 अगस्त 2009

बंटवारा

बहुत ही हो हल्ला मचना शुरू हो गया है ,जैसे की जसवंत सिंह ने जिन्ना को१९४७ के बटवारे का अपराधी न मानकर कोई बहुत ही बड़ा अपराध कर दिया हो। लेकिन हाँ ,सरदार पटेल को इस कीचड में धकेल कर जसवंत सिंह ने जरूर अपराध किया है। बटवारे का अपराधी अगर ढूँढने की कोशिश की जाय तो हमें उन कारणों को देखना पड़ेगा जो इस संसार में इस्लाम के साथ आए । जिन्ना ने अपने मुस्लिम लीग के सम्मलेन में दिए गए एक भाषण में कहा था कि जिस दिन भारत में पहले मुस्लमान ने कदम रक्खा था। पकिस्तान का निर्माण की नींव उसी दिन रक्खी गई थी।लेकिन बाद में जिन्ना से दो कदम आगे बढ़कर गाँधी जी के प्यारे शिष्य नेहरू ने अपने सपनो को पूरा करने के लिए भारत के बटवारे में जिन्ना का पूरा साथ दिया,और समर्थन मिला उन्हें भारतीय मुसलमानों का।बटवारे के जितने भी कारण रहे उनमे बड़ा कारण था भारत में ३०% मुसलमानों की आबादी। और उस से भी सबसे बड़ा कारण रहा उस आबादी को मिल रही उनकी धार्मिक पुस्तक कुरान की शिक्षा।
आप पूरे विश्व पर नजर डालिए,जहाँ भी मुसलमानों की आबादी लगभग १०% से कम होती है,तब ये वहां पर बड़ी शान्ति के साथ रहते है और लगातार अपनी आबादी बढ़ने पर जोर देते है। जहाँ इनकी आबादी १०%से २०%तक होती है उस देश में ये उलटी सीदी मांग करते है और आतंकवाद का सहारा लेते है। भारत इसका सबसे बड़ा उदहारण है।२५%से ४०% तक की आबादी होने परे उस देश में ग्रह युद्ध शुरू हो जाते है। सीरिया इसका सबसे बड़ा उदहारण है.सीरिया में पिछले २० वर्ष से लगातार मुसलमानों व ईसाईयों का गृहयुद्ध चल रहा है। दर्जनों अफ्रीकी देश और भी इस बात के उदहारण है। ४०% से ऊपर जब इनकी आबादी हो जाती है तो उस देश का या तो बटवारा होता है और या फ़िर शुरू होती है शरीय कानून की शुरुआत जहाँ मुसलमानों के अतिरिक्त किसी दूसरे धर्म के लोगो को जीने का कोई अधिकार नही होता।
इन सब बातों का मूल कारण क्या है? मुसलमानों की इन सोंचो के पीछे सबसे बड़ा कारण है इनकी धार्मिक शिक्षा । यानि कुरान की शिक्षा ।मानव एकता और भाईचारे के विपरीत कुरान का मूल तत्व और लक्ष्य इस्लामी एकता व इस्लामी भाईचारा है. गैर मुसलमानों के साथ मित्रता रखना कुरान में मना है. कुरान मुसलमानों को दूसरे धर्मो के विरूद्ध शत्रुता रखने का निर्देश देती है । कुरान के अनुसार जब कभी जिहाद हो ,तब गैर मुस्लिमों को देखते ही मार डालना चाहिए। कुरान में मुसलमानों को केवल मुसलमानों से मित्रता करने का आदेश है। सुरा ३ की आयत ११८ में लिखा है कि, "अपने (मजहब) के लोगो के अतिरिक्त किन्ही भी लोगो से मित्रता मत करो। "लगभग यही बात सुरा ३ कि आयत २७ में भी कही गई है, "इमां वाले मुसलमानों को छोड़कर किसी भी काफिर से मित्रता न करे। "कुरान की लगभग १५० से भी अधिक आयतें मुसलमानों को गैर मुसलमानों के प्रति भड़काती है। सन १९८४ में हिंदू महासभा के दो कार्यकर्ताओं ने कुरान की २४ आयातों का एक पत्रक छपवाया । उस पत्रक को छपवाने पर उनको गिरफ्तार कर लिया गया। परन्तु तुंरत ही कोर्ट ने उनको रिहा कर दिया। कोर्ट ने फ़ैसला दिया,"कुरान मजीद का आदर करते हुए इन आयतों के सूक्ष्म अध्यन से पता चलता है की ये आयते मुसलमानों को गैर मुसलमानों के प्रति द्वेषभावना भड़काती है............."उन्ही आयतों में से कुछ आयतें निम्न है................सुरा ९ आयत ५ में लिखा है,......."फ़िर जब पवित्र महीने बीत जायें तो मुशरिकों (मूर्ती पूजक) को जहाँ कहीं पाओ कत्ल करो और उन्हें pakdo व घेरो और हर घाट की जगह उनकी ताक में बैठो। यदि वे तोबा करले ,नमाज कायम करे,और जकात दे तो उनका रास्ता छोड़ दो। निसंदेह अल्लाह बड़ा छमाशील और दया करने वाला है। "इस आयत से साफ पता चलता है की अल्लाह और इश्वर एक नही हो सकते । अल्लाह सिर्फ़ मुसलमानों का है ,गैर मुसलमानों का वह तभी हो सकता है जब की वे मुस्लमान बन जाए। अन्यथा वह सिर्फ़ मुसलमानों को गैर मुसलमानों को मार डालने का आदेश देता है। सुरा ९ की आयत २३ में लिखा है कि, "हे इमां वालो अपने पिता व भाइयों को अपना मित्र न बनाओ ,यदि वे इमां कि अपेक्षा कुफ्र को पसंद करें ,और तुमसे जो मित्रता का नाता जोडेगा तो ऐसे ही लोग जालिम होंगे। " इस आयत में नव प्रवेशी मुसलमानों को साफ आदेश है कि,जब कोई व्यक्ति मुस्लमान बने तो वह अपने माता , पिता, भाई सभी से सम्बन्ध समाप्त कर ले। यही कारण है कि जो एक बार मुस्लमान बन जाता है, तब वह अपने परिवार के साथ साथ राष्ट्र से भी कट जाता है। सुरा ४ की आयत ५६ तो मानवता की क्रूरतम मिशाल पेश करती है ..........."जिन लोगो ने हमारी आयतों से इंकार किया उन्हें हम अग्नि में झोंक देगे। जब उनकी खाले पक जाएँगी ,तो हम उन्हें दूसरी खालों से बदल देंगे ताकि वे यातना का रसा-स्वादन कर लें। निसंदेह अल्लाह ने प्रभुत्वशाली तत्व दर्शाया है।" सुरा ३२ की आयत २२ में लिखा है "और उनसे बढकर जालिम कोन होगा जिसे उसके रब की आयतों के द्वारा चेताया जाए और फ़िर भी वह उनसे मुँह फेर ले।निश्चय ही ऐसे अप्राधिओं से हमे बदला लेना है। "सुरा ९ ,आयत १२३ में लिखा है की," हे इमां वालों ,उन काफिरों से लड़ो जो तुम्हारे आस पास है,और चाहिए कि वो तुममे शक्ति पायें।"सुरा २ कि आयत १९३ ............"उनके विरूद्ध जब तक लड़ते रहो, जब तक मूर्ती पूजा समाप्त न हो जाए और अल्लाह का मजहब(इस्लाम) सब पर हावी न हो जाए. "सूरा २६ आयत ९४ ..................."तो वे गुमराह (बुत व बुतपरस्त) औन्धे मुँह दोजख (नरक) की आग में डाल दिए जायंगे."
सूरा ९ ,आयत २८ ......................."हे इमां वालों (मुसलमानों) मुशरिक (मूर्ती पूजक) नापाक है। "
गैर मुसलमानों को समाप्त करने के बाद उनकी संपत्ति ,उनकी औरतों ,उनके बच्चों का क्या किया जाए ? उसके बारे में कुरान ,मुसलमानों को उसे अल्लाह का उपहार समझ कर उसका भोग करना चाहिए।
सूरा ४८ ,आयत २० में कहा गया है ,....."यह लूट अल्लाह ने दी है। "
सूरा ८, आयत ६९..........."उन अच्छी चीजो का जिन्हें तुमने युद्ध करके प्राप्त किया है,पूरा भोग करो। "
सूरा १४ ,आयत १३ ............"हम मूर्ती पूजकों को नष्ट कर देंगे और तुम्हे उनके मकानों और जमीनों पर रहने देंगे।"
मुसलमानों के लिए गैर मुस्लिमो के मकान व संपत्ति ही हलाल नही है, अपितु उनकी स्त्रिओं का भोग करने की भी पूरी इजाजत दी गई है।
सूरा ४ ,आयत २४.............."विवाहित औरतों के साथ विवाह हराम है , परन्तु युद्ध में माले-गनीमत के रूप में प्राप्त की गई औरतें तो तुम्हारी गुलाम है ,उनके साथ विवाह करना जायज है।

"इस्लाम समस्त विश्व को दो भागो में बांटता है। १--दारुल इस्लाम। २--दारुल हरब। वह देश जहाँ इस्लामिक राज्य होता है,वह दारुल इस्लाम तथा जहाँ इस्लाम का राज्य नही होता वह देश कुरान के अनुसार दारुल हरब(यानि शत्रु का देश) है। कुरान के अनुसार "दारुल हरब को दारुल इस्लाम में बदलना मुसलमानों का मजहबी कर्तव्य है.
इस कार्य को करने के लिए किया गया युद्ध जेहाद कहलाता है।
जेहाद-------अनवर शेख अपनी पुस्तक "इस्लाम-कामवासना और हिंसा" में लिखते है की,"गैर इमां वालों के विरुद्ध जिहाद एक अंतहीन युद्ध है । जिसमे हिंदू, बोद्ध, ---------ईसाई, यहूदी समविष्ट है.इस सिद्धांत के अनुसार किसी भी व्यक्ति का सबसे बड़ा अपराध यह है की, वह अल्लाह पर इमां लाये जाने वाले और पूजे जाने के मोहम्मद के एकमात्र अधिकार को न माने.यह आश्चर्य पूर्ण सत्य है कि, (इस्लाम का) अल्लाह ,गैर मुस्लिमों पर आक्रमण,उनके वद्ध,उनकी लूटपाट,उनकी महिलाओं के शीलभंग और दास बनाने के कार्यों को ,जिन्हें साधारण मानव भी जघन्य अपराध मानता है,उनको सर्वाधिक पुनीत एवं पवित्र घोषित करके जिहाद के लिए मुसलमानों को घूस देता है।"

अब मुसलमानों को जब उनकी धार्मिक पुस्तक कुरान ऐसी शिक्षा देती है तो बटवारे के कारणों को ढूढना एकदम मूर्खता है ।कोन किसको दोष देता है ये तो केवल राजनितिक प्रपंच है।
अंत में एक ही बात कहना चाहूँगा कि जसवंत सिंह पूरे भारत से छमा मांगे क्यों कि वह तुच्छ मनुष्य,सरदार पटेल की पाँव की धूलि के बराबर भी नही है।

शनिवार, 15 अगस्त 2009

नाथूराम गोडसे व गाँधी ........भाग २

जैसा की पिछले भाग में बताया गया है कि गोडसे गाँधी की मुस्लिम तुस्टीकरण की निति से किस प्रकार छुब्द था अब उससे आगे के बयान ...................................

अनुच्छेद ७० का भाग ग ........................जब खिलाफत आन्दोलन असफल हो गया ----------------------------------------------इस ध्येय के लिए गाँधी अली भाइयों ने गुप्त से अफगानिस्तान के अमीर को भारत पर हमला करने का निमंत्रण दिया.इस षड़यंत्र के पीछे बहुत बड़ा इतिहास है। ----------------------------------------गाँधी जी के एक लेख का अंश नीचे दिया जा रहा है................."मै नही समझता कि जैसे ख़बर फैली है,अली भाइयों को क्यो जेल मे डाला जाएगा और मै आजाद रहूँगा?उन्होंने ऐसा कोई कार्य नही किया है कि जो मे न करू। यदि उन्होंने अमीर अफगानिस्तान को आक्रमण के लिए संदेश भेजा है,तो मै भी उसके पास संदेश भेज दूँगा कि जब वो भारत आयेंगे तो जहाँ तक मेरा बस चलेगा एक भी भारतवासी उनको हिंद से बहार निकालने में सरकार कि सहायता नही करेगा।"

अनुच्छेद ७० का भाग ........................हिन्दी के विरूद्ध हिदुस्तानी ----------------राष्ट्र भाषा के प्रश्न पर गाँधी जी ने मुसलमानों का जिस प्रकार अनुचित पक्षलिया------------------किसी भी द्रष्टि से देखा जाय तो राष्ट्रभाषा बनने का अधिकार हिन्दी को है। परंतु मुसलमानों खुश करने के लिए वे हिन्दुस्तानी का प्रचार करने लगे------------------------------यानि बादशाह राम व बेगम सीता जैसे शब्दों का प्रयोग होने लगा। ------------------------हिन्दुस्तानी के रूप में स्कूलों में पढ़ाई जाने लगी इससे कोई लाभ नही था ,प्रत्युत इसलिए की मुस्लमान खुश हो सके। इससे अधिक सांप्रदायिक अत्याचार और क्या होगा? ----------------------------------

अनुच्छेद ७० का भाग ................................न गाओ वन्देमातरम ----------------कितनी लज्जा जनक बात है की मुस्लमान वन्देमातरम पसंद नही करते। गाँधी जी पर जहाँ तक हो सका उसे बंद करा दिया। ------------------------------------------------

अनुच्छेद ७० का भाग ढ ......................................गाँधी ने शिवबवनी पर रोक लगवा दी ------------------------शिवबवनी ५२ छंदों का एक संग्रह है,जिसमे शिवाजी महाराज की प्रशंसा की गई है.---------------इसमे एक छंद में कहा गया है की अगर शिवाजी न होते तो सारा देश मुस्लमान हो जाता। ---------------------इतिहास और हिंदू धर्म के दमन के अतिरिक्त उनके सामने कोई सरल मार्ग न था।

अनुच्छेद ७० का भाग फ ..................................कश्मीर के विषय में गाँधी हमेशा ये कहते रहे की सत्ता शेख अब्दुल्ला को सौप दी जाय, केवल इसलिए की कश्मीर में मुसाल्मान अधिक है। इसलिए गाँधी जी का मत था की महाराज हरी सिंह को सन्यास लेकर काशी चले जन चाहिए,परन्तु हैदराबाद के विषय में गाँधी की निति भिन्न थी। यद्यपि वहां हिन्दुओं की जनसँख्या अधिक थी ,परन्तु गाँधी जी ने कभी नही कहा की निजाम फकीरी लेकर मक्का चला जाय।

अनुच्छेद ७० का भाग म ..............................कोंग्रेस ने गाँधी जी को सम्मान देने के लिए चरखे वाले झंडे को राष्ट्रिय ध्वज बनाया। प्रत्येक अधिवेशन में प्रचुर मात्रा में ये झंडे लगाये जाते थे. -------------------------------इस झंडे के साथ कोंग्रेस का अति घनिष्ट समबन्ध था। नोआखली के १९४६ के दंगों के बाद वह ध्वज गाँधी जी की कुटिया पर भी लहरा रहा था, परन्तु जब एक मुस्लमान को ध्वज के लहराने से आपत्ति हुई तो गाँधी ने तत्काल उसे उतरवा दिया। इस प्रकार लाखों करोडो देशवासियों की इस ध्वज के प्रति श्रद्धा को अपमानित किया। केवल इसलिए की ध्वज को उतरने से एक मुस्लमान खुश होता था।

अनुच्छेद ७८ .........................गाँधी जी -----------------------------सुभाषचंद्र बोस अध्यक्ष पद पर रहते हुए गाँधी जी की निति पर नही चले। फ़िर भी वे इतने लोकप्रिय हुए की गाँधी जी की इच्छा के विपरीत पत्ताभी सीतारमैया के विरोध में प्रबल बहुमत से चुने गए ------------------------गाँधी जी को दुःख हुआ.उन्होंने कहा की सुभाष की जीत गाँधी की हार है। -----------------जिस समय तक सुभाष बोस को कोंग्रेस की गद्दी से नही उतरा गया तब तक गाँधी का क्रोध शांत नही हुआ।

अनुच्छेद ८५ .......................मुस्लिम लीग देश की शान्ति को भंग कर रही थी। और हिन्दुओं पर अत्याचार कर रही थी। -------------------कोंग्रेस इन अत्याचारों को रोकने के लिए कुछ भी नही करना चाहती थी,क्यो की वह मुसलमानों को प्रसन्न रखना चाहती थी। गाँधी जी जिस बात को अपने अनुकूल नही पते थे ,उसे दबा देते थे। इसलिए मुझे यह सुनकर आश्चर्य होता है की आजादी गाँधी जी ने प्राप्त की । मेरा विचार है की मुसलमानों के आगे झुकना आजादी के लिए लडाई नही थी।------------------गाँधी व उनके साथी सुभाष को नष्ट करना चाहते थे।

अनुच्छेद ८८ ..........................गाँधी जी के हिंदू मुस्लिम एकता का सिद्धांत तो उसी समय नष्ट हो गया, जिस समय पाकिस्तान बना। प्रारम्भ से ही मुस्लिम लीग का मत था की भारत एक देश नही है। ------------------------------------हिंदू तो गाँधी के परामर्श पर चलते रहे किंतु मुसलमानों ने गाँधी की तरफ़ ध्यान नही दिया और अपने व्यवहार से वे सदा हिन्दुओं का अपमान और अहित करते रहे और अंत में देश दो टुकडों में बँट गया।
क्रमश

गुरुवार, 13 अगस्त 2009

नाथूराम गोडसे और गाँधी---- भाग १

नाथूराम गोडसे एक ऐसा नाम है जिसको सुनते ही लोगो के मस्तिष्क में एक ही विचार आता है कि गाँधी का हत्यारा। हमारे इतिहास में भी गोडसे का इतिहास एक ही पंक्ति में समाप्त हो जाता है। गोडसे ने गाँधी वध क्यों किया, इसके पीछे क्या कारण रहे , इन बातों का कही भी व्याख्या नही की जाती।

गोडसे ने गाँधी के वध करने के १५० कारण न्यायालय के समक्ष बताये थे। उन्होंने जज से आज्ञा प्राप्त कर ली थी कि वे अपने बयानों को पढ़कर सुनाना चाहते है । अतः उन्होंने वो १५० बयान माइक पर पढ़कर सुनाए। लेकिन कांग्रेस सरकार ने (डर से) नाथूराम गोडसे के गाँधी वध के कारणों पर बैन लगा दिया कि वे बयां भारत की जनता के समक्ष न पहुँच पायें। गोडसे के उन बयानों में से कुछ बयान क्रमबद्ध रूप में, में लगभग १० भागों में आपके समक्ष प्रस्तुत करूंगा। आप स्वं ही विचार कर सकते है कि गोडसे के बयानों पर नेहरू ने क्यो रोक लगाई ?और गाँधी वध उचित था या अनुचित।

अनुच्छेद, १५ व १६.............................."इस बात को तो मै सदा बिना छिपाए कहता रहा हूँ कि में गाँधी जी के सिद्धांतों के विरोधी सिद्धांतों का प्रचार कर रहा हूँ। मेरा यह पूर्ण विशवास रहा है कि अहिंसा का अत्यधिक प्रचार हिदू जाति को अत्यन्त निर्बल बना देगा और अंत में यह जाति ऐसी भी नही रहेगी कि वह दूसरी जातियों से ,विशेषकर मुसलमानों के अत्त्याचारों का प्रतिरोध कर सके।"-------------------------------------------------------------------"हम लोग गाँधी जी कि अहिंसा के ही विरोधी ही नही थे,प्रत्युत इस बात के अधिक विरोधी थे कि गाँधी जी अपने कार्यों व विचारों में मुसलमानों का अनुचित पक्ष लेते थे और उनके सिद्धांतों व कार्यों से हिंदू जाति कि अधिकाधिक हानि हो रही थी।" ---------------------------------
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अनुच्छेद, ६९ ..................................."३२ वर्ष से गाँधी जी मुसलमानों के पक्ष में जो कार्य कर रहे थे और अंत में उन्होंने जो पाकिस्तान को ५५ करोड़ रुपया दिलाने के लिए अनशन करने का निश्चय किया ,इन बातों ने मुझे विवश किया कि गाँधी जी को समाप्त कर देना चाहिए। "--------------------------------

अनुच्छेद,७०..भाग ख ........................"खिलाफत आन्दोलन जब असफल हो गया तो मुसलमानों को बहुत निराशा हुई और अपना क्रोध उन्होंने हिन्दुओं पर उतारा।--------------------------------"मालाबार,पंजाब,बंगाल , सीमाप्रांत में हिन्दुओं पर अत्यधिक अत्याचार हुए। जिसको मोपला विद्रोह के नाम से पुकारा जाता है। उसमे हिन्दुओं कि धन, संपत्ति व जीवन पर सबसे बड़ा आक्रमण हुआ। हिन्दुओं को बलपूर्वक मुसलमान बनाया गया,स्त्रियों के अपमान हुए। गाँधी जी अपनी निति के कारण इसके उत्तरदायी थे,मौन रहे।"-----------------------------"प्रत्युत यह कहना शुरू कर दिया कि मालाबार में हिन्दुओं को मुस्लमान नही बनाया गया।यद्यपि उनके मुस्लिम मित्रों ने ये स्वीकार किया कि मुसलमान बनाने कि सैकडो घटनाएं हुई है। ---------------------------------------------और उल्टे मोपला मुसलमानों के लिए फंड शुरू कर दिया। "-----------------
क्रमशः

मंगलवार, 11 अगस्त 2009

यहाँ देशद्रोही भी मंत्री व ..........बनते है.

सप्रग की पिछली सरकार में पेट्रोलियम मंत्री रहे मणिशंकर अय्यर का नाम तो आप सभी को याद होगा। इस सरकार में भी नेताजी मैडम के दूत बनकर जगह जगह सोनिया गान करते घूम रहे है।
मणिशंकर का चरित्र एक ऐसे राष्ट्रद्रोही का रहा है,जिसको कभी छमा नही किया जा सकता।
१९६२ में जिस समय चीन ने भारत पर आक्रमण किया था,उस समय ये नेता लन्दन में पढ़ाई कर रहा था। पूरा का पूरा देश इस आक्रमण से शोकग्रस्त था। गाँव गाँव व नगर नगर से भारतीय सैनिको के लिए धन एकत्र किया जा रहा था। परंतु लन्दन में ये देशद्रोही कुछ और ही खेल खेल रहा था। अय्यर व इसके साथी भी सैनिको के लिए चंदा एकत्र कर रहे थे किंतु वो जो धन एकत्र कर रहा था,वो भारतीय सैनिको के लिए नही बल्कि चीनी सेना के लिए धन एकत्र कर रहा था।
उसकी इस बात का नेहरू को भी पता था।क्यो कि जिस समय अय्यर का चयन इंडियन फ़ौरन सर्विस में हुआ था, तो देश की सबसे बड़ी जासूसी संस्था आई बी ने प्रधानमंत्री कारालय को एक पत्र लिखा,तथा उपरोक्त बात का हवाला देते हुए उसके चयन पर रोक लगाने को कहा। परन्तु देश के इस महान? नेता ने भी अय्यर का पक्ष लेते हुए उसके चयन को मान्यता दे दी।
यदि यही कार्य किसी और देश का व्यक्ति करता तो निश्चय ही उस देश का क़ानून उसे कड़ी से कड़ी सजा देता। परंतु एक देशद्रोही भारत में ही मंत्री व ...................................... बन सकता है।

गुरुवार, 6 अगस्त 2009

मुस्लिम चिंतन

आज भारत आजाद है?भारतीय स्वतंत्रता का इतिहास में हिंदू नेताओं के साथ साथ बहुत से मुस्लिम नेताओं को भी हमारे इतिहास में विद्द्यार्थिओं को उदार व देशभक्त बताकर पढाया जाता है। में आपको इन्ही कुछ उदार व्यक्तियों के कुछ व्यक्तत्व आपको बताऊंगा । उसके बाद निर्णय आप करे कि सावरकर को बदनाम करने वाली कांग्रेस इन लोगो के नाम पर चुप क्यो है?



सर सैयद खान .....भारतीय इतिहास में इन महाशय को एक महान व्यक्ति के रूप में पढाया जाता है। इन्ही के शब्दों में "मान लो की अंग्रेज भारत छोड़ कर चले जाय। क्या ऐसी दशा में सम्भव होगा की हिंदू और मुस्लमान समानता के आधार पर सत्तारूढ़ हो जाय ?निश्चय ही नही।...............याद रक्खो की यद्द्य्पी मुस्लमान हिन्दुओं से कम है। उन्हें कमजोर मत समझाना। कदाचित वे अकेले ही सत्ता छिनने में समर्थ होंगे। किंतु यदि ऐसा न भी हुआ तो हमारे मुसलमान पठान भाई टिड्डी दल की तरह अपने पहाडों की वादिओं से निकल पड़ेगे और हिंदुस्तान पर छा जायेंगे और पूरे देश में रक्क्त की नदियाँ बहा देंगे।"

(जान स्तेची... एडमिनिस्ट्रेशन एंड प्रोग्रेस पेज न० ५००)



"हम वो है जिन्होंने भारत पर कई शताब्दियों तक राज्य किया है। हमारी कोम उन लोगो के खून से बनी है जिनसे न केवल भारत बल्कि एशिया व यूरोप भी कापते थे। तुम जानते हो कि राज्य करना क्या होता है?"

(सर सैयद अहमद खान , प्रष्ठ..३५)

मौलाना आजाद ................"जब कभी किसी इस्लामी देश पर कोई आक्रमण करे तो उस समय प्रय्तेक मुस्लमान का कर्तव्य जेहाद हो जाता है।" (अल्हीलाल १९२१)



"इस्लामिक राजनीती अपने विकास के लिए केवल इस्लाम में एकता चाहती है। विभिन्न धर्मो के लोगो को उसमे सम्मलित करने का विचार इस्लाम के लिए पराया है। " (कन्फेदेरेसी इन इंडिया)



मोहम्मद अली जोहर ...............इन महाश्यं के नाम पर उत्तर प्रदेश का पूर्व मुख्य मंत्री मुलायम सिंह, जोहर विश्वविद्धालय कि घोषणा कर चुका है तथा कांग्रेस ने सरकारी खर्चे पर इस उदार व धर्म निर्पेक्ष की जीवनी छपवाई है। इन्ही के शब्दों में .............

"यदि अफगानिस्तान भारत पर आक्रमण करेगा तो भारत का हर मुसलमान अफगानिस्तान की सहायता करेगा।"

(मद्रास में दिए गए एक भाषण में)



"अपने मजहब और विशवास के अनुसार में एक व्यभिचारी, बलात्कारी और पतित मुसलमान को मै देवता जैसे गाँधी से भी श्रेष्ठ मानता हूँ।"

(१९२४ में अजमेर व अलीगड़ में दिया भाषण)



आर्श्चय तो यह है कि हमारा इतिहास इन तीनो को भारत का उदार, धर्म निर्पेक्ष,महान स्वतंत्रता सेनानी और भी न जाने क्या-२ लिखता है और हमारे बच्चों को ये सब पढ़ना पड़ता है।वहीं सावरकर ,लाला हर दयाल व भाई परमानन्द जैसे महान क्रांतिकारियों को सांप्रदायिक नेता कहकर इतिहास में कोई स्थान नही दिया जाता। सोनिया के नेर्तात्व वाली कांग्रेस सरकार तो वीर सावरकर को लगातार बदनाम करने par तुली है। क्या यही है भारत का धर्म्निर्पेक्ष इतिहास।