शुक्रवार, 21 अगस्त 2009

वतन पे मरने वालों का यही बाकि निशाँ होगा.

भारतीय स्वतंत्रता संग्राम में एक क्रांतिकारी थे भगवतीचरण वोहरा। भगत सिंह जी का पूरा संगठन उनको बड़ा भाई मानता था। उनकी धर्मपत्नी का नाम था दुर्गा, और यही दुर्गा इतिहास में दुर्गा भाभी का नाम पाकर अमर हो गई।
जिस समय सरदार भगत सिंह जी व उनके साथियों ने लाला लाजपत राय जी की म्रत्यु का बदला लेने के लिए दिन दहाड़े सांडर्स को गोलियों से उड़ा दिया था। तो अंग्रेज एकदम बोखला गए थे। उन्होंने चप्पे चप्पे पर क्रांतिकारियों को पकड़ने के लिए निगरानी शुरू कर दी। क्रांतिकारियों के लाहोर से निकलने में दुर्गा भाभी का योगदान अविस्मरनीय है।
उस समय भगवतीचरण वोहरा फरार थे। दुर्गा भाभी लाहोर की एक छोटी सी गली में एक मकान में रह रही थी। भगत सिंह जी की पत्नी बनकर उन्होंने भगतसिंह व राजगुरु को लाहोर स्टेशन से लखनऊ तक पहुचाया। उनके साथ उनका पुत्र शचीन्द्र भी था। राजगुरु जी उन के नोकर के रूप में थे। इसके बाद भगत सिंह व बटुकेश्वर दत्त ने दिल्ली असेम्बली में बम फैंका, और अपनी ग्रिफतारी दे दी।उसके पश्चात् जब भगत सिंह, राजगुरु व सुखदेव को फांसी की सजा हो गई तब दुर्गा भाभी,सुसीला दीदी तथा साथियों ने मिलकर जेल से भगत सिंह व साथियों को छुटाने के लिए एक योजना बनाई । इसके अर्न्तगत दिल्ली में एक छोटी सी बम फैक्ट्री बनाई गई। इसमे बने बम का परिक्षन करते हुए दुर्गा भाभी के पति वोहरा जी की मौत हो गई। पति की म्रत्यु के पश्चात् दुर्गा भाभी ने भगत सिंह को छुड़ाने का कार्य अपने हाथ में ले लिया। परन्तु दुर्भाग्य से उस बम फैक्ट्री में विष्फोट हो गया,और दुर्गा भाभी व साथियों को भूमिगत होना पड़ा।दुर्गा भाभी की सारी संपत्ति जब्त कर ली गई,किंतु वे अपने पथ पर अग्रसर होती रही। वे भगत सिंह की रिहाई के लिए गाँधी से भी मिली,किंतु कोई फायदा नही हुआ।
भगत सिंह व साथियों को फंसी लगने के बाद वे अत्यन्त दुखी हुई। उन्होंने अंग्रेजों से बदला लेने के लिए पुलिस कमिश्नर को मारने का निर्णय किया। उन्होंने अपना बच्चा अपने एक रिश्तेदार के पास छोड़ दिया। अपनी इस योजना को कार्य रूप देने के लिए वे मुंबई जा पहुची।
एक रात काली साडी पहनकर वे कमिश्नर के बंगले पर जा पहुची। क्रन्तिकारी प्रथ्वी सिंह उनके साथ थे। कुछ अंग्रेज कमिश्नर के बंगले की और से आते दिखाई दिएदुर्गा भाभी अत्यन्त आवेश व गुस्से में थी। उन्होंने तुंरत गोली चला दी। कमिश्नर उन लोगों में नही था। गोली लगने से तीन अंग्रेज घायल हो गए।वहाँ से भागकर उन्होंने तुंरत मुंबई को छोड़ दिया। काफी समय तक वो पुलिस से बचती रही। लेकिन बाद में गिरफ्तार हो गयीं। सबूतों के अभाव के कारण उनको कोई सजा तो नही हुई किंतु फ़िर भी उनको नजरबन्द रक्खा गया,तथा बाद में रिहा कर दिया गया।
उनके सभी साथी शहीद हो चुके थे। वे बिल्कुल बेसहारा हो चुकी थी। अंत में थक हारकर बैठने के बजाय वे समाज सेवा में लग गई। १९३७ से १९८२ तक वे लखनऊ में वे एक शिक्षा केन्द्र चलाती रही। उसके बाद वे गाजियाबाद में आकर बस गई। १५ ओक्टुबर १९९९ को उनका स्वर्गवास हो गया। उनकी मौत एक गुमनामी की मौत रही। उनकी शवयात्रा में देश का कोई बड़ा नेता तो नेता गाजियाबाद का भी कोई क्षेत्रिय नेता भी शामिल नही हुआ।हाँ कुछ पत्रकारों द्बारा सरकार की खिल्ली जरूर उडाई गई।

तुम सो रहे हो नोजवानो देश बिकता है,
तुम्हारी संस्कृति का है खुला परिवेश बिकता है।
सिंहासनों के लोभियों के हाथ में पड़कर ,
तुम्हारे देश के इतिहास का अवशेष बिकता है ।
पिशाचों से बचालो देश को,अभिमान ये होगा,
तुम्हारा राष्ट्र को अर्पित किया सम्मान ये होगा।

3 टिप्‍पणियां:

  1. neech itihaskaron ne durga bhaabhi jaise charitr ko ithas me uchit sthan na dekar apni neechta ka hi pradarshan kiya hai.
    mai apne va apne parivaar ki or se is virangna ko naman karti hoon.

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  2. ye gandhi or nehru pariwaar is desh ko apne baap ki baputi samjhte he,, jabki inka desh ki aajadi me sirf fita katne ke barabar ka kaam tha,,,

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