शनिवार, 31 अक्तूबर 2009

पाँव में चुभने लगे .

देश पर चर्चा चली तो,प्रश्न भी उठने लगे।
शर्म से चेहरे हमारे,बेतरह झुकने लगे॥ १

आँधियों के पाँव में तो,बेडियाँ डाली नही।
दीपकों से रोशनी के,वायदे करने लगे॥२

होंसले लेकर चले थे,रहबरों के साथ हम।
वे रास्ते ही रहबरों के पाँव में चुभने लगे॥ ३

जब उजालों से रही,पहचान न बिल्कुल कोई।
जुगनुओं की रौशनी को,रौशनी कहने लगे॥४

तारीख लिखेगी तुम्हारे कर्म की हर दास्ताँ।
सर कटाकर किस तरह, मगरूर तुम रहने लगे॥५

की है तरक्की आदमी ने इस कदर, है अब तलक।
लड़ते थे जो कि पत्थरों से ,बारूद से लड़ने लगे॥६

रचनाकार ---मेरे पिता श्री देवेन्द्र सिंह त्यागी







3 टिप्‍पणियां:

  1. अति सुन्दर, श्री देवेन्द्र सिंह त्यागी तो उच्च स्तर के महान रचनाकार प्रतीत होते हैं, सबसे बड़ी बात है वो आज के समय की मांग के अनुसार उसके अनुरूप लिख रहे हैं.

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  2. आँधियों के पाँव में तो,बेडियाँ डाली नही।
    दीपकों से रोशनी के,वायदे करने लगे॥२

    baRii baat kahi hai..mai bhi सौरभ आत्रेय ji se sahmat hun

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