मंगलवार, 1 दिसंबर 2009

हिंदू धर्म का पतन-राष्ट्र का पतन

आज राष्ट्र विषम परिस्थितियों से गुजर रहा है । स्थिति इतनी विनाशकारी है की कोई कल्पना भी नहीं कर सकता है। आतंकवाद ,भ्रष्टाचार , अंधविश्वास ,भाषावाद ,जातिवाद , क्षेत्रवाद, अलगाववाद , मतान्तरण , मतान्धता , गरीबी , भुखमरी , बेरोजगारी , अशिक्षा , परिवर्तित शिक्षा , असीमित मुस्लिम तुष्टिकरण आदि अनेकों समस्याओं में से कोई भी ऐसी समस्या नहीं है जो इस भारत वर्ष की भूमि पर न हो। वो राष्ट्र जिस में जन्म लेना ही भाग्यशाली माना जाता था आज उसी राष्ट्र के लोगो में अप्रवासी भारतीय बन ने की अंधी दौड़ मची है। जिस राष्ट्र में आने का और शिक्षा लेने का विदेशियों का सपना होता था आज उसी राष्ट्र के लोगो में विदेशो में पढने की होड़ लगी है। जिस राष्ट्र की भाषा और लिपि ज्ञान की पर्याय मानी जाती थी आज उसी राष्ट्र के लोग उसको लिखने बोलने में शर्म का अनुभव करते हैं, जिस राष्ट्र के लोग वेदानुसार ईश्वरोपासना, वैज्ञानिकता और यज्ञ आदि की बातें करते थे आज विभिन्न प्रकार के अंधविश्वासों,असंख्य मतों में पड़ कर मुर्ख,मतान्धता और अज्ञानता की बातें करते है, जिस राष्ट्र में कभी राम राज्य हुआ करता था आज वहीँ आतंकवाद और भ्रष्टाचार का नृशंस नंगा नाच हो रहा है जहाँ की संस्कृति में सभी को बराबर का अधिकार था आज जातिवाद और क्षेत्रवाद के नाम पर मारकाट मची है, जहाँ का इतिहास सदैव गौरवशाली वीरता भरा रहा है वहां की जनता कायरता का प्रत्यक्ष उदाहरण प्रस्तुत कर रही है जहाँ स्त्री की लज्जा उसका आभूषण होती थी आज स्वयं ही कपडे उतारने पर उतारू हो गयीं हैं। न जाने कितनी समस्याएं इस राष्ट्र को निगलती जा रही हैं पर आज के अधिकतर प्रवचनकर्ता , नेता, स्वनिर्धारित बोद्धिक लोग जनता को अहिंसा,सर्व धर्म सम्भाव, वसुदैव कुटुम्बकम, अतिथि देवो भवः सूक्तों का पाठ पढ़ाते-पढ़ाते नहीं थकते जबकि वास्तव में इन सूक्तों का अर्थ वो गलत सन्दर्भों में पेश करते हैं पर जनता भी आँखे मूँद कर विश्वास करती है जरा सा भी ये प्रयास नहीं होता की ये सूत्र हमारे शास्त्रों में किस सन्दर्भ में और क्यों लिखे गए हैं। इश्वर द्वारा रचित हमारे ही द्वारा पोषित ज्ञान को विदेशी लोगो का ठप्पा लगा कर हमें पढ़ाया जाता है। हमारे जीते हुए युद्धों को भी हार में परिवर्तित कर दिया जाता है।गीता जैसे ग्रंथो का जोकि अध्यात्मिक विधि से वीरता और साहस का पाठ पढ़ाती है उसको भी लोग कायरता के रूप में व्याखित करते हैं, मेरी समझ में ये नहीं आता की हम सब लोगो को हो क्या गया है हम किस स्वप्नलोक में जी रहे हैं शायद सोच रहे हैं की कोई आएगा और इन समस्याओं का निवारण करेगा पता नहीं लोग किस भ्रमजाल में हैं। मैं समझता हूँ आज स्थिति मुग़ल काल और ब्रिटिश राज से भी बदतर है। कम से कम उस समय लोग विरोध करते थे क्रांतियाँ चलती रहती थी किन्तु आज तो स्वयं ही अपना सब-कुछ अर्पित कर दिया है और मानसिक गुलामी की पराकाष्ठा पर पहुँच चुके हैं, सोनिया गाँधी को राज सोंपना इसका ज्वलंत उदाहरण है।महर्षि दयानंद सरस्वती ने हिन्दुओं की दुर्दशा को देखते हुए कहा था की हिन्दू एक लुप्त प्रायः वर्ग है वास्तव में उनका तात्पर्य था की हिन्दुओं जाग जाओ वरना समाप्त हो जाओगे, किन्तु उनकी चेतावनी का कोई असर नहीं दिखता लोग तो गाँधी -नेहरु सरीखे लोगो के ही दीवाने हैं, पिछले ६० वर्षों से और विशेषतः कुछ २ दशक से एक ऐसा चमत्कारी शब्द जिसने हिन्दुओं को अनेक बार ठगा है पर फिर भी लोग इसके दीवाने हैं और इसके मोहजाल से निकल ही नहीं पाते हैं वो शब्द है सेकुलर, सेकुलर शब्द का अपना इतिहास है पर संक्षिप्त में यह है की जब यूरोप में चर्च का पॉप राज चलता था और इसाईओं के अतिरिक्त मान्यताओं का पूर्णतयः बहिष्कार था तब लम्बे युद्धों के बाद उस पॉप राज के विरोध में एक शासन आया जो की सेकुलर था मतलब की चर्च के अन्यायी पॉप राज के विरुद्ध में सेकुलर राज स्थापित हुआ। भारत में इस शब्द का अत्यधिक प्रचार नेहरु काल से आरम्भ हुआ और अब तक चमत्कारी ढंग से अपना कार्य कर रहा है। भारतीय दर्शन या हिन्दू दर्शन अथवा वैदिक या सनातन धर्म में न की केवल गैर हिन्दुओं भारतियों को वरन सभी विश्व के मानवों को एक ही द्रष्टिकोण से देखा जाता है इस कारण यहाँ सभी के लिए न्यायिक विधि एक ही रहती है और किसी को भी भेदभाव की द्रष्टि से नहीं देखती है यहाँ पर कभी भी पॉप की तरह राज नहीं रहा है वो बात अलग है मध्य में कुछ राजा धूर्त लोगो के जाल में फंस कर कुछ गलत कार्य कर गए किन्तु हमारे प्रमाणित धर्मं शास्त्रों में कोई भी इस तरह की बात नहीं लिखी है आज आतंकवाद सहित सभी समस्याओं के मूल में हमारा अपने इतिहास और धर्मं शास्त्रों से हट कर अंधविश्वास में लिप्त होना ही है। यदि आप इस कारण पर गौर करेंगे तो इसको निराधार नहीं मानंगे। होता क्या है जब भी हम धर्मं शास्त्रों की बातें करते हैं तो अधिकतर लोग सोचते हैं की पूजा,भस्म, कमंडल आदि की बात करने जा रहे हैं या फिर अपने में और सब में भगवान् देखो कुछ इस तरह की बातें करने वाला होगा या अहिंसा का पाठ पढ़ने की बात करंगे। जबकि वास्तविकता कुछ और ही स्पष्ट करती है। यदि कोई पुस्तक ये कहती है की मांस खाना, बलि देना , मदिरापान करना वेदों में लिखा है तो लोग उसका बिना सोचे समझे अनुसरण करने लगते हैं। आज बहुत से लोग ऐसे भी मिल जायेंगे जो यज्ञो में बलि देते हैं, शराब को प्रसाद में बांटते हैं और धार्मिक क्रियाकलापों में मांस आदि का भक्षण करते हुए मिल जायेंगे। उनसे पूछे जिस लेखक की पुस्तक उन्होंने पढ़ी है क्या वो विद्वजनों के मध्य प्रमाणिक भी है क्या वो लेखक उस कोटि का है भी जिसकी बातें अविरोध मान लिया जाये बल्कि हमारे न्याय शास्त्र में स्पष्ट लिखा है की जब तक वादी-प्रतिवादी होकर न्याय नहीं किया जाये तब तक सत्यासत्य का निर्णय नहीं हो सकता मतलब प्रमाणों के द्वारा सत्य सिद्ध नहीं किया जाये तब तक उसको निर्विवाद सत्य नहीं मन जा सकता। सभी आप्त पुरुष अपनी बातों को प्रमाण द्वारा समझाते हैं तो ऐरे-गिरे की बात ही क्या करें। कालांतर में हमारे धर्म शास्त्रों के नाम पर सैकडों-हजारों पुस्तके लोगो ने अपने को प्रिसिद्ध और विद्वान घोषित करने के लिए लिख डाली ये कार्य ऐसा नहीं की अभी हुआ है ये कार्य तो महाभारत काल के पश्चात् से ही आरम्भ हो गया था। मैं इस बात को किसी आधार पर ही कह रहा हूँ यदि कोई मेरी बात से सहमत नहीं है तो प्रतिवाद कर तर्क-वितर्क के द्वारा सत्य का निर्धारण कर सकता है ।आप गूगल इमेज में जा कर Hindu Sadhu लिख कर सर्च करिए आपको राख मले हुए, उट-पटांग आसन करते हुए, त्रिशूलधारी मैले -कुचैले कपड़े पहने हुए या और भी जंगली तरह के लोगो की तस्वीरें ढेरो मिल जाएँगी क्या ये ही है हमारा हिन्दू धर्मं यदि ये ही स्वरुप है तो उनसे लाख बेहतर कोई इंसान ईसाई या मुस्लिम होना अधिक पसंद करेगा। ये लोग मूर्खो के अलावा कोई और नहीं है और ये हिन्दू होने का गलत अर्थ दुनिया के सामने प्रस्तुत कर रहे हैं । इनसे यदि धर्म की बातें करोगे तो इन्हें अ ब स कुछ पता नहीं होता बस कुछ इन्ही के जैसे द्वारा लिखित अप्रमाणिक पुस्तकों पर ये विश्वास करते हैं या फिर अपने को ज्ञानी बताने का ढोंग करते घूमते हैं। गूगल पर हिन्दू भगवान से सर्च करिए तो राम कृष्ण शिव विष्णु आदि के साथ - साथ कितने ही सारे बाबा और और गुरु भगवान के नाम से संबोधित होते हैं। अधिकतर आजकल सभी गुरु अपने को भगवान बोलते हैं और अपने को चेलो से पुजवाते हैं और आश्चर्य जनक रूप से लाखो-करोड़ो लोग इन बाबाओं और गुरुओं को भगवान मान कर पूजते हैं।मैं यहाँ कुछ प्रश्न उठाना चाहूँगा की १।कौन से प्रमाणिक ग्रन्थ में ये लिखा है की इस तरह का रूप भरने से इश्वर की प्राप्ति होती है? २.क्या मनुष्य भगवान होता है ? मनुष्य को भगवान् मानने का चलन आदि शंकराचार्य से प्रारंभ हुआ है किन्तु शंकराचार्य ने किसी परिस्थितिवश और उपनिषदों में ईश्वर उपासना की द्रष्टि से सब जगत को इश्वर के रूप में देखने के लिए कहा है अन्यथा वहां भी इश्वर को जगत को उपादान न मानते हुए निमित्त या प्रेरणाकार कहा है जैसे मनुष्य के किसी भी कार्य करने के लिए एक संकल्प शक्ति विद्यमान होती है मतलब यदि गहराई से सोचो तो उदाहरण के तौर पर मुझे एक गिलास पानी पीना है तो मैं जब उठ कर चल कर पानी नहीं लूँगा तो पानी अपने आप मेरे पास नहीं आएगा तो उठने, चलने और पानी पीने के पीछे वो संकल्प शक्ति ही विद्यमान है जिसके कारण मैं अपने शरीर की आवश्यकता पूर्ण करता हूँ। कहने का तात्पर्य इतना है की जगत भी उस इश्वर की संकल्प शक्ति और प्रकृति से ही बना है और उसीकी शक्ति से अपने उपादान कारण प्रकृति में लीन हो जाता है। ईश्वर कभी जगत में परिवर्तित नहीं होता यदि ये मान लिया जाये तो वह परिणामी हो जायेगा और ये सर्वविदित है चेतन परिणामी नहीं होता। ये जगत हमेशा से विद्यमान है अभी व्यक्त है और महाप्रलय में अव्यक्त हो जायेगा किन्तु कभी सर्वथा नष्ट नहीं होता जैसे कोई ये कहे बिल में सांप नहीं था और उसमें से सांप निकल आया तो ये संभव नहीं है क्योंकि अभाव से किसी की उत्पत्ति नहीं होती इसीलिए जगत निर्माण की सामग्री हमेशा से ही इस ईश्वर में उपस्थित रहती है ईश्वर स्वयं उसमें परिवर्तित नहीं होता। आत्मा भी चेतन है अनादी है अंतरहित है अल्पज्ञ है और संख्या की द्रष्टि से असंख्य हैं किन्तु ईश्वर एक है सर्वज्ञ है अनादी है अनंत है आकाश की तरह सर्व व्यापक है जिस प्रकार आकाश भिन्न रहते हुए भी सबमें उपस्थित रहता है एक परमाणु भी रिक्त नहीं है उस आकाश से उसी प्रकार उस आकाश से भी सूक्ष्म,अखण्ड और विराट ईश्वर भिन्न रहते हुए भी उस आकाश सहित सबमें उपस्थित रहता है जभी वो तो सबका नियंता होता है। मैंने यहाँ प्रसंग वश संक्षिप्त में इस बारे में इसलिए लिखा है कि हिन्दू , आर्य या सनातन दर्शन इतना व्यापक और वैज्ञानिक है कि आप सोच भी नहीं सकते और हम राख मलने वालो , नंगे साधुओं, चालाक प्रवचनकर्ताओं (अधिकतर) को भगवान् मान कर पूजते हैं और वो ही उनका उद्देश्य होता है।इस अन्धविश्वास से हमें निकल कर हमें अपने सत्य धर्म वैज्ञानिकता का पालन करना चाहिए और अपने राष्ट्र को अन्धकार से निकाल के विश्व के भले के लिए फिर से विश्वगुरु बनने कि राह पर अग्रसर होना चाहिये। जब मनुष्य अंधविश्वासों से निकलेंगे और ज्ञान का प्रचार होगा तो आधी समस्यायें स्वतः ही समाप्त होंगी और हिन्दू इस अंतहीन जातिवाद समस्या से निकल कर साहसी, स्वाभिमानी, निर्भीक, न्यायिक, पुरुषार्थी और राष्ट्रवादी बनेगा और थोपा हुआ गलत इतिहास बदला जायेगा, स्वः घोषित भगवानो या अपने को पुजवाने वालो को तिरस्कार या दण्ड मिलेगा और मनुष्यता या हिन्दू अथवा सनातन वैदिक धर्म का उत्थान होगा विश्व में शांति स्थापित होगी।

रचनाकार --- सौरभ अत्रे

मंगलवार, 10 नवंबर 2009

लेके बगावत आग की.

बर्फ के पन्नो पे लिखकर,इक इबारत आग की।
फ़िर रहा करता शहर में, मै तिजारत आग की।

बर्फ से गलते शहर में , ढूँढ़ते जो आशियाँ।
बांटता मै फ़िर रहा,उनको इमारत आग की।

बारूद पर बैठा हुआ मै ,लिख रहा तहरीर हूँ।
ले जाए जिसको चाहिए,जितनी जरूरत आग की।

है वतन के वास्ते, जिनके दिलों में जलजला ।
सिखला रहा करना उन्हें ही,मै इबादत आग की।

कब जरुरत आ पड़े ,फिरसे वतन की कोम को,
भरके गजल में कर रहा हूँ ,में हिफाजत आग की.

लिखने गजल को जब उठाता,मै कलम को हाथ में।
लगती उगलने आंच ये,लेके बगावत आग की।





रविवार, 1 नवंबर 2009

सरकार देश को बतलाये कि देशद्रोही की परिभाषा क्या है ?

भारत सरकार के गृहमंत्री चिदम्बरम के हालिया बयान के अनुसार उन्होंने कश्मीरी जनता को विशवास दिलाया कि केन्द्र सरकार आजाद कश्मीर की मांग करने वालों व पकिस्तान समर्थक अलगाववादियों (जेहादियों से ) बात करने को तैयार है,और इन सभी बातों को मीडिया से दूर रखा जाएगा।
चिदंबरम ने कश्मीर समस्या को राजनीतिक समस्या बताकर भारत की अस्मिता से छेड़-छाड़ करने वाले ,भारत के राष्ट्रिय ध्वज का अपमान करने वाले,भारतीय संविधान को नकारने वाले और लाखों की संख्या में हिन्दुओं का घर-बार उजड़ने वालों को राजनेता के रूप में स्वीकार कर लिया है।केन्द्र सरकार की इसी नीतियों के कारन आज समस्त विश्व के इस्लामिक देश भारत को कश्मीर मुद्दे पर घेरने की तैयारी कर चुके है। भारत के दुश्मन नंबर २ चीन ने तो कश्मीर को अपने नक्शे में एक अलग देश दिखाना शुरू कर दिया है।
३० सितम्बर को दिल्ली में एक प्रेस वार्ता में चिदम्बरम ने कहा कि जेहादियों से लगातार वार्ता चल रही है। कोई भी प्रबुद्ध व्यक्ति इस बात को बता सकता है कि जेहादियों की केन्द्र सरकार से क्या मांगे हो सकती हैं? क्यों कि इससे पहले भी कश्मीर के जेहादियों से ४ बार वार्ता हो चुकी है। दो बार अटल बिहारी की सरकार में तथा दो बार मनमोहन की प्रथम पारी में, लेकिन कोई नतीजा नही निकला। क्यों कि जेहादियों की मांगे थी कि,कश्मीर को आजाद किया जाय, जेलों से सभी आतंकवादी छोडे जाय,भारतीय सेना को कश्मीर से तुंरत हटाया जाय,सुरक्षा-बालों के विशेष अधिकार समाप्त किए जाँय,और एक दो संगठनो ने तो सारी हद पार करते हुए मांग की कि पाकिस्तानी मुद्रा को चलाया जाय।
इतना सब कुछ होने के बाद भी भारत सरकार इन जेहादियों के साथ अपने दामाद की तरह व्यवहार करती है। सरकार इनके शाही ढंग से आने -जाने की व्यवस्था करती है। इनको ५ सितारा होटलों में ठहराती है। इनके खाने -पीने का इंतजाम करती है,और कुछ को तो सुरक्षा भी देती है।
जेहादियों ने दिल्ली में होने वाली वार्ता का जो एजेंडा तैयार किया है उसमे कश्मीर की आजादी से कम कुछ भी नही है। राजनीतिक क्षेत्र में चर्चा का बाजार गर्म है और माना जा रहा है कि कश्मीर की आजादी को छोड़कर सरकार जेहादियों की सभी मांगो के लिए तथास्तु कहने वाली है। यानि कि कश्मीर से सेना का हटना,सुरक्षा बालों के विशेष अधिकारों को समाप्त होना, आतंकवादियों का बिना शर्त रिहा होना,जेहादियों को सरकारी नोकरी मिलना,तथा उनको आर्थिक सहायता मिलना सभी कुछ निश्चित सा है। मनमोहन सिंह तो पहले ही ७०००० आतंकियों के परिवारों को पेंशन देने कि बात कर चुके हैं।
इन सभी बातों के बाद भारतीय जनता स्वम विचारे कि, अगर कुछ लोग मिलकर भारत के किसी भी हिस्से को भारत से काटने की बातें करे उस हिस्से कि आजादी कि मांग करे तो क्या वे देशद्रोही नही ठहराए जाएंगे? निसंदेह वे लोग देशद्रोही ही हैं.,तथा उन पर देशद्रोह का ही मुकदमा चलेगा। तो फ़िर कश्मीर की आजादी की मांग करने वाले,उसको पाकिस्तान का हिस्सा मानने वाले, तिरंगे को जलाने वाले,पाकिस्तानी झंडा फहराने वाले और भारतीय संविधान को न मानने वाले देशद्रोही क्यों नही हैं ?
सरकार देश को बताये कि संविधान के अनुसार देशद्रोही की क्या परिभाषा है? तथा देशद्रोही क़ानून किसके लिए आरक्षित है?

शनिवार, 31 अक्तूबर 2009

पाँव में चुभने लगे .

देश पर चर्चा चली तो,प्रश्न भी उठने लगे।
शर्म से चेहरे हमारे,बेतरह झुकने लगे॥ १

आँधियों के पाँव में तो,बेडियाँ डाली नही।
दीपकों से रोशनी के,वायदे करने लगे॥२

होंसले लेकर चले थे,रहबरों के साथ हम।
वे रास्ते ही रहबरों के पाँव में चुभने लगे॥ ३

जब उजालों से रही,पहचान न बिल्कुल कोई।
जुगनुओं की रौशनी को,रौशनी कहने लगे॥४

तारीख लिखेगी तुम्हारे कर्म की हर दास्ताँ।
सर कटाकर किस तरह, मगरूर तुम रहने लगे॥५

की है तरक्की आदमी ने इस कदर, है अब तलक।
लड़ते थे जो कि पत्थरों से ,बारूद से लड़ने लगे॥६

रचनाकार ---मेरे पिता श्री देवेन्द्र सिंह त्यागी







बुधवार, 28 अक्तूबर 2009

अमेरिका भारत की धार्मिक नीतियों के बारे में बोलना बंद करे.

अब भारत सरकार की धार्मिक निति क्या हो और उसे पूरे देश में किस प्रकार लागू किया जाय ?इसकी चिंता अमेरिका सरकार को सताने लगी है। इस्लामिक देशों की अपने अपने देश में अल्पसंख्यकों के प्रति क्या निति है किस प्रकार सरेआम वहां अल्पसंख्यकों को मोत के घाट उतारा जा रहा है, किस प्रकार मानवाधिकारों की वहां धज्जियाँ उडाई जा रही हैं,यह सब देख सुनकर भी अमेरिका किसी भी छोटे मोटे इस्लामिक देश के विरूद्ध एक भी शब्द बोलने का साहस नही कर पाता। चीन की किसी भी घरेलू निति के बारे में बोलने में जिस अमेरिका की रूह कापती है,आस्ट्रेलिया में हो रहे भारतीय समाज पर हमलों के बारे में जिसने एक शब्द भी नही बोला है,वह आज भारत की धार्मिक निति पर खुले आम बयानबाजी कर रहा है तथा एक रिपोर्ट तैयार कराई है।
जी हाँ ,अभी हाल ही में अमेरिका के लोकतंत्र ,मानवाधिकार और श्रम मामलों के सहायक मंत्री माइकल एच पोजर ने भारत की केन्द्र सरकार की धार्मिक निति पर बोलते हुए कहा है की ,"प्रश्न यह है कि भारत की केन्द्र सरकार की निति को स्थानीय स्तर पर किस प्रकार लागू किया जाय। "
अमेरिका ने इस मामले में जो रिपोर्ट तैयार की है,उसमे कांग्रेस सरकार की धार्मिक निति (भारत का इसाई करण)
की प्रशंसा की है,तथा भाजपा की नीतियों की आलोचना की है। रिपोर्ट में कहा गया है कि,"कुछ प्रदेशों में इस धार्मिक स्वतंत्रता को धर्मांतरण विरोधी क़ानून बनाकर या क़ानून में संशोधन करके इसे सीमित कर दिया है,और वहां पर अल्पसंख्यक लोगो पर आक्रमण करने वाले लोगो के विरूद्ध कोई भी प्रभावी कार्यवाही नही की गई है।" रिपोर्ट में वरुण गाँधी के भाषण का भी जिक्र किया गया है।
इस बात को अगर पूरी गहराई से परखा जाय,तो स्पष्ट रूप से दिखाई पड़ता है कि किस प्रकार अमेरिका भारत को एक इसाई देश बनाने की सुनियोजित षड़यंत्र रच रहा है।
कभी राजग सरकार के साथ गलबहियां करने वाला अमेरिका किस प्रकार एक विदेशी इसाई महिला के हाथ में सत्ता की चाबी आते ही किस षड़यंत्र में लग गया है, यह रिपोर्ट साफ़ बताती है।

गुरुवार, 15 अक्तूबर 2009

१५ ओक्टुबर को दुर्गा भाभी की पुन्य तिथि पर मेरा शत- शत नमन

भारतीय स्वतंत्रता संग्राम में एक क्रांतिकारी थे भगवतीचरण वोहरा। भगत सिंह जी का पूरा संगठन उनको बड़ा भाई मानता था। उनकी धर्मपत्नी का नाम था दुर्गा, और यही दुर्गा इतिहास में दुर्गा भाभी का नाम पाकर अमर हो गई।
जिस समय सरदार भगत सिंह जी व उनके साथियों ने लाला लाजपत राय जी की म्रत्यु का बदला लेने के लिए दिन दहाड़े सांडर्स को गोलियों से उड़ा दिया था। तो अंग्रेज एकदम बोखला गए थे। उन्होंने चप्पे चप्पे पर क्रांतिकारियों को पकड़ने के लिए निगरानी शुरू कर दी। क्रांतिकारियों के लाहोर से निकलने में दुर्गा भाभी का योगदान अविस्मरनीय है।
उस समय भगवतीचरण वोहरा फरार थे। दुर्गा भाभी लाहोर की एक छोटी सी गली में एक मकान में रह रही थी। भगत सिंह जी की पत्नी बनकर उन्होंने भगतसिंह व राजगुरु को लाहोर स्टेशन से लखनऊ तक पहुचाया। उनके साथ उनका पुत्र शचीन्द्र भी था। राजगुरु जी उन के नोकर के रूप में थे।
इसके बाद भगत सिंह व बटुकेश्वर दत्त ने दिल्ली असेम्बली में बम फैंका, और अपनी ग्रिफतारी दे दी।उसके पश्चात् जब भगत सिंह, राजगुरु व सुखदेव को फांसी की सजा हो गई तब दुर्गा भाभी,सुसीला दीदी तथा साथियों ने मिलकर जेल से भगत सिंह व साथियों को छुटाने के लिए एक योजना बनाई । इसके अर्न्तगत दिल्ली में एक छोटी सी बम फैक्ट्री बनाई गई। इसमे बने बम का परिक्षन करते हुए दुर्गा भाभी के पति वोहरा जी की मौत हो गई।
पति की म्रत्यु के पश्चात् दुर्गा भाभी ने भगत सिंह को छुड़ाने का कार्य अपने हाथ में ले लिया। परन्तु दुर्भाग्य से उस बम फैक्ट्री में विष्फोट हो गया,और दुर्गा भाभी व साथियों को भूमिगत होना पड़ा।दुर्गा भाभी की सारी संपत्ति जब्त कर ली गई,किंतु वे अपने पथ पर अग्रसर होती रही। वे भगत सिंह की रिहाई के लिए गाँधी से भी मिली,किंतु कोई फायदा नही हुआ।
भगत सिंह व साथियों को फंसी लगने के बाद वे अत्यन्त दुखी हुई। उन्होंने अंग्रेजों से बदला लेने के लिए पुलिस कमिश्नर को मारने का निर्णय किया। उन्होंने अपना बच्चा अपने एक रिश्तेदार के पास छोड़ दिया। अपनी इस योजना को कार्य रूप देने के लिए वे मुंबई जा पहुची। एक रात काली साडी पहनकर वे कमिश्नर के बंगले पर जा पहुची। क्रन्तिकारी प्रथ्वी सिंह उनके साथ थे।
कुछ अंग्रेज कमिश्नर के बंगले की और से आते दिखाई दिएदुर्गा भाभी अत्यन्त आवेश व गुस्से में थी। उन्होंने तुंरत गोली चला दी। कमिश्नर उन लोगों में नही था। गोली लगने से तीन अंग्रेज घायल हो गए।वहाँ से भागकर उन्होंने तुंरत मुंबई को छोड़ दिया। काफी समय तक वो पुलिस से बचती रही। लेकिन बाद में गिरफ्तार हो गयीं। सबूतों के अभाव के कारण उनको कोई सजा तो नही हुई किंतु फ़िर भी उनको नजरबन्द रक्खा गया,तथा बाद में रिहा कर दिया गया।
उनके सभी साथी शहीद हो चुके थे। वे बिल्कुल बेसहारा हो चुकी थी। अंत में थक हारकर बैठने के बजाय वे समाज सेवा में लग गई। १९३७ से १९८२ तक वे लखनऊ में वे एक शिक्षा केन्द्र चलाती रही। उसके बाद वे गाजियाबाद में आकर बस गई। १५ ओक्टुबर १९९९ को उनका स्वर्गवास हो गया। उनकी मौत एक गुमनामी की मौत रही। उनकी शवयात्रा में देश का कोई बड़ा नेता तो नेता गाजियाबाद का भी कोई क्षेत्रिय नेता भी शामिल नही हुआ।हाँ कुछ पत्रकारों द्बारा सरकार की खिल्ली जरूर उडाई गई।

रविवार, 4 अक्तूबर 2009

आवश्यकता है अभी एक और स्वतंत्रता संग्राम की

सम्पूर्ण विश्व ने सदियों से भारत पर लगातार आक्रमण किए हैं किंतु मुख्यतः मुग़ल और ब्रिटिश लोगो को ही अधिक सफलता मिली है। मुग़ल और ब्रिटिश लोग भी इस राष्ट्र पर कभी पुर्णतः राज नही कर सके।भारत जब गुलाम था और यहाँ मुग़ल और ब्रिटिश साम्राज्यवादियों का साम्राज्य था ,उस समय देश में किसी न किसी जगह क्रांति चलती ही रहती थी और यहाँ के लोगो ने प्राण गवाएं पर कभी मन से दासता स्वीकार नही की किंतु आज देश के एक बड़े वर्ग ने पराधीनता और गुलामी स्वीकार ली है और जिनकी पराधीनता स्वीकार की है ,अब उनका उद्देश्य पूरे राष्ट्र को पराधीन बनाने का है और इस कार्य को बड़ी कुशलता के साथ क्रियान्वित कर रहे हैं। उन्होंने चारो तरफ़ ऐसा जाल बिछाया है की इसको हर कोई आराम से समझ भी नही पाता एक ऐसा माहौल बना दिया है की किसी भी भारतवासी में आत्मसम्मान या आत्मविश्वास जाग्रत न हो जाए और अपने को हीन भावना से ही ग्रस्त समझे। वर्तमान में पूरे विश्व में ये अकेला देश ऐसा है जिसको अपनी भाषा में लिखते-बोलते-पढ़ते शर्म आती है जो अमेरिका और ब्रिटेन की नौकरी करना पसंद करता है या सिर्फ़ एक उपनिवेश बन कर रहना चाहता है। यहाँ के उधोगपति, नौकरीपेशा या थोड़ा सा भी संपन्न व्यक्ति इंग्लिश बोलता है या बोलने का प्रयास करता दिखाई देता है और बड़ा ही गर्व महसूस करता है। मैं किसी भाषा के विरुद्ध नही हूँ और मैं भी फिलहाल इंग्लिश भाषी देश में कार्यरत हूँ किंतु इंग्लिश बोलने पर गर्व नही करता क्युकी मैं इसको एक साधारण भाषा से अधिक कुछ नहीं समझता जैसा की चाइना , जापान, रसिया, फ्रांस, स्पेन आदि के लोग समझते हैं। मेरा यह मानना है और यह प्रत्यक्ष भी है की भाषा, ज्ञान का पर्यावाची नही होती और कोई राष्ट्र अपनी भाषा में ही तरक्की कर सकता है अन्यथा उसकी तरक्की कुछ सीमित लोगो तक ही सीमित रहती है। जापान, यु. एस., चाइना इस बात के ज्वलंत उदाहरण है कि अपने स्वाभिमान और आत्मविश्वास से ही तरक्की होती है न कि किसी की नक़ल से।भारतियों में ये प्रचार बहुत है कि कंप्यूटर पर हिन्दी में कार्य करना सम्भव नहीं है इसके लिए हँसी के टेक्निकल शब्द बनाकर बहुत मजे लिए जाते हैं। ये तो गुलामी कि मानसिकता की पराकाष्ठा है। चाइना की मैंडरिन भाषा में ३०० से अधिक अक्षर हैं और वो अपना समस्त कार्य इसी में करते हैं और ऐसा ही जापान, रसिया, फ्रांस आदि के लोग करते हैं। जापान आदि कई देशो में प्रोग्रामिंग भी जापानीज़ आदि में होती है। नयी खोज के साथ भाषा में नए शब्दों का भी निर्माण होता है। किंतु हिन्दी में ऊटपटांग शब्द बना कर कुछ भारतीय हँसते हैं और गुलामी कि चरम सीमा पर पहुच जातें हैं।

कुछ लोग आई. टी. और सोफ्टवेअर में भारत की कामयाबी को ही पूर्ण राष्ट्र कि तरक्की मानते हैं। क्या यह देश केवल सोफ्टवेअर और आई टी इंजिनीयर्स का ही है बाकी जनता को देश निकाले की सजा देनी चाहिए। क्या केवल एक क्षेत्र में तरक्की करके इतने विशाल देश का भरण-पोषण हो सकता है। एक अनुमान के अनुससार २०२० तक भारत में १५ करोड़ से भी अधिक बेरोजगार हो जायेंगे और अब भी कितने ही करोडो लोग भूखे-नंगो का नर्कीय जीवन जीने पर मजबूर हैं।ये कैसी तरक्की कि है भारत ने १९९७ से करीब १ लाख ८२ हजार ९३६ किसान आत्महत्या कर चुके हैं, जबकि सरकार अमेरिका कि नक़ल से बेलआउट में मस्त है।२००७ के दौरान १६६३२ किसानों ने आत्महत्या कर ली। इनमें सर्वाधिक किसान महाराष्ट्र से हैं। गांव-देहात में मौत का धारावाहिक तांडव जस का तस जारी है। दिन-प्रतिदिन बेरोजगारी बढती जा रही है और भारत के इंजिनियर अमेरिका और ब्रिटेन के लिए काम करके बहुत प्रसन्न हो रहे हैं कि देश तरक्की कर रहा है। यदि वर्तमान में देश की समस्याओं पर एक पुस्तक लिखी जाए तो कम से कम १०००० पृष्ठ तो आराम से लिखे जा सकते हैं। जो भारत का शहरी धनाड्य और संपन्न वर्ग है उसको केवल अपनी तरक्की ही सारे देश की तरक्की नज़र आती है किंतु कटु सत्य यह है मुश्किल से २-३ करोड़ लोग ही संपन्न हैं और अधिक से अधिक ५ करोड़ हैं और ये ही लोग ओर अधिक संपन्न होते जा रहे हैं और ये ही लोग देश पर राज भी कर रहे हैं और बाकी जनता को लच्छेदार बातो में उलझा के उनका शोषण कर रहे हैं।ऊपर से सेकुलर्स खुलेआम प्रत्यक्ष आतंकवादियों को समर्थन देते हैं और शान्ति का राग अलाप करके जनता के विद्रोह या क्रांति को शांत करने में लगे रहते हैं ।

मजे की बात देखो जनता का बेवकूफ उसी के सामने बनाया जा रहा है और जनता जातियों और गुटों में विभाजित होकर अपना बलात्कार करा रही है और जरा सी लज्जा भी नही है। अब राष्ट्रभक्ति का भी वो सम्मान नहीं है ओर लोग स्वतंत्रता को Happy Republic Day या Happy Independence Day कह कर अपना कर्तव्य पूर्ण करते हैं। यदि लोग ये समझते हैं की १९४७ में देश स्वतंत्र हुआ था तो वो एक बहुत बड़े भुलावे में हैं गौर से इतिहास को पलट कर देखो ओर जिनके हाथो में वो सत्ता आई थी उनका व्यक्तित्व देखो तो पाओगे वह एक सत्ता का स्थानांतरण था जो की कुछ अंग्रेजो से हट कर दूसरे अंग्रेजो के हाथ में आ गई थी। उन्होंने उस समय न तो अंग्रेजो के कानून को बदला न ही अपनी शिक्षा पद्धति लागू की, न ही ग़लत इतिहास को बदलने का प्रयास किया और न ही देश को एक सूत्र में बांधने का प्रयास किया वरन् देश को अंग्रेजो की नीति पर ही मुस्लिम तुष्टिकरण, भाषा, जाति आदि के नाम पर इसको खंड-बंड कर दिया। ये कैसी स्वतंत्रता है भाई मेरी समझ से परे है। इन्होने देश को मानसिक गुलाम बना दिया ओर उसीका परिणाम है आज जनता ने स्वयम ही देश की सत्ता एक विदेशी महिला के चरणों में अर्पित करदी अब केवल उसका मन्दिर बनाना ही बाकी है।

हमें राष्ट्र और राष्ट्रवाद को जानना चाहिए यजुर्वेद के अनुसार

आ ब्रह्मन ब्राहमणों ब्रह्मवर्चसी जायतामा राष्ट्रे राजन्यः शूरअइषव्योअतिव्यधि महारथो जायतां दोग्ध्री धेनुर्वोधानडवानाशुः सप्तिः पुरन्धिर्योषा जिष्णू रतेष्ठा सभेयो युवास्या यजमानस्य वीरो जायतां, निकामे निकामे नः पर्जन्यो वर्षतु फलवत्यो नअओषधयः पच्यन्तां योगक्षेमो नः कल्पताम्।।

इस सूक्त के अनुसार जन समूह, जो एक सुनिश्चित भूमिखंड में रहता है, संसार में व्याप्त और इसको चलने वाले परमात्मा अथवा प्रकृति के अस्तित्व को स्वीकारता है, जो बुद्धि या ज्ञान को प्राथमिकता देता है और विद्वजनों का आदर करता है, और जिसके पास अपने देश को बाहरी आक्रमण और आन्तरिक, प्राकृतिक आपत्तियों से बचाने और सभी के योगक्षेम की क्षमता हो, वह एक राष्ट्र है।

अंग्रेजी भाषा के ऑक्सफोर्ड शब्दकोष में नेशन शब्द का अर्थ बताया गया है - 'वह विशिष्ट जाति अथवा जन समूह जिसका उदगम, भाषा, इतिहास अथवा राजनीतिक संस्थाएं समान हों ।'
वैसे पश्चिम में नेशन को और अलग-अलग तरीको से भी परिभाषित किया गया है। आज का संसार नेशन-स्टेट्स में विभाजित है। आप देख सकते हैं भारत की राष्ट्र की परिभाषा और पश्चिम में कितना अन्तर है। यह भी एक पूर्ण विषय है जिस पर पूरी पुस्तक लिखी जा सकती है। मेरा यहाँ पर तात्पर्य ये है की भारत एक राष्ट्र है और उसकी आत्मा वहां की संस्कृति और लोगो की वो भावना है जो उनको एक राष्ट्र के लिए समर्पित करती है । किंतु आज न केवल इसके राष्ट्र होने में संदेह किया जाता है वरन इसकी आत्मा हिंदू समाज को आतंकवादी, अत्याचारी जैसे शब्दों से परिभाषित किया जाता है। पूरे विश्व में सनातन धर्म या हिन्दुओ की छवि को कलंकित करने का व्यापक तौर पर कार्य और षडयंत्र किया जा रहा है। खुलेआम प्रत्यक्ष राष्ट्रवादी शक्तियों का दमन हो रहा है और आज का हिंदू समाज मौन धारण किए किसी ईश्वरीय अवतार की प्रतीक्षा में बैठा दिखाई देता है जबकि मनुष्य अपने कर्मो का स्वयं कर्ता और भोक्ता होता है। और सत्य की तभी जीत होती है जब उसके जीतने की चेष्टा की जाती है। यदि कोई प्रयास ही नही करेगा तो ये देश इन सेकुलर्स जिनका उद्देश्य ही हिंदू,हिन्दुज्म को जड़ से मिटाना है के हाथो गुलाम या मुस्लिम मजहबी देश में परिवर्तित हो जाएगा । ये सेकुलर्स यहाँ यू. एस. में और विदेशो में बैठे भारतीयों को अपने राष्ट्र से काटने के लिए विशेष फिल्में या मूवी बनाते हैं, पुस्तकें लिखते हैं, समाचार पत्र में लेख लिखते हैं आदि कार्य ये बड़ी ही दृढ़ इच्छा के साथ युद्ध स्तर पर कर रहे हैं।ये सेकुलर लोग जिमी मानसिकता से ग्रस्त जिमी-टैक्स अदा कर रहे हैं जो मुग़ल काल में हिन्दुओं से लिया जाता था।

आप में से काफ़ी लोगो ने स्वतंत्रता की लड़ाई और क्रांतिकारियों के बारे में जब-जब पढ़ा होगा तो आप लोगो में भी एक राष्ट्रवाद की भावना जाग्रत होती होगी और ये भी सोचते होगे कि यदि मैं उस समय होता तो क्रांतिकारी होता तो आज ये राष्ट्र अपने भक्तो को फ़िर से आमंत्रण दे रहा है उन्हें क्रांतिकारी बनने का ओर देश पर बलिदान होने का फ़िर से मौका दे रहा है और आज फ़िर से एक स्वतंत्रता संग्राम की आवश्यकता है अन्यथा इस विश्व से विश्वगुरू सनातन सभ्यता का नामो-निशान मिट जाएगा। गीता में भी श्रीकृष्ण ने अर्जुन से कहा है-

स्वतः प्राप्त हे पार्थ ! खुले यह, स्वर्ग-द्वार के जैसा।
भाग्यवान क्षत्री ही करते, युद्ध प्राप्त हैं ऐसा।।


वंदे मातरम्
रचनाकार-सौरभ आत्रेय

शुक्रवार, 2 अक्तूबर 2009

हिंदू शब्द की उत्पत्ति १७ वीं शताब्दी में हुई.निर्लज्ज व्यक्तियों का झूंठ.

कुछ ब्लोगर्स ने आजकल हिंदू संस्कृति को बदनाम करने का ठेका ले रक्खा है वो चाहे हिंदू त्यौहार हों अथवा हिंदू देवी देवता। और इससे भी बड़ा दुख जब होता है जब हिंदू समाज के ही कुछ लोग उनके समर्थन में टिपण्णी छोड़ते है।

अभी हाल ही में मैंने एक ब्लॉग पर एक लेख पढ़ा। वह बुद्धिहीन ब्लोगर लिखता है कि "हिंदू शब्द की उत्पत्ति १७ वीं शताब्दी में हुई है।" उदहारण के रूप में उसने नेहरूकी डिस्कवरी ऑफ़ इंडिया" का उदाहरण प्रस्तुत किया है। नेहरू की वह पुस्तक नेहरू की तरह झूंठ का पुलिंदा है। नेहरू अपने आप में कितना झूठा व हिंदू विरोधी था यह सच आज सबके सामने खुलता जा रहा है।

हिंदू शब्द भारतीय विद्दवानो के अनुसार कम से कम ४००० वर्ष पुराना है।

शब्द कल्पद्रुम : जो कि लगभग दूसरी शताब्दी में रचित है ,में मन्त्र है.............

"हीनं दुष्यति इतिहिंदू जाती विशेष:"

अर्थात हीन कर्म का त्याग करने वाले को हिंदू कहते है।

इसी प्रकार अदभुत कोष में मन्त्र आता है.........................

"हिंदू: हिन्दुश्च प्रसिद्धौ दुशतानाम विघर्षने"।

अर्थात हिंदू और हिंदु दोनों शब्द दुष्टों को नष्ट करने वाले अर्थ में प्रसिद्द है।

वृद्ध स्म्रति (छठी शताब्दी)में मन्त्र है,...........................

हिंसया दूयते यश्च सदाचरण तत्पर:।
वेद्.........हिंदु मुख शब्द भाक्। "

अर्थात जो सदाचारी वैदिक मार्ग पर चलने वाला, हिंसा से दुख मानने वाला है, वह हिंदु है।

ब्रहस्पति आगम (समय ज्ञात नही) में श्लोक है,................................

"हिमालय समारभ्य यवाद इंदु सरोवं।
तं देव निर्वितं देशम हिंदुस्थानम प्रच्क्षेत ।

अर्थात हिमालय पर्वत से लेकर इंदु(हिंद) महासागर तक देव पुरुषों द्बारा निर्मित इस छेत्र को हिन्दुस्थान कहते है।

पारसी समाज के एक अत्यन्त प्राचीन ग्रन्थ में लिखा है कि,
"अक्नुम बिरह्मने व्यास नाम आज हिंद आमद बस दाना कि काल चुना नस्त"।

अर्थात व्यास नमक एक ब्र्हामन हिंद से आया जिसके बराबर कोई अक्लमंद नही था।

इस्लाम के पैगेम्बर मोहम्मद साहब से भी १७०० वर्ष पुर्व लबि बिन अख्ताब बिना तुर्फा नाम के एक कवि अरब में पैदा हुए। उन्होंने अपने एक ग्रन्थ में लिखा है,............................

"अया मुबार्केल अरज यू शैये नोहा मिलन हिन्दे।
व अरादाक्ल्लाह मन्योंज्जेल जिकर्तुं॥

अर्थात हे हिंद कि पुन्य भूमि! तू धन्य है,क्योंकि ईश्वर ने अपने ज्ञान के लिए तुझे चुना है।

१० वीं शताब्दी के महाकवि वेन .....अटल नगर अजमेर,अटल हिंदव अस्थानं ।
महाकवि चन्द्र बरदाई....................जब हिंदू दल जोर छुए छूती मेरे धार भ्रम ।

जैसे हजारो तथ्य चीख-चीख कर कहते है की हिंदू शब्द हजारों-हजारों वर्ष पुराना है।
इन हजारों तथ्यों के अलावा भी लाखों तथ्य इस्लाम के लूटेरों ने तक्ष शिला व नालंदा जैसे विश्व -विद्यालयों को नष्ट करके समाप्त कर दिए।

इसलिए मेरा सभी ब्लोगर्स से अनुरोध है कि वे किसी अध्यन हीन व बुद्धि हीन व्यक्ति की ग़लत जानकारी को सच न माने।हिंदू धर्म की बुराई करो और अपने को हिंदू कहो ,ऐसा करने से कोई हिंदू नही बन जाता।

मंगलवार, 29 सितंबर 2009

मै राष्ट्र -यज्य के लिए तुम्हारा शीश मांगने आया.

अपना शौर्य तेज भुला यह देश हुआ क्षत-क्षत है।
यह धरा आज अपने ही मानस -पुत्रों से आहत है।
अब मात्र उबलता लहू समय का मूल्य चुका सकता है।
तब एक अकेला भारत जग का शीश झुका सकता है।
एक किरण ही खाती सारे अंधकार के दल को।
एक सिंह कर देता निर्बल पशुओं के सब बल को।
एक शून्य जुड़कर संख्या को लाख बना देता है।
अंगार एक ही सारे वन को राख बना देता है।
मै आया हूँ गीत सुनाने नही राष्ट्र-पीड़ा के।
मै केवल वह आग लहू में आज नापने आया
मै राष्ट्र-यज्य के लिए तुम्हारा शीश मांगने आया ।।१

नही महकती गंध केशरी कश्मीरी उपवन में।
बारूदों की गंध फैलती जाती है आँगन में।
मलयाचल की वायु में है गंध विषैली तिरती।
सम्पूर्ण राष्ट्र के परिवेश पर लेख विषैले लिखती।
स्वेत बर्फ की चादर गिरी के तन पर आग बनी है।
आज धरा की हरियाली की पीड़ा हुई घनी है।
पर सत्ता के मद में अंधे धरती के घावों से।
अंजान बने फिरते है बढ़ते ज्वाला के लावों से।
शक्ति के नव बीज खोंजता इसीलिए ही अब मैं।
मै महाकाल का मन्त्र फूंकता तुम्हे साधने आया
मै राष्ट्र यज्य के लिए ....................................२


उठ रहा आज जो भीषण -रव यह एक जेहादी स्वर है।
एक दिशा से नही घेरता चारो और समर है।
इस जिहाद की नही कोई भी अन्तिम कही कड़ी है ।
सहस्त्र वर्ष से अधिक राष्ट्र पर इसकी नजर गढ़ी है।
निरपेक्ष मौन है किंतु सत्ता इसको खेल समझती।
अंतहीन इस रण को बस उन्माद समझ कर हंसती।
उदारवाद के बहकावों के शब्द जाल में फंसकर।
नही देखती इतिहासों के काले प्रष्ठ पलटकर।
इतिहासों की उसी कालिमा से आवृत प्रष्ठों में ।
उज्जवल इतिवृत के पन्नों को मै आज बाँचने आया
मै राष्ट्र यज्य के लिए .........................................३


itivrat के प्रष्ठ सुनहरे जो सत्ता ने फाड़ दिए हैं।
आतंकवाद के पैरों में ही गहरे गाड़ दिए हैं।
अपने जीवन-मूल्य बेच सत्ता का मोल किया है।
सत्ता के पलडे में सारा भारत तोल दिया है।
ओट अहिंसा की ले कायरता का वरण किया है।
भूतकाल के भारत के वैभव का हरण किया है।
मत पूछो क्या-क्या पाप किए है सत्ता को वरने को।
आतंकवाद सोपान बनाली सत्ता पर चढ़ने को।
इस अंतहीन आतंकवाद से आरपार करने को ।
किस -किस की नस में उबल रहा वह लहू जाँचने आया।
मै राष्ट्र-यज्य के लिए .................................................४


saikularivaad से राष्ट्रवाद का है उपहास उड़ाकर।
अल्पसंख्यकता को राष्ट्रवाद का नव परियाय बनाकर।
सैकुलरती को अल्पसंख्यकता का नूतन अर्थ दिया है।
राष्ट्रद्रोह और राष्ट्रवाद सम-अर्थी मान लिया है।
राष्ट्र -अस्मिता भी इनकी इन सोंचो से हारी है।
आतंकवाद की तुष्टि तो अब संसद पर भारी है।
नही राष्ट्र के भक्त इन्हे आतंकवाद प्यारा है।
करनी से इनके आतंक नही हर बार देश हारा है।
आतंकवाद का तिनका-तिनका जड़ -सहित नष्ट करने को।
मै राष्ट्र- प्रेम का तक्र तुम्हारे बीच बाँटने आया॥

मै राष्ट्र-यज्य के लिए ............................................५


आलोक राष्ट्र का पश्चिम की बदली में अटक गया है।
अन्धकार की राह पकड़कर सूरज भटक गया है।
सहना कोई अन्याय यह कायरता का सूचक है।
यह किसी राष्ट्र की जनशक्ति की जड़ता का सूचक है।
मात्र अहिंसा तो ऋषियों का आभूषण होती है।
par राज मार्ग पर कायरता का आकर्षण होती है।
हिंसा के प्रतिशोधों को तो युद्ध किए जाते है।
प्रस्ताव अमन के वीरों द्वारा नही दिए जाते है।
इस कायरता के संस्कार है रोपे जिसने मन में।
वह भावः अहिंसा के मन से मै आज काटने आया।
मै राष्ट्र यज्य के लिए ........................................६


युद्धों से भयभीत देश जो युद्धों से बचता है।
युद्ध स्वं उसके द्वारों पर दस्तक जा देता है।
इसलिए शत्रु की चालों में न अपने को फसने दो।
वीरों की छाती पर अब तो बस शास्त्रों को सजने दो।
यदि समय पर चूके सब कुछ राष्ट्र यह खो देगा।
फ़िर सिंहासन की एक भूल का दंड देश भोगेगा।
राष्ट्र खड़ा है पीछे तेरे रणभेरी बजने दो।
अब जनशक्ति को अश्वमेध की तैयारी करने दो।
इस महायज्य की पूत-अनल में समिधा बन जाने को।
मै धर्म-जाति के हर गह्वर को आज पाटने आया॥
मै राष्ट्र-यज्य के लिए ............................................७

रविवार, 27 सितंबर 2009

भारतीय संस्कृति के आधार यज्य को अपपतन करने की वामपंथी मानसिकता.

हमारे भारतीय ग्रंथों व गौरवशाली इतिहास को गोरे अंग्रेजो ने बदनाम करने में कोई कसर नही छोडीहै, वहीं आज काले अंग्रेज (अंग्रेजी की गुलाम मानसिकता वाले भारतीय) भी भारतीयता को बादनाम करने पर तुले है।मैंने वेदों के बारे में अपने पहले लेख मे बताया था कि किस प्रकार नेहरू ने अपनी पुस्तक डिस्कवरी ऑफ़ इंडिया में वेदों को जंगली लोगो के जंगली गीत बताया था। आज उसी कड़ी मे मै आपको एक कम्युनिस्ट नेता अमृत पाद डांगे के लिखे एक ग्रन्थ के बारे में बताऊंगा

डांगे ने भारतीय संस्कृति पर एक पुस्तक लिखी है.उस पुस्तक मे उसने ऋग्वेदीय काल की चर्चा करते हुए यज्य के बारे में लिखा है,"यज्य नाम के सामूहिक महोत्सव के प्रसंग पर खूब मांस खाकर एवं खूब मदिरा पीकर वे पुरातन कालीन लोग अग्नि के चारों ओर सो जाते थे अथवा अपनी चुनी संगिनी सहित झोपडी में विहार के लिए चले जाते थे।"

अब वेदों में यज्य के बारे मे क्या लिखा है मै आपको बताता हूँ।

ऋग्वेद के प्रथम मंडल मे ही ३६ वें वर्ग के मन्त्र ५ में बताया गया है कि,"जो यज्य धूम से शोधे हुए पवन हैं,वे अच्छे राज्य के कराने वाले होकर रोग आदि दोषों का नाश करते हैं और जो अशुद्ध ,अर्थात दुर्गंध आदि दोषों से भरे हुए है सुखों का नाश करते हैं,इससे मनुष्यों को चाहिए कि अग्नि मे होम द्वारा वायु की शुद्धि से अनेक प्रकार के सुखों को सिद्ध करें।"

सप्तम मंडल के द्वीतीय सूक्त के मन्त्र १ में बताया गया है कि,"हे !अग्नि हम आज जो तुम्हे समिधायें प्रदान करते है,उनको तुम स्वीकार करो.तुम इन संविधाओ को स्वीकार करके अच्छी तरह प्रदीप्त हो। पर्वत के ऊंचे भागों को तुम अपनी तप्त रश्मियों से स्पर्श करो और सूर्य की किरणों के साथ मिलो। पर्वत के शिखर पर भी यज्य करने चाहियें। उन यज्ञों से वायु मंडल शुद्ध होता है।"

सप्तम मंडल के द्वीतीय सूक्त में मन्त्र संख्या ८ में बताया गया है कि,"भारती देश की भाषा है। मात्रभाषा की संज्ञा भारती है.इला मात्रभूमि को कहते है। सरस्वती सतत बहने वाली संस्कृति है। मात्रभाषा,मात्रभूमि व मात्र्संस्क्रती ये तीन देवियाँ है। इन तीनो देवियों का सत्कार यज्य मे होना चाहिए। जो भी मनुष्य कर्म करे वे इन तीनो देवियों की उन्नति की द्रष्टि से किए जांय। ये तीनो देवियाँ अग्नि के ही रूप हैं। मात्रभाषा अग्नि का ही रूप है,क्यों कि अग्नि से ही वाणी उत्पन्न होती है। मात्रभूमि भी अग्नि का ही रूप है, क्यों कि भूमि अग्नि का ही स्थान है,और सभ्यता या संस्कृति भी अग्नि के सामान तेजस्वी होती है। इन तीनो देवियों की भक्ति सदा ही करनी चाहिए।"

तृतीय मंडल सूक्त ४ के मन्त्र ४ में बताया गया है कि ,"जो यज्य करता और यज्य कराने वाले हों, विद्य्वान हों,और सुंदर शुद्ध पद्धार्थों को अग्नि मै छोडे तो क्या सुख प्राप्त न होंगे।"

तृतीय मंडल के सूक्त ४ के मन्त्र ५ में बताया गया है कि ,"जो मनुष्य सुगंध्यादी युक्त पद्धार्थों के अग्नि में छोड़ने से वायु,वृष्टि,जल,ओषधि और अन्नो को अच्छे प्रकार से शोधे तो सब आरोग्य्पन को प्राप्त हों।"

यज्य के महत्त्व को बताने के लिए ऐसे कितने ही मन्त्र ऋग्वेद मे है। लेकिन नेहरू हो या हो कामरेड डांगे इनका कार्य भारतीय संस्कृति को बदनाम करने का ही रहा है। मैक्समूलर जैसा वेदों को बदनाम करने वाले व्यक्ति ने मरने से कुछ ही समय पहले ये स्वीकार किया कि भारतीय संस्कृति सनातन है। वेद कम से कम १५००० वर्ष ओर हो सकता है कि लाखों वर्ष पूर्व लिखे गए हैं।

कामरेड डांगे अरे नही डंगर ने वेदों की कभी छवि भी न देखी हो,परंतु भारतीय संस्कृति के आधार यज्य के बारे में ऐसी बात लिखने से पहले उसके मष्तिष्क में क्या खुराफात जगी होगी ये तो मै नही बता सकता।किंतु इतना जरूर कह सकता हूँ कि भारतीय संस्कृति के आधार वेदों को बदनाम करने वाले व्यक्ति चाहे कोई भी हो देशभक्त नही हो सकता।

वेदों में यज्य के बारे मे पढ़कर पता चलता है कि उस समय के ऋषियों को वायुमंडल -शुद्धि का कितना ज्ञान था,क्यों कि आज शोध हो चुका है कि १० ग्राम देशी घी को अगर १० ग्राम चावल के साथ यज्य की आहुति के साथ यज्य कि अग्नि मे अर्पित किया जाय तो वायुमंडल मे १ टन ओक्सिजन पैदा होती है। वायु मंडल में अगर ओक्सिजन की अधिकता होगी तो वायुमंडल तो शुद्ध होगा ही ,साथ ही वर्षा की पूर्ती भी रहेगी क्यो कि ओक्सिजन -हाइड्रोजन का मिश्रण ही जल की उत्पत्ति का कारण है. वेदों मे इस बात का ज्ञान लाखों वर्ष पहले ही था। अगर आज पूरे विश्व में घर -घर में प्रतिदिन यज्य होवे,तो पूरे विश्व की प्रदुषण, सूखा जैसी समस्याएँ दूर हो सकती हैं।

तो बोलो यज्य भगवान् की जय।

रविवार, 20 सितंबर 2009

संसद चालीसा

संसद से सीधा प्रसारण-संसद चालीसा

देशवासियों सुनो झलकियाँ मै तुमको दिखलाता।
राष्ट्र- अस्मिता के स्थल से सीधे ही बतियाता।
चारदीवारी की खिड़की सब लो मै खोल रहा हूँ।
सुनो देश के बन्दों मै संसद से बोल रहा हूँ।१।

रंगमंच संसद है नेता अभिनेता बने हुए हैं।
जन- सेवा अभिनय के रंग में सारे सने हुए हैं।
पॉँच वर्ष तक इस नाटक का होगा अभिनय जारी।
किस तरह लोग वोटों में बदलें होगी अब तैयारी।२।

चुनाव छेत्र में गाली जिनको मुहं भर ये देते थे।
जनता से जिनको सदा सजग ये रहने को कहते थे।
क्या-क्या तिकड़म करके सबने सांसद- पद जीते है।
बाँट परस्पर अब सत्ता का मिलकर रस पीते हैं।३।

जो धर्म आज तक मानवता का आया पाठ पढाता।
सर्वधर्म-समभाव-प्रेम से हर पल जिसका नाता।
वोटों की वृद्धि से कुछ न सरोकार उसका है।
इसीलिए संसद में होता तिरस्कार उसका है।४।

दो पक्षो के बीच राष्ट्र की धज्जी उड़ती जाती।
राष्ट्र-अस्मिता संसद में है खड़ी-खड़ी सिस्काती।
पल-पल, क्षन-क्षन उसका ही तो यहाँ मरण होता है।
द्रुपद सुता का बार-बार यहाँ चीर-हरण होता है।५।

आतंकवाद और छदम युद्ध का है जो पालनहारा।
साझे में आतंकवाद का होगा अब निबटारा।
आतंक मिटाने का उसके संग समझोता करती है।
चोरों से मिलकर चोर पकड़ने का सौदा करती है।६।

विषय राष्ट्र के एक वर्ग पर यहाँ ठिठक जाते हैं।
राष्ट्र-प्रेम के सारे मानक यहाँ छिटक जाते हैं।
अर्थ-बजट की द्रष्टि जाकर एक जगह टिकती है।
एक वर्ग की मनुहारों पर संसद यह बिकती है।7।

अफजल के बदले मे जो है वोट डालने जाते।
सत्ता की नजरों में वे ही राष्ट्र भक्त कहलाते।
आज देश की गर्दन पर जो फेर रहे हैं आरे।
उनकी वोटो से विजयी नही क्या संसद के हत्यारे।8।

सर्वोच्च अदालत ने फाँसी का जिसको दंड दिया है।
संसद ने तो उसको ही वोटो में बदल लिया है।
इसलिए आज यह देश जिसे है अपराधी ठहराता।
वही जेल मे आज बैठकर बिरयानी है खाता।9।

मौत बांटते जिसको सबने टी० वी० पर पहचाना।
धुआं उगलती बंदूकों को दुनिया भर ने जाना।
सत्ता का सब खेल समझ वह हत्त्यारा गदगद है।
हत्या का प्रमाण ढूंढती अभी तलक संसद है।10।

यहमाइक-कुर्सी फैंक वीरता रोज-रोज दिखलाती।
पर शत्रु की घुड़की पर है हाथ मसल रह जाती।
जाने क्या-क्या कर जुगाड़ यहाँ कायरता घुस आई।
फ़िर काग -मंडली मधुर सुरों का पुरुष्कार है लायी।११।

जब एक पंथ से आतंकियों की खेप पकड़ में आती।
वोट खिसकती सोच-सोच यह संसद घबरा जाती।
तब धर्म दूसरे पर भी आतंकी का ठप्पा यह धरती है।
यूँ लोकतंत्र में सैक्यूलारती की रक्षा यह करती है। १२।

लोकतंत्र में युवाओं को हिस्सा जब देने को ।
चिल्लाती जनता है इनको भी भाग वहां लेने को।
बड़ी शान से जन इच्छा का मन यह रख देती है।
बेटों को सब तंत्र सोंप जनतंत्र बचा लेती है।१३

घोटाले अरबों -खरबों के यहाँ प्राय होते हैं।
चर्चे उनके चोपालों पर सुबह -सायं होते हैं।
अधिक शोर मचने पर सोती संसद यह जगती है।
आयोग बिठाकर दौलत को चुपचाप हजम करती है।१४

जो इसी धरा पर खाते-पीते साँस हवा में लेते।
माता का सम्मान नही पर इस धरती को देते।
उनके ही पीछे राष्ट्र सौंपने संसद भाग रही है।
एक मुस्त बदले में केवल बोटें मांग रही है । १५

देश-द्रोह में लगे रहें या करे देश बर्बादी ।
दे रही छूट यह हर उस दल को है पूरी आजादी।
बस एक शर्त का अनुपालन ही उनकी जिम्मेदारी।
सिंहासन का मौन- समर्थन करे हमेशा जारी ।१६

सरकार पाक की जब जी चाहे घुड़की दे देती है।
कान दबाकर संसद उसकी सब-कुछ सुन लेती है।
बोटो के भयवश न विरुद्ध कुछ साहस है यह करती।
एक वर्ग को पाक-समर्थक संसद स्वयम समझती। १७

पहले तो शत्रु इसी धरा पर हमले ख़ुद करवाता।
फ़िर हमलों के इससे ही प्रमाण स्वयं मंगवाता।
वह दो कोडी का देश फैकता रद्दी में है उनको।
यह कायर संसद युद्ध नही,प्रमाण भेजती उसको।१८

जब विस्फोटों की गूँज भीड़ के बीचों-बीच उभरती।
दस-पॉँच जनों के तन से जब ,शोणित की धार उबलती।
लाशों के चेहरों में वोटों की गणना को जुटती है।
यूँ बार-बार सत्ता पाने के सपने यह बुनती है। १९

रचनाकार ----मेरे पिता श्री देवेन्द्र सिंह त्यागी

शनिवार, 19 सितंबर 2009

ऋग्वेद में विमान की चर्चा.

नेहरू ने अपनी पुस्तक "डिस्कवरी ऑफ़ इंडिया "में विश्व में सबसे बढे ज्ञान के स्रोत वेदों के बारे में लिखा है कि "भारत में ३००० वर्ष पूर्व जंगली मनुष्य जब भेढ़ बकरी चराया करते थे तो अपना समय काटने के लिए जो गीत गाया करते थे वे ही वेद् है।"आज नेहरू अगर जिन्दा होता तो मै उससे अवश्य पूछता कि क्या उसने कभी वेदों की प्रतियों को देखा है पढने की बात तो बहुत दूर की है। अधिकतर भारतीय लेखक भी वेदों को बिना पढ़े उनको असभ्य संस्कृति के लोगो द्वारा रचित बताते है।
जबकि वेदों के ज्ञान के बारे में बिल्कुल इसका उल्टा है।प्रथ्वी पर ऐसा कोई ज्ञान ,विज्ञानं नही है जिसकी जानकारी वेदों में न हो।वेदों के बारे में अपने इस लेख में में आपको बताऊंगा कि आज जो हवाई जहाज हवा में उड़ रहे है ,ऋग्वेद में उसकी जानकारी दी हुई है।

ऋग्वेद के प्रथम मंडल के श्लोक ७-- आ नो नावा मतीनां यातंपारे गन्तवे। युन्जाथाम्शिव्ना रथं॥
जिसका अर्थ है कि,"मनुष्यों को चाहिए कि वो रथ से स्थल,नाव से जल में तथा विमान से आकाश में आया जाया करें।"

उसके पश्चात श्लोक ८ में बताया गया है कि," कोई भी मनुष्य अग्नि,जल आदि से चलने वाले अर्थात भाप से चलने वाले यान,के बिना प्रथ्वी समुन्द्र और अन्त्रिक्ष में सुख से आने जाने में समर्थ नही हो सकता।"

९ में बताया गया है कि,"जो मनुष्य विद्ववानों की शिक्षा के अनुकूल अग्नि,जल के प्रयोग से युक्त यानो पर स्थित होके राजा-प्रजा के व्यवहार कि सिद्धि के लिए समुद्रो के छोर तक जावे-आवे तो बहुत उत्तमोत्तम धन को प्राप्त होवे।"

श्लोक १० में बताया गया है कि,"हे सवारी पर चलने वाले मनुष्यों! तुम दिशाओं को जानने वाले चुम्बक,ध्रुव यंत्र और सूर्यादि कारण से दिशाओं को जान;यानो को चलाया और ठहराया भी करो जिससे भ्रान्ति में पड़कर अन्यंत्र गमन न हो,अर्थात जहाँ जाना चाहते हो वही पहुँचो,भटकना न हो। "

इसके बाद श्लोक११ में बताया गया है कि ,"मनुष्यों को उचित है कि सर्वत्र आने-जाने के लिए सीधे और शुद्ध मार्गों को रच और विमानादि यानों से इच्छा पूर्वक गमन करके नाना प्रकार के सुखों को प्राप्त करें।"

इन श्लोकों के आलावा और भी कई जगह विमान कि चर्चा है। ऋग्वेद ज्ञानकाण्ड पर आधारित है।समस्त विश्व में जो भी आविष्कार हुए या हो रहे है उन सबका ज्ञान वेदों में है। विश्व के कितने वैज्ञानिकों ने वेदों को पढने के लिए कई कई वर्ष संस्कृत भाषा को सीखा,परन्तु हमारे देश के नेता,बुद्धिजीवी वर्ग ? ही वेदों की बुराई करने पर तुले रहते है।

मेरी ईश्वर से प्रार्थना है कि वह दिन जल्दी आए जब ज्ञान के भण्डार ये वेद् भारत के घर घर में पहुंचे और सभी इनका अध्यन करे।क्यों कि इतिहास साक्षि है कि जिस दिन से भारतीय वेदों कि शिक्षा से दूर होने लगे तभी से भारतीय समाज में विकृति शुरू हो गई।

(मैंने श्लोको को लिखने कि कोशिश कि परन्तु संस्कृत में होने के कारण शब्द ग़लत हो रहे थे,इसलिए केवल उनका भावार्थ ही लिखा है। )

बुधवार, 16 सितंबर 2009

दोहो की धारा

रखवाला तो सो रहा ,क्या होगा अब हाल।
लोकतंत्र के खेत में, घुस आए स्रंगाल ॥ १ ॥


दिल्ली की ही भूल के, भोगे हैं संत्रास ।
दिल्ली फ़िर दोहरा रही पुनः वही इतिहास ॥ 2 ॥


दिया पंथनिरपेक्षता , को इतना सम्मान।
बहुसंख्यक की आस्था, कर दी लहूलुहान ॥ ३ ॥


हुए अचानक देश में,आतंकी विस्फोट।
लगी होड़ नेताओं में,कोन बटोरे वोट ॥ ४ ॥

बेटो को ही राज का,देकर उतराधिकार ।
नेता पैनी कर रहे, लोकतंत्र की धार ॥ ५ ॥

कैसे लिक्खे लेखनी, अब फूलों के छंद।
उपवन में है फैलती,बारूदी दुर्गंध ॥ ६॥


नई आर्थिक नीतियो , का करती उपहास।
सड़क किनारे पड़ी हुई, भूखी -नंगी लाश ॥ ७ ॥

प्रातः आँगन में गिरे, आकर जब अखबार।
करने लगता तेज फ़िर,में चाकू की धार ॥ ८ ॥

पुन्य से अब पाप का, छिड़ने दो संग्राम।
धरती को शायद मिले, फ़िर से कोई राम॥


रचनाकार--मेरे पिता श्री देवेन्द्र सिंह त्यागी

मंगलवार, 15 सितंबर 2009

अफजल तो फ़िर भी बच गया.

मै अपने कुछ मित्रो के साथ मेरठ से दिल्ली जा रहा था। रास्ते में समय काटने के लिए कुछ बातचीत का दौर चल पडा , तो यात्रा में केन्द्रीय सरकार के कार्यो की मीमांसा शुरू हो गई। बात शुरू हुई अफजल की,क्योकि हमने भी अफजल गुरु की फांसी के लिए कई प्रदर्शन किए थे। खूब जुलुस निकाले और खूब गला फाड़-फाड़ कर चिल्लाये भी कि अफजल को फांसी दो,फांसी दो। हुआ कुछ नही तो एक भड़ास थी मन में, निकालनी शुरू कर दी।

हमने बात को आगे बढाते हुए कहा कि,कितने साल हो गए लेकिन सरकार अफजल को फांसी नही दे रही है और अब तो सरकार ने हद कर दी है कि केन्द्र सरकार आतंकवादियों के परिवार की पेंशन बांधने जा रही है और भी बातें आगे बढ़ी। कसाब का जिक्र हुआ, सोहराबुद्दीन का हुआ। अंत में मैंने मित्रो के साथ एक निर्णय किया कि,हम भी बहरे प्रशासन व सोई हुई हिंदू जनता को जगाने के लिए कोई ऐसा कार्य करे कि हमारी बात को पूरा मीडिया जगत पूरे देश में पहुचाये।

निर्णय भी ले लिया कि भगत सिंह जी के अनुरूप हम भी तेज धमाके वाला व धुएँ वाला कोई बम फोडेंगे । जिससे कोई व्यक्ति आह़त न हो,तथा अपनी ग्रिफतारी देकर जनता को जगायंगे। अब बात थी कि बम कहाँ फोड़ा जाय, तो तय हुआ की दिल्ली तो जा रहे है क्यो न कनाट प्लेस पर ये शुभ कार्य किया जाय। अब दिल्ली पहुचकर बम की खोज शुरू हो गई। जल्दी ही दिवाली पर छोड़े जाने वाले दो पटाखे हमे प्राप्त हो गए। और कनाट प्लेस पर जाकर फोड़ डाले और इन्तजार करने लगे मीडिया का।

परन्तु एक आर्श्चय हुआ कि भारतीय पुलिस जो हमेशा घटना के काफी देर बाद पहुचती है वो मिडिया के लोगो से पहले पहुँच गई,और हमे ग्रिफतार कर लिया गया। हमने बड़ी शान से ग्रिफ्तारी भी दे दी। परन्तु थाने तक पहुचते पहुचते सारा नजारा ही बदल गया। लगता था की पूरी दिल्ली की सारी पुलिस वहां थी ,हमने सोचा कि हमारे आलावा कोई बहुत बड़ा आतंकी भी शायद इसी थाने मे है। परन्तु जो हुआ वो तो सोचा भी न था ,कि वो सारा इंतजाम तो हमारे लिए ही था।अब हमें महसूस होने लगा कि सारा मामला ही बिगड़ गया है।

पुलिस का कोई ऑफिसर हमसे पूछ रहा था कि और कहाँ कहाँ बम फोड़ने का प्लान है?कोन से आतंकवादी संगठन से जुड़े हो?तो कोई पूछ रहा था कि इससे पहले कहाँ कहाँ बम फोडे है। अफजल को फांसी दिलाने का सारा सपना चूर-चूर होता दीख रहा था। परंतु मैंने थोडी सी हिम्मत दिखायी,और पुलिस को सारा नाटक समझाया कि हम तो सोई जनता को जगाने के लिए व बहरे शासन को अपना पक्ष सुनाने के लिए सरदार भगत सिंह के रास्ते पर चलना चाह रहे है। परंतु हमारी बात किसी ने भी नही सुनी।

एक सिपाही हमारे पास आया ,बोला बबुआ कोन आतंकवादी को फोलो कर रहे हो,बड़ा साब और मंत्री जी आपके बारे में बतिया रहे है तो मंत्री जी ही कहत रह कि इ लोगन तो ससुरा बहुत बड़े आतंकी का फोलो करता है। ससुरों को कल ही फांसी पर लटकवा दो।

पता नही रात कैसे कटी ?आँख लग ही नही पायी। सुबह सुबह एक नेताजी आए हाथ में समाचार पत्र लिए हुए थे। हमारे ऊपर फैक कर मारा कि तुम हिंदू आतंकवादी बाज नही आओगे। पहले अंग्रेजो को मार रहे थे अब हमे मारना चाहते हो। हमारी कुछ भी समझ में नही आ रहा था कि हम करे तो क्या करे ? हमे न तो कोई फोन ही करने दिया गया, और न ही मीडिया से बात।

achanak केन्द्रीय सरकार भी हरकत मे आ गई। सरकार की मीटिंग हुई। मैडम जी ने सरदार को ऑर्डर दिया की, मन्नू इन आतंकवादियों को एक महीने में फांसी हो जानी चाहिए, चुनाव नजदीक है। काफी फायदा मिलेगा। मैडम के ही एक मंत्री ने कहा कि मैडम जी बुरा न मानो तो एक बात कहूं कि इन को फांसी देने के बाद हिंदू लोग अफजल के बारे में नही पूछेंगे। बैठक में एक मिनट को सन्नाटा छा गया । परंतु मैडम की जहरीली मुस्कान चेहरे पर फैली और बोली ये तो अच्छा ही है, लगे हाथ अफजल की फांसी की घोषणा भी कर देते है,मुसलमानों को ये तो कह ही देंगे की देखो हमने मुस्लिम आतंकी को फांसी देने से पहले चार हिंदू आतंकियों को फांसी पर चढाया है। बैठक में मैडम की जय जयकार होने लगी और मीटिंग समाप्त हो गई।

आर्श्चय, एक महीने में ही हमारे विरूद्ध सारे सबूत जुटा लिए गए।सारी राजनैतिक ताकत हमारे विरूद्ध खडी हो गई । समाचार पत्र से पता लगा कि हमारे बाद अफजल को भी फांसी हो रही है,तो मन में कही थोडी खुशी हुई कि चलो हमारा बलिदान ही सही लेकिन अफजल को फांसी तो हो रही है।

अब फाँसी वाला दिन भी आ गया । हमे फाँसी के तख्ते की और ले जाया जाने लगा । हम सोच रहे थे जेल के चारो और हमारी जय जयकार हो रही होगी। परंतु कोई इंसान तो इन्सान किसी जानवर कि भी आवाज नही आई। हाँ रास्ते में मिले एक दो कैदियों ने जरूर कहा कि साले चले थे भगत सिंह बनने,अब मरो।हम भी बेशर्मी से उनकी और देखते हुए निकल गए।

अब जैसे ही हमे फांसी पर लटकाया गया तो अचानक हमारी आँख खुल गई,और अपने को अपने बिस्तर पर पसीनो से लथपथ पाया। कुछ देर तो अपने को सँभालने में लगी। पर जैसे ही अपने सपने के बारे में सोचा तो बड़ा अफ़सोस हुआ कि आँख खुलने से अफजल तो साला फ़िर भी बच गया।

ईश्वर एक नाम अनेक

ऋग्वेद कहता है कि ईश्वर एक है किन्तु दृष्टिभेद से मनीषियों ने उसे भिन्न-भिन्न नाम दे रखा है । जैसे एक ही व्यक्ति दृष्टिभेद के कारण परिवार के लोगों द्वारा पिता, भाई, चाचा, मामा, फूफा, दादा, बहनोई, भतीजा, पुत्र, भांजा, पोता, नाती आदि नामों से संबोधित होता है, वैसे ही ईश्वर भी भिन्न-भिन्न कर्ताभाव के कारण अनेक नाम वाला हो जाता है।

यथा-
जिस रूप में वह सृष्टिकर्ता है वह ब्रह्मा कहलाता है ।

जिस रूप में वह विद्या का सागर है उसका नाम सरस्वती है ।

जिस रूप में वह सर्वत्र व्याप्त है या जगत को धारण करने वाला है उसका नाम विष्णु है ।

जिस रूप में वह समस्त धन-सम्पत्ति और वैभव का स्वामी है उसका नाम लक्ष्मी है ।

जिस रूप में वह संहारकर्ता है उसका नाम रुद्र है ।

जिस रूप में वह कल्याण करने वाला है उसका नाम शिव है ।

जिस रूप में वह समस्त शक्ति का स्वामी है उसका नाम पार्वती है, दुर्गा है ।

जिस रूप मे वह सबका काल है उसका नाम काली है ।

जिस रूप मे वह सामूहिक बुद्धि का परिचायक है उसका नाम गणेश है ।

जिस रूप में वह पराक्रम का भण्डार है उसका नाम स्कंद है ।

जिस रूप में वह आनन्ददाता है, मनोहारी है उसका नाम राम है ।

जिस रूप में वह धरती को शस्य से भरपूर करने वाला है उसका नाम सीता है ।

जिस रूप में वह सबको आकृष्ट करने वाला है, अभिभूत करने वाला है उसका नाम कृष्ण है

जिस रूप में वह सबको प्रसन्न करने, सम्पन्न करने और सफलता दिलाने वाला है उसका नाम राधा है ।

लोग अपनी रुचि के अनुसार ईश्वर के किसी नाम की पूजा करते हैं । एक विद्यार्थी सरस्वती का पुजारी बन जाता है, सेठ-साहूकार को लक्ष्मी प्यारी लगती है । शक्ति के उपासक की दुर्गा में आस्था बनती है । शैव को शिव और वैष्णव को विष्णु नाम प्यारा लगता है । वैसे सभी नामों को हिन्दू श्रद्धा की दृष्टि से स्मरण करता है ।

साभार --vishvhindusamaj.org

शनिवार, 12 सितंबर 2009

कायरता की पराकाष्ठा

नेहरू से लेकर आज तक भारत के राजनेता सीमाओं से छेड़छाड़ आराम से सहन करते आए है। महाभारत में भीष्म पिता ने कहा है कि,"राष्ट्र की सीमाएं माता के वस्त्रों के सामान होती है,कोई भी बेटा जिनसे छेड़छाड़ सहन नही कर सकता."हमारे देश के नेतागण चाहे चीन हो या बांग्लादेश ,कोई भी कितना ही अतिक्रमण करले वे उसे सहन तो करते ही है साथ ही उसे भारतीय जनता से छुपाते भी है।

पिछले साल अकेले चीन ने ही भारत में घुसपैठ का लगभग २२५ बार दुस्साहस किया है। चीन ने १९५० में तिब्बत पर कब्जा करने के बाद जब लद्दाख में ओक्सिचीन पर अतिक्रमण करके निर्माण कार्य भी शुरू कर दिया था तो जानकारी के बावजूद नेहरू ने न केवल कोई कार्यवाही की बल्कि इस तथ्य को भारतीय जनता से छुपाने की पूरी कोशिश भी की। ओक्सिचीन के आलावा चीन ने शिप्कला,बारहोती,तवांग व नेफा में भी घुसपैठ करके अपने अड्डे बना लिए थे। भारत का ३८००० वर्ग किलोमीटर का भाग चीन १९५५ तक कब्जा चुका था।

बाद में संसद में हंगामा होने पर नेहरू ने जवाब दिया कि ,"वहाँ तो घास तक भी नही उगती।" नेहरू की इस बात का जवाब उस समय के रक्षा मंत्री रहे महावीर सिंह त्यागी ने जब अपनी टोपी उतारकर दिया कि, "देखो मेरे गंजे सर पर भी एक बाल नही उगता ,इसे भी काटकर चीन को सोप दो।" इस उत्तर को सुनकर नेहरू झल्लाकर संसद से बहार चले गए । इसी वर्ष भी सिक्किम से चीनियों को खदेड़ने में कई भारतीय सैनिको ने वीरगति प्राप्त की है।

आज चीन की तरफ़ से जो लगातार अतिक्रमण हो रहा है उसकी चेतावनी १९५० में ही सरकार को वीर सावरकर ने देते हुए कहा था कि, " भारत को असली खतरा चीन से है,इसलिए भारत की उत्तरी सीमा को सबसे पहले सुरक्षित किया जाय।" सावरकर की इस बात का समर्थन उस समय रहे सेना के सर्वोच्च अधिकारी जनरल करिअप्पा ने भी किया था। परन्तु सत्ता के मद में चूर नेहरू ने सावरकर की उस बात को अनसुनी कर दिया । नेहरू की वही निति आजतक जारी है । चीन बार बार भारतीय छेत्र में रोज अतिक्रमण कर रहा है, और भारत का रक्षा मंत्री लगातार कह रहा है कि चिंता की कोई बात नही। इस निति को अहिंसा नही बल्कि कायरता कहते है।

इन्ही बातों कि और इंगित करती हुई कवि श्री देवेन्द्र सिंह त्यागी की कविताओं की ये पंक्ति देखिये

दो पक्षो बीच राष्ट्र की धज्जी उड़ती जाती।
राष्ट्र-अस्मिता संसद में है खड़ी-खड़ी सिस्काती।
पल-पल क्षन-क्षन उसका ही तो यहाँ मरण होता है।
द्रुपद सुता का बार-बार यहाँ चीर-हरण होता है।

युद्धों से भयभीत देश जो युद्धों से बचता है।
युद्ध स्वं उसके द्वारों पर दस्तक जा देता है।
इसलिए शत्रु की चालों में न अपने को फसने दो।
वीरों की छाती पर अब तो शास्त्रों को सजने दो।
यदि समय पर चूके सब कुछ राष्ट्र यह खो देगा।
फ़िर सिंहासन की एक भूल का दंड देश भोगेगा।

पिछली एक सदी में इस्लाम का सबसे बड़ा बुद्धिजीवी अल्लामा इकबाल

इस्लाम में पिछली सदी में एक महानायक पैदा हुआ अल्लामा इक़बाल। सारे जहाँ से अच्छा लिखने वाले इस शायर को निसंदेह २० वीं सदी का इस्लाम का सबसे बड़ा बुद्धिजीवी व शुभ चिन्तक माना गया है। आजादी के बाद भी इस शायर को हमारे देश भारत के बुद्धिजीवी व धर्म निर्पेक्ष इस शायर की प्रसंशा करते नही अघाते।
सन १९०९ में इसी शायर ने शिकवा नाम से एक पुस्तक की रचना की और ४ वर्ष बाद इसी की पूरक एक और जवाब ऐ शिकवा की रचना की। इन पुस्तकों में इकबाल ने अल्लाह से कुछ मामूली सी शिकायत की है। इस्लाम के इस बुद्धिजीवी ने अल्लाह से शिकायत की है कि

"सारी दुनिया में हम मुसलमानों ने तुम्हारे नाम पर ही सब कुछ किया। तमाम काफिरों , दूसरे धर्मो को मानने वालो को ख़त्म कर दिया,उनकी मुर्तिया तोडी,उनकी पूरी सभ्यताये उजाड़ डाली। केवल इसलिए की वे सब तुम्हारी सत्ता को माने ,इस्लाम को कबूलें। मगर ऐ अल्लाह, तेरे लिए इतना कुछ करने वाले मुसलमानों को तूने क्या दिया? कुछ भी तो नही। उल्टे दुनिया के काफिर मजे से रह रहे है। उन्हें हूरे व नियामाते यहीं धरती पर मिल रही है, जबकि मुसलमान दुखी है। अब काफिर इस्लाम को बीते ज़माने की बात समझते है। "

इस शायर की अल्लाह से इस शिकायत पर भारत के मुस्लिम बुद्धिजीवी व हिंदू सेकुलर नेता क्या कहना चाहेंगे ? क्यो कि शिकवा को समझने के लिए अलग से बुद्धि लगाने कि आवश्यकता नही है।
भारत का एक महान लेखक खूसट खुशवंत सिंह ने तो इकबाल कि इस रचना का अंग्रेजी अनुवाद किया है और इस रचना की तारीफ़ में कसीदें पड़े है।
इस्लाम को भाईचारे का व प्रेम का संदेश देने वाला बताने वाले इस्लाम के इस बुद्धिजीवी की इस रचना को जरूर पढ़े,और समझें कि इसके लिए इस्लाम कि वो शिक्षा ही जिम्मेदार है जो इकबाल जैसे लोगो को कुरान व हादीसों से प्राप्त होती है।

सोमवार, 7 सितंबर 2009

हम भारतीय, सिकंदर महान? को सिकंदर महान क्यों माने

सिकंदर अपने पिता की मृत्यु के पश्चात् अपने सौतेले व चचेरे भाइयों को कत्ल करने के बाद मेसेडोनिया के सिंहासन पर बैठा था। अपनी महत्वकन्क्षा के कारण वह विश्व विजय को निकला। अपने आसपास के विद्रोहियों का दमन करके उसने इरान पर आक्रमण किया,इरान को जीतने के बाद गोर्दियास को जीता । गोर्दियास को जीतने के बाद टायर को नष्ट कर डाला। बेबीलोन को जीतकर पूरे राज्य में आग लगवा दी। बाद में अफगानिस्तान के क्षेत्र को रोंद्ता हुआ सिन्धु नदी तक चढ़ आया।

सिकंदर को अपनी जीतों से घमंड होने लगा था । वह अपने को इश्वर का अवतार मानने लगा,तथा अपने को पूजा का अधिकारी समझने लगा। परंतु भारत में उसका वो मान मर्दन हुआ जो कि उसकी मौत का कारण बना।

सिन्धु को पार करने के बाद भारतt के तीन छोटे छोटे राज्य थे। १--,ताक्स्शिला जहाँ का राजा अम्भी था। २--पोरस। ३--अम्भिसार ,जो की काश्मीर के चारो और फैला हुआ था। अम्भी का पुरु से पुराना बैर था,इसलिए उसने सिकंदर से हाथ मिला लिया। अम्भिसार ने भी तठस्त रहकर सिकंदर की राह छोड़ दी, परंतु भारतमाता के वीर पुत्र पुरु ने सिकंदर से दो-दो हाथ करने का निर्णय कर लिया। आगे के युद्ध का वर्णन में यूरोपीय इतिहासकारों के वर्णन को ध्यान में रखकर करूंगा। सिकंदर ने आम्भी की साहयता से सिन्धु पर एक स्थायी पुल का निर्माण कर लिया।
प्लुतार्च के अनुसार,"२०,००० पैदल व १५००० घुड़सवार सिकंदर की सेना पुरु की सेना से बहुत अधिक थी,तथा सिकंदर की साहयता आम्भी की सेना ने भी की थी। "

कर्तियास लिखता है की, "सिकंदर झेलम के दूसरी और पड़ाव डाले हुए था। सिकंदर की सेना का एक भाग झेहलम नदी के एक द्वीप में पहुच गया। पुरु के सैनिक भी उस द्वीप में तैरकर पहुच गए। उन्होंने यूनानी सैनिको के अग्रिम दल पर हमला बोल दिया। अनेक यूनानी सैनिको को मार डाला गया। बचे कुचे सैनिक नदी में कूद गए और उसी में डूब गए। "
बाकि बची अपनी सेना के साथ सिकंदर रात में नावों के द्वारा हरनपुर से ६० किलोमीटर ऊपर की और पहुच गया। और वहीं से नदी को पार किया। वहीं पर भयंकर युद्ध हुआ। उस युद्ध में पुरु का बड़ा पुत्र वीरगति को प्राप्त हुआ।

एरियन लिखता है कि,"भारतीय युवराज ने अकेले ही सिकंदर के घेरे में घुसकर सिकंदर को घायल कर दिया और उसके घोडे 'बुसे फेलास 'को मार डाला।"
ये भी कहा जाता है की पुरु के हाथी दल-दल में फंस गए थे,तो कर्तियास लिखता है कि,"इन पशुओं ने घोर आतंक पैदा कर दिया था। उनकी भीषण चीत्कार से सिकंदर के घोडे न केवल डर रहे थे बल्कि बिगड़कर भाग भी रहे थे। ----------------अनेको विजयों के ये शिरोमणि अब ऐसे स्थानों की खोज में लग गए जहाँ इनको शरण मिल सके। सिकंदर ने छोटे शास्त्रों से सुसज्जित सेना को हाथियों से निपटने की आज्ञा दी। इस आक्रमण से चिड़कर हाथियों ने सिकंदर की सेना को अपने पावों में कुचलना शुरू कर दिया।"
वह आगे लिखता है कि,"सर्वाधिक ह्रदयविदारक द्रश्य यह था कि, यह मजबूत कद वाला पशु यूनानी सैनिको को अपनी सूंड सेपकड़ लेता व अपने महावत को सोंप देता और वो उसका सर धड से तुंरत अलग कर देता। --------------इसी प्रकार सारा दिन समाप्त हो जाता,और युद्ध चलता ही रहता। "
इसी प्रकार दियोदोरस लिखता है की,"हाथियों में अपार बल था,और वे अत्यन्त लाभकारी सिद्ध हुए। अपने पैरों के तले उन्होंने बहुत सारे यूनानी सैनिको को चूर-चूर कर दिया।
कहा जाता है की पुरु ने अनाव्यशक रक्तपात रोकने के लिए सिकंदर को अकेले ही निपटने का प्रस्ताव रक्खा था। परन्तु सिकंदर ने भयातुर उस वीर प्रस्ताव को अस्वीकार कर दिया था।
इथोपियाई महाकाव्यों का संपादन करने वाले श्री इ० ए० दब्ल्यु०बैज लिखते है की,"जेहलम के युद्ध में सिकंदर की अश्व सेना का अधिकांश भाग मारा गया। सिकंदर ने अनुभव किया कि यदि में लडाई को आगे जारी रखूँगा,तो पूर्ण रूप से अपना नाश कर लूँगा।अतः उसने युद्ध बंद करने की पुरु से प्रार्थना की। भारतीय परम्परा के अनुसार पुरु ने शत्रु का वद्ध नही किया। इसके पश्चात संधि पर हस्ताक्षर हुए,और सिकंदर ने पुरु को अन्य प्रदेश जीतने में सहायता की"।
बिल्कुल साफ़ है की प्राचीन भारत की रक्षात्मक दिवार से टकराने के बाद सिकंदर का घमंड चूर हो चुका था। उसके सैनिक भी डरकर विद्रोह कर चुके थे । तब सिकंदर ने पुरु से वापस जाने की आज्ञा मांगी। पुरु ने सिकंदर को उस मार्ग से जाने को मना कर दिया जिससे वह आया था। और अपने प्रदेश से दक्खिन की और से जाने का मार्ग दिया।
जिन मार्गो से सिकंदर वापस जा रहा था,उसके सैनिको ने भूख के कारण राहगीरों को लूटना शुरू कर दिया।इसी लूट को भारतीय इतिहास में सिकंदर की दक्खिन की और की विजय लिख दिया। परंतु इसी वापसी में मालवी नामक एक छोटे से भारतीय गणराज्य ने सिकंदर की लूटपाट का विरोध किया।इस लडाई में सिकंदर बुरी तरह घायल हो गया।
प्लुतार्च लिखता है कि,"भारत में सबसे अधिक खुन्कार लड़ाकू जाती मलावी लोगो के द्वारा सिकंदर के टुकड़े टुकड़े होने ही वाले थे,---------------उनकी तलवारे व भाले सिकंदर के कवचों को भेद गए थे।और सिकंदर को बुरी तरह से आहात कर दिया।शत्रु का एक तीर उसका बख्तर पार करके उसकी पसलियों में घुस गया।सिकंदर घुटनों के बल गिर गया। शत्रु उसका शीश उतारने ही वाले थे की प्युसेस्तास व लिम्नेयास आगे आए। किंतु उनमे से एक तो मार दिया गया तथा दूसरा बुरी तरह घायल हो गया।"
इसी भरी markat में सिकंदर की गर्दन पर एक लोहे की lathi का प्रहार हुआ और सिकंदर अचेत हो गया। उसके अन्ग्रक्षक उसी अवस्था में सिकंदर को निकाल ले गए। भारत में सिकंदर का संघर्ष सिकंदर की मोत का कारण बन गया।
अपने देश वापस जाते हुए वह बेबीलोन में रुका। भारत विजय करने में उसका घमंड चूर चूर हो गया। इसी कारण वह अत्यधिक मद्यपान करने लगा,और ज्वर से पीड़ित हो गया। तथा कुछ दिन बाद उसी ज्वर ने उसकी जान ले ली।
स्पष्ट रूप से पता चलता है कि सिकंदर भारत के एक भी राज्य को नही जीत पाया । परंतू पुरु से इतनी मार खाने के बाद भी इतिहास में जोड़ दिया गया कि सिकंदर ने पुरु पर जीत हासिल की।भारत में भी महान राजा पुरु की जीत को पुरु की हार ही बताया जाता है।यूनान सिकंदर को महान कह सकता है लेकिन भारतीय इतिहास में सिकंदर को नही बल्कि उस पुरु को महान लिखना चाहिए जिन्होंने एक विदेशी आक्रान्ता का मानमर्दन किया।

शनिवार, 5 सितंबर 2009

संसद से सीधा प्रसारण-संसद चालीसा भाग १

देशवासियों सुनो झलकियाँ मै तुमको दिखलाता।
राष्ट्र- अस्मिता के स्थल से सीधे ही बतियाता।
चारदीवारी की खिड़की सब लो मै खोल रहा हूँ।
सुनो देश के बन्दों मै संसद से बोल रहा हूँ।१।

रंगमंच संसद है नेता अभिनेता बने हुए हैं।
जन- सेवा अभिनय के रंग में सारे सने हुए हैं।
पॉँच वर्ष तक इस नाटक का होगा अभिनय जारी।
किस तरह लोग वोटों में बदलें होगी अब तैयारी।२।

चुनाव छेत्र में गाली जिनको मुहं भरके देते थे।
जनता से जिनको सदा सजग रहने को कहते थे।
क्या-क्या तिकड़म करके सबने संसद पद जीते है।
बाँट परस्पर अब सत्ता का रस मिलकर पीते हैं।३।

जो धर्म आज तक आया मानवता का पाठ पढाता।
सर्वधर्म-समभाव-प्रेम से हर पल जिसका नाता।
वोटों की वृद्धि से कुछ न सरोकार उसका है।
इसलिए संसद में होता तिरस्कार उसका है।४।

दो पक्षो बीच राष्ट्र की धज्जी उड़ती जाती।
राष्ट्र-अस्मिता संसद में है खड़ी-खड़ी सिस्काती।
पल-पल क्षन-क्षन उसका ही तो हाय मरण होता है।
द्रुपद सुता का बार-बार यहाँ चीर-हरण होता है।५।

आतंकवाद और छदम युद्ध का है जो पालनहारा।
साझे में आतंकवाद का होगा अब निबटारा।
आतंक मिटाने का उसके संग समझोता करती है।
चोरों से मिलकर चोर पकड़ने का दावा करती है।६।

विषय राष्ट्र के एक वर्ग पर यहाँ ठिटक जाते हैं।
राष्ट्र-प्रेम के सारे मानक यहाँ छिटक जाते हैं।
अर्थ-बजट की द्रष्टि जाकर एक जगह टिकती है।
एक वर्ग की मनुहारों पर संसद यह बिकती है।7.

अफजल के बदले मे जो है वोट डालने जाते।
सत्ता की नजरों में वे ही राष्ट्र भक्त कहलाते।
आज देश की गर्दन पर जो फेर रहे हैं आरे।
उनकी वोटो से विजयी नही क्या संसद के हत्यारे।8.

सर्वोच्च अदालत ने फाँसी का जिसको दंड दिया है।
सांसद ने तो उसको ही वोटो में बदल लिया है।
इसलिए आज यह देश जिसे है अपराधी ठहराता।
वही जेल मे आज बैठकर बिरयानी है खाता।9.

मौत बांटते जिसको सबने टी० वी० पर पहचाना।
धुआं उगलती बंदूकों को दुनिया भर ने जाना।
सत्ता का सब खेल समझ वह हत्त्यारा गदगद है।
हत्या का प्रमाण ढूंढती अभी तलक संसद है।10.

यह माइक-कुर्सी फैंक वीरता रोज-रोज दिखलाती।
पर शत्रु की घुड़की पर है हाथ मसल रह जाती।
जाने क्या-क्या कर जुगाड़ यहाँ कायरता घुस आई।
फ़िर भांड-मंडली मधुर सुरों का पुरुष्कार है लायी।११।

जब एक पंथ से आतंकियों की खेप पकड़ में आती।
वोट खिसकती सोच-सोच यह संसद घबरा जाती।
तब धर्म दूसरे पर भी आतंकी का ठप्पा यह धरती है।
यूँ लोकतंत्र में सैक्युलरती की रक्षा यह करती है। १२।
क्रमशः

शनिवार, 22 अगस्त 2009

भारतीय क्रांति की एक अति रोमांचकारी व साहसिक घटना.

१८ अप्रैल १९३० को चटगाव कांड(क्रांतिकारियों ने शस्त्रागार पर हमला कर दिया था.) के बाद सारा बंगाल क्रांति की ज्वाला से धधक उठा। वहीं अंग्रेजो ने भी एक एक व्यक्ति पर नजर रखनी शुरू कर दी,तथा क्रांतिकारियों के दमन की प्रक्रिया तेज कर दी।
२४ दिसम्बर १९३० को एक ऐसी घटना घटी जिसने पूरी अंग्रेजी सत्ता को झकझोर कर रख दिया। पूरे विश्व का ध्यान इस घटना ने अपनी और खीच लिया। क्यों कि इस घटना को अंजाम देने वाली १४ वर्षीय दो मासूम स्कूली छात्राएं थी। जिनके नाम थे शान्ति घोष व सुनीति चौधरी।
चट्गावं कांड के बाद पूर्वी बंगाल में प्रय्तेक नागरिक को परिचय पत्र दिया जाने लगा। किसी भी व्यक्ति से कहीं भी परिचय पत्र माँगा जा सकता था। ऐसा न करने पर गोली तक मारने के भी आदेश थे। क्रांतिकारियों का एक स्थान से दूसरे स्थान पर जाना बहुत ही कठिन हो गया था। इतनी कठोर व्यवस्था होने पर भी त्रिपुरा के जिला मजिस्ट्रेट को जान से मरने के पत्र मिल रहे थे। क्यों कि परिचय पत्र वाली व्यवस्था में उसका भी बड़ा हाथ था।
मजिस्ट्रेट स्तिवेंशन की सुरक्षा बहुत ही कड़ी कर दी गई।स्तिवेंशन ने एक प्रकार से अपने को नजरबन्द कर लिया था।
२४ दिसम्बर १९३० को देश भक्ति की प्रेरणा से वे दो छोटी बालिका मजिस्ट्रेट के बंगले पर पहुँची। गेट पर सिपाही ने रोककर आने का कारण पूंछा। इस पर उन छात्रायों ने कहा की लड़कियों की तेराकी प्रतियोगिता है।साहब से प्रार्थना पत्र पर साइन कराने है कि उस दिन वहां से कोई स्टीमर और नौका न निकले। लड़कियों की भोली सूरत देखकर सिपाही ने स्टीवेंसन से फोन पर बात की ,स्टीवेंसन ने दोनों लड़कियों को अन्दर बुला लिया। आगे जासूसी विभाग के लोगो ने रोककर पूछताछ की।स्टीवेंसन अपने कमरे से बहार आया और उनके प्रार्थना पत्र को देखते हुए कहा कि ये कार्य तो पुलिस का है,में इसको पुलिस ऑफिसर को फोरवर्ड कर देता हूँ।लड़कियों ने कहा ठीक है। जैसे ही मेज पर पत्र रखकर उसने साइन करने शुरू किए,दोनों भोली भाली लड़कियों ने माँ दुर्गा का रूप धारण कर लिया और तुंरत पिस्तोलें निकली और ५-५ गोलियां मजिस्ट्रेट पर बरसा दी।जब तक कोई समझ पाता स्टीवेंसन धरती पर गिर चुका था और दम तोड़ दिया था।
शान्ति व सुनीति ने अपनी-अपनी पिस्तोलें फैक दी और वन्देमातरम के नारों से मजिस्ट्रेट का बंगला गूंजा दिया।दोनों को बंदी बना लिया गया। नाबालिक होने के कारण दोनों को काले पानी की सजा दी गई।रिहा होने के बाद वो कहाँ गई ,उनका क्या हुआ,इस बात का विवरण मुझे नही मिल पाया है
इन १४ वर्षीय लड़कियों के कारनामे से पूरा देश रोमांचित हो गया था। शान्ति घोष व सुनीति चौधरी भारतीय क्रांति की सबसे छोटी उम्र की क्रांतिकारी थी। इनके बलिदान को सत्ता भुनाने वाले लोगो ने व्यर्थ कर दिया। छोटे छोटे बच्चों को बचपन से ही गाँधी को बापू व नेहरू को चाचा बताकर रटवाया जाता है। परंतु ऐसी क्रांतिकारी लड़कियों को इतिहास से भुला दिया जाता है।
हमारे बच्चों को अगर ऐसे क्रांतिकारिओं का भी इतिहास में पढाया जाता,तो हमारी आने वाली पीढी का भविष्य उज्ज्वलता के शिखर पर होता,और उन्हें भी पता चलता कि देश गाँधी की अहिंसा से नही बल्कि ऐसे बलिदानों से स्वतन्त्र हुआ है।

शुक्रवार, 21 अगस्त 2009

वतन पे मरने वालों का यही बाकि निशाँ होगा.

भारतीय स्वतंत्रता संग्राम में एक क्रांतिकारी थे भगवतीचरण वोहरा। भगत सिंह जी का पूरा संगठन उनको बड़ा भाई मानता था। उनकी धर्मपत्नी का नाम था दुर्गा, और यही दुर्गा इतिहास में दुर्गा भाभी का नाम पाकर अमर हो गई।
जिस समय सरदार भगत सिंह जी व उनके साथियों ने लाला लाजपत राय जी की म्रत्यु का बदला लेने के लिए दिन दहाड़े सांडर्स को गोलियों से उड़ा दिया था। तो अंग्रेज एकदम बोखला गए थे। उन्होंने चप्पे चप्पे पर क्रांतिकारियों को पकड़ने के लिए निगरानी शुरू कर दी। क्रांतिकारियों के लाहोर से निकलने में दुर्गा भाभी का योगदान अविस्मरनीय है।
उस समय भगवतीचरण वोहरा फरार थे। दुर्गा भाभी लाहोर की एक छोटी सी गली में एक मकान में रह रही थी। भगत सिंह जी की पत्नी बनकर उन्होंने भगतसिंह व राजगुरु को लाहोर स्टेशन से लखनऊ तक पहुचाया। उनके साथ उनका पुत्र शचीन्द्र भी था। राजगुरु जी उन के नोकर के रूप में थे। इसके बाद भगत सिंह व बटुकेश्वर दत्त ने दिल्ली असेम्बली में बम फैंका, और अपनी ग्रिफतारी दे दी।उसके पश्चात् जब भगत सिंह, राजगुरु व सुखदेव को फांसी की सजा हो गई तब दुर्गा भाभी,सुसीला दीदी तथा साथियों ने मिलकर जेल से भगत सिंह व साथियों को छुटाने के लिए एक योजना बनाई । इसके अर्न्तगत दिल्ली में एक छोटी सी बम फैक्ट्री बनाई गई। इसमे बने बम का परिक्षन करते हुए दुर्गा भाभी के पति वोहरा जी की मौत हो गई। पति की म्रत्यु के पश्चात् दुर्गा भाभी ने भगत सिंह को छुड़ाने का कार्य अपने हाथ में ले लिया। परन्तु दुर्भाग्य से उस बम फैक्ट्री में विष्फोट हो गया,और दुर्गा भाभी व साथियों को भूमिगत होना पड़ा।दुर्गा भाभी की सारी संपत्ति जब्त कर ली गई,किंतु वे अपने पथ पर अग्रसर होती रही। वे भगत सिंह की रिहाई के लिए गाँधी से भी मिली,किंतु कोई फायदा नही हुआ।
भगत सिंह व साथियों को फंसी लगने के बाद वे अत्यन्त दुखी हुई। उन्होंने अंग्रेजों से बदला लेने के लिए पुलिस कमिश्नर को मारने का निर्णय किया। उन्होंने अपना बच्चा अपने एक रिश्तेदार के पास छोड़ दिया। अपनी इस योजना को कार्य रूप देने के लिए वे मुंबई जा पहुची।
एक रात काली साडी पहनकर वे कमिश्नर के बंगले पर जा पहुची। क्रन्तिकारी प्रथ्वी सिंह उनके साथ थे। कुछ अंग्रेज कमिश्नर के बंगले की और से आते दिखाई दिएदुर्गा भाभी अत्यन्त आवेश व गुस्से में थी। उन्होंने तुंरत गोली चला दी। कमिश्नर उन लोगों में नही था। गोली लगने से तीन अंग्रेज घायल हो गए।वहाँ से भागकर उन्होंने तुंरत मुंबई को छोड़ दिया। काफी समय तक वो पुलिस से बचती रही। लेकिन बाद में गिरफ्तार हो गयीं। सबूतों के अभाव के कारण उनको कोई सजा तो नही हुई किंतु फ़िर भी उनको नजरबन्द रक्खा गया,तथा बाद में रिहा कर दिया गया।
उनके सभी साथी शहीद हो चुके थे। वे बिल्कुल बेसहारा हो चुकी थी। अंत में थक हारकर बैठने के बजाय वे समाज सेवा में लग गई। १९३७ से १९८२ तक वे लखनऊ में वे एक शिक्षा केन्द्र चलाती रही। उसके बाद वे गाजियाबाद में आकर बस गई। १५ ओक्टुबर १९९९ को उनका स्वर्गवास हो गया। उनकी मौत एक गुमनामी की मौत रही। उनकी शवयात्रा में देश का कोई बड़ा नेता तो नेता गाजियाबाद का भी कोई क्षेत्रिय नेता भी शामिल नही हुआ।हाँ कुछ पत्रकारों द्बारा सरकार की खिल्ली जरूर उडाई गई।

तुम सो रहे हो नोजवानो देश बिकता है,
तुम्हारी संस्कृति का है खुला परिवेश बिकता है।
सिंहासनों के लोभियों के हाथ में पड़कर ,
तुम्हारे देश के इतिहास का अवशेष बिकता है ।
पिशाचों से बचालो देश को,अभिमान ये होगा,
तुम्हारा राष्ट्र को अर्पित किया सम्मान ये होगा।

गुरुवार, 20 अगस्त 2009

केवल हिंदू ही राष्ट्र है.

किसी भी देश की उन्नति उस देश में रहने वाले उस समुदाय से होती है,जो कि उस देश की धरती को अपनी मात्र भूमि, पितृ भूमि व पुज्य्भूमि मानता है। जिसकी निष्ठां देश को समर्पित हो। भारत में रहने वाला ऐसा समाज केवल हिंदू है,और हिंदू की परिभाषा भी यही कहती है कि जो व्यक्ति भारत भूमि को अपनी मात्रभूमि, पितृ भूमि ,व पुण्यभूमि मानता है वह हिंदू है । ऐसे में कहा जा सकता है कि मुसलमान व इसाई को छोढ़कर भारत में प्रय्तेक पंथ को मानने वाला व्यक्ति, चाहे वह सनातनी हो,बोद्ध हो,जैन हो,सिक्ख हो , हिंदू है।
कुछ लोग इस बात को जरूर पूछना चाहेंगे की मुसलमान व इसाई हिंदू क्यो नही है? तो इसका कारण है उनकी पुन्य भूमि।एक मुसलमान मुसलमान पहले है भारतीय बाद में। क्यो कि भारत से ज्यादा उसका लगाव अरब से है ,मक्का से है। इसी प्रकार एक इसाई भारत से पहले जेरूसलम को पूजता है। उस पोप की आज्ञा उसकी उस राष्ट्रभक्ति पर भारी पड़ती है जो उसे वेटिकन सिटी से मिलती है।
भारत में जो भी हिस्सा हिंदू बहुल नही रहता वह हिस्सा या तो अलग हो जाता है या फ़िर अलग होने का प्रयास शुरू कर देता है। यूँ तो भारत में खालिस्तान की मांग भी उठी किंतु आम सिक्ख खालिस्तान का कभी समर्थक नही रहा। आज का जो पकिस्तान व बांग्लादेश है वह इस बात का सबसे बड़ा उदहारण है कि हिंदू कम होने पर वह हिस्सा भारत से कट गया। कश्मीर की समस्या पूरे विश्व के सामने है। इस समस्या का कारण सिर्फ़ वहाँ पर मुसलमानों की बहुलता होना है।आसाम की स्थिति भी मुस्लिमो की आबादी तेजी के साथ बढ़ने के कारण हाथ से निकलती जा रही है। वहां पर मुसलमानों ने चुनाव में अपने लिए अलग विधानसभा सीटों की मांग शुरू कर दी है।
नागालेंड,मिजोरम मेघालय की स्थिति इसलिए जटिल होती जा रही है क्यों कि ये राज्य इसाई बहुसंख्यक हो चुके है,और स्वतंत्र इसाई राष्ट्र की मांग कर रहे है। इनमे विदेशी पादरियों की भूमिका स्पष्ट दिखाई देती है।
स्वामी विवेकानंद के अनुसार "जब कोई हिंदू धर्म परिवर्तन करता है तब एक हिंदू ही कम नही होता ,बल्कि उसका एक शत्रु भी बढ़ जाता है। "
बाबा भीमराव आंबेडकर ने भी लिखा है कि "जब एक हिंदू का धर्मान्तरण होता है तो वह राष्ट्र वाद से बिल्कुल कट जाता है ।उसकी भक्ति मक्का व वेटिकन सिटी से जुड़ जाती है।
इन दो महापुरुषों ने भी यही बात अपने उपरोक्त शब्दों में स्पष्ट रूप से बता दी है कि भारत में राष्ट्र वाद केवल हिंदू में है। बाकि सब राष्ट्र विरोधी है।
भारत एक धर्मनिरपेक्स देश है। परन्तु देखिये की कश्मीर व नागालैंड में आप लोग जमीन नही खरीद सकते, केवल मात्र इसलिए की वो प्रदेश मुस्लिम बाहुल्य व इसाई बाहुल्य हैं।ये तो धर्म के नाम पर साफ बंटवारा है।
अतःस्पष्ट है की भारत में राष्ट्रवाद व हिंदू समाज दोनों ही एक शब्द के पर्यायवाची है। भारत में राष्ट्र व राष्ट्रवाद वहीं है जहाँ हिंदू बाहुल्य में है,अन्यथा भारत के कई टुकड़े हो चुके है।