गुरुवार, 30 जुलाई 2009

स्वामी विवेकानंद का शिकागो की धर्म सभा में दिया गया भाषण

मित्रों मै बहुत समय से किसी कारण वश लेखन से दूर रहा। आज लगभग २ महीने के पश्चात कुछ लिखने बैठा तो मेरे सामने स्वामी विवेकानंद का शिकागो की धर्म सभा मे ११ सितम्बर १८९३ को दिया गया भाषण आ गया, तो सोचा कि इसके कुछ मुख्य अंश को आप सबके साथ क्यों न बाटा जाय.......................

प्रस्तुत है ...........

अमेरिकी निवासी बहनों और भाइयों

जिस अपनत्व और प्यार के साथ आपने हम लोगो का स्वागत किया है, उसके फलस्वरूप मेरा ह्रदय अकथनीय हर्ष से प्रफुल्लित हो रहा है। संसार के प्राचीन ऋषिओं के नाम पर मै आपको धन्यवाद देता हूँ । तथा सब धर्मों की मतास्वरूप हिंदू धर्म के करोड़ों हिन्दुओं की ओर से भी धन्यवाद प्रकट करता हूँ।

मै उन सज्जनों के प्रति भी धन्यवाद ज्ञापित करता हूँ,जिन्होंने इस सभामंच से पूर्व से आए प्रतिनिधियों के बारे मे ये बतलाया है कि, ये दूर देश वाले पुरूष भी सर्वत्र सहिष्णुता का भाव प्रसारित करने के निमित्त यश व गौरव के अधिकारी हो सकते है।

मुझको ऐसे धर्मावलम्बी होने का गौरव है,जिसने संसार को सहिष्णुता तथा सब धर्मो को मान्यता प्रदान करने की शिक्षा दी। हम लोग सब धर्मों के प्रति सहिष्णुता ही नही रखते वरन सब धर्मों की सच्ची बातो को ग्रहण भी करते हैं। मुझे आपसे यह कहते हुए गर्व होता है की मेरे धर्म की पवित्र भाषा संस्कृत मे अंग्रेजी शब्द एक्स्क्लुसन का कोई पर्यायवाची नही है। मुझे एक ऐसे देश का व्यक्ति होने का अभिमान है ,जिसने प्रथ्वी की समस्त पीड़ित शरणागत जातियों को तथा विभिन्न धर्मों के बहिष्कृत मतावलंबियों को आश्रय दिया है। मुझे यह बतलाते गर्व होता है कि, जिस वर्ष यहूदियों का पवित्र मन्दिर रोमन जाति के अत्याचार से धूल में मिला दिया गया,उस समय लाखों यहूदी शरण लेने दक्षिन भारत पहुंचे,और हमारी जाति ने उन्हें छाती से लगाकर शरण दी। ऐसे धर्म में जन्म लेने का मुझे गर्व है,जिसने इस्लाम की आंधी में उजड़ी पारसी जाति की रक्क्षा की और आज तक कर रहा है। ---------------------------साम्प्रदायिकता ,संकीर्णता और इनसे उत्पन्न भयंकर धर्म-विषयक उन्मत्ता इस सुंदर धरती पर बहुत समय तक राज्य कर चुके है। इनके घोर अत्याचार से प्रथ्वी भर गई इन्होने अनेक बार इस धरती को माने रक्त से सींचा,सभ्यताएं नष्ट कर दालिताथा समस्त जातियों को हताश कर डाला । अगर यह न होता तो मानव समाज आज कहीं अधिक उन्नत होता। पर अब उसका भी समय आ गया है,और मे आशा करता हूँ की जो घंटे आज सुबह इस सभा के सम्मान मै बजाये गए हैं,वे समस्त कट्टरताओं,तलवार के बल पर किए जाने वाले समस्त अत्याचारों की पारस्परिक कटुताओं के लिए म्रत्यु-नाद ही सिद्ध होंगे।



और इस दिन के बाद स्वामीजी के भाषणों की लगातार १७ दिवस तक चले विश्व धर्म सम्मलेन मै सबसे अधिक मांग होने लगी,तथा विश्व की नजरों मे दबे कुचले हिंदू धर्म व संस्कृति को विश्व के सबसे महान धर्म सबसे महान संस्कृति माना जाने लगा।

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