मंगलवार, 15 सितंबर 2009

अफजल तो फ़िर भी बच गया.

मै अपने कुछ मित्रो के साथ मेरठ से दिल्ली जा रहा था। रास्ते में समय काटने के लिए कुछ बातचीत का दौर चल पडा , तो यात्रा में केन्द्रीय सरकार के कार्यो की मीमांसा शुरू हो गई। बात शुरू हुई अफजल की,क्योकि हमने भी अफजल गुरु की फांसी के लिए कई प्रदर्शन किए थे। खूब जुलुस निकाले और खूब गला फाड़-फाड़ कर चिल्लाये भी कि अफजल को फांसी दो,फांसी दो। हुआ कुछ नही तो एक भड़ास थी मन में, निकालनी शुरू कर दी।

हमने बात को आगे बढाते हुए कहा कि,कितने साल हो गए लेकिन सरकार अफजल को फांसी नही दे रही है और अब तो सरकार ने हद कर दी है कि केन्द्र सरकार आतंकवादियों के परिवार की पेंशन बांधने जा रही है और भी बातें आगे बढ़ी। कसाब का जिक्र हुआ, सोहराबुद्दीन का हुआ। अंत में मैंने मित्रो के साथ एक निर्णय किया कि,हम भी बहरे प्रशासन व सोई हुई हिंदू जनता को जगाने के लिए कोई ऐसा कार्य करे कि हमारी बात को पूरा मीडिया जगत पूरे देश में पहुचाये।

निर्णय भी ले लिया कि भगत सिंह जी के अनुरूप हम भी तेज धमाके वाला व धुएँ वाला कोई बम फोडेंगे । जिससे कोई व्यक्ति आह़त न हो,तथा अपनी ग्रिफतारी देकर जनता को जगायंगे। अब बात थी कि बम कहाँ फोड़ा जाय, तो तय हुआ की दिल्ली तो जा रहे है क्यो न कनाट प्लेस पर ये शुभ कार्य किया जाय। अब दिल्ली पहुचकर बम की खोज शुरू हो गई। जल्दी ही दिवाली पर छोड़े जाने वाले दो पटाखे हमे प्राप्त हो गए। और कनाट प्लेस पर जाकर फोड़ डाले और इन्तजार करने लगे मीडिया का।

परन्तु एक आर्श्चय हुआ कि भारतीय पुलिस जो हमेशा घटना के काफी देर बाद पहुचती है वो मिडिया के लोगो से पहले पहुँच गई,और हमे ग्रिफतार कर लिया गया। हमने बड़ी शान से ग्रिफ्तारी भी दे दी। परन्तु थाने तक पहुचते पहुचते सारा नजारा ही बदल गया। लगता था की पूरी दिल्ली की सारी पुलिस वहां थी ,हमने सोचा कि हमारे आलावा कोई बहुत बड़ा आतंकी भी शायद इसी थाने मे है। परन्तु जो हुआ वो तो सोचा भी न था ,कि वो सारा इंतजाम तो हमारे लिए ही था।अब हमें महसूस होने लगा कि सारा मामला ही बिगड़ गया है।

पुलिस का कोई ऑफिसर हमसे पूछ रहा था कि और कहाँ कहाँ बम फोड़ने का प्लान है?कोन से आतंकवादी संगठन से जुड़े हो?तो कोई पूछ रहा था कि इससे पहले कहाँ कहाँ बम फोडे है। अफजल को फांसी दिलाने का सारा सपना चूर-चूर होता दीख रहा था। परंतु मैंने थोडी सी हिम्मत दिखायी,और पुलिस को सारा नाटक समझाया कि हम तो सोई जनता को जगाने के लिए व बहरे शासन को अपना पक्ष सुनाने के लिए सरदार भगत सिंह के रास्ते पर चलना चाह रहे है। परंतु हमारी बात किसी ने भी नही सुनी।

एक सिपाही हमारे पास आया ,बोला बबुआ कोन आतंकवादी को फोलो कर रहे हो,बड़ा साब और मंत्री जी आपके बारे में बतिया रहे है तो मंत्री जी ही कहत रह कि इ लोगन तो ससुरा बहुत बड़े आतंकी का फोलो करता है। ससुरों को कल ही फांसी पर लटकवा दो।

पता नही रात कैसे कटी ?आँख लग ही नही पायी। सुबह सुबह एक नेताजी आए हाथ में समाचार पत्र लिए हुए थे। हमारे ऊपर फैक कर मारा कि तुम हिंदू आतंकवादी बाज नही आओगे। पहले अंग्रेजो को मार रहे थे अब हमे मारना चाहते हो। हमारी कुछ भी समझ में नही आ रहा था कि हम करे तो क्या करे ? हमे न तो कोई फोन ही करने दिया गया, और न ही मीडिया से बात।

achanak केन्द्रीय सरकार भी हरकत मे आ गई। सरकार की मीटिंग हुई। मैडम जी ने सरदार को ऑर्डर दिया की, मन्नू इन आतंकवादियों को एक महीने में फांसी हो जानी चाहिए, चुनाव नजदीक है। काफी फायदा मिलेगा। मैडम के ही एक मंत्री ने कहा कि मैडम जी बुरा न मानो तो एक बात कहूं कि इन को फांसी देने के बाद हिंदू लोग अफजल के बारे में नही पूछेंगे। बैठक में एक मिनट को सन्नाटा छा गया । परंतु मैडम की जहरीली मुस्कान चेहरे पर फैली और बोली ये तो अच्छा ही है, लगे हाथ अफजल की फांसी की घोषणा भी कर देते है,मुसलमानों को ये तो कह ही देंगे की देखो हमने मुस्लिम आतंकी को फांसी देने से पहले चार हिंदू आतंकियों को फांसी पर चढाया है। बैठक में मैडम की जय जयकार होने लगी और मीटिंग समाप्त हो गई।

आर्श्चय, एक महीने में ही हमारे विरूद्ध सारे सबूत जुटा लिए गए।सारी राजनैतिक ताकत हमारे विरूद्ध खडी हो गई । समाचार पत्र से पता लगा कि हमारे बाद अफजल को भी फांसी हो रही है,तो मन में कही थोडी खुशी हुई कि चलो हमारा बलिदान ही सही लेकिन अफजल को फांसी तो हो रही है।

अब फाँसी वाला दिन भी आ गया । हमे फाँसी के तख्ते की और ले जाया जाने लगा । हम सोच रहे थे जेल के चारो और हमारी जय जयकार हो रही होगी। परंतु कोई इंसान तो इन्सान किसी जानवर कि भी आवाज नही आई। हाँ रास्ते में मिले एक दो कैदियों ने जरूर कहा कि साले चले थे भगत सिंह बनने,अब मरो।हम भी बेशर्मी से उनकी और देखते हुए निकल गए।

अब जैसे ही हमे फांसी पर लटकाया गया तो अचानक हमारी आँख खुल गई,और अपने को अपने बिस्तर पर पसीनो से लथपथ पाया। कुछ देर तो अपने को सँभालने में लगी। पर जैसे ही अपने सपने के बारे में सोचा तो बड़ा अफ़सोस हुआ कि आँख खुलने से अफजल तो साला फ़िर भी बच गया।

4 टिप्‍पणियां:

  1. साला सपने मैं भी जिन्दा रह गया ,अफजल |काश सपने मैं ही मर जाता |

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  2. इतिहास का साम्‍प्रदायिकीकरणः शिवाजी और अफ़जल खान--शिवाजी, जनता में इसलिए लोकप्रिय नहीं थे क्‍योंकि वे मुस्लिम-विरोधी थे या वे ब्राह्मणों या गायों की पूजा करते थे। वे जनता के प्रिय इसलिए थे क्‍योंकि उन्‍होंने किसानों पर लगान ओर अन्‍य करों का भार कम किया था। शिवाजी के प्रशासनिक तंत्र का चेहरा मानवीय था और वह धर्म के आधार पर भेदभाव नहीं करता था। सैनिक और प्रशासनिक पदों पर भर्ती में शिवाजी धर्म को कोई महत्‍व नहीं देते थे। उनकी जलसेना का प्रमुख सिद्दी संबल नाम का मुसलमान था और उसमें बडी संख्‍या में मुस्लिम सिददी थे। दिलचस्‍प बात यह है कि शिवाजी की सेना से भिडने वाली औरंगज़ेब की सेना नेतृत्‍व मिर्जा राजा जयसिंह के हाथ में था, जो कि राजपूत था। जब शिवाजी आगरा के किले में नजरबंद थे तब कैद से निकल भागने में जिन दो व्‍यक्तियों ने उनकी मदद की थी उनमें से एक मुलमान था जिसका नाम मदारी मेहतर था। उनके गुप्‍तचर मामलों के सचिव मौलाना हैदर अली थे और उनके तोपखाने की कमान इब्राहिम गर्दी के हाथ मे थी। उनके व्‍यक्तिगत अंगरक्षक का नाम रूस्‍तम-ए-जामां था।
    शिवाजी सभी धर्मों का सम्‍मान करते थे। उन्‍होंने हजरत बाबा याकूत थोर वाले को जीवन पर्यन्‍त पेंशन दिए जाने का आदेश दिया था। उन्‍होंने फादर अंब्रोज की उस समय मदद की जब गुजरात में स्थित उनके चर्च पर आक्रमण हुआ। अपनी राजधानी रायगढ़ में अपने महल के ठीक सामने शिवाजी ने एक मस्जिद का निर्माण करवाया था जिसमें उनके अमले के मुस्लिम सदस्‍य सहूलियत से नमाज अदा कर सकें। ठीक इसी तरह, उन्‍होंने महल के दूसरी और स्‍वयं की नियमित उपासना के लिए जगदीश्‍वर मंदिर बनवाया था। अपने सैनिक अभियानों के दौरान शिवाजी का सैनिक कमांडरों को यह सपष्‍ट निर्देश था रहता था कि मुसलमान महिलाओं और बच्‍चों के साथ कोई दुर्व्‍यवहार न किया जाए। मस्जिदों और दरगाहों को सुरक्षा दी जाए और यदि कुरआन की प्रति किसी सैनिक को मिल जाए तो उसे सम्‍मान के साथ किसी मुसलमान को सौंप दिया जाए।
    एक विजित राज्‍य के मुस्लिम राजा की बहू को जब उनके सैनिक लूट के सामान के साथ ले आए तो शिवाजी ने उस महिला से माफी माँगी और अपने सैनिकों की सुरक्षा में उसे उसके महल तक वापस पहुँचाया शिवाजी को न तो मुसलमानों से घृणा थी और न ही इस्‍लाम से। उनका एकमात्र उद्देश्‍य बडे से बडे क्षेत्र पर अपना राज कायम करना था। उन्‍हें मुस्लिम विरोधी या इस्‍लाम विरोधी बताना पूरी तरह गलत है। न ही अफजल खान हिन्‍दू विरोधी था। जब शिवाजी ने अफजल खान को मारा तब अफजल खान के सचिव कृष्‍णाजी भास्‍कर कुलकर्णी ने शिवाजी पर तलवार से आक्रमण किया था। आज सांप्रदायिकरण कर उनका अपने राजनेतिक हित साधान के लिए उपयोग कर रही हैं। सांप्रदायिक चश्‍मे से इतिहास को देखना-दिखाना सांप्र‍दायिक ताकतों की पुरानी आदत है। इस समय महाराष्‍ट्र में हम जो देख रहे हैं वह इतिहास का सांप्रदायिकीकरण कर उसका इस्‍तेमाल समाज को बांटने के लिए करने का उदाहरण है। समय का तकाजा है कि हम संकीर्ण भावनाओं से ऊपर उठें ओर राष्‍ट्र निर्माण के काम में संलग्‍न हों। हमें राजाओं, बादशाहों और नवाबों को किसी धर्म विशेष के प्रतिनिधि के तौर पर देखने की बजाए ऐसे शासकों की तरह देखना चाहिए जिनका एकमात्र उद्देश्‍य सत्‍ता पाना और उसे कायम रखना था।
    (लेखक 'राम पुनियानी' आई. आई. टी. मुंबई में प्रोफेसर थे, और सन 2007 के नेशनल कम्‍यूनल हार्मोनी एवार्ड से सम्‍मानित हैं।)
    साभार दैनिक 'अवाम-ए-हिंद, नई दिल्‍ली, बृहस्‍पतिवार 24 सितंबर 2009,पृष्‍ठ 6

    http://www.awamehind.com/
    भारत का एममात्र सेकुलर समाचार पत्र जो श्री शेष नारायण सिंह sheshji.blogspot.com की जेरे निगरानी हिन्‍दू-मुस्लिम सहित सर्व धर्म के समाचार दे

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  3. उमर कैरानवी शायद मेरे ब्लॉग पर आने के बाद
    बुद्धि सठिया गई तभी तो अफजल गुरु और
    अफजल खान में फर्क नजर नहीं आया.

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  4. उमर कैरानवी आप कौन सी दुनिया में रहते हैं वैसे तो अफजल खान हो या अफजल गुरु दोनों में अधिक अंतर नहीं है और कहाँ से मूर्खो द्वारा लिखित इतिहास पढ़ते हैं समझ से बहार की बात है. उस महानायक शिवाजी की निंदा करते हुए तनिक भी लज्जा नहीं आती जिसने अपना जीवन उन बदमाश-लुटेरो मुगलों की जड़ उखाड़ने में लगाया. वाह वाह क्या इतिहास का ज्ञान हैं तुम्हें !! जो पुस्तकें आप पढ़ते हो वो कितनी प्रमाणिक हैं ये एक बुद्धिमान व्यक्ति समझ सकता है. जिन हिन्दू लेखको की पुस्तकों का तुम प्रचार करते घूमते हो उन्ही के कारण लोग इतने भ्रमित हो चुके हैं . यदि सत्य जानना चाहते हो तो उसका ढंग से अन्वेषण करिए और हमसे भी विचार-विमर्श कर सकते हैं कौन सी पुस्तकें पठनीय हैं . अब आप ये बोलेंगे की उन पुस्तकों का प्रमाण क्या है तो उसका प्रमाण है मानव विवेक और तर्क ज्ञान अर्थात निष्पक्ष बुद्धि, यदि आप अपने विवेक और तर्क ज्ञान से अपनी बातें सिद्ध कर सकते हो तो सब लोग आपकी बात मान लेंगे और नहीं कर सकते तो आप व्यर्थ की बात मत करिये और अपने जीवन को निरर्थक बातों में नष्ट ना कीजिये क्योंकि मानव के जीवन का परम उद्देश्य सत्य के अनुसंधान के लिये है. ईश्वर आपका शुभ करे !!ॐ

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