सोमवार, 20 दिसंबर 2010

दिग्विजय सिंह इसाई है,(digvijay is a converted christian)



दिग्विजय सिंह के तेवर हिन्दुओं के विरुद्ध कुछ ज्यादा ही गर्म हो रहे हैं।कोई भी नहीं समझ पा रहा है कि वो ऐसा क्यों कर रहा है। अगर इस बात को सत्य माना जाय कि दिग्विजय हिन्दू ही नहीं है ( http://en.wikipedia.org/wiki/Digvijay_Singh_(politician)
(Digvijay Singh was born in the royal family of Raghogarh principality, in Guna district of Madhya Pradesh. He is a rajput also known popularly as Diggi Raja.He studied at the Daly College, Indore, a private school established in 1882. During his school days he was an outstanding sportsman. He was a member of the school team in cricket, hockey and soccer. He represented Central Zone schools in cricket, and also played hockey and football at the college level.He also excelled in squash, and was the Central India champion at the junior level for six years from 1960 to 1966.He also held national ranking in this game.[clarification needed].He is a converted christian.)


तब इसका अंदाजा स्यवं ही लगाया जा सकता है।क्यों कि इसाई बनने के बाद हिंदुत्व को गाली गरियाकर ही दिग्विजय पुत्तर सोनिया मम्मी के दुलारे बनेंगे।

शुक्रवार, 17 दिसंबर 2010

गणित विद्या और शून्य का आविष्कार

सभी यह जानते हैं कि गणित में शून्य और दशमलव का आविष्कार भारत ने किया है किन्तु यह आंशिक सत्य है क्योंकि गणित विद्या का मूल(कारण) वेदों में है जिसमें न केवल शून्य से लेकर ९ तक सभी प्राकृतिक अंको का वर्णन है वरन अंक गणित, बीज गणित और रेखा गणित सभी गणित विद्या के ३ आधार ईश्वर ने हमको दिये हैं। बहुत से लोग यह मानते हैं आर्य भट्ट ने शून्य का या दशमलव का आविष्कार किया था जोकि गलत है क्योंकि यह तो पहले से ही वेदों में है, आर्य भट्ट निश्चित तौर पर एक महान गणितज्ञ थे इसमें कोई सन्देह नहीं है किन्तु प्राकृतिक संख्याओं के निर्माण का विज्ञान मानव ज्ञान से बहार की बात है। मैं यहाँ वेदों के मन्त्र तो नहीं लिख रहा हूँ किन्तु उनमें से उधृत कुछ एक बातों को लिख रहा हूँ प्रमाण के तौर पर।

अंक, बीज और रेखा भेद से जो तीन प्रकार की गणित विद्या सिद्ध की जाती है , उनमें से प्रथम अंक(१) जो संख्या है, सो दो बार गणने से २ की वाचक होती है। जैसे १+१=२। ऐसे ही एक के आगे एक तथा एक के आगे दो, वा दो के आगे १ आदि जोड़ने से ९ तक अंक होते हैं। इसी प्रकार एक के साथ तीन(३) जोड़ने से चार (४) तथा तीन(३) को तीन(३) के साथ जोड़ने से ६ अथवा तीन को तीन गुणने से ३ x ३ = ९ होते हैं।

इसी प्रकार चार के साथ चार , पाञ्च के साथ पाञ्च, छः के साथ छः, आठ के साथ आठ इत्यादि जोड़ने वा गुणने तथा सब मन्त्रों के आशय को को फ़ैलाने सब गणितविद्या निकलती है। जैसे पाञ्च के साथ पाञ्च (५५) वैसे ही छः छः इत्यादि जान लेने चाहियें। ऐसे ही इन मन्त्रों के अर्थो का आगे योजना करने से अंकों से अनेक प्रकार की गणित विद्या सिद्ध होती है। क्योंकि इन मन्त्रों के अर्थ और अनेक प्रकार के प्रयोगों से मनुष्यों को अनेक प्रकार की गणित विद्या अवश्य जाननी चाहिये ।
और जो कि वेदों का अंक ज्योतिषशास्त्र कहाता है (आज का कथित फलित ज्योतिषशास्त्र नहीं), उसमें भी इसी प्रकार के मन्त्रों के अभिप्राय से गणितविद्या सिद्ध की है और अंकों से जो गणित विद्या निकलती है , वह निश्चित और संख्यात पदार्थों में युक्त होती है। और अज्ञात पदार्थों की संख्या जानने के लिये बीजगणित होता है , सो भी अनेक मन्त्रों से सिद्ध होता है। जैसे (अ + क) (अ-क) (अ ÷ क) (अ x क) इत्यादि संकेत से निकलता है । यह भी वेदों से ही ऋषि-मुनियों ने निकला है। (अग्न आ०) इस मन्त्र के संकेतों से भी बीज गणित निकलता है।

और इसी प्रकार से तीसरा भाग जो रेखागणित है सो भी वेदों से ही सिद्ध होता है। अनेक मन्त्रों से रेखागणित का प्रकाश किया है। यज्ञ-वेदी के रचने में भी रेखा गणित का भी उपदेश है। पृथ्वी का जो चारो ओर घेरा है, उसको परिधि और ऊपर से अन्त तक जो पृथ्वी की रेखा है उसको व्यास कहते हैं। इसी प्रकार से इन मन्त्रों में आदि मध्य और अन्त आदि रेखाओं को भी जानना चाहिये और इस रीति से त्रियक् विषुवत रेखा आदि भी निकलती हैं

(कासीत्प्र०) अर्थात यथार्थ ज्ञान क्या है ? (प्रतिमा) जिससे पदार्थों का तोल किया जाये सो क्या चीज़ है ? (निदानम्) अर्थात कारण जिससे कार्य उत्पन्न होता है , वह क्या चीज़ है (आज्यं) जगत में जानने के योग्य सारभूत क्या है ? (परिधिः०) परिधि किसको कहते हैं ? (छन्दः०) स्वतन्त्र वस्तु क्या है ? (प्रउ०) प्रयोग और शब्दों से स्तुति करने के योग्य क्या है ? इन सात प्रश्नों का उत्तर यथावत दिया जाता है (यद्देवा देव०) जिसको सब विद्वान लोग पूजते हैं वही परमेश्वर प्रमा आदि नाम वाला है।
इन मन्त्रों में भी प्रमा और परिधि आदि शब्दों से रेखागणित साधने का उपदेश परमात्मा ने किया है। सो यह ३ प्रकार की गणित विद्या के अनेक मन्त्रों से आर्यों ने वेदों से ही सिद्ध की है और इसी आर्य्यावर्त्त देश से सर्वत्र भूगोल में गयी है।

गणित के साथ-२ समस्त विश्व के ज्ञान का आधार वेद ही हैं इसमें सन्देह नहीं करनी चाहिये। वेदों के नाम पर बकवासबाजी लिखने वालों पर न जाकर सत्य से अवगत होना चाहिये उदाहरण के तौर पर आज कल ज्योतिषशास्त्र के नाम पर जो धन्धा चल रहा है उसका वैदिक पुस्तकों में कहीं वर्णन नहीं है वो स्वार्थी और मुर्ख लोगो ने खड़ा किया है जिसको अनजाने में बहुत लोग मानते हैं जबकि सत्य यह है कि मनुष्य अपने कर्मो के आधार पर ही अपने भविष्य का निर्माण करता है न कि काला कपड़ा, दाल, तेल आदि अन्धविश्वास भरे दान देने से। वेदों से आधार लेकर ही महान ऋषियों ने अनेक प्रकार की विद्या सिद्ध की है।

आज राष्ट्र की स्तिथि अच्छी नहीं है, हमें हमारी जड़ों से हमें काटा जा रहा है, हमारे स्वाभिमान पर निरन्तर आघात किये जा रहे हैं इसीलिए हमें अपने धर्म के मूल से परिचित अवश्य होना चाहिये जिसको जानने से हमें ज्ञान और स्वाभिमान आएगा और हम राष्ट्र-सेवा के लिये उठ खड़े होंगे। हमारा मूल धर्म ज्ञान-विज्ञान के साथ-२ राष्ट्र-सेवा की प्रबल प्रेरणा देता है उसका विरोधी नहीं है इसीलिए भी समस्त राष्ट्र-विरोधी शक्तियां हमारे धर्म को निशाने पर रखती हैं।

कितने ही विश्व के लोग और मत कुछ पुस्तकों को ईश्वरीय पुस्तक मानते हैं जबकि उनमें अनेक साक्षात् प्रमाण हैं अवैज्ञानिकता के, मूर्खता के, धूर्तता के और भी अतार्किक बाते हैं किन्तु फिर भी उन मतों के लोग उन पुस्तकों के प्रचार में दिन-रात एक किये हुए हैं, बड़े-२ संगठन बनाये हुए हैं, युद्ध लड़ रहे हैं, पैसा बहा रहे हैं कि हमारी पुस्तक को ईश्वरीय मानो उसका अनुसरण करो वरना तुम्हारी खैर नहीं. और दूसरी तरफ सनातन हिन्दू वैदिक धर्म समस्त मानव जाति के कल्याण के लिये है उसमें किसी भी प्रकार का भेद-भाव नहीं है किसी प्रकार का दोष नहीं है किसी प्रकार की भी अवैज्ञानिकता नहीं है कोई अतार्किकता नहीं है जो सृष्टि के कण-२ से लेकर अखिल ब्रह्माण्ड का ज्ञान देता है, समस्त विद्याएं जिससे निकली हैं और उसका कोई प्रवर्तक कम से कम कोई मनुष्य भी नहीं है यह तो हम सभी जानते ही हैं इस सबके बावजूद भी इसको ईश्वरीय मानने में हम लोग ही सन्देह करते हैं कैसा विरोधाभास है

शनिवार, 11 दिसंबर 2010

साम्यवादी क्रान्ति के सूत्रधार लेनिन भी वीर सावरकर के घोर प्रशंसक थे.






भारत की संसद में जब वीर सावरकर के चित्र की प्रतिस्थापना की गयी तो उस समय के सारे कोंग्रेसी सांसद सोनिया मैनो के नेर्तत्व में तथा सारे कम्युनिष्ट सांसद समारोह का बहिष्कार करके चले गए थे। केवल मात्र सोमनाथ चटर्जी ही राजग के सांसदों के साथ संसद में उपस्थित थे।

वीर सावरकर मात्र एक सशस्त्र क्रांतिकारी ही नहीं वरन एक युगद्रष्टा थे। युगद्रष्टा के साथ साथ वे एक राष्ट्र स्रष्टा भी थे। वे विश्व क्रांतिकारिता के सूत्रधार और व्यवस्थापक भी थे। उनकी वीरता,धीरता व पांडित्य और कुशल नेत्रत्व को देखकर पूरा विश्व चकित था। साम्यवादी क्रांति के सूत्रधार लेनिन भी वीर सावरकर की विलक्षणता के अत्यधिक प्रभावित थे।

जब रूस के क्रांति की प्रष्ट भूमि तैयार हो रही थी,तब लेनिन रूस से जाकर वीर सावरकर के पास जाकर इंग्लेंड में इण्डिया हाउस में छिपे थे।लेनिन अपने अज्ञात वास में वीर सावरकर से रोज घंटों भावी अर्थव्यवस्था पर विचार-विमर्श करते थे। रुसी क्रान्ति सफल हो जाने के पश्चात लेनिन ने अपने प्रथम बजट में वीर सावरकर का आदर सहित उल्लेख किया। उसके पश्चात लेनिन सावरकर से तीन बार और मिले। दोनों के बीच वैचारिक सम्बन्ध लम्बे समय तक रहा।

रुसी क्रान्ति अभिलेखों में सावरकर को विश्व का महानतम क्रांतिकारी कहा गया है। लेकिन कम्युनिष्ट अपने कुलगुरु लेनिन पर वीर सावरकर द्वारा किये गए उपकार को बिलकुल भूल चुके हैं, इसे इन लोगों की सावरकर के प्रति क्रत्य्घ्नता की कहा जाएगा।

शुक्रवार, 5 नवंबर 2010

हिन्दू धर्म के बिना भारत का कोई भविष्य नहीं है .


डॉ० एनी बेसेंट का हिन्दू धर्म को कोसने वालों के मूह पर तमाचा
भूलिये नहीं ! हिन्दू धर्म के बिना भारत का कोई भविष्य नहीं है। हिन्दू धर्म वह भूमि है जिसमे भारत की जड़े गहरी जमी हुई हैं और यदि इस भूमि से इसे उखाड़ा गया तो भारत वैसे ही सूख जायेगा जैसे कोई वृक्ष भूमि से उखाड़ने पर सूख जाता है। भारत में अनेक मत,संप्रदाय और वंशों के लोग पनप रहे हैं,किन्तु उनमे से कोई भी न तो भारत के अतीत के उषा काल में था, न उनमे कोई राष्ट्र के रूप में उसके स्थायित्व के लिए अनिवार्यत: आवयशक है।
यदि आप हिन्दू धर्म छोड़ते है तो आप अपनी भारत माता के ह्रदय में छुरा घोंपते हैं।यदि भारत माता के जीवन-रक्त स्वरुप हिन्दू धर्म निकल जाता है तो माता गत-प्राण हो जाएगी। आर्य जाती की यह माता ,यह पद्भ्रष्ट जगत -सम्राज्ञी पहले ही आहत क्षत-विक्षत ,विजित और अवनत हुई है। किन्तु हिन्दू धर्म उसे जीवित रखे हुए है,अन्यथा उसकी गर्णा म्रतों में हुई होती।
यदि आप अपने भविष्य को मूल्यवान समझते हैं, अपनी मात्रभूमि से प्रेम करते हैं,तो अपने प्राचीन धर्म की अपनी पकड़ को छोडिये नहीं,उस निष्ठां से अलग मत होइए जिस पर भारत के प्राण निर्भर हैं। हिन्दू धर्म के अतिरिक्त अन्य किसी मत की रक्त -वाहिनिया ऐसी स्वर्ण सी ,ऐसी अमूल्य नहीं हैं,जिनमे आध्यात्मिक जीवन का रक्त प्रवाहित किया जा सके।
परन्तु एक धोखा है --
-- एक वास्तविक और भारी धोखा --- कि भारत से कभी हिन्दू धर्म का लोप न हो जाए ,
नए -पुराने के झगडे में कहीं हिन्दू धर्म ही नष्ट न हो जाए। यदि हिन्दू ही हिन्दू धर्म को न बचा सके तो और कोन बचाएगा ? यदि भारत की संतान अपने धर्म पर अडिग नहीं रही तो कोन उस धर्म कीरक्षा करेगा ?भारत और हिन्दू धर्म एक रूप हैं। मै यह कार्य भार aapko de रही हूँ,कि हिन्दू धर्म के प्रति निष्ठावान रहो,वही आपका सच्चा जीवन है। कोई भ्रष्ट मत या विकृत धर्म अपने कलंकित हाथों से आपको सोंपी गयी इस पवित्र धरोहर को स्पर्श न कर सके।
( hindu jeevanaadarsh prashth ..135-136)

गुरुवार, 12 अगस्त 2010

भारत का स्वाधीनता यज्ञ और हिन्दी काव्य

"हिमालय के ऑंगन में उसे, प्रथम किरणों का दे उपहार।"


“जगे हम लगे जगाने विश्व, देश में फिर फैला आलोक,
व्योम तम पुंज हुआ तब नष्ट, अखिल संस्कृति हो उठी अशोक।”

परिवर्तन की जीवंत प्रक्रिया सतत् प्रवहमान है। संहार के बाद सृजन, क्रांति के बाद शांति और संघर्ष के बाद विमर्श का सिलसिला मानव के अन्तर्वाह्य जगत में चलता रहता है। मनुष्य का असन्तोष से भरा जीवन आजन्म संधर्ष की स्थिति को झेलता रहता है, लड़ाइयाँ लड़ता है, नयी व्यवस्था के निर्माण के लिए पुरानी व्यवस्था पर आघात करता है, इसी द्वन्द्व की स्थिति में वह जीता मरता रहता है। भारतीय स्वतन्त्रता संग्राम की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि के निर्माण में व्यक्ति की यही संधर्षशील चेतना कार्यरत है। गुलामी के बन्धन को तोड़कर उन्मुक्त होने की कामना ने 1857 में क्रान्ति की नयी जमीन को खोज निकाला। इस क्रान्ति महायज्ञ में प्रथम आहुति देने वाले बलिया जनपद के हलद्वीप गाँव के ब्राह्यण कुलोत्पन्न पंडित मंगल पाण्डेय ने 8 अप्रैल 1857 को अपनी शहादत से स्वतन्त्रता का प्रथम दीप जलाया।

आजादी को लेकर देश में व्याप्त उथल-पुथल को हिन्दी कवियों ने अपनी कविता का विषय बनाकर साहित्य के क्षेत्र में दोहरे दायित्व का निर्वहन किया। स्वदेश व स्वधर्म की रक्षा के लिए कवि व साहित्यकार एक ओर तो राष्ट्रीय भावों को अपनी कविता का विषय बना रहे थे वही दूसरी ओर राष्ट्रीय चेतना को हवा दे रहे थे। कवि व साहित्यकार अपनी उर्वर प्रज्ञा भूमि के कारण युगीन समस्याओं के प्रति अधिक सावधान व संवेदनशील रहता है। स्वतन्त्रता आंदोलन के आरम्भ से लेकर स्वतन्त्रता प्राप्ति तक भिन्न-भिन्न चरणों में राष्ट्रीय भावनाओ से ओत-प्रोत कविताओं की कोख में स्वातन्त्र्य चेतना का विकास होता रहा। 'विप्लव गान' शीर्षक कविता में कवि की क्रान्तिकामना मूर्तिमान हो उठी है।

''कवि कुछ ऐसी तान सुनाओ, जिससे उथल-पुथल मच जाये
एक हिलोर इधर से आये, एक हिलोर उधर को जाये
नाश ! नाश! हाँ महानाश! ! ! की
प्रलयंकारी आंख खुल जाये।
-नवीन

भारतेन्दु युग का साहित्य अंग्रेजी शासन के विरूद्ध हिन्दुस्तान की संगठित राष्ट्रभावना का प्रथम आह्वाहन था। यही से राष्ट्रीयता का जयनाद शुरू हुआ। जिसके फलस्वरूप द्विवेदी युग ने अपने प्रौढ़तम स्वरूप के साथ नवीन आयामों और दिशाओं की ओर प्रस्थान किया। भारतेन्दु की 'भारत दुर्दशा' प्रेमघन की आनन्द अरूणोदय, देश दशा, राधाकृष्ण दास की भारत बारहमासा के साथ राजनीतिक चेतना की धार तेज हुई। द्विवेदी युग में कविवर 'शंकर' ने शंकर सरोज, शंकर सर्वस्व, गर्भरण्डारहस्य के अर्न्तगत बलिदान गान में 'प्राणों का बलिदान देष की वेदी पर करना होगा' के द्वारा स्वतन्त्रता प्राप्ति के लिए क्रान्ति एवं आत्मोत्सर्ग की प्रेरणा दी। 'बज्रनाद से व्योम जगा दे देव और कुछ लाग लगा दे' के ओजस्वी हुंकार द्वारा भारत भारतीकार मैथिलीषरण गुप्त ने स्वदेश-संगीत व सर्वश्रेष्ठ सशक्त रचना भारत-भारती में ऋषिभूमि भारतवर्ष के अतीत के गौरवगान के साथ में वर्तमान पर क्षोभ प्रकट किया है। छायावादी कवियों ने राष्ट्रीयता के रागात्मक स्वरूप को ही प्रमुखता दी और उसी की परिधि में अतीत के सुन्दर और प्रेरक देशप्रेम सम्बन्धी मधुरगीतों व कविताओं की सृष्टि की । निराला की 'वर दे वीणा वादिनी', 'भारती जय विजय करे', 'जागो फिर एकबार', 'शिवाजी का पत्र', प्रसाद की 'अरूण यह मधुमय देश हमारा' चन्द्रगुप्त नाटक में आया 'हिमाद्रि तुंगश्रृंग से प्रबुद्ध शुद्ध भारती' आदि कविताओं में कवियों ने हृदय के स्तर पर अपनी प्रशस्त राष्ट्रीयता की अभिव्यक्ति की है।

स्वतंत्रता आन्दोलन से प्रभावित हिन्दी कवियों की श्रृखला में भारतेन्दु हरिश्चन्द्र, राधाचरण गोस्वामी, बद्रीनारायण चौधरी प्रेमघन, राधाकृष्ण दास, मैथिलीशरण गुप्त, श्रीधर पाठक, माधव प्रसाद शुक्ल, रामनरेश त्रिपाठी, नाथूराम शर्मा शंकर, गया प्रसाद शुक्ल स्नेही (त्रिशूल), माखनलाल चतुर्वेदी, बालकृष्ण शर्मा नवीन, रामधारी सिंह दिनकर, सुभद्रा कुमारी चौहान, सियाराम शरण गुप्त, सोहन लाल द्विवेदी, श्याम नारायण पाण्डेय, अज्ञेय इत्यादि कवियों ने परम्परागत राष्ट्रीय सांस्कृतिक भित्ति पर ओजपूर्ण स्वरों मे राष्ट्रीयता का संधान किया।

हिन्दी की राष्ट्रीय काव्यधारा के समस्त कवियों ने अपने काव्य में देशप्रेम व स्वतन्त्रता की उत्कट भावना की अभिव्यक्ति दी है। राष्ट्रीय काव्यधारा के प्रणेता के रूप में माखन लाल चतुर्वेदी की हिमकिरीटनी, हिमतरंगिनी, माता, युगचरण, समर्पण आदि के काव्यकृतियों के माध्यम से उनकी राष्ट्रीय भावछाया से अवगत हुआ जा सकता है। चतुर्वेदी जी ने भारत को पूर्ण स्वतन्त्र कर जनतन्त्रात्मक पद्धति की स्थापना का आहवाहन किया। गुप्त जी के बाद स्वातन्त्र्य श्रृखला की अगली कड़ी के रूप में माखन लाल चतुर्वेदी का अविस्मृत नाम न केवल राष्ट्रीय गौरव की याद दिलाता है अपितु संघर्ष की प्रबल प्रेरणा भी देता है। जेल की हथकड़ी आभूषण बन उनके जीवन को अलंकृत करती है।

'क्या? देख न सकती जंजीरो का गहना
हथकड़ियां क्यों? यह ब्रिटिश राज का गहना'

(कैदी और कोकिला)


पिस्तौल, गीता, आनन्दमठ की जिन्दगी ने इनके भीतर प्रचण्ड विद्रोह को जन्म दे वैष्णवी प्रकृति विद्रोह और स्वाधीनता के प्रति समर्पण भाव ने इनके जीवन को एक राष्ट्रीय सांचे में ढाल दिया। 1912 में उनकी जीवन यात्रा ने बेड़ियों की दुर्गम राह पकड़ ली।

'उनके हृदय में चाह है अपने हृदय में आह है
कुछ भी करें तो शेष बस यह बेड़ियों की राह है।'



1921 में कर्मवीर के सफल सम्पादक चतुर्वेदी जी को जब देशद्रोह के आरोप में जेल हुई तब कानपुर से निकलने वाले गणेश शंकर विद्यार्थी के पत्र 'प्रताप' और महात्मा गाँधी के 'यंग इण्डिया' ने उसका कड़ा विरोध किया। 'मुझे तोड़ लेना वन माली देना तुम उस पथ पर फेंक मातृभूमि पर शीष चढ़ाने जिस पर जाते वीर अनेक ''पुष्प की अभिलाषा'' शीर्षक कविता की यह चिरजीवी पंक्तियाँ उस भारतीय आत्मा की पहचान कराती है जिन्होनें स्वतन्त्रता के दुर्गम पथ में यातनाओं से कभी हार नही मानी।

'' जो कष्टों से घबराऊँ तो मुझमें कायर में भेद कहाँ
बदले में रक्त बहाऊँ तो मुझमें डायर में भेंद कहाँ!"



अनुभूति की तीव्रता की सच्चाई, सत्य, अहिंसा जैसे प्रेरक मूल्यों के प्रति कवि की आस्था, दृढ़ संकल्प, अदम्य उत्साह और उत्कट् अभिलाषा को लेकर चलने वाला यह भारत माँ का सच्चा सपूत साहित्यशास्त्र और कर्मयंत्र से दासता की बेड़ियों को काट डालने का दृढ़व्रत धारण करके जेल के सींखचों के भीतर तीर्थराज का आनन्द उठाते है।

''हो जाने दे गर्क नशे में, मत पड़ने दे फर्क नशे में, के उत्साह व आवेश के साथ स्वतन्त्रता संग्राम श्रृंखला की अगली कड़ी के रूप में आबद्ध एक श्लाघ्य नाम बालकृष्ण शर्मा नवीन का है वह स्वतन्त्रता आन्दोलन के मात्र व्याख्यता ही नहीं अपितु भुक्तभोगी भी रहे। 1920 में गाँधी जी के आह्वाहन पर वह कालेज छोड़कर आन्दोलन में कूद पड़े। फलत: दासता की श्रृंखलाओं के विरोध संघर्ष में इन्हे 10 बार जेल जाना पड़ा। जेल यात्राओं का इतना लम्बा सिलसिला शायद ही किसी कवि के जीवन से जुड़ा हो। उन दिनों जेल ही कवि का घर हुआ करता था।


'हम संक्रान्ति काल के प्राणी बदा नही सुख भोग
घर उजाड़ कर जेल बसाने का हमको है रोग'


नवीन

अपनी प्रथम काव्य संग्रह 'कुंकुम' की जाने पर प्राणार्पण, आत्मोत्सर्ग तथा प्रलयंकर कविता संग्रह में क्रान्ति गीतों की ओजस्विता व प्रखरता है।

'यहाँ बनी हथकड़िया राखी, साखी है संसार
यहाँ कई बहनों के भैया, बैठे है मनमार।'


राष्ट्रीय काव्यधारा को विकसित करने वाली सुभद्रा कुमारी चौहान का 'त्रिधारा' और 'मुकुल' की 'राखी' 'झासी की रानी' 'वीरों का कैसा हो बसंत' आदि कविताओं में तीखे भावों की पूर्ण भावना मुखरित है। उन्होने असहयोग आन्दोलन में सक्रिय भूमिका निभायी। आंदोलन के दौरान उन्हें कई बार जेल जाना पड़ा। 'जलियावाला बाग में बसंत' कविता में इस नृशंस हत्याकाण्ड पर कवयित्री के करूण क्रन्दन से उसकी मूक वेदना मूर्तिमान हो उठी है।


''आओ प्रिय ऋतुराज, किन्तु धीरे से आना
यह है शोक स्थान, यहाँ मत शोर मचाना
कोमल बालक मरे यहाँ गोली खा-खा कर
कलियाँ उनके लिए चढ़ाना थोड़ी सी लाकर।"



दिनकर की हुँकार, रेणुका, विपथगा में कवि ने साम्राज्यवादी सभ्यता और ब्रिटिश राज्य के प्रति अपनी प्रखर ध्वंसात्मक दृष्टि का परिचय देते हुए क्रान्ति के स्वरों का आह्वाहन किया है। पराधीनता के प्रति प्रबल विद्रोह के साथ इसमें पौरूष अपनी भीषणता और भंयकरता के साथ गरजा है। कुरूक्षेत्र महाकाब्य पूर्णरूपेण राष्ट्रीय है।

'उठो- उठो कुरीतियों की राह तुम रोक दो
बढो-बढो कि आग में गुलामियों को झोंक दो '।


दिनकर

स्वतन्त्रता की प्रथम शर्त कुर्बानी व समर्पण को काव्य का विषय बना क्रान्ति व ध्वंस के स्वर से मुखरित दिनकर की कवितायें नौंजवानों के शरीर में उत्साह भर उष्ण रक्त का संचार करती है ।


जिसके द्वारों पर खड़ा क्रान्त, सीमापति! तूने की पुकार
पददलित उसे करना पीछे, पहले ले मेरा सीस उतार।


सोहनलाल द्विवेदी की भैरवी राणाप्रताप के प्रति, आजादी के फूलों पर जय-जय, तैयार रहो, बढ़े चलो बढ़े चलो, विप्लव गीत कवितायें, पूजा गीत संग्रह की मातृपूजा, युग की पुकार, देश के जागरण गान कवितायें तथा वासवदत्ता, कुणाल, युगधारा काब्य संग्रहों में स्वतन्त्रता के आह्वान व देशप्रेम साधना के बीच आशा और निराशा के जो स्वर फूटे है उन सबके तल में प्रेम की अविरल का स्रोत बहाता कवि वन्दनी माँ को नहीं भूल सका है ।

'कब तक क्रूर प्रहार सहोगे ?
कब तक अत्याचार सहोगे ?
कब तक हाहाकार सहोगे ?
उठो राष्ट्र के हे अभिमानी
सावधान मेरे सेनानी।'


सियाराम शरण गुप्त की बापू कविता में गाँधीवाद के प्रति अटूट आस्था व अहिंसा, सत्य, करूणा, विश्व-बधुत्व, शान्ति आदि मूल्यों का गहरा प्रभाव है। राजस्थानी छटा लिये श्यामनारायण पाण्डेय की कविताओं में कहीं उद्बोधन और क्रान्ति का स्वर तथा कहीं सत्य, अहिंसा जैसे अचूक अस्त्रों का सफल संधान हुआ है। इनकी 'हल्दीघाटी' व 'जौहर' काव्यों में हिन्दू राष्ट्रीयता का जयघोष है । देशप्रेम के पुण्य क्षेत्र पर प्राण न्यौछावर के लिए प्रेरित करने वाले रामनरेश त्रिपाठी की कविता कौमुदी, मानसी, पथिक, स्वप्न आदि काव्य संग्रह देश के उद्धार के लिए आत्मोत्सर्ग की भावना उत्पन्न करते है । देश की स्वतन्त्रता को लक्ष्य करके श्री गया प्रसाद शुक्ल सनेही ने कर्मयोग कविता में भारतवासियों को जागृत कर साम्राज्यवादी नीति को आमूल से नष्ट करने का तीव्र आह्वाहन किया । श्रीधर पाठक ने भारतगीत में साम्राज्यवादियों के चंगुल में फंसे भारत की मुक्ति का प्रयास किया। प्रयोगवादी कवि अज्ञेय भी अपनी पढ़ाई बीच में ही छोड़कर आंदोलन में सक्रिय भूमिका निभाते हुए कई बार जेल गये। जगन्नाथ प्रसाद मिलिन्द की कवितायें भी इस दिशा मे सक्रिय हैं।

इस प्रकार हम देखते है कि स्वतन्त्रता आंदोलन के उत्तरोत्तर विकास के साथ हिन्दी कविता और कवियों के राष्ट्रीय रिश्ते मजबूत हुए। राजनीतिक घटनाक्रम में कवियों के तेवर बदलते रहे और कविता की धार भी तेज होती गई। आंदोलन के प्रारम्भ से लेकर स्वतन्त्रता प्राप्ति तक हिन्दी काव्य संघर्षो से जूझता रहा। स्वाधीनता के पश्चात राष्ट्रीय कविता के इतिहास का एक नया युग प्रारम्भ हुआ। नये निर्माण के स्वर और भविष्य के प्रति मंगलमय कल्पना उनके काव्य का विषय बन गया। फिर भी स्वतन्त्रता यज्ञ में उनके इस अवदान और बलिदान को विस्मृत नही किया जा सकता । भारत का ऐतिहासिक क्षितिज उनकी कीर्ति किरण से सदा आलोकित रहेगा और उनकी कविताए राष्ट्रीय आस्मिता की धरोहर बनकर नयी पीढ़ी को अपने गौरव गीत के ओजस्वी स्वर सुनाती रहेगीं।

जन्म से पहले शमशान होता है
शान्ति के पहले तूफान होता है
वक्त के साथ बदलती है तस्वीर देश की
क्रान्ति के बाद ही तो नवनिर्माण होता है।

शलभ

- डॉ शुभिका सिंह (bharatdarshan.co.nz)
प्रवक्ता नवयुग कन्या महाविद्यालय, लखनऊ



शुक्रवार, 23 जुलाई 2010

स्वराज मेरा जन्म सिद्ध अधिकार है,और मै इसे लेकर रहूँगा.

(२३ जुलाई, 1856- १ अगस्त १९२०)
"स्वराज मेरा जन्म सिद्ध अधिकार है,और मै इसे लेकर रहूँगा।"
बाल गंगाधर तिलक (२३ जुलाई, 1856- १ अगस्त १९२०) भारत के एक प्रमुख नेता, समाज सुधारक और स्वतन्त्रता सेनानी थे। ये भारतीय स्वतन्त्रता संग्राम के पहले लोकप्रिय नेता थे। इन्होंने सबसे पहले भारत में पूर्ण स्वराज की माँग उठाई। इनका कथन "स्वराज मेरा जन्मसिद्ध अधिकार है और मैं इसे लेकर रहूँगा" बहुत प्रसिद्ध हुआ। इन्हें आदर से "लोकमान्य" कहा जाता था। इन्हें हिन्दू राष्ट्रवाद का पिता भी कहा जाता है।
तिलक ने अंग्रेजी सरकार की क्रूरता और भारतीय संस्कृति के प्रति हीन भावना की बहुत आलोचना की। इन्होंने माँग की कि ब्रिटिश सरकार तुरन्त भारतीयों को पूर्ण स्वराज दे। केसरी में छपने वाले उनके लेखों की वजह से उन्हें कई बार जेल भेजा गया।
‘क्या ये सरकार पागल हो गई है?’ और 'बेशर्म सरकार' जैसे उनके लेखों ने आम भारतीयों के मन में रोष की लहर दौड़ा दी। दो वर्षों में ही ‘केसरी’ देश का सबसे ज्यादा बिकने वाला भाषाई समाचार-पत्र बन गया था।
लंदन के ‘ग्लोब’ और ‘टाइम्स ऑफ इंडिया’ समाचार पत्रों ने तिलक पर लोगों को हत्या के लिए भड़काने का आरोप लगाया। इस आरोप में तिलक को 18 महीने की कैद हो गई। नाराज अँग्रेजों ने तिलक को भारतीय अशांति का दूत घोषित कर दिया। इस बीच तिलक ने भारतीय राष्ट्रीय काँग्रेस की सदस्यता ले ली थी, लेकिन स्वराज्य की माँग को लेकर काँग्रेस के उदारवादियों का रुख उन्हें पसंद नहीं आया और सन 1907 के काँग्रेस के सूरत अधिवेशन के दौरान काँग्रेस गरम दल और नरम दल में बँट गई। गरम दल का नेतृत्व लाला लाजपतराय, बाल गंगाधर तिलक और विपिन चंद्र पाल कर रहे थे।
उन्होंने गणेश उत्सव, शिवाजी उत्सव आदि को व्यापक रूप से मनाना प्रारंभ किया। उनका मानना था कि इस तरह के सार्वजनिक मेल-मिलाप के कार्यक्रम लोगों में सामूहिकता की भावना का विकास करते हैं। वह अपने इस उद्देश्य में काफी हद तक सफल भी हुए। तिलक ने शराबबंदी के विचार का पुरजोर समर्थन किया। वो पहले काँग्रेसी नेता थे, जिन्होंने हिंदी को राष्ट्रभाषा स्वीकार करने की माँग की थी।
1 अगस्त, 1920 को इस जननायक ने मुंबई में अपनी अंतिम साँस ली।तिलक की मृत्यु पर महात्मा गाँधी ने कहा - ‘हमने आधुनिक भारत का निर्माता खो दिया है।’


आधुनिक भारत के निर्माता को उनकी १५४ वी जयंती पर सभी ब्लोगर्स की और से कोटि- कोटि नमन।

गुरुवार, 17 जून 2010

ये है झांसी की रानी (jhansi ki rani)का असली चित्र.




मित्रो आज १७ जून को झाँसी की रानी लक्ष्मी बाई की पुन्यथिति है।


झांसी की रानी लक्ष्मीबाई का यह एकमात्र फोटो है, जिसे कोलकाता में रहने वाले अंग्रेज फोटोग्राफर जॉनस्टोन एंड हॉटमैन द्वारा 1850 में ही खींचा गया था। यह फोटो अहमदाबाद निवासी चित्रकार अमित अंबालाल के संग्रह में मौजूद है।

The only photo of Rani Laxmibai of Jhansi, which living in Calcutta in 1850 by the British photographer Ahugoman Jonstone and was pulled. This photo Ahmedabad resident artist Amit Ambalal exists in the collection.


शनिवार, 12 जून 2010

छोडूंगा नहीं एक दिन तो शमशान घाट आवेगा.

मेरी सबसे पहली तुकबंदी "दूर की सोच "

एक दिन सुरेन्द्र शर्मा जी मन्दिर पूजा को गए।
मन्दिर से जब बाहर आए ,अपने नए जूते गायब पाये ।
जूते गायब देखकर ,सुरेन्द्र जी ने मचाया शोर,
तब एक फूल वाले से पता चला ,
कि जूते ले गया शैल नाम का चोर।
ठाणे में रपट लिखाई, जासूसों को पीछे लगाया,
पर शैल नाम का चोर कहीं पकड़ में न आया।
थक हार कर बेचारे श्रीमान,जा पहुचे सीधे शमसान ,
बोले शैल अब देखूँगा ,तने कोण बचावेगा
छोडूँगा नही एक दिन तो शमशान घाट आवेगा।

सोमवार, 7 जून 2010

यह मेरे इस देश को हो गया क्या आज है.


यह मेरे इस देशं को ये हो गया क्या आज है
ये जिन्दगी की प्रात है या जिन्दगी की सांझ है।

उद्देश्यहीन भीड़ क्यों हर तरफ खड़ी हुई।
हर आदमी के चेहरे पे गम की परत चढ़ी हुई।
यूं देखने मे हर कोई लगता तो पास-पास है।
लेकिन दिलों की दूरियां!! कैसा विरोधाभास है?
क्यों जिन्दगी के गीत की ये बेसुरी आवाज है।
ये मेरे इस ............................................................ ॥


हर सुबह की धूप का सूरज कही है को गया ।
चांदनी समेटकर अब चाँद भी है सो गया।
हर गली के बीच में वहशियाना शोर है।
क्यों खुद की आत्मा का खुद आदमी ही चोर है?
जाने कैसा बज रहा ये जिन्दगी का साज है।
ये मेरे इस देश .............................................. ॥


हर तरफ है नाचती हिंसा भरी जवानिया ।
मेरे वतन में रह गयी अहिंसा की बस कहानिया।
अन्न महंगा है तो क्या खून तो सस्ता हुआ।
यहाँ आदमी को आदमी है खा रहा हँसता हुआ।
गाँधी के सपनो पे बना ये कैसा रामराज है !!!!!
ये मेरे इस देश को .................................................... ॥


जीने की लालसा लिए बस जी रहा है आदमी ।
यूं विष का घूँट आप ही तो पी रहा है आदमी।
असत्य और कपट की जब बू रही हो खेतियाँ।
पाएंगी कहाँ से सच फिर आने वाली पीढियां।
फूलों भरे चमन का ये कैसा बुरा आगाज है।
ये मेरे इस ............................................................. ॥


इतने मुखोंटे आदमी के पास रहते है यहाँ।
हर बार चेहरे और ही हर बार दीखते हैं यहाँ।
यूं आदमी को जिन्दगी के दर्द का अहसास है।
पर जी रहा है इसलिए क़ल पर उसे विश्वास है।
ये जिन्दगी के जीने का कैसा नया अंदाज है।
ये मेरे इस देश को हो गया क्या आज है।


( यह रचना मेरे पिताजी ने १९७५ में रची थी । किन्तु आज भी ज्यों की त्यों प्रासंगिक है।)

शुक्रवार, 28 मई 2010

भारतीय स्वतंत्रता के जनक(fathar of indian independece)

(veer savarkar)
"वीर सावरकर की पीढ़ी में उनके समान प्रभावी, साहसी,ढ्रद,देशभक्त भारतवर्ष में पैदा नही हुआ है। सावरकर ने जो कष्ट सहे हैं,उसी के फलस्वरूप भारत ने स्वाधीनता प्राप्त की है। आदर्श सिधांतों को निभाने के लिए जी जान से प्रयत्न करने वालो में वीर सावरकर का स्थान बहुत ऊचा है। ------वे केवल हिन्दी देशभक्त hee नही,वरन समस्त विश्व के प्रेरणा श्रोत हैं। में तो मानव समाज के दर्शनकार के रूप में उन्हें देखता हूँ। भारतीय जनता का यह आध्य कर्तव्य है कि सम्पूर्ण स्वतंत्रता के जनक के रूप में उनका सत्कार करे."---ये शब्द इंग्लेंड के सुप्रसिद्ध विद्वान् व पत्रकार श्री गाय अल्द्रेड के हैं, जो सावरकर के समय में हेराल्ड,फ्री वूमेन एवं जस्टिस आदि पत्रों के सम्पादक, प्रकाशक व प्रतिनिधि थे.(गाय अल्द्रेड)
२५ जून सन १९४४ को सिंगापुर में आजाद हिंद सरकार की स्थापना पर नेताजी सुभाष चंद्र बोश ने सिंगापुर रेडियो पर अपने संदेश में कहा कि,-------"जब भ्रमित राजनैतिक विचारों और अदूरदर्शिता के कारन कांग्रेस के लगभग सभी नेता अंग्रेजी सेना में भारतीय सिपाहियों को भाड़े का टट्टू कहकर बदनाम कर रहे थे,उस समय सबसे पहले वीर सावरकर ने निर्भीकता से भारतीय युवको को सेना में भरती होने का आह्वान किया.सावरकरजी कि प्रेरणा पर सेना में भरती युवक ही हमारी आई ० एन ० ऐ ० के सिपाही बने हैं.उन्होंने इस बात का भी रहस्योद्घाटन किया कि,आइ० एन० ए० को संघटित करने कि प्रेरणा भी उन्हें सावरकर जी से ही मिली थी। उन्होंने बताया कि,जब वे सावरकर जी से मिलने मुंबई गए तब सावरकर जी ने उन्हें यह राय दी थी कि अंग्रेजों कि जेल में सड़कर मरने कि बजाय यह अच्छा होगा कि वे देश से बाहर चले जायं और आई ० एन० ए० को संगठित करें। (नेता जी सुभाष चंद्र बोश)
सरदार भगत सिंह ने रत्ना गिरी में जाकर सावरकर जी से आशीर्वाद लिया था.तथा सावरकर जी के लिखे ग्रन्थ को प्रकाशित कराया था।
ऐसे क्रांतिकारियों के प्रेरणा श्रोत,महान दार्शनिक, हिंदुत्व विचारक, करोड़ो भारतियों के ह्रदय सम्राट वीर सावरकर की जयंती (28 may)पर कोटि-कोटि नमन .

बुधवार, 26 मई 2010

राजनीती की मण्डी में सी० बी० आइ०(c.b.i.) रंडी की ओकात रखती है.

पिछले कुछ वर्षों से केंद्र की संप्रग सरकार उत्तर प्रदेश की मुख्यमंत्री मायावती के पीछे हाथ-मूंह धोकर पड़ी थी। वहीँ मायावती ने भी कोंग्रेस को कोसने में कोई कमी नहीं की थी। फिर अचानक ऐसा क्या हुआ कि सभी विपक्षियों के केंद्र सरकार के विरूद्ध खड़े होने के तुरंत बाद मायावती अचानक पलटा मार कर कोंग्रेस के पक्ष में खडी हो गयी और संप्रग सरकार की सभी नीतियों को ठीक बताया।
उससे पुर्व भी सन २००७ में परमाणु समझोते में जब सरकार को महसूस होने लगा कि वामपंथी दल इस समझोते में उसका समर्थन नहीं करेंगे तो अचानक मुलायम सिंह ने सरकार के साथ सहमती जता दी, ओर संप्रग सरकार को समर्थन दे दिया।
इसी प्रकार बोफोर्स के आरोपी व सोनिया गाँधी के मित्र क्वात्रोची को भी संप्रग सरकार ने क्लीन चिट दे दी ।
पिछली सरकार में लालू प्रसाद यादव संप्रग सरकार के साथ थे,उनके विरूद्ध कई घोटालों के मुक़दमे चल रहे थे तथा फैंसला भी आने वाला था कि अचानक उस न्यायधीश का तबादला हो गया जो लालू के केस को देख रहा था। तथा इन्कमटेक्स के ऑफिसरों की मीटिंग में सारा का सारा मामला ही ढीला कर दिया गया। लालू को संप्रग सरकार के समर्थन का इनाम मिल गया।
ये सारे के सारे मामले यूं तो देखने में अलग अलग है,किन्तु इनमे दो बातें कोमन हैं।
१..संप्रग सरकार २..सी० बी० आइ०
उपरोक्त सभी मामले संप्रग की सरकार में सी० बी० आइ० के हवाले थे । देश में कोई भी घोटाला हो तो सी० बी० आइ० से जांच कराने की मांग उठती है। जनता समझती है कि सी० बी० आइ० निष्पक्षता से जांच करेगी। किन्तु क्या कभी ऐसा होता है?
सी० बी० आई ० के एक पूर्व निदेशक का कहना है कि क्वात्रोची को क्लीन ची देना बिलकुल गलत था क्योंकि उसके विरूद्ध पूरे पुख्ता सबूत सी० बी० आइ० के पास मोजूद थे। अभी हाल ही में उन्होंने यह भी कहा है कि सी० बी० आइ० अपने से कुछ भी तय नहीं कर सकती है । किस मामले को दबाना है, तथा किस को गर्माना है , यह सब सरकार ही करती है।
अब देखिये उत्तर प्रदेश की मुख्य मंत्री मायावती को आय से अधिक संपत्ति रखने के आरोप में पहले सी० बी० आइ० से कहलाया गया कि उसके खिलाफ पूरे सबूत हैं। लेकिन मायावती के संप्रग के पक्ष में बोलते ही सी० बी० आइ० ने कह दिया कि केस में कोई दम ही नहीं है।
यही २००७ में मुलायम सिंह यादव व उसके परिवार भी कुछ एसा ही हुआ। परमाणु समझोते में वामपंथियों के सरकार के साथ नहीं रहने पर मुलायम ने सरकार का समर्थन किया और जिस कोंग्रेसी नेता ने इनके खिलाफ आय से अधिक संपत्ति रखने की सी० बी० आइ० जाँच की मांग की थी,अपनी याचिका वापस ले ली।
वहीँ दूसरी ओर सी० बी० आइ० लोकप्रिय मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी के विरूद्ध कुछ ज्यादा ही सक्रीय नजर आ रही है। गोधरा हत्या काण्ड के बाद के दंगे हों या फिर सोहराबुदीन मुठभेड़ ,गुजरात सरकार व नरेंद्र मोदी को रोज ही घेरा जा रहा है। जबकि पुरे देश को पता है कि सोहराबुद्दीन एक आतंकवादी था तथा दाउद का पुराना सहयोगी रहा है।
वहीं छात्तिसगड़ के पूर्व मुख्यमंत्री अजीत जोगी पर विधायकों की खरीद के पर्याप्त सबूत जुटाने पर भी सी० बी० आइ० उसका कुछ भी नहीं बिगाड़ पाई। आंध्र के पूर्व इसाई मुख्यमंत्री पर हजारों करोडो की संपत्ति कहाँ से आई, उसने मंदिरों में आये दान का रुपया चर्चो को दान में क्यों दिया? इन सभी मामलों में सी० बी० आइ० कहाँ गायब हो गयी?
सी० बी० आइ० का जितना दुरूपयोग इन्द्र गाँधी ने किया ,वैसा ही दुरूपयोग यह संप्रग सरकार कर रही है। सरकार का ये कार्य निसंदेह राष्ट्र विरोधी है। सी० बी० आइ० का कार्य किस प्रकार होता है यह अपने आप में एक कटु सत्य है। सी० बी० आइ० एक सरकारी संस्था है इसलिए यह सरकार के इशारे पर ही कार्य करती है।
स्पष्ट रूप से संप्रग सरकार सी० बी० आइ० का दुरूपयोग अपनी सरकार को बचाने में तथा अपने विरोधियों को धुल चटाने के लिए कर रही है ।
सी० बी० आई ० की स्थिति राजनीती में रखैल की तरह हो गयी है ,जिसमे दम है वह उसे अपने पास रख ले।यदि सी० बी० आइ० के साख को बचाना है तो उसे स्वतंत्र कार्य करने के लिए छोड़ देना चाहिए। किन्तु क्या aisa हो सकेगा ? यह अपने आप में एक यक्ष प्रश्न है।

बुधवार, 5 मई 2010

सन १९४७ में भारत( bharat ) के बटवारे का सबसे बड़ा कारण

कोन कहता है कि बुड्ढे इश्क नहीं करते ,इश्क तो करते है पर लोग उन पर शक नहीं करते ।
पर भाई पता नहीं लोग हम पर शक क्यों करते हैं ।

अरे कम से कम भीड़ में तो शर्म की होती।



तू जहाँ जहाँ ,में वहां वहां


तुसी न जाओ.


बराबर में तो मै ही बैठूँगा।

हम तो आपकी हर प्रकार से सेवा करेंगे। चाहे कितना भी झुकना क्यों न पड़े।
अब लोगो का काम तो है
कहना।


नेहरू ने लेडी एडविना के कहने पर ही पकिस्तान का बंटवारा माना था।
क्यों माना, इसका उत्तर आपके सामने है । (सभी चित्र गूगल से साभार )

















रविवार, 2 मई 2010

घर में उनके कुत्तों पर भी ,फोंजों के हैं पहरे रहते


सोने के महलों में कुछ तो,ख़ास-ख़ास हैं बहरे रहते।
कुछ की तो गर्दन के ऊपर ,दो-दो हरदम चेहरे रहते॥

कहने को मासूम बड़े ही,दिखलाई सबको देते वे ।
दिल में उनके अन्दर भैया,राज बड़े ही गहरे रहते॥

कसमे खाते रहते जिस पल,दहशतगर्दी से लड़ने की।
दहशतगर्दों के ही उनके,उस पल घर में डेरे रहते॥

हत्याओं का दौर देखने ,सज धज कर जब वे जाते।
कातिल के हमदर्द सयापे, आँखों को हैं घेरे रहते॥

हर मुश्किल से टकराने का, बंधा रहे हैं साहस जो जो।
घर में उनके कुत्तों पर भी , फोंजो के हैं पहरे रहते॥

धरती तपने लगती जब यूं ,लेकर अपने साथ बगुले।
सब कुछ स्वाहा करने को फिर,नहीं जलजले ठहरे रहते॥

शनिवार, 10 अप्रैल 2010

बाल कविता




मुझको पैसे चार मिले हैं,


जितनी जितनी बार मिले हैं ,


खर्च नहीं में उनको करती ,


जोड़ जोड़ कर उनको रखती।


बन्दूक एक दिन उनसे लाकर,


अपने कंधे उसे लगाकर ,


मै भारत के शत्रु गिन-गिन ,


मार भागाउंगी एक दिन ।

अनाहिता त्यागी




मंगलवार, 30 मार्च 2010

कायर मनुष्य,कायर समाज व कायर राष्ट्र का कोई सहायक नहीं होता.

समझोतों से नहीं कभी भी युद्ध टला करते हैं।
कायर जन ही इनसे खुद को स्वयं छला करते हैं।।
स्वतंत्रता -काल से आज तक की कालावधि में पकिस्तान और भारत के मध्य लगभग १७५ बार से भी अधिक वार्तालापों के दौर चल चुके हैं। इस लम्बी वार्ताओं की कड़ी में उन सभी वार्तालापों के क्या परीणाम रहे,इसकी गहराई में जाने की अब कोई आवश्यकता नहीं रही है। इसको संछेप में सीधे सीधे ही यही कहा जा सकता है कि पकिस्तान से भारत लगभग १७५ बार ही कूटनीतिक युद्ध में पराजित हो चुका है। १९४८ में पाकिस्तान के सैनिकों का कबाइलियों के वेश में आक्रमण रहा हो या १९६५ का युद्ध हो अथवा १९७१ या फिर १९९९ में कारगिल का युद्ध हो, भारत समर-छेत्र सैनिक विजय के प्राप्त करने के बावजूद भी बार बार हारा है। इन युद्दों में प्राप्त सैनिक विजय के लिए भारत का शासक वर्ग यदि अपनी पीठ थपथपाता है तो वह राष्ट्र को यह बतलाने का भी साहस करे कि विजय प्राप्त करने के उपरांत भी पाकिस्तान के किस भू-भाग को उसने भारत के अधिकृत किया है। अथवा कोन सा लाभ या लक्सय उसकी इन विजयों द्वारा प्राप्त किया गया। जबकि पाकिस्तान बार बार पराजित होकर भी हर युद्ध के बाद भारत की अपेक्सा सदैव लाभ में ही रहा है।
भारत की कायर सत्ता एक बड़े युद्ध को टालने के लिए समय समय पर समझोतों और वार्ताओं का खेल खेलती है। जबकि शत्रु इस समय का सदुपयोग केवल अपनी सैनिक शक्ति को सुद्रढ़ करने में लगता रहता है। आजादी के समय पाकिस्तान एक अत्यंत निर्बल राष्ट्र ही था । किन्तु वार्तालापों में भारत को बार बार उलझाकर उसने आज तक जो शक्ति अर्जित कर ली है , वह आज सबके सम्मुख है। आज पाकिस्तान भारत की और आँख तरेरता है, उसकी नितांत ऊपेक्छा करता है ,बार बार धमकी देता है,यही सब आज तक के भारतीय राजनेताओं की उन सभी वार्ताओं से प्राप्त की गयी उपलब्धियां हैं। और अब फिर से एक नयी उपलब्धी प्राप्त करने की भारत सरकार की पाकितान के साथ सचिव स्तर की बात चल पडी है । भारत का जन जन इस वार्तालाप की अंतिम परिणति से परिचित है। वार्ता आरम्भ होने से पूर्व अपने आतंकवादियों से पुणे में कराये गए विस्फोटो के द्वारा पाकिस्तान ने इसकी जानकारी भारत को पहले ही दे दी है। बस अब तो केवल भारत सरकार ही इस वार्तालाप की ऊलाब्धि जान्ने के लिए उत्सुकता बची हुई है।
गत ६० वर्षों से इसी प्रकार से वार्ताओं का दोर चला आ रहा है । क्या भारत की सरकारे सचमुच इतनी भोली है कि वह केवल चर्चाओं के दोर चलाकर एक ऐसे शत्रु को नियंत्रण में लाना चाहती है,जिसके मन में कहीं गहरे तक भारत के प्रति केवल तीव्र घ्रणा ही बसी है।जिसका एक मात्र उदेश्य अपने जन्म काल से ही भारत को खंड खंड करके उसको मिटा देना या अपने अधिकार में करने का ही रहा है। केवल अपनी कायरता के कारण भारत उसके इस उद्देश्य की पूर्ती का ही एक परोक्स्त: माध्यम बनता चला आ रहा है ।
मेरा इन बातों का कहने का तात्पर्य यह भी नहीं है कि भारत को तुरंत ही पाकिस्तान पर आक्रमण कर देना चाहिए। किन्तु स्वाभिमान को बचाए रखने की सम्मति तो हर किसी भारतीय की भारत सरकार को देने की जिम्मेदारी बनती ही है।पाकिस्तान भारत का कोई छिपा शत्रु नहीं है,जिसके शत्रु भाव से कोई परिचित न हो। वह हर पल बातों का जहर उगलकर भारत के प्रति अपनी शत्रुता की घोषणा करता रहता है । तब क्या भारत को उसके प्रलाप का उत्तर इस प्रकार देना चाहिए,जिस प्रकार वह आज तक देता रहा है। अब पाकिस्तान को भारत की और से यह स्पष्ट चेतावनी मिलनी ही चाहिए कि यदि एक निश्चित समय सीमा तक यह अपने आतंकी कार्यों में सुधार नहीं करता तो फिर किसी भी सीमा तक जाने के लिए भारत की स्वतंत्रत है । इस वर्तमान वार्ता के दोर का तभी कुछ लाभ हो सकता है जब भारत पाकितान के सम्मुख आतंक समाप्त कर ने के लिए समय की एक निश्चित सीमा रेखा खीचे ।
भारत यदी इस प्रकार के चेतावनी देकर अपना दृढ रुख इस पर बनाए रखे तो विश्व बिरादरी भी उसका साथ देने के लिए विवश हो सकती है। भारत सरकार को यह समझ लेने की आवश्यकता है कि कायर मनुष्य का , कायर समाज का और कायर राष्ट्र का कोई सहायक नहीं होता । अपनी भुजाओं के बल पर विशवास करके ही इतिहास की धारा मोड़ी जा सकती है। एक अवश्यम्भावी युद्ध को टालने का प्रयास सदा कायर सत्ता ही करती है। धरती के यथार्थ कठोर तल पर पैर न जमाये रखकर जो केवल दिवा- स्वप्नों में ही झूलता है,ऐसा भयग्रस्त राष्ट्र कभी अपना भविष्य नहीं बना सकता । और अंत में ....................
उचित काल को राष्ट्र स्वयं ही बातों में खोता जो।
अपनी ही भावी पीढी का अपराधी होता वो॥

गुरुवार, 25 मार्च 2010

यहाँ देशद्रोही ही मंत्री व .संसद .........बनते है.


सप्रग की पिछली सरकार में पेट्रोलियम मंत्री रहे मणिशंकर अय्यर का नाम तो आप सभी को याद होगा। इस सरकार में भी नेताजी मैडम के दूत बनकर जगह जगह सोनिया गान करते घूम रहे है।
मणिशंकर का चरित्र एक ऐसे राष्ट्रद्रोही का रहा है,जिसको कभी छमा नही किया जा सकता।
१९६२ में जिस समय चीन ने भारत पर आक्रमण किया था,उस समय ये नेता लन्दन में पढ़ाई कर रहा था। पूरा का पूरा देश इस आक्रमण से शोकग्रस्त था। गाँव गाँव व नगर नगर से भारतीय सैनिको के लिए धन एकत्र किया जा रहा था।माता व बहनों ने अपने हाथों के जेवर व मंगलसूत्र तक भारतीय सेना के लिए दे दिए थे। सारा देश रो रहा था। परंतु लन्दन में ये देशद्रोही कुछ और ही खेल खेल रहा था। अय्यर व इसके साथी भी सैनिको के लिए चंदा एकत्र कर रहे थे
किंतु वो जो धन एकत्र कर रहा था,वो भारतीय सैनिको के लिए नही बल्कि लाल सेना (चीनी सेना) के लिए धन एकत्र कर रहा था।
उसकी इस बात का नेहरू को भी पता था।क्यो कि जिस समय अय्यर का चयन इंडियन फ़ौरन सर्विस में हुआ था, तो देश की सबसे बड़ी जासूसी संस्था ने प्रधानमंत्री कार्यालय को एक पत्र लिखा,तथा उपरोक्त बात का हवाला देते हुए उसके चयन पर रोक लगाने को कहा। परन्तु देश के इस महान? नेता ने भी अय्यर का पक्ष लेते हुए उसके चयन को मान्यता दे दी।
यही प्रक्रिया सप्रग ने अपने प्रथम कार्यकाल में अय्यर को पेट्रोलियम मंत्री बनाकर दोहराई। सोनिया स्तुति करने का अय्यर को इस सरकार ने अरे नहीं माननीय राष्ट्रपति जी (सरकार गलत नहीं लिखा क्योंकि राष्ट्रपति जी भी तो सरकारी है) ने भी प्रसाद दे दिया है बात ये है कि राष्ट्रपति को अधिकार है कि वह कुछ ऐसे लोगों को राजसभा में मनोनीत कर सकता है जिन्होंने कला ,संगीत जैसे क्षेत्रों में विशेष योगदान दिया हो। जिस रास्ते से लता मंगेशकर, हेमा मालिनी जैसे कलाकार राजसभा में पहुंचे उसी रास्ते से अय्यर को राजसभा में भेजने के लिए राष्ट्रपति ने कैसे चुना । न तो अय्यर कोई कलाकार हैं और न ही समाज के लिए कोई ऐसा कार्य किया है जिससे उसे राजसभा के लिए चुना जाय। हाँ अय्यर मैडम भक्त जरूर है,और मैडम कि चमचा गिरी व चरण वंदना का ही प्रसाद के रूप में उसे राजसभा में भेजा जा रहा है।
१९६२ में जो देशद्रोही कार्य अय्यर ने किया था। यही कार्य किसी और देश का व्यक्ति करता तो निश्चय ही उस देश का क़ानून उसे कड़ी से कड़ी सजा देता। परंतु एक देशद्रोही भारत में ही मंत्री व संसद ...................................... बन सकता है। अय्यर इसका जीता जगता सबूत है।

शनिवार, 13 मार्च 2010

आप सभी को नववर्ष विक्रमी संवत २०६७ की हार्दिक शुभकामनाएं


मित्रों जब अब से एक वर्ष पूर्व मैंने ब्लॉग लिखना शुरू किया था ,तब सबसे प्रथम सम्राट विक्र्मद्वित्तीय के ऊपर दो लेख लिखे थे। विक्रमी संवत २०६६ समाप्त हो रहा है। संवत २०६७ का आरम्भ होने जा रहा है। भारतीय नव वर्ष कि हार्दिक शुभकामनाओं के साथ मै विक्रमी संवत के प्रवर्तक सम्राट विक्र्माद्वितीय को नमन करते हुए वे दोनों लेख आपको दुबारा प्रस्तुत कर रहा हूँ।

विश्व विजेता सम्राट विक्रमादित्य
ईसा से कई शताब्दी पूर्व भारत भूमि पर एक साम्रराज्य था मालव गण। मालव गण की राजधानी थी भारत की प्रसिद्ध नगरी उज्जेन । उज्जैन एक प्राचीन गणतंत्र राज्य था । प्रजावात्सल्या राजा नाबोवाहन की म्रत्यु के पश्चात उनके पुत्र गंधर्वसेन ने "महाराजाधिराज मालवाधिपति महेंद्राद्वित्तीय "की उपाधि धारण करके मालव गण को राजतन्त्र में बदल दिया । उस समय भारत में चार शक शासको का राज्य था। शक राजाओं के भ्रष्ट आचरणों की चर्चाएँ सुनकर गंधर्वसेन भी कामुक व निरंकुश हो गया। एकं बार मालव गण की राजधानी में एक जैन साध्वी पधारी।उनके रूप की सुन्दरता की चर्चा के कारण गंधर्व सेन भी उनके दर्शन करने पहुच गया । साध्वी के रूप ने उन्हें कामांध बना दिया। महाराज ने साध्वी का अपहरण कर लिया तथा साध्वी के साथ जबरदस्ती विवाह कर लिया। अपनी बहन साध्वी के अपहरण के बाद उनके भाई जैन मुनि कलिकाचार्य ने राष्ट्र्यद्रोह करके बदले की भावना से शक राजाओं को उज्जैन पर हमला करने के लिए तैयार कर लिया। शक राजाओं ने चारों और से आक्रमण करके उज्जैन नगरी को जीत लिया.शोषद वहाँ का शासक बना दिया गया। गंधर्व सेन साध्वी और अपनी रानी सोम्यादर्शन के साथ विन्धयाचल के वनों में छुप गये.साध्वी सरस्वती ने महारानी सोम्या से बहुत दुलार पाया तथा साध्वी ने भी गंधर्व सेन को अपना पति स्वीकार कर लिया । वनों में निवास करते हुए,सरस्वती ने एक पुत्र को जनम दिया, जिसका नाम भरत हरी रक्खा गया.उसके तीन वर्ष पश्चात महारानी सोम्या ने भी एक पुत्र को जनम दिया.जिसका नाम विक्रम सेन रक्खा गया।
विंध्याचल के वनों में निवास करते हुए एक दिन गंधर्व सेन आखेट को गये,जहाँ वे एक सिंह का शिकार हो गये। वहीं साध्वी सरस्वती भी अपने भाई जैन मुनि कलिकाचार्य के राष्ट्र द्रोह से छुब्द थी।महाराज की म्रत्यु के पशचात उनहोने भी अपने पुत्र भ्रत्हरी को महारानी को सोंपकर अन्न का त्याग कर दिया।और अपने प्राण त्याग दिए। उसके पश्चात महारानी सोम्या दोनों पुत्रों को लेकर कृषण भगवान् की नगरी चली गई,तथा वहाँ पर आज्ञातवास काटने लगी। दोनों राजकुमारों में भ्रताहरी चिंतन शील बालकथा,तथा विक्रम में एक असाधारण योद्धा के सभी गुन विद्यमान थे। अब समय धीरे धीरे समय अपनी कालपरिक्र्मा पर तेजी से आगे बढने लगा। दोनों राजकुमारों को पता चल चुका था की शको ने उनके पिता को हराकर उज्जैन पर अधिकार कर लिया था,तथा शक दशको से भारतीय जनता पर अत्याचार कर रहे है।विक्रम जब युवा हुआ तब वह एक सुगतित शरीर का स्वामी व एक महान योद्धा बन चुका था। धनुषबाण, खडग, असी,त्रिसूल,व परशु आदि में उसका कोई सानी नही था.अपनी नेत्रत्व्य करने की छमता के कारन उसने एक सैन्य दल भी गठित कर लिया था।
अब समय आ गया था ,की भारतवर्ष को शकों से छुटकारा दिलाया जाय।वीर विक्रम सेन ने अपने मित्रो को संदेश भेजकर बुला लिया.सभाओं व मंत्रणा के दौर शुरू हो गए। निर्णय लिया गया की ,सर्वप्रथम उज्जैन में जमे शक राज शोशाद व उसके भतीजे खारोस को युद्ध में पराजित करना होगा।परन्तु एक अड़चन थीकि, उज्जैन पर आक्रमण के समय सौराष्ट्र का शकराज भुमक व तक्षिला का शकराज कुशुलुक शोशाद की साहयता के लिए आयेंगे। विक्रम ने कहा की, शक राजाओं के पास विशाल सेनाये है,संग्राम भयंकर होगा,तो उसके मित्रो ने उसे आश्वासन दियाकी, जब तक आप उज्जैन नगरी को नही जीत लेंगे ,तब तक सौराष्ट्र व तक्षिला की सेनाओं को हम आप के पास फटकने भी न देंगे। विक्रम सेन के इन मित्रों में सौवीर गन राज्य का युवराज प्रधुम्न, कुनिंद गन राज्य का युवराज भद्रबाहु,अमर्गुप्त आदि प्रमुख थे।
अब सर्वप्रथम सेना की संख्या को बढ़ाना व उसको सुद्रढ़ करना था। सेना की संख्या बढ़ाने के लिए गावं गावं के शिव मंदिरों में भैरव भक्त के नाम से गावों के युवकों को भरती किया जाने लगा। सभी युवकों को त्रिशूल प्रदान किए गए। युवकों को पास के वनों में शास्त्राभ्यास कराया जाने लगा.इस कार्य में वनीय छेत्र बहुत साहयता कर रहा था। इतना बड़ा कार्य होने के बाद भी शकों को कानोकान भनक भी नही लगी.
कुछ ही समय में भैरव सैनिकों की संख्या लगभग ५० सहस्त्र हो गई.भारत वर्ष के वर्तमान की हलचल देखकर भारत का भविष्य अपने सुनहरे वर्तमान की कल्पना करने लगा। लगभग दो वर्ष भाग दौर में बीत गए.इसी बीच विक्रम को एक नया सहयोगी मिल गया अपिलक। अपिलक आन्ध्र के महाराजा शिवमुख का अनुज था। अपिलक को भैरव सेना का सेनापति बना दिया गया। धन की व्यवस्था का भार अमर्गुप्त को सोपा गया। अब जहाँ भारत का भविष्य एक चक्रवाती सम्राट के स्वागत के लिए आतुर था,वहीं चारो शक राजा भारतीय जनता का शोषण कर रहे थे और विलासी जीवन में लिप्त थे।
इशा की प्रथम शताब्दी में महाकुम्भ के अवसर पर सभी भैरव सेनिको को साधू-संतो के वेश में उज्जैन के सैकडो गावों के मंदिरों में ठहरा दिया गया .प्रय्तेक गाँव का आर मन्दिर मनो शिव के टांडाव् के लिए भूमि तैयार कर रहा था। महाकुम्भ का स्नान समाप्त होते ही सैनिको ने अपना अभियान शुरू कर दिया। भैरव सेना ने उज्जैन व विदिशा को घेर लिया gayaa . भीषण संग्राम हुआ। विदेशी शकों को बुरी तरह काट डाला गया। उज्जैन का शासक शोषद भाग खड़ा हुआ.तथा मथुरा के शासक का पुत्र खारोश विदिशा के युद्ध में मारा गया। इस समाचार को सुनते ही सौराष्ट्र व मथुरा के शासकों ने उज्जैन पर आक्रमण किया। अब विक्रम के मित्रों की बारी थी, उन्होंने सौराष्ट्र के शासक भुमक को भैरव सेना के साथ राह में ही घेर लिया,तथा उसको बुरी तरह पराजित किया, तथा अपने मित्र को दिया वचन पूरा किया।
मथुरा के शक राजा राज्बुल से विक्रम स्वम टकरा गया और उसे बंदी बना लिया। आंध्र महाराज सत्कारणी के अनुज अपिलक के नेत्र्तव्य में पुरे मध्य भारत में भैरव सेना ने अपने तांडव से शक सेनाओं को समाप्त कर दिया। विक्रम सेन ने अपने भ्राता भरथरी को उज्जैन का शासक नियुक्त कराया। तीनो शक राजाओं के पराजित होने के बाद ताछ्शिला के शक रजा कुशुलुक ने भी विक्रम से संधि कर ली। मथुरा के शासक की महारानी ने विक्रम की माता सौम्या से मिलकर छमा मांगी तथा अपनी पुत्री हंसा के लिए विक्रम का हाथ मांगा । महारानी सौम्या ने उस बंधन को तुंरत स्वीकार कर लिया। विक्रम के भ्राता भरथरी का मन शासन से अधिक ध्यान व योग में लगता था इसलिए उन्होंने राजपाट त्याग कर सन्यास ले लिया। उज्जैन नगरी के राजकुमार ने पुन: वर्षों पश्चात गणतंत्र की स्थापना की व्यवस्था की परन्तु मित्रों व जनता के आग्रह पर विक्रम सेन को महाराजाधिराज विक्र्माद्वित्य के नाम से सिंहासन पर आसीत् होना पडा।
लाखों की संख्या में शकों का याघ्होपवीत हुआ। शक हिंदू संस्कृति में ऐसे समां गए जैसे एक नदी समुद्र में मिलकर अपना अस्तित्व खो देती है। विदेशी शकों के आक्रमणों से भारत मुक्त हुआ तथा हिंदू संस्क्रती का प्रसार समस्त विश्व में हुआ। इसी शक विजय के उपरांत इशा से ५७ वर्ष पूर्व महाराजा विक्र्माद्वित्तीय के राज्याभिषेक पर विक्रमी संवत की स्थापना हुई। आगे आने वाले कई चक्रवाती सम्राटों ने इन्ही सम्राट विक्रमादित्य के नाम की उपाधि धारण की.
भारतवर्ष के ऐसे वीर शिरोमणि सम्राट विकारामाद्वित्य को शत-शत प्रणाम।





सम्राट विक्रमादित्य का साम्राज्य अरब तक था.
शकों को भारत से खदेड़ने के बाद सम्राट विक्रमादित्य ने पुरे भारतवर्ष में ही नही , बल्कि लगभग पूरे विश्व को जीत कर हिंदू संस्कृति का प्रचार पूरे विश्व में किया। सम्राट के साम्राज्य में कभी सूर्य अस्त नही होता था। सम्राट विक्रमादित्य ने अरबों पर शासन किया था, इसका प्रमाण स्वं अरबी काव्य में है । "सैरुअल ओकुल" नमक एक अरबी काव्य , जिसके लेखक "जिरहम विन्तोई" नमक एक अरबी कवि है। उन्होंने लिखा है,-------
"वे अत्यन्त भाग्यशाली लोग है, जो सम्राट विक्रमादित्य के शासन काल में जन्मे। अपनी प्रजा के कल्याण में रत वह एक कर्ताव्यनिष्ट , दयालु, एवं सचरित्र राजा था।"
"किंतु उस समय खुदा को भूले हुए हम अरब इंद्रिय विषय -वासनाओं में डूबे हुए थे । हम लोगो में षड़यंत्र और अत्याचार प्रचलित था। हमारे देश को अज्ञान के अन्धकार ने ग्रसित कर रखा था। सारा देश ऐसे घोर अंधकार से आच्छादित था जैसा की अमावस्या की रात्रि को होता है।"


"किंतु शिक्षा का वर्तमान उषाकाल एवं सुखद सूर्य प्रकाश उस सचरित्र सम्राट विक्रम की कृपालुता का परिणाम है। यद्यपि हम विदेशी ही थे,फ़िर भी वह हमारे प्रति उपेछा न बरत पाया। जिसने हमे अपनी द्रष्टि से ओझल नही किया"। "उसने अपना पवित्र धर्म हम लोगो में फैलाया। उसने अपने देश से विद्वान् लोग भेजे,जिनकी प्रतिभा सूर्य के प्रकाश के समान हमारे देश में चमकी । वे विद्वान और दूर द्रष्टा लोग ,जिनकी दयालुता व कृपा से हम एक बार फ़िर खुदा के अस्तित्व को अनुभव करने लगे। उसके पवित्र अस्तित्व से परिचित किए गए,और सत्य के मार्ग पर चलाए गए। उनका यहाँ पर्दापण महाराजा विक्रमादित्य के आदेश पर हुआ। "
इसी काव्य के कुछ अंश बिड़ला मन्दिर,दिल्ली की यज्ञशाला के स्तभों पर उत्कीर्ण है,-------------------१-हे भारत की पुन्य भूमि!तू धन्य है क्योंकि इश्वर ने अपने ज्ञान के लिए तुझको चुना। २-वाह्ह ईश्वर का ज्ञान जो सम्पूर्ण जगत को प्रकाशित करता है,यह भारतवर्ष में ऋषियो द्बारा चारों रूप में प्रकट हुआ। ३-और परमात्मा समस्त संसार को आज्ञा देता है की वेड जो मेरे गान है उनके अनुसार आचरण करो। वह ज्ञान के भण्डार 'साम' व 'यजुर 'है। ४ -और दो उनमे से 'ऋग् ' व 'अथर्व 'है । जो इनके प्रकाश में आ गया वह कभी अन्धकार को प्राप्त नही होता। "

विक्र्माद्वितीय के काल में भारत विज्ञान, कला, साहित्य, गणित, नस्छ्त्र आदि विद्याओं का विश्व गुरु था। महान गणितग्य व ज्योतिर्विद्ति वराह मिहिर ने सम्राट विक्रम के शासन काल में ही सारे विश्व में भारत की कीर्ति पताका फहराई।

महाकवि कालिदास भी इन्ही सम्राट विक्र्माद्वितीय के नवरत्नों में से एक थे ।

सोमवार, 8 मार्च 2010

क्या भारत में ऐसा संभव है.

९\११ के आतंकी हमले के बाद अमेरिका ने सूझ-बूझ और साहसयुक्त कदम उठाया है,वैसा ही साहसी कदम उठाना अब भारत के लिए भी आवश्यक हो गया है. यह कहना है एक सेवा-निर्वत्त मुस्लिम सेनाधिकारी का. उनके कथानुसार अमेरिका ने इस हमले के बाद से ही मस्जिदों के इमामों को उनके इलाके में रहने वाले मुस्लिमों की गैर कानूनी गतिविधियों का जिम्मेवार निश्चित किया है,क्योकि प्रत्येक मुस्लिम किसी न किसी मस्जिद से जुड़ा होता है. इस नियम के अंतर्गत अब तक २०० से ज्यादा इमामों को उनके इलाके में संदिग्ध घटनाओं के कारण अमेरिका से बाहर निकाला जा चुका है. इसलिए अमेरिका में उसके बाद आतंकी घटनाओं की पुनरावृति नहीं हुई है.
उस देशभक्त अधिकारी का सुझाव है की भारत सरकार को भी सभी मस्जिदों के प्रमुखों को उनसे सम्बंधित नागरिकों की गतिविधियों का जिमेदार मानना चाहिए. क्योकि उन्हें अपने इलाके में रहने वाले सभी नागरिकों की जानकारी होती है.
वे कहते है की जिस दिन पाकिस्तानी आतकवादियों को भारतीय समर्थक मिलने बंद हो जायेंगे ,उसी दिन से भारत में आतंकवाद दम तोड़ने लगेगा .
देश की सुरक्छा के लिए ऐसी इच्छा शक्ति आवश्यक है . लेकिन क्या भारत में ऐसा संभव है? यह एक yax प्रश्न है.

शुक्रवार, 26 फ़रवरी 2010

मुसलमानों के पूर्वज कोन?(जाकिर नाइक के चेलों को समर्पित लेख)

स्व0 मौलाना मुफ्ती अब्दुल कयूम जालंधरी संस्कृत ,हिंदी,उर्दू,फारसी व अंग्रेजी के जाने-माने विद्वान् थे। अपनी पुस्तक "गीता और कुरआन "में उन्होंने निशंकोच स्वीकार किया है कि,"कुरआन" की सैकड़ों आयतें गीता व उपनिषदों पर आधारित हैं।
मोलाना ने मुसलमानों के पूर्वजों पर भी काफी कुछ लिखा है । उनका कहना है कि इरानी "कुरुष " ,"कौरुष "व अरबी कुरैश मूलत : महाभारत के युद्ध के बाद भारत से लापता उन २४१६५ कौरव सैनिकों के वंसज हैं, जो मरने से बच गए थे।
अरब में कुरैशों के अतिरिक्त "केदार" व "कुरुछेत्र" कबीलों का इतिहास भी इसी तथ्य को प्रमाणित करता है। कुरैश वंशीय खलीफा मामुनुर्र्शीद(८१३-८३५) के शाशनकाल में निर्मित खलीफा का हरे रंग का चंद्रांकित झंडा भी इसी बात को सिद्ध करता है।
कौरव चंद्रवंशी थे और कौरव अपने आदि पुरुष के रूप में चंद्रमा को मानते थे। यहाँ यह तथ्य भी उल्लेखनीय है कि इस्लामी झंडे में चंद्रमां के ऊपर "अल्लुज़ा" अर्ताथ शुक्र तारे का चिन्ह,अरबों के कुलगुरू "शुक्राचार्य "का प्रतीक ही है। भारत के कौरवों का सम्बन्ध शुक्राचार्य से छुपा नहीं है।
इसी प्रकार कुरआन में "आद "जाती का वर्णन है,वास्तव में द्वारिका के जलमग्न होने पर जो यादव वंशी अरब में बस गए थे,वे ही कालान्तर में "आद" कोम हुई।
अरब इतिहास के विश्वविख्यात विद्वान् प्रो० फिलिप के अनुसार २४वी सदी ईसा पूर्व में "हिजाज़" (मक्का-मदीना) पर जग्गिसा(जगदीश) का शासन था।२३५० ईसा पूर्व में शर्स्किन ने जग्गीसी को हराकर अंगेद नाम से राजधानी बनाई। शर्स्किन वास्तव में नारामसिन अर्थार्त नरसिंह का ही बिगड़ा रूप है। १००० ईसा पूर्व अन्गेद पर गणेश नामक राजा का राज्य था। ६ वी शताब्दी ईसा पूर्व हिजाज पर हारिस अथवा हरीस का शासन था। १४वी सदी के विख्यात अरब इतिहासकार "अब्दुर्रहमान इब्ने खलदून " की ४० से अधिक भाषा में अनुवादित पुस्तक "खलदून का मुकदमा" में लिखा है कि ६६० इ० से १२५८ इ० तक "दमिश्क" व "बग़दाद" की हजारों मस्जिदों के निर्माण में मिश्री,यूनानी व भारतीय वातुविदों ने सहयोग किया था। परम्परागत सपाट छत वाली मस्जिदों के स्थान पर शिव पिंडी कि आकृति के गुम्बदों व उस पर अष्ट दल कमल कि उलट उत्कीर्ण शैली इस्लाम को भारतीय वास्तुविदों की देन है।इन्ही भारतीय वास्तुविदों ने "बैतूल हिक्मा" जैसे ग्रन्थाकार का निर्माण भी किया था।
अत: यदि इस्लाम वास्तव में यदि अपनी पहचान कि खोंज करना चाहता है तो उसे इसी धरा ,संस्कृति व प्रागैतिहासिक ग्रंथों में स्वं को खोजना पड़ेगा.

शनिवार, 20 फ़रवरी 2010

satyarthved.blogspot.com का एक वर्ष पूरा

पिछले कुछ महीनो में कभी बिमारी के कारण, कभी किसी और कारण से मै लेखन कार्य से दूर रहा. मित्रों २० फरवरी को ब्लॉग लेखन का पूरा एक साल हो गया है .१ वर्ष में काफी अच्छा अनुभव रहा .ब्लॉग के कारण पूरे भारत के कई प्रदेशों के लोगो को जाना .कुछ टुच्चे किस्म के लोगो से भी पाला पड़ा।आप समझ तो रहे ही होंगे कि में किन गुरु -चेलों कि बात कर रहा हूँ । खैर छोड़ो सब की अपनी अपनी आदत है कोई कितना भी टोके सुधरती नहीं। ब्लॉग के जन्म दिन पर कल से फिर आपके साथ रेगुलर आरहा हूँ । आप सभी से यही आशा करता हूँ कि आप सभी से पहले की तरह ही सहयोग मिलेगा ।
सभी मित्रों को बताना चाहता हूँ कि मैंने जो पाक्सिक पत्रिका राष्ट्र-समिधा कि शुरुआत की थी ,वह ३ महीने से लगातार छाप रही है। तकनीकी कारणों से मै उसे ब्लॉग पर नहीं डाल पाया हूँ। कल से रेगुलर होने के साथ साथ आज विदा लेता हूँ।