मंगलवार, 12 नवंबर 2013

१४ नवंबर नेहरू के जन्म दिन पर विशेष 


हमें नेहरुओं के बारे में कुछ नई सूचनाएं प्राप्त हुई हैं, जिसे हम
पाठकों को  बताना चाहते हैं। हम आप को सूचित कर चुके हैं कि जवाहर के
पितामह यानी दादा का नाम गंगाद्दर कौल था। मुगल राज्य में गंगाद्धर पुलिस
अधिकारी  था। वह नहर के किनारे रहता था, इसीलिए इस परिवार ने नेहरू नाम
धारण कर लिया। ऐसा बताया जाता है।
अब सूचना मिली है कि गंगधर नकली नाम था। जवाहर का पैतृक पितामह वास्तव
में मुगलवंशीय था। तब उसने कश्मीरी हिंदू नाम क्यों धारण किया? हमें जो
कारण बताए गए हैं, वे निम्नलिखित हैं,
1857 के गदर में अंग्रेज सभी जगह सभी मुगलों को कत्ल कर रहे थे। ताकि
भारतीय साम्राज्य का कोई दावेदार न बचे। उस समय हिंदू अंग्रेजों के
निशाने पर नहीं थे। जब तक कि, किसी विशेष परिस्थिति में, पिछले संबंधों
के कारण, कोई हिंदू मुगलों का पक्ष लेते हुए न पाया जाए। यही कारण था कि
मुसलमानों द्वारा हिंदुओं का नाम अपनाए जाने का उस समय चलन हो चुका था।
इसी कारण से, मालूम होता है कि, गंगाधर नाम भी किसी मुसलमान ने, अपनी जान
बचाने के लिए धारण कर लिया।
अपने आत्मचरित्र वर्णन में जवाहरलाल लिखता है कि उसने अपने पितामह का
मुगल राजवंशीय वेशभूषा में बना चित्र देखा था। अपने संस्मरण में जवाहर की
दूसरी बहन कृष्णा हथीसिंह ने लिखा है कि 1857 के गदर के पूर्व गंगाद्दर
दिल्ली का शहर कोतवाल था। लेकिन पूरी छानबीन करके लिखे गए अभिलेख
‘‘बहादुर शाह द्वितीय और 1857 का दिल्ली का गदर’’ महदी हुसेन लिखित, (
1987 का प्रकाशन, प्रकाशक एमएन प्रकाशन, डब्लू-112 ग्रेटर कैलाश भाग 1,
नईदिल्ली) के अनुसार 1857 के गदर के आसपास कार्यरत नगर कोतवाल दिल्ली का
नाम फैजुल्ला खान था। उसकी नियुक्ति नगर राज्यपाल और कोतवाल मिर्जा
मनीरुद्दीन के स्थान पर हुई थी। मिर्जा मनीरुद्दीन पर अंग्रेजों का जासूस
होने का आरोप था। इसी कारण से उसे सुल्तान ने नौकरी से निकाला था और
राज्यपाल का पद भी समाप्त कर दिया था। उस समय नायब कोतवाल श्री भाव सिंह
और लाहौरी गेट के थानेदार श्री काशीनाथ थे। गंगाधर नाम के व्यक्ति का
उपरोक्त अभिलेख में कहीं पता नहीं है। स्पष्टतः यह विषय किसी सुयोग्य
इतिहासकार द्वारा जांच करने के योग्य है।
1857 में दिल्ली पर कब्जे के बाद अंग्रेजों ने सारा दिल्ली खाली करा
लिया। दिल्ली के बाहर लोगों को छोलदारियों में रहना पड़ा। प्रत्येक घर की
अच्छी तरह तलाशी ली गई। जिसमें अकूत द्दन मिला। इसे अंग्रेजों ने जब्त कर
लिया। दिल्ली के बाहरी भागों की भी अंग्रेजों ने तलाशी ली। जो भी मुगल
मिला उसे अंग्रेजों ने मार डाला ताकि दिल्ली सिंहासन का कोई दावेदार न
बचे। लगभग दो माह बाद हिंदुओं को अपने घरों में वापस जाने की अनुमति दी
गई। बाद में मुसलमानों को अपने घरों में वापस जाने की अनुमति मिली।
19वीं सदी के उर्दू साहित्यकारों, विशेषकर ख्वाजा हसन निजामी के साहित्य
में, उस समय की मुगलों और मुसलमानों के दुखदायी जीवन परिपाटी का उल्लेख
मिलता है। साहित्यकारों ने यह भी बताया है कि किस प्रकार अपनी जान बचाने
के लिए मुगल और मुसलमान शहरों को छोड़ कर भाग रहे थे। जवाहर लाल ने भी
अपने आत्मचरित्र में लिखा है कि मुगलों से प्रभावित स्थान आगरा जाते हुए
रास्ते में अंग्रेजों ने मुगलवेशभूषा के कारण उसके दादा यानी पितामह के
परिवार को रोक लिया था। लेकिन कश्मीरी पंडित कहने पर उसके पितामह को जाने
दिया था। इस उद्धरण से इस बात को बल मिलता है कि हो न हो फैजुल्ला खान ही
गंगाद्दर कौल बन गया था। कुछ काल पहले राजकीय पद के लिए मुगल बताने के
लिए कश्मीर का सम्बन्द्द जोड़ा जाता था फिर हिंदू बताने के लिए कश्मीर का
सम्बन्द्द जोड़ा जाने लगा।
श्री टी.एल. शर्मा अपने गंभीर खोजपूर्ण लेख ‘‘हिंदू-मुस्लिम रिलेशन’’
पृष्ट 3-से-5 ( बी.आर. पब्लिशिंग कार्प, 29/9 शक्तिनगर, दिल्ली 7, 1987)
में मसीर उल उमारा के अद्दिकार से लिखते हैं,
‘‘मुगलकाल में अभारतीय वंशज का इतना महत्व था कि उच्च सरकारी पदों के लिए
विदेशी मूल के होने का झूठा प्रमाण गढ़ा जाता था। बहुधा वे कश्मीरी
लड़कियों से निकाह करते थे ताकि उनका रूपरंग तुर्कों और इरानियों के
वंशजों की भांति दिखाई दे।’’ ( आज, इस्लामी पाकिस्तान और बंगलादेश में
उच्च पदाधिकारी मुसलमान स्वयं को अरब मूल का बताते हैं।)
इस प्रकार फैजुल्ला खान ने अपना झूठा नाम ‘गंगाधर कौल’ रख लिया। नेहरू
शब्द भी प्रश्न पैदा करता है। यदि नेहरू उपाधि परशियन शब्द नहर के कारण
पड़ा तो वहां के अन्य निवासियों ने यह उपाधि  क्यों नहीं धारण किया?
मोतीलाल ने ही इस नाम को क्यों चुना?
ऐसा प्रतीत होता है कि दिल्ली से भागने के पश्चात मोतीलाल ने अपना
सम्माननीय पारिवारिक नाम ‘कौल’ छोड़ कर नेहरू रख लिया। जिससे इस परिवार के
वैवाहिक संबन्द्द कश्मीरी पंडितों से होने लगे। फिर भी यह महत्वपूर्ण बात
है कि इस परिवार के सभी नजदीकी संबंध  मुसलमानों से ही रहे। यहां तक कि
उनका खानसामा भी मुसलमान ही रहा। इतना ही नहीं नेहरू वंश हिंदुओं के साथ
असंतुष्टि अनुभव करते हैं। विशेषकर जवाहरलाल को हिंदू और हिंदी से विशेष
नफरत थी। फिर भी इस खान वंश को पूरे भारत में कश्मीरी पंडित कहा जाता है!
जो जवाहरलाल नेहरू यज्ञोपवीत नहीं पहनता था, संस्कृत की कौन कहे हिंदी तक
को पढ़ नहीं सकता था, इस देश के मूर्ख ब्राह्मण उसके पीछे लग गए। जब इस
देश की संस्कृति के सिरमौर ही उसके पीछे लग गए तो जो होना था हुआ। देश
बंटा और कंगाल हो गया। वैदिक संस्कृति मिट गई। इंदिरा के जवाहरलाल की
पुत्री होने पर भी संदेह है। जिसकी चर्चा हम आगे करेंगे। ऐसा प्रतीत होता
है कि जवाहर लाल और इंदिरा दोनो अपने मुगल वंश के होने से परिचित थे।
सोनिया तक आते आते यह परिवार न तो मुगलवंशी रहा और न अंग्रेज ही रहा।
क्या   कारण है कि मुगल वंशीय इतिहास को दिल्ली में सुरक्षित रखा गया है।
मुगलों के नाम पर सड़कें हैं। नेशनल कौंसिल आफ एजुकेशनल रिसर्च एंड
ट्रेनिंग  यानी एनसीईआरटी मुगलकाल की आज भी प्रशंसक है। प्रसंगवश बता दें
कि 1947 के पूर्व की ऐतिहासिक पुस्तकें गुप्त काल को भारत का स्वर्णयुग
बताती हैं।
तत्कालीन भारत के पूर्व विदेशमंत्री नटवर सिंह ने इंदिरा के मुगलों से
संबन्‍ध  पर एक महत्वपूर्ण रहस्योद्घाटन किया है। अपनी पुस्तक ‘प्रोफाइल
एंड लेटर्स’, प्रकाशक स्टर्लिगं पब्लिशर्स, एल 10 ग्रीनपार्क एक्सटेंशन,
दिल्ली 16, में, जिसका निचोड़ दैनिक हिंदुस्तान टाइम्स संस्करण, नवंबर 16,
1997, में छपा था , श्री नटवर सिंह लिखते हैं कि तत्कालीन प्रधानमंत्री
इंदिरा सरकारी यात्रा पर 1968 में अफगानिस्तान गई थी। नटवर सिंह भारत के
विदेश मंत्रालय के विशेष नियुक्ति के कारण उनके साथ थे। दिन भर के ब्यस्त
कार्यक्रम के बाद इंदिरा सायं घूमना चाहती थी। कार में लंबे यात्रा के
बाद इंदिरा ने बाबर के कब्र को देखना चाहा। यह वीरान स्थान था। इंदिरा
बाबर के कब्र के पास गई। सम्मान में कब्र के सामने कुछ मिनटों तक सिर
झुकाया और मौन रही।
याद रखिए! बाबर मुगलवंश का संस्थापक था। यह यात्रा उसके कार्यक्रम में
उल्लिखित नहीं थी। अतः अफगान अधिकारियों ने इंदिरा को मना भी किया।
इंदिरा फिर भी नहीं मानी। इंदिरा ने नटवर सिंह से कहा कि आज हमने अपने
इतिहास को तरोताजा किया है। इसमें संदेह नहीं कि यदि इंदिरा गांधी
प्रधानमंत्री रहती तो अयोध्या के बाबरी मस्जिद कांड में मुलायमसिंह से
दसगुना अधिक नरसंहार हुआ होता, उसी प्रकार जिस प्रकार हरमंदर साहिब मंदिर
में 1984 में हुआ। याद रखें! गोरक्षा की मांग करने वाले संतों पर 7
नवंबर, 1966 को गोली इसी खूंखार औरत ने चलवाई थी।
इंदिरा का पुत्र राजीव गांधी , यद्यपि भारतीय या विदेशी इतिहास का जानकार
नहीं था, तथापि उसे मुगलवंशी होने पर काफी गर्व था। यद्यपि वह कहा करता
था कि उसका केाई निजी धर्म नहीं है और उसकी पत्नी कैथोलिक ईसाई है, तथापि
वह ब्यवहार में इस्लामी था। 15 अगस्त 1988 को उसने लाल किले के प्राचीर
से ललकारा था, ‘‘हमारा प्रयत्न इस देश केा 250 से 300 वर्ष पूर्व के काल
की बुलंदियों तक ले जाने के लिए होना चाहिए।’’ यही वह काल था जब जजिया
विशेषज्ञ औरंगजेब कत्ल किए गए हिंदुओं के सवा मन यज्ञोपवीत तौलने के बाद
ही पानी पीता था और मंदिर तोड़ने में जिसे महारत हासिल थी।
मोतीलाल-वैश्यालय मालिकः
मोती और लाल शब्‍दों का मतलब है। मोतीलाल का नाम नरायनदास या मदन मोहन
अथवा उस प्रकार का कोई और नहीं था। मोतीलाल में पंथनिरपेक्षता का बीज
पहले ही बोया गया था, जो कश्मीर की इस्लामिक उपज थी और ( वास्तव में जब
भी उपयुक्त लगा) उसने मिथ्या अपने ब्राह्मण होने का दंभ किया।
मोतीलाल अधिक पढ़ा लिखा नहीं था। कम उम्र में विवाह कर वह जीविका के लिए
इलाहाबाद ( अल्लाह के शहर) आ गया। हमें यह पता नहीं कि निश्चित रूप से वह
उस समय इलाहाबाद में कहां बसा। फिर भी हम विश्वास नहीं करते कि उसके बसने
की जगह वह मीरगंज रही होगी, जहां तुर्क और मुगल अपहृत हिंदू महिलाओं को
अपने मनोरंजन के लिए रखते थे। ( यहीं उर्दू की उत्पत्ति हुई)। हम ऐसा कह
रहे हैं क्यों कि अब हम अच्छी तरह जानते हैं कि मोतीलाल अपने दूसरे पत्नी
के साथ मीरगंज के रंडियों के इलाके में रहा। ( हम यह नहीं जानते कि
मोतीलाल दूसरी पत्नी को सचमुच ब्याह के लाया था अथवा दुराचार के लिए भगा
कर लाया था।)
पहली पत्नी पुत्र पैदा होने के समय मर गई। पुत्र भी मर गया। उसके तुरंत
बाद मोतीलाल कश्मीर लौट गया, वहां उसे गरीब परिवार की अत्यंत सुंदर उसकी
तथाकथित पत्नी मिली जिसे वह इलाहाबाद ले आया। वह मीर गंज में बस गया।
मोतीलाल ने सहायक जीविका के रूप में वैश्यालय चलाने का निश्चय किया।
क्यों कि उसके पास जीविका का अन्य साधन नहीं था। जो भी हो किसी का अपनी
(दूसरी नई पत्नी के साथ भी) वैश्याओं के मुहल्ले में रहना और अपने बच्चों
को वहीं पालना सुने? तो उसका मतलब क्या लगाएगा? हम शीघ्र ही  देखेंगे कि
जवाहर, मोतीलाल का दूसरा लड़का(?), जो जीवित बचा, बहुत दिनों तक उस मीरगंज
में पाला नहीं गया। लेकिन उसकी दोनों बहनों का विकास व पालन पोषण उसी
मीरगंज में वर्षों तक होता रहा।
दिन के समय मोतीलाल इलाहाबाद कचहरी में ‘मुख्तार’, जो वकील से छोटा पद
होता था, का कार्य करता था। उन दिनों मुख्तार को भी उच्च न्यायालय में
वकालत की अनुमति थी। फिर भी, इससे मोतीलाल की आय बहुत अल्प थी।
उसी उच्च न्यायालय में, एक प्रसिद्ध कानूनी सलाह देने वाला अन्य वकील भी
था। वह शिया मुसलमान मुबारक अली था। उसकी वकालत खूब चलती थी। इशरत मंजिल
नाम का उसका बड़ा मकान था। यह भी बताना आवश्यक है कि उस समय इलाहाबाद में
दो  इशरत मंजिल थे। दूसरे इशरत  मंजिल का मालिक अकबर इलाहाबादी था। इससे
डाक इधर-उधर  हो जाती थी। मुबारक अली का इशरत  मंजिल बाद में मोतीलाल को
बेच दिया गया; जिसका नाम बदल कर ‘आनन्द भवन’ हो गया। अब इसे ‘स्वराज्य
भवन’ कहा जाता है और राष्‍ट्र  की धरोहर है।
मेातीलाल मुबारक से मिलाः
शाम को, मोतीलाल अपनी वकालत के बाद घर लौटता था। अधिकतर, वह मीरगंज के
वैश्याओं के इलाके के अपने निवास में पैदल आता था। मुबारक अली, अन्य धनी
मुसलमानों की भांति, मौज मस्ती के लिए मीरगंज आता रहता था। मुबारक अपनी
बग्गी में आया करता था। मोतीलाल सदा मुबारक से संबंध  बनाना चाहता था और
एक शाम ऐसा हुआ कि मुबारक ने, जब वह न्यायालय परिसर में अपने बग्गी में
सवार हो रहा था, इस फटी पैंट पहने हिंदू को देखा। विनम्रता से  मोबारक ने
उसे अपनी बग्गी में बैठने के लिए पूछा। दोनों ही, वास्तव में, विभिन्न
कारणों से मीरगंज जा रहे थे, अतः मोतीलाल बग्गी में सामने बैठ गया।
इच्छुक मोतीलाल को स्पष्ट हो गया कि मोबारक अली किसी खूबसूरत वैश्या के
साथ रात बिताना चाहता था। मोतीलाल ने अपनी नई नवेली सुंदर पत्नी के साथ
मुबारक को रात बिताने का निमंत्रण दिया। सौदा पट गया। और इस प्रकार
मुबारक और मोतीलाल इसके पश्चात् बहुधा  साथ-साथ मीरगंज आते थे।
मुबारक ने मोतीलाल को अपने कानूनी कार्यालय में छोटी नौकरी करने का
निमंत्रण दिया। कश्मीरी पंडित ने कामुक मुसलमान के यहां, जो अब उसका
मालिक था, नौकरी कर ली। काफी समय बाद मोतीलाल ने अपना कार्यालय ले लिया।
अनुवादक की टिप्पणीः और यहीं से पंथनिरपेक्षता की नींव पड़ी।
इटावा और अमेठी की विधवाः
इसके बाद के कुछ वर्षों में काफी कुछ घटा। इटावा का राजा निःसंतान मर
गया। ब्रिटिश कानून के अनुसार निःसंतान विधवा की सम्पत्ति ब्रिटिश  सरकार
की हो जाती थी। अतः विधवा को अपनी संपत्ति गवांनी पड़ती। विधवा मुबारक अली
से अपने मुकदमे की पैरवी कराने के लिए आई।
मुबारक ने यह कार्य मोतीलाल को सौंपा। उसने पीछे से कार्य किया। मुबारक
के आदेश  पर मोतीलाल रानी (स्वर्गीय राजा इटावा की विधवा) से मिला और
बताया कि मुबारक आप के केस लड़कर जीत सकते हैं। उसने मुबारक की फीस बताई।
यह पांच लाख रूपए थी (उस समय के लिए एक बड़ी रकम)। असहाय रानी ने देना
स्वीकार किया। रकम मुबारक अली और मोतीलाल में बराबर बंट गई। लेकिन निचली
अदालत में मुबारक अली और मोतीलाल रानी का मुकदमा हार गए। अविचलित, दोनों
ने ऊपरी अदालत में रानी के मुकदमे को लड़ने की घोषणा की। फीस फिर 5 लाख
रूपए तय हुई जिसे दोनों ने बराबर बराबर बांट लिया। वे उच्च न्यायालय में
भी मुकदमा हार गए।
चतुर मुबारक ने मुकदमे को प्रीवी कौंसिल लंदन लड़ने की सलाह दी। इस बार
रानी को लंदन आने जाने का ब्यय और बैरिस्टर की फीस भी देनी पड़ी। मुबारक
ने उच्च कोटि का बैरिस्टर नियुक्त किया। बैरिस्टर ने अपने बहस मे बताया
कि राजा के मृत्यु के पूर्व रानी गर्भवती थी। इस कार्य के लिए एक उचित
लड़का ढूंढ़ लिया गया और अदालत को बताया गया कि यही राजा का लड़का है और
रानी उसकी मां है। इस बार मुकदमा जीत लिया गया और रानी ने अपने मृतक पति
के राज्य के स्वामित्व को बचा लिया।
इसी बीच मोतीलाल की पत्नी गर्भवती हो गई। एक सुहावने प्रातः अपने भारी
पांव लिए मोतीलाल के साथ गंगा स्नान को गई। एक सन्यासी ने उन्हें देखा और
मोतीलाल को एक किनारे ले जा कर झिड़का कि उसने जिस गर्भ को ठहरने दिया है
वह भारत को बर्बाद  कर देगा। उसने मोतीलाल को गर्भ को जहर देने की सलाह
दी, ताकि गर्भ नष्ट हो जाए। पत्नी दूरी के कारण सारी बात तो न सुन सकी
परंतु जहर शब्‍द  सुन लिया। मोतीलाल पत्नी के पास झाड़ सह कर वापस आया और
पत्नी को समझाया कि सन्यासी ने लड़के का नाम जवाहर रखने के लिए कहा है। यह
पता नहीं कि भावी मां ने, चिरस्थाई झूठे मोतीलाल की बात का विश्वास किया
या नहीं।
मोतीलाल ने अपने मालिक मुबारक से उसके निवास इशरत मंजिल में भावी संतान
के जन्म के लिए अनुरोध किया। मुबारक ने ऐसा नहीं होने दिया। मुबारक ने
माना कि बच्चा उसी का है। लेकिन वह अपने घर में इसका जन्म नहीं होने
देगा। शरीयत के अनुसार वर्णसंकर का भी संपत्ति पर उतना ही अधिकार  है
जितना अपनी संतान का। मुबारक ने जच्चा बच्चा का खर्च वहन करना स्वीकार
किया और अंत में बच्चा जवाहर मीरगंज के वैश्यालय में ही पैदा हुआ। जैसे
ही जवाहर प्रधान  मंत्री बना उसने वह मीरगंज का मकान ही गिरवा दिया और
अफवाह फैलाया कि जवाहर आनंद भवन में पैदा हुआ था। याद रखिए उसके जन्म समय
में कोई आनन्द भवन नहीं था। उस समय वह इशरत मंजिल ही था। लेकिन भारत में
परेशानी में डालने वाले प्रश्न कोई नहीं पूछता। इसी प्रकार तथाकथित गैर
मुसलमान राजीव के पिता का क्या नाम था? अथवा क्यों इंदिरा व फिरोज ने
शपपथपत्र द्वारा अपने नाम गांधी  रख लिये? अथवा कैसे जवाहर की मृत्यु छूत
यानी संक्रमण की बीमारी सूजाक यानी आत्यक रोग से हुई, जिससे वह मरा? क्या
ऐसा किसी से हाथ मिलाने से हो गया या खुले में मुंह पोंछने से हो गया?
किसी ने नहीं पूछा।
मुबारक का संबंध  बड़े प्रभुत्‍वशाली  मुसलमानों से था। अवध के नवाब ने
बच्चे जवाहर की वैश्यालय में परवरिश का विरोध  किया और अपने महल में
परवरिश  के लिए कहा। इस प्रकार बालक जवाहर ने जन्म के शीघ्र  बाद ही
मीरगंज छोड़ दिया और राजमहल में रहने व परवरिश के लिए आ गया। जवाहर राजमहल
में दस वर्ष की उम्र तक रहा। इसके बाद पढ़ने के लिए लंदन चला गया। मोतीलाल
ने तब तक इतना पैसा कमा लिया था कि अपने जवाहर की पढ़ाई पर ब्यय वहन कर
सकता था।
नवाब के बगल में खड़े जवाहर की आदमकद  तस्वीर लखनऊ के पास महल के पहले
मंजिल में लगी थी। नवाब के महल में परवरिश  के कारण ही जवाहर गर्व से
कहता था कि उसकी परवरिश विदेश में हुई, इस्लाम के तौर तरीके से उसका
विकास हुआ और हिंदू तो वह दुर्घटनावश ही था!
मीरगंज के वैश्यालय में दो बच्चों का और जन्म हुआ था। दोनों लड़कियां थीं।
यह पता नहीं कि क्या वे भी मुबारक की नाजायद संतानें थीं? शायद हां और
नहीं भी। लेकिन तब मोतीलाल, एक सिद्ध मनचले ऐय्याश, के भी दो नाजायज
संतानें शेख अब्दुल्ला और सयूद हुसेन, जो उसकी बेटी विजया लक्ष्मी को भगा
ले गया था, थीं। यही वह कारण था जिसने मोतीलाल को हुसेन और विजयालक्ष्मी
को शादी करने से रोका था। प्रेमी हुसेन के साथ भाग जाने के बाद दोनों कुछ
दिन साथ रहे थे। यही कारण है कि विजया लक्ष्मी की पहली बेटी चंद्रलेखा की
सूरत हुसेन से मिलती है जो उसका पिता था न कि आर. एस. पंडित से। किसी को
भी चंद्रलेखा, नयनतारा और रीता की सूरतों  को मिलाने से यह पता लग जाएगा
कि बाद की दोनों लड़कियां ही पंडित की हैं पहली चंद्रलेखा नहीं।
छलिया जवाहर लालः
जवाहर लाल एक अलग तरह का बैरिस्टर बना। टिनिटी  कालेज में उसका मुख्य
विषय वनस्पति विज्ञान था। उस समय, मोहम्मद अली जिन्नाह, एक अन्य शिया
मुसलमान, निवास व कार्यालय मुंबई के मलाबार हिल्स में, रहता था। उसकी
वकालत खूब चलती थी। सदा के ज्‍वलनशील  जवाहर ने अपना कार्यालय वहीं खोला।
उसकी वकालत नहीं चली। एक दिन जवाहर को अपने महिला कर्मचारी को, अपने ही
कार्यालय में, जो पारसी थी, छेड़ने के कारण पुलिस ने गिरफ्तार कर लिया।
सेसन अभिलेखागार, मुंबई में  आज भी वे कागजात सु‍रक्षित हैं। मोतीलाल भाग
कर मुंबई गया और अपने हद  और प्रभाव का प्रयोग कर जवाहर को छुड़ा कर
इलाहाबाद ले आया। जवाहर की वकालत खत्म हो गई। वह राजनीति करने लगा। यहां
यह बता दूं कि जवाहर की एक से दस वर्ष तक की कोई तस्वीर उपलब्‍ध  नहीं
है। इस दौरान वह नवाब के महल में रहा। मोतीलाल के वैश्यालय में नहीं।
तस्वीर बनाना इस्लाम में निषिद्ध है। दस वर्ष  के हो जाने के बाद वह
विलायत चला गया। दोनों बहनों को जवाहर से कुछ लेना देना नहीं था। बहनों
के बचपन की बहुत तस्वीरें हैं परंतु जवाहर की एक भी नहीं। जवाहर के खर्च
का बड़ा भाग मुबारक ने दिया था। मोतीलाल के पास तब इतने पैसे नहीं थे।
इटावा के विधवा रानी की कृपा से मोतीलाल के पास काफी पैसा आ गया।
विधूर  जवाहर से ईसाई बच्चे का जन्मः
जैसा बाप वैसा बेटा बल्कि बाप से आगे ही। जवाहर ने अपने भारत के प्रधान
मंत्रित्व का पूर्ण फायदा उठाया। जवाहर की सुंदर औरतों की तलाश  और
आधीरात में गुप्त समागम अंदर खाने सबको अच्छी तरह पता लग गई। जवाहर ने एक
हिंदू नन को गर्भवती कर दिया। उसे अस्पताल नहीं भेजा गया बल्कि
वैरागिनियों की कुटी यानी ननरी में भेजा गया। क्यों कि अस्पताल भेजने पर
लोगों को मालूम हो जाता। यही कारण है कि ईसाइयों को पंथनिरपेक्ष भारत में
विशेष दर्जा प्राप्त है। ताकि वे अपने ओठ सिले रखें और जब चाहें ब्लैक
मेल कर सकें। विधूर जवाहर के पुत्र को भारत के बाहर एक अच्छा ईसाई जार्ज
बनाने के लिए भेज दिया गया। लेकिन यह कोई नई बात नहीं है। भारत पर सदा ही
शासन जारजों का रहा और आज भी है। इसे आप जवाहर के निजी सचिव कैथोलिक ईसाई
मथाई की पुस्तकों, माई डेज विथ नेहरू और नेहरू युग की स्मृतियां से पढ़
सकते हैं।
जवाहर, झूठाः
सदावहार झूठा नेहरू, जो लाउडस्पीकर पर लालकिले की प्राचीर से दिल्ली चलो
और जै हिंद का नारा लगाता था, अपने आफिस में आते ही क्लिमेंट एटली,
तत्कालीन ब्रिटिश  प्रधानमंत्री, को पत्र लिखवाता था, कि वह स्टालिन पर
नेता जी को सौंपने के लिए, जिन्होंने ब्रिटिश  साम्राज्य के विरुद्ध
युद्ध घोषित  कर दिया था, दबाव डाले। ताकि नेता जी पर अभियोग चलाया जा
सके।
ज्यों ही श्यामा प्रसाद मुखर्जी को, अपने मुस्लिम डाक्टर से जहर की सुई
लगवा कर, शेख अब्दुल्ला ने कश्मीर में मरवा दिया, जवाहर लंदन से तुरंत उड़
आया और मुखर्जी जी की निजी डायरी अपने कब्जे में ले ली और उनकी दुखिया
मां को बार बार के गुहार पर भी कभी नहीं लौटाई।
यद्यपि नेहरू को इसका प्रतिकार भी मिला। जिस व्यक्ति को भाग्य ने 15
अगस्त 1947 के रात्रि में सत्ता के सर्वोच्च स्थान पर बिठाया, वह, जैसा
वे बताते हैं, दिल का दौरा पड़ने से नहीं, बल्कि सूजाक की बीमारी से मरा।
और मुझ पर भरोसा कीजिए, यह बीमारी किसी अल्पाहारालाय के लोटे में के पानी
पीने से नहीं हुई।

पुस्तक नेहरू खान वंश
मानव रक्षा संघ प्रकाशन
अनुवादकः अयोध्या प्रसाद त्रिपाठी
मूल लेखक: अरविंद घोष

5 टिप्‍पणियां:

  1. पंडितजवाहर लाल नेहरु अगर कश्मीर का था तो आज कहाँ गया कश्मीर में वो घर आज तो वो कश्मीरमें कांग्रेस का मुख्यालय होना चाहिए जिस प्रकार आनंदभवन कांग्रेस का मुख्यालय बना हुआ है इलाहाबाद में….

    आज तो वो घर हर कांग्रेसी के लिए तीर्थ स्थान घोषित हो जाना चाहिए

    ये कहानी इतनी पुरानी भी नहीं है की इसके तथ्य कश्मीर में मिल न सकें ….आज हर पुरानी चीज़ मिल रही है ….चित्रकूट में भगवन श्री राम के पैरों के निशान मिले,लंका में रावन की लंका मिली, उसके हवाई अड्डे, अशोक वाटिका, संजीवनी बूटी वाले पहाड़ आदि बहुतकुछ….समुद्र में भगवान श्री कृष्ण भगवान् द्वारा बसाईगई द्वारिका नगरी मिली ,करोड़ों वर्ष पूर्व की DINOSAUR के अवशेष मिले तो 150 वर्ष पुरानाकश्मीर में नकली नेहरू काअस्तित्व ढूंढना क्या कठिन है ?????दुश्मन बहुत होशिआर है हमें आजादी के धोखे में रखा हुआ है,

    इस से उभरने के लिए इनको इन सब से भी बड़ी चुस्की पिलानी पड़ेगी जो की मेरेविचार से धर्मान्धता ही हो सकती है जैसे गणेश को दूध पिलाया था अन्यथा किसी डिक्टटर को आना पड़ेगा या सिविल वार अनिवार्य हो जायेगा

    तो क्या सोचा हम नेहरू को कौनसे नाम से पुकारे ? 
    जवाहरुद्दीन या चाचा नेहरू ? 
    जो नेहरू नेहरू कहते है उनसे पूछिये की इस खानदानके अलावा भारत मे और कोई नेहरू क्यूँ नहीं हुआ ?
    अगर यह वास्तवमे ब्राह्मण था तो ब्राह्मनों मे नेहरू नाम की गोत्र अवश्य होनी चाहिए थी ?
    क्यूँ नहीं ? 
    क्यों देश मे और कोई नेहरू नहीं मिलता?
    क्या ये जवाहर लाल के परिवार वाले आसमान से टपके थे ?""

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  2. ये लेख शुद्ध बकवास है, और लेखक नेहरू जी के व उनके परिवार के प्रति गलत पूर्वाग्रहों से पीड़ित है.

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    1. pandey ji jis pustak se yh lekh liyaa gyaa hai .....vo bajaar me upasthit hai........kintu aaj tak 20 sal baad bhi kisi congresi neta ne us pr mukadma nahi kiya...............esaa kyo?

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  3. Ara madarcood log moslman log tumara maa yar hi usko galat bolta ho madarcood hindo nam thuma moslman na dea hindustan nam moslman na dea ar hindustan ke ajade ma hamara ve lau bha smjha re harame gai ka mas ka ra kamena

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    1. abe chutiye teri gand kyu fat ri ha bhosdike sach sun k bawra ho gaya kya

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