मंगलवार, 1 दिसंबर 2009

हिंदू धर्म का पतन-राष्ट्र का पतन

आज राष्ट्र विषम परिस्थितियों से गुजर रहा है । स्थिति इतनी विनाशकारी है की कोई कल्पना भी नहीं कर सकता है। आतंकवाद ,भ्रष्टाचार , अंधविश्वास ,भाषावाद ,जातिवाद , क्षेत्रवाद, अलगाववाद , मतान्तरण , मतान्धता , गरीबी , भुखमरी , बेरोजगारी , अशिक्षा , परिवर्तित शिक्षा , असीमित मुस्लिम तुष्टिकरण आदि अनेकों समस्याओं में से कोई भी ऐसी समस्या नहीं है जो इस भारत वर्ष की भूमि पर न हो। वो राष्ट्र जिस में जन्म लेना ही भाग्यशाली माना जाता था आज उसी राष्ट्र के लोगो में अप्रवासी भारतीय बन ने की अंधी दौड़ मची है। जिस राष्ट्र में आने का और शिक्षा लेने का विदेशियों का सपना होता था आज उसी राष्ट्र के लोगो में विदेशो में पढने की होड़ लगी है। जिस राष्ट्र की भाषा और लिपि ज्ञान की पर्याय मानी जाती थी आज उसी राष्ट्र के लोग उसको लिखने बोलने में शर्म का अनुभव करते हैं, जिस राष्ट्र के लोग वेदानुसार ईश्वरोपासना, वैज्ञानिकता और यज्ञ आदि की बातें करते थे आज विभिन्न प्रकार के अंधविश्वासों,असंख्य मतों में पड़ कर मुर्ख,मतान्धता और अज्ञानता की बातें करते है, जिस राष्ट्र में कभी राम राज्य हुआ करता था आज वहीँ आतंकवाद और भ्रष्टाचार का नृशंस नंगा नाच हो रहा है जहाँ की संस्कृति में सभी को बराबर का अधिकार था आज जातिवाद और क्षेत्रवाद के नाम पर मारकाट मची है, जहाँ का इतिहास सदैव गौरवशाली वीरता भरा रहा है वहां की जनता कायरता का प्रत्यक्ष उदाहरण प्रस्तुत कर रही है जहाँ स्त्री की लज्जा उसका आभूषण होती थी आज स्वयं ही कपडे उतारने पर उतारू हो गयीं हैं। न जाने कितनी समस्याएं इस राष्ट्र को निगलती जा रही हैं पर आज के अधिकतर प्रवचनकर्ता , नेता, स्वनिर्धारित बोद्धिक लोग जनता को अहिंसा,सर्व धर्म सम्भाव, वसुदैव कुटुम्बकम, अतिथि देवो भवः सूक्तों का पाठ पढ़ाते-पढ़ाते नहीं थकते जबकि वास्तव में इन सूक्तों का अर्थ वो गलत सन्दर्भों में पेश करते हैं पर जनता भी आँखे मूँद कर विश्वास करती है जरा सा भी ये प्रयास नहीं होता की ये सूत्र हमारे शास्त्रों में किस सन्दर्भ में और क्यों लिखे गए हैं। इश्वर द्वारा रचित हमारे ही द्वारा पोषित ज्ञान को विदेशी लोगो का ठप्पा लगा कर हमें पढ़ाया जाता है। हमारे जीते हुए युद्धों को भी हार में परिवर्तित कर दिया जाता है।गीता जैसे ग्रंथो का जोकि अध्यात्मिक विधि से वीरता और साहस का पाठ पढ़ाती है उसको भी लोग कायरता के रूप में व्याखित करते हैं, मेरी समझ में ये नहीं आता की हम सब लोगो को हो क्या गया है हम किस स्वप्नलोक में जी रहे हैं शायद सोच रहे हैं की कोई आएगा और इन समस्याओं का निवारण करेगा पता नहीं लोग किस भ्रमजाल में हैं। मैं समझता हूँ आज स्थिति मुग़ल काल और ब्रिटिश राज से भी बदतर है। कम से कम उस समय लोग विरोध करते थे क्रांतियाँ चलती रहती थी किन्तु आज तो स्वयं ही अपना सब-कुछ अर्पित कर दिया है और मानसिक गुलामी की पराकाष्ठा पर पहुँच चुके हैं, सोनिया गाँधी को राज सोंपना इसका ज्वलंत उदाहरण है।महर्षि दयानंद सरस्वती ने हिन्दुओं की दुर्दशा को देखते हुए कहा था की हिन्दू एक लुप्त प्रायः वर्ग है वास्तव में उनका तात्पर्य था की हिन्दुओं जाग जाओ वरना समाप्त हो जाओगे, किन्तु उनकी चेतावनी का कोई असर नहीं दिखता लोग तो गाँधी -नेहरु सरीखे लोगो के ही दीवाने हैं, पिछले ६० वर्षों से और विशेषतः कुछ २ दशक से एक ऐसा चमत्कारी शब्द जिसने हिन्दुओं को अनेक बार ठगा है पर फिर भी लोग इसके दीवाने हैं और इसके मोहजाल से निकल ही नहीं पाते हैं वो शब्द है सेकुलर, सेकुलर शब्द का अपना इतिहास है पर संक्षिप्त में यह है की जब यूरोप में चर्च का पॉप राज चलता था और इसाईओं के अतिरिक्त मान्यताओं का पूर्णतयः बहिष्कार था तब लम्बे युद्धों के बाद उस पॉप राज के विरोध में एक शासन आया जो की सेकुलर था मतलब की चर्च के अन्यायी पॉप राज के विरुद्ध में सेकुलर राज स्थापित हुआ। भारत में इस शब्द का अत्यधिक प्रचार नेहरु काल से आरम्भ हुआ और अब तक चमत्कारी ढंग से अपना कार्य कर रहा है। भारतीय दर्शन या हिन्दू दर्शन अथवा वैदिक या सनातन धर्म में न की केवल गैर हिन्दुओं भारतियों को वरन सभी विश्व के मानवों को एक ही द्रष्टिकोण से देखा जाता है इस कारण यहाँ सभी के लिए न्यायिक विधि एक ही रहती है और किसी को भी भेदभाव की द्रष्टि से नहीं देखती है यहाँ पर कभी भी पॉप की तरह राज नहीं रहा है वो बात अलग है मध्य में कुछ राजा धूर्त लोगो के जाल में फंस कर कुछ गलत कार्य कर गए किन्तु हमारे प्रमाणित धर्मं शास्त्रों में कोई भी इस तरह की बात नहीं लिखी है आज आतंकवाद सहित सभी समस्याओं के मूल में हमारा अपने इतिहास और धर्मं शास्त्रों से हट कर अंधविश्वास में लिप्त होना ही है। यदि आप इस कारण पर गौर करेंगे तो इसको निराधार नहीं मानंगे। होता क्या है जब भी हम धर्मं शास्त्रों की बातें करते हैं तो अधिकतर लोग सोचते हैं की पूजा,भस्म, कमंडल आदि की बात करने जा रहे हैं या फिर अपने में और सब में भगवान् देखो कुछ इस तरह की बातें करने वाला होगा या अहिंसा का पाठ पढ़ने की बात करंगे। जबकि वास्तविकता कुछ और ही स्पष्ट करती है। यदि कोई पुस्तक ये कहती है की मांस खाना, बलि देना , मदिरापान करना वेदों में लिखा है तो लोग उसका बिना सोचे समझे अनुसरण करने लगते हैं। आज बहुत से लोग ऐसे भी मिल जायेंगे जो यज्ञो में बलि देते हैं, शराब को प्रसाद में बांटते हैं और धार्मिक क्रियाकलापों में मांस आदि का भक्षण करते हुए मिल जायेंगे। उनसे पूछे जिस लेखक की पुस्तक उन्होंने पढ़ी है क्या वो विद्वजनों के मध्य प्रमाणिक भी है क्या वो लेखक उस कोटि का है भी जिसकी बातें अविरोध मान लिया जाये बल्कि हमारे न्याय शास्त्र में स्पष्ट लिखा है की जब तक वादी-प्रतिवादी होकर न्याय नहीं किया जाये तब तक सत्यासत्य का निर्णय नहीं हो सकता मतलब प्रमाणों के द्वारा सत्य सिद्ध नहीं किया जाये तब तक उसको निर्विवाद सत्य नहीं मन जा सकता। सभी आप्त पुरुष अपनी बातों को प्रमाण द्वारा समझाते हैं तो ऐरे-गिरे की बात ही क्या करें। कालांतर में हमारे धर्म शास्त्रों के नाम पर सैकडों-हजारों पुस्तके लोगो ने अपने को प्रिसिद्ध और विद्वान घोषित करने के लिए लिख डाली ये कार्य ऐसा नहीं की अभी हुआ है ये कार्य तो महाभारत काल के पश्चात् से ही आरम्भ हो गया था। मैं इस बात को किसी आधार पर ही कह रहा हूँ यदि कोई मेरी बात से सहमत नहीं है तो प्रतिवाद कर तर्क-वितर्क के द्वारा सत्य का निर्धारण कर सकता है ।आप गूगल इमेज में जा कर Hindu Sadhu लिख कर सर्च करिए आपको राख मले हुए, उट-पटांग आसन करते हुए, त्रिशूलधारी मैले -कुचैले कपड़े पहने हुए या और भी जंगली तरह के लोगो की तस्वीरें ढेरो मिल जाएँगी क्या ये ही है हमारा हिन्दू धर्मं यदि ये ही स्वरुप है तो उनसे लाख बेहतर कोई इंसान ईसाई या मुस्लिम होना अधिक पसंद करेगा। ये लोग मूर्खो के अलावा कोई और नहीं है और ये हिन्दू होने का गलत अर्थ दुनिया के सामने प्रस्तुत कर रहे हैं । इनसे यदि धर्म की बातें करोगे तो इन्हें अ ब स कुछ पता नहीं होता बस कुछ इन्ही के जैसे द्वारा लिखित अप्रमाणिक पुस्तकों पर ये विश्वास करते हैं या फिर अपने को ज्ञानी बताने का ढोंग करते घूमते हैं। गूगल पर हिन्दू भगवान से सर्च करिए तो राम कृष्ण शिव विष्णु आदि के साथ - साथ कितने ही सारे बाबा और और गुरु भगवान के नाम से संबोधित होते हैं। अधिकतर आजकल सभी गुरु अपने को भगवान बोलते हैं और अपने को चेलो से पुजवाते हैं और आश्चर्य जनक रूप से लाखो-करोड़ो लोग इन बाबाओं और गुरुओं को भगवान मान कर पूजते हैं।मैं यहाँ कुछ प्रश्न उठाना चाहूँगा की १।कौन से प्रमाणिक ग्रन्थ में ये लिखा है की इस तरह का रूप भरने से इश्वर की प्राप्ति होती है? २.क्या मनुष्य भगवान होता है ? मनुष्य को भगवान् मानने का चलन आदि शंकराचार्य से प्रारंभ हुआ है किन्तु शंकराचार्य ने किसी परिस्थितिवश और उपनिषदों में ईश्वर उपासना की द्रष्टि से सब जगत को इश्वर के रूप में देखने के लिए कहा है अन्यथा वहां भी इश्वर को जगत को उपादान न मानते हुए निमित्त या प्रेरणाकार कहा है जैसे मनुष्य के किसी भी कार्य करने के लिए एक संकल्प शक्ति विद्यमान होती है मतलब यदि गहराई से सोचो तो उदाहरण के तौर पर मुझे एक गिलास पानी पीना है तो मैं जब उठ कर चल कर पानी नहीं लूँगा तो पानी अपने आप मेरे पास नहीं आएगा तो उठने, चलने और पानी पीने के पीछे वो संकल्प शक्ति ही विद्यमान है जिसके कारण मैं अपने शरीर की आवश्यकता पूर्ण करता हूँ। कहने का तात्पर्य इतना है की जगत भी उस इश्वर की संकल्प शक्ति और प्रकृति से ही बना है और उसीकी शक्ति से अपने उपादान कारण प्रकृति में लीन हो जाता है। ईश्वर कभी जगत में परिवर्तित नहीं होता यदि ये मान लिया जाये तो वह परिणामी हो जायेगा और ये सर्वविदित है चेतन परिणामी नहीं होता। ये जगत हमेशा से विद्यमान है अभी व्यक्त है और महाप्रलय में अव्यक्त हो जायेगा किन्तु कभी सर्वथा नष्ट नहीं होता जैसे कोई ये कहे बिल में सांप नहीं था और उसमें से सांप निकल आया तो ये संभव नहीं है क्योंकि अभाव से किसी की उत्पत्ति नहीं होती इसीलिए जगत निर्माण की सामग्री हमेशा से ही इस ईश्वर में उपस्थित रहती है ईश्वर स्वयं उसमें परिवर्तित नहीं होता। आत्मा भी चेतन है अनादी है अंतरहित है अल्पज्ञ है और संख्या की द्रष्टि से असंख्य हैं किन्तु ईश्वर एक है सर्वज्ञ है अनादी है अनंत है आकाश की तरह सर्व व्यापक है जिस प्रकार आकाश भिन्न रहते हुए भी सबमें उपस्थित रहता है एक परमाणु भी रिक्त नहीं है उस आकाश से उसी प्रकार उस आकाश से भी सूक्ष्म,अखण्ड और विराट ईश्वर भिन्न रहते हुए भी उस आकाश सहित सबमें उपस्थित रहता है जभी वो तो सबका नियंता होता है। मैंने यहाँ प्रसंग वश संक्षिप्त में इस बारे में इसलिए लिखा है कि हिन्दू , आर्य या सनातन दर्शन इतना व्यापक और वैज्ञानिक है कि आप सोच भी नहीं सकते और हम राख मलने वालो , नंगे साधुओं, चालाक प्रवचनकर्ताओं (अधिकतर) को भगवान् मान कर पूजते हैं और वो ही उनका उद्देश्य होता है।इस अन्धविश्वास से हमें निकल कर हमें अपने सत्य धर्म वैज्ञानिकता का पालन करना चाहिए और अपने राष्ट्र को अन्धकार से निकाल के विश्व के भले के लिए फिर से विश्वगुरु बनने कि राह पर अग्रसर होना चाहिये। जब मनुष्य अंधविश्वासों से निकलेंगे और ज्ञान का प्रचार होगा तो आधी समस्यायें स्वतः ही समाप्त होंगी और हिन्दू इस अंतहीन जातिवाद समस्या से निकल कर साहसी, स्वाभिमानी, निर्भीक, न्यायिक, पुरुषार्थी और राष्ट्रवादी बनेगा और थोपा हुआ गलत इतिहास बदला जायेगा, स्वः घोषित भगवानो या अपने को पुजवाने वालो को तिरस्कार या दण्ड मिलेगा और मनुष्यता या हिन्दू अथवा सनातन वैदिक धर्म का उत्थान होगा विश्व में शांति स्थापित होगी।

रचनाकार --- सौरभ अत्रे

8 टिप्‍पणियां:

  1. जब मनुष्य अंधविश्वासों से निकलेंगे और ज्ञान का प्रचार होगा तो आधी समस्यायें स्वतः ही समाप्त होंगी और हिन्दू इस अंतहीन जातिवाद समस्या से निकल कर साहसी, स्वाभिमानी, निर्भीक, न्यायिक, पुरुषार्थी और राष्ट्रवादी बनेगा और थोपा हुआ गलत इतिहास बदला जायेगा, स्वः घोषित भगवानो या अपने को पुजवाने वालो को तिरस्कार या दण्ड मिलेगा और मनुष्यता या हिन्दू अथवा सनातन वैदिक धर्म का उत्थान होगा विश्व में शांति स्थापित होगी।

    sundar lekh

    उत्तर देंहटाएं
  2. आपके विचारों से मैं शत प्रतिशत सहमत हूँ. मैं पूरे देश की बात कर रहा हूँ, जिसमें सभी धर्म-सम्प्रदाय के लोग शामिल हैं. दरअसल अब पढने यानी अध्ययन पर कोई ध्यान नहीं देता. और धर्म, वो तो जन्मजात मिल गया है, उसके बारे में ज्ञान प्राप्त करने की जरूरत ही क्या है ! एक हज़ार वर्ष तक गुलाम रहे हैं हम, इस गुलामी का असर ६२ वर्षों में जाने से रहा. आज भी हम खद्दरधारियों के गुलाम हैं. उनकी विजय पर खीसें निपोरते हैं, उनकी पराजय हमारा दिल टुकड़े टुकड़े कर देती है. नेहरु-गाँधी को कोसने से कुछ नहीं होने वाला. हम अपने व्यवहार-आचरण में सुधार करें, फिर परिजनों को इस ओर उन्मुख करें, फिर मित्रों को, फिर....!!!बूँद बूँद से शायद घट भर जाये. कहना बहुत चाहता हूँ मित्र, लेकिन पहले मैं स्वयं में सुधार तो पैदा कर लूं.

    उत्तर देंहटाएं
  3. sarwat ji mai aapke veechaaron ko naman karta hoon.agar sabhi muslim ki soch yahi ho jaaye,ki hindustaan me musalmaan bahar se nahi aaye,ve bhi 1000 varsh se hinduon ki tarah se gulaam hain to hindu muslim ki samasa hi samapt ho jaayegi.

    उत्तर देंहटाएं
  4. ye secular mansikta hai jisne desh ki aisi ki taise maar rakhi hai

    उत्तर देंहटाएं
  5. jo bhi tark ewam dalile aapne di hain...we wishay se bilkul aprastut najar aati hain...kehana padega ki kamse kam mere tark se to ye sab pare hain !! jin samasyaao ka ullekh aapne kiya hai...ye to pichhle samay me bhi hua karti thi ! kewal fark itna hai k astr shastr me huyi pragati ko dhyaan me rakhte hue inka wiksit rup hum dekh rahe hain..! par lekh k liye jo wishay naam aapne chuna hai...in sab chizo ka hal nahi balki aapke wichaaro ka bhatkaaw nazar aata hai !!!

    उत्तर देंहटाएं
  6. @krishna yadav
    aap ko bhatkaaw nazar aata hai tabhi to ye heading hai ki हिंदू धर्म का पतन-राष्ट्र का पतन
    app ki tarraki ki baat kar rahen hai
    every third kid in india is hungry (WHO)

    उत्तर देंहटाएं
  7. हिंदू धर्म का पतन-राष्ट्र का पतन

    The wholly truth by my friend. You spoke what I wanted to so I provided a link to my blog
    arya.blog.co.in

    उत्तर देंहटाएं